पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ३५१) अच्छी प्रकारसे देखा तो घरके एक कोनेमें चोरको देख विचारने लगा। "अव- श्यही यह इसके भयसे मुझे आलिंगन करती है" ऐसा विचार चोरसे बोला- या ममोद्विजते नित्यं सा मामद्यावगूहते । प्रियकारक भद्रं ते यन्ममास्ति हरस्व तत् ॥ १९५ ॥" जो मुझसे सदा क्लेश मानती थी वह आज मुझे आलिंगन करती है हे प्रियकरनेवाले ! जो मेरा है उसे हरण कर ॥ १९५ ॥" तत् श्रुत्वा चौरोऽपि आह- यह सुनकर चोर भी बोला- हर्तव्यं ते न पश्यामि हर्तव्यं चेद्भविष्यति । पुनरप्यागमिष्यामि यदीयं नावगूहते ॥ १९६ ॥ तेरे हरने योग्य नहीं देखताहू जो हरने योग्य होगा तो फिर आऊंगा जो यह न आलिंगन करेगी ॥ १९६ ॥ तस्मात् चौरस्यापि उपकारिणः श्रेयः चिन्त्यते, किं पुनर्न शरणागतस्य। अपि च अयं तैः विप्रकृतोऽस्माकमेव पुष्टये भविष्यति तदीयरन्ध्रदर्शनाथ चेति। अनेन कारणेन अय- मवध्य" इति। एतदाकर्ण्य अरिमर्दनोऽन्यं सचिवं वक्रनासं पप्रच्छ,-"भद्र ! साम्प्रतमेवं स्थिते किं कर्तव्यम् ?" सोऽ- ब्रवीत,-" देव ! अवध्योऽयम् । यतः- इस कारण उपकारी चोरका भी मगल विचारा जाता है फिर शरण आयेका तो क्या । और फिर यह उनसे तिरस्कृत हुआ हमारी पुष्टिके निमित्त ही होगा उसका रन्ध्र दिखानेको । इन कारणोंसे यह अवध्य है"। यह सुनकर अरिमर्दन दूसरे मन्त्री वक्रनाससे पूछने लगा- "भद्र ! इस स्थितिमें क्या करना चाहिये" वह बोला-"यह अवध्य है । क्यों कि- शत्रवोऽपि हितायैव विवदन्तः परस्परम् । चौरेण जीवितं दत्तं राक्षसेन तु गोयुगम् ॥ १९७॥" परस्पर विवाद करते हुए शत्रुभी हितके निमित्त होते हैं चोरने जीवन और राक्षसने दो गौ दीं ॥ १९७ ॥