भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( ३२२ ) पञ्चतन्त्रम् । श्रुतिका अर्थ नहीं जानते। वहां तो ऐसा कहा है अजोंसे यज्ञ करना चाहिये। सो अज नाम सप्तवर्षीय व्रीहिधान्यका हे नकि पशुविशेषका। कहा है- वृक्षांश्छित्त्वा पशून्हत्वा कृत्वा रुधिरकर्दमम्। यद्येवं गम्यते स्वर्गे नरकः केन गम्यते ॥ १०७ ॥ वृक्षोंका छेदन, पशुओंका मारण कर उनके रुधिरकी काच करनेसे यदि स्वर्ग होता है तो नरक कौनसे कर्मोंसे होता है ॥ १०७॥ तन्न अहं भक्षयिष्यामि । परं जयपराजयनिर्णयं करिष्यामि । किन्तु अहं वृद्धो दूराद्युवयोः भाषान्तरं सम्यक् न शृणोमि । एवं ज्ञात्वा मम समीपवर्त्तिनौ भूत्वा मम अग्रे न्यायं वदतम् । येन विज्ञाय विवादपरमार्थं वचो वदतो मे परलोकबाधो न भवति । उक्तञ्च यतः- सो मैं भक्षण नहीं करूंगा। परन्तु जय पराजयका निर्णय कर दूंगा। किन्तु मैं वृद्ध हूं दूरसे तुम दोनोंके भाषणको भली प्रकार नहीं सुन सकता। ऐसा जानकर मेरे निकटवर्ती होकर मेरे आगे अपना न्याय कहो जिसको जान- कर विवादका परमार्थ वचन कहते हुए मुझे परलोककी बाधा नहो। कहाहै- मानाद्वा यदि वा लोभात्क्रोधाद्वा यदि वा भयात् । यो न्यायमन्यथा ब्रूते स याति नरकं नरः ॥ १०८ ॥ मान, लोभ, क्रोध या भयसे जो न्यायको अन्यथा कहताहै वह मनुष्य नर- कको जाता है ॥ १०८ ॥ पञ्च पश्वनृते हन्ति दश हन्ति गवानृते । शतं कन्यान्ृते हन्ति सहस्रं पुरुषानृते ॥ १०९ ॥ मनुष्यके पशु विषयक झूठ बोलनेमें पांच पुरुषकी, गौके निमित्त दशकी, कन्याके निमित्त सौकी, पुरुष विषयक मिथ्या कहनेमें सहस्र पुरुषकी हत्या लगतीहै ॥ १०९ ॥ उपविष्टः सभामध्ये यो न वक्ति स्फुटं वचः । तस्माद्दूरेण स त्याज्यो न्यायो वा कीर्त्तयेद्ऋतम् ॥ ११० ॥ सभाके बीचमें स्थित होकर जो पुरुष स्पष्ट वचन नहीं बोलता है उसको वहांसे निकालदे अथवा वह सत्य कहदे ॥ ११० ॥