भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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: मुझको डालदे। और तू ऋष्यमूक पर्वतके निकट जाकर वहा परिवारके सहित : स्थित हो। जबतक मै सब शत्रुओंको अपने आचरणकी विधिसे विश्वासी कर : सन्मुख कर कृतार्थहो दुर्गको जानकर दिनके मध्यमे अघताको प्राप्त हुए उनको : जानकर मार डालू। जाना है मैने भली प्रकार। हमारी सिद्धि अन्यथा न होगी। : कारण कि हमारा आवास दुर्गम निकलनेके उपायसे शून्य केवल वधके लिये : होगा। कारण कहा है कि- : अपसारसमायुक्तं नयज्ञैर्दुर्गमुच्यते। : अपसारपरित्यक्तं दुर्गं व्याजेन बन्धनम् ॥ १२५ ॥ : नीति जाननेवालोंने निकलनेके उपायसे युक्त ही दुर्गकी प्रशसा की है (१) : अपसारके बिना दुर्ग कारावासकी समान है ॥ १२५ ॥ : न च त्वया मदर्थे कृपा कार्या। उक्तञ्च- : तुझे मेरे निमित्त कृपा करनी नहीं चाहिये। कहाहै- : अपि प्राणसमानिष्टान्पालिताँल्लालितानपि। : भृत्यान्युद्धे समुत्पन्ने पश्येच्छुष्कमिवेन्धनम् ॥ १२६ ॥ : प्राणोंकी समान प्यारे पालित और लालित भृत्योंको युद्धके उत्पन्न होनेमें : सूखे काठको अग्निमे जैसे प्रेरण करे ॥ १२६ ॥ : तथाच- : और देखो- : प्राणवद्रक्षयेद्भृत्यान्स्वकायमिव पोषयेत्। : सदैकदिवसस्यार्थे यत्र स्याद्रिपुसंगमः ॥ १२७ ॥ : भृत्योंको प्राणकी समान रक्षा करे अपने कायाकी नाई पुष्ट करे यह उसी : एक दिनके निमित्त है जब शत्रु का संगमहो ॥ १२७ ॥ : तत् त्वया अहं न अत्रविषये प्रतिषेधनीयः"। इत्युक्त्वा तेन : सह शुष्ककलहं कर्तुमारब्धः। अथ अन्ये तस्य भृत्याः स्थिर- : जीविनमुच्छ्रंखलवचनैर्जल्पन्तमवलोक्य तस्य वधाय उद्यताः : मेघवर्णेन अभिहिताः- "अहो ! निवर्तध्वं यूयम्। अहमेव : अस्य शत्रुपक्षपातिनो दुरात्मनः स्वयं निग्रहं करिष्यामि”। : १-निकलनेका मार्ग।