भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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[Header] भाषाटीकासमेतम् । ( ३४५ )

हे भद्र! आपका शुभागमनहो कहो मै तुम्हारा क्या प्रिय करू दुख मत मानना तुम अपने घरमेंही प्राप्त हो ॥ १६४ ॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच विहंगमम् । कपोत खलु शीतं मे हिमत्राणं विधीयताम् ॥ १६५ ॥ उसके यह वचन सुन ( वह व्याधा ) पक्षीसे बोला हे कबूतर, मुझे जाडा बहुत लगता है जाडेसे बचाओ ॥ १६५ ॥ स गत्वाङ्गारकं नीत्वा पातयामास पावकम् । ततः शुष्केषु पर्णेषु तमाशु समदीपयत् ॥ १६६ ॥ तब वह जाकर ( चोंचमें ) अगारेकी लकडी लाकर अग्निको गिराता हुआ और फिर सूखे पत्तोंमे उसको जलाता हुआ ॥ १६६ ॥ सुसन्दीप्तं ततः कृत्वा तमाह शरणागतम् । सन्तापयस्व विश्रब्धं स्वगात्राण्यत्र निर्भयः । न चास्ति विभवः कश्चिन्नाशये येन ते क्षुधम् ॥ १६७ ॥ अग्निको दीप्तकर उस शरणमे आये हुएसे बोला अब निर्भय होकर तुम अपने गात्रको तपाओ और कुछ वैभव तो है नहीं जिससे तुम्हारी क्षुधा निवृत्त करूं ॥ १६७ ॥ सहस्रं भरते कश्चिच्छतमन्यो दशापरः । मम त्वकृतपुण्यस्य क्षुद्रस्यात्मापि दुर्भरः ॥ १६८ ॥ कोई सहस्रको, कोई सौको, कोई दशको पालन करताहै अपुण्यकारी मुझ क्षुद्रका शरीर तो एककी तृप्तिके निमित्त भी पूर्ण नहींहै ॥ १६८ ॥ एकस्याप्यतिथेरन्नं यः प्रदातुं न शक्तिमान् । तस्यानेकपरिक्लेशे गृहे किं वसतः फलम् ॥ १६९ ॥ जो एक अतिथिको भी अन्नदेनेकी सामर्थ्य नहीं रखता उसका अनेक क्लेश- -वाले घरमे रहनेसे क्या फलहै ? ॥ १६९ ॥ तत्तथा साधयाम्येतच्छरीरं दुःखजीवितम् । यथा भूयो न वक्ष्यामि नास्तीत्यर्थिसमागमे ॥ १७० ॥ सो इस दुःख जीवित शरीरको इस प्रकारसे साधन करूंगा कि जो फिर अर्थीके समीप मेरे पास कुछ नहीं ऐसा न कहसकू ॥ १७० ॥

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