पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेतम् । ( ३७१) प्रत्याह-“अहो ! मूर्खोऽयं मन्त्रिजनो भवांश्च इति एवमहमव- गच्छामि । उक्तञ्च- सो यदि यह उनका वचन करते तो थोडासा भी अनर्थ इनका न होता”। तब दुर्गद्वारको प्राप्त होकर अरिमर्दन बोला-“भो ! हितकारी इस स्थिरजी- वीको जहा चाहे वहा स्थान दो”। यह सुनकर स्थिरजीवी विचारने लगा । “मुझे तो इनके वधका उपाय करना है । सो मध्यमें रहनेसे वह मुझसे सिद्ध न होगा, कारण कि यह मेरी चेष्टादिकका विचार कर सावधान हो जायगे । सो दुर्गद्वारमें स्थित होकर आपना अभिप्राय सिद्ध करू”। ऐसा विचार उलूक- पतिसे बोला-“देव युक्त ही है यह जो स्वामीने कहा है । परन्तु मैंभी नीति- शास्त्रका ज्ञाता तुम्हारा अहित हू । यद्यपि तुममे प्रीतिमान् और पवित्र हू तथापि दुर्गके मध्यमें रहना उचित नहीं । सो मैं यहा दुर्गके द्वारमें स्थित हुआही प्रतिदिन स्वामीके चरणकमलकी रजसे पवित्र शरीरवाला सेवा करूंगा”। बहुत अच्छा ऐसा कहने पर प्रतिदिन उलूकपतिके सेवक के सम्यक् आहार करके उलूक राजकी आज्ञासे प्रचुर मास भोजन स्थिरजीवीको देते । तब कितने एक दिनोंमें मयूरकी समान बलवान् हुआ । तब रक्ताक्ष स्थिरजीवीको पुष्ट देखकर विस्मयपूर्वक मन्त्रिजन और राजासे बोला-“अहो ! मन्त्रिजन और तुम सब मूर्ख हो ऐसा मैं जानता हू । कहा है- पूर्वं तावदहं मूर्खो द्वितीयः पाशबन्धकः । ततो राजा च मन्त्री च सर्वं वै मूर्खमण्डलम् ॥ २२३ ॥ पहले तो मैं मूर्ख, दूसरे पाशबंधक, फिर राजा और मंत्री सबही मूर्ख मडल है ॥ २२३ ॥” ते प्राहुः,-“कथमेतत् ?” रक्ताक्षः कथयति- वे बोले-“यह कैसी कथा ?” । रक्ताक्ष कहने लगा- कथा १३. अस्ति कस्मिंश्चित् पर्वतैकदेशे महान् वृक्षः । तत्र च सि- म्भुकनामा कोऽपि पक्षी प्रतिवसति स्म । तस्य पुरीषे सुव- र्णमुत्पद्यते । अथ कदाचित् तमुद्दिश्य व्याधः कोऽपि समा- ययौ । स च पक्षी तदग्रत एव पुरीषमुत्ससर्ज । अथ पातस-