पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ३२५ ) देशकालके न जाननेवाले परिणाममे कटु जो अप्रिय अपनेको लघु करने- वाला कारण रहित बचन बोलता है वह बचन नही किन्तु विष है ॥ ११३ ॥ बलोपपन्नोऽपि हि बुद्धिमान्नरः परं नयेन्न स्वयमेव वैरिताम् । भिषङ्गममास्तीति विचिन्त्य भक्षये- दकारणात्को हि विचक्षणो विषम् ॥ ११४ ॥ बुद्धिमान् मनुष्य बलको प्राप्त हुआभी स्वय दूसरेको अपना शत्रु न बनावे मेरा चिकित्सक है ऐसा विचार कोई अकारण विषको नहीं खाता है॥ ११४ ॥ परपरिवादः परिषदि न कथञ्चित्पण्डितेन वक्तव्यः । सत्यमपि तन्न वाच्यं यद्युक्तमसुखावहं भवति ॥ ११५ ॥ सभामें पराई निन्दा पडितको किसी प्रकार कहनी उचित नहीं है जो कहने- से दूसरेको बुरी लगे वह सत्य हो तो भी न कहे ॥ ११५ ॥ सुहृद्भिरातैरसकृद्विचारितं स्वयञ्च बुद्ध्या प्रविचारिताश्रयम् । करोति कार्य्यं खलु यः स बुद्धिमान् स एव लक्ष्म्या यशसाञ्च भाजनम् ॥ ११६ ॥ ” सुहृद् और आप्त पुरुषोंसे बारंबार विचार किये हुए तथा अपनी बुद्धिसे विचार कर जो कार्य करता है वही बुद्धिमान् है वही लक्ष्मी और यशका पात्र होता है ॥ ११६ ॥ ” एवं विचिन्त्य काकोऽपि प्रयातः । तदा प्रभृति अस्माभिः सह कौशिकानाम् अन्वयगतं वैरमस्ति ? ” मेघवर्ण आह- “तात ! एवं गते अस्माभिः किं कृत्यमस्ति” । स आह,- “वत्स ! एवं गतेऽपि षाड्गुण्यात् अपरः स्थूलोऽभिप्रायोऽस्ति तमङ्गीकृत्य स्वयमेव अहं तद्विजयाय यास्यामि रिपून् वञ्च- यित्वा वधिष्यामि । उक्तञ्च यतः- ऐसा विचार कर काकभी चला गया । उस दिनसे हमारे साथ उल्लुओंका वंशक्रमागत वैर है”। मेघवर्ण बोला,-“तात ऐसा होनेमे हमको क्या कर्तव्य है”। वह बोला-“वत्स ऐसा होनेमें भी षट् सन्धि आदिके सिवाय एक महान् अन्य