पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
पृष्ठ 416, कुल 536 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ४०१ ) सो यदि वह तुम्हारी प्यारी न होती तो क्यों मेरे निमित्त तुम उसको न मारते?। और जो वह वानर है तो उसके सहित तेरा स्नेह कैसा ? सो बहुत कहनेसे क्या है यदि उसका हृदय भक्षण न करूंगी तो मेरा मरणक निमित्त कृत सकल्प जानो” । इस प्रकार वह उसके निश्चयको जान चिन्तासे व्याकुल हृदय हो बोला । अथवा अच्छा कहा है- "वज्रलेपस्य मूर्खस्य नारीणां कर्कटस्य च । एको ग्रहस्तु मीनानां नीलीमद्यपयोस्तथा ॥ १०॥ “वज्रलेप ( महा ) मूर्ख, नारी, केंकडा, मत्स्य, नीली और मद्यप इनका एकवारही दृढग्रह होता है ॥ १० ॥ तत् किं करोमि ? कथं स मे वध्यो भवति” इति विचि- न्त्य वानरपार्श्वमगमत् । वानरोऽपि चिरायान्तं तं सोद्वेग - मवलोक्य प्रोवाच "भो मित्र ! किमद्य चिरवेलायां समा- यातोऽसि ? कस्मात् साहादं न आलपसि ? न सुभाषितानि पठसि ?” स आह-“मित्र ! अहं तव भ्रातृजायया निष्ठुर- तरैर्वाक्यैरभिहितः-“ भोः कृतघ्न ! मा मे त्वं स्वमुखं दर्शय यतः त्वं प्रतिदिनं मित्रं उपजीवासि न च तस्य पुनः प्रत्युप- कारं गृहदर्शनमात्रेण अपि करोषि । तत् ते प्रायश्चित्तमपि नास्ति । उक्तञ्च- सो क्या करू किस प्रकार उसको मारू” । ऐसा विचार कर वानरके समीप आया, वानर भी उसे आता देख उद्वेगपूर्वक बोला,-“ भो मित्र ! क्या आज देरसे आये ? क्यों आनन्दपूर्वक नहीं बोलते हो ? क्यो नहीं अच्छे वचन पढते हो ?” वह बोला-“मित्र ! मैं तेरी भाभीसे आज निष्ठुर वचनसे ताडित हुआ हू । उसने कहा है-“भो कृतघ्न ! तू मुझे अपना मुख मत दिखला जो कि तू प्रतिदिन मित्रोंसे उपजीवित होताहै परन्तु घर दिखाने मात्रसे भी उसका प्रत्युपकार नहीं करता है, सो तेरा प्रायश्चित्त भी नहीं है। कहा है- ब्रह्मघ्ने च सुरापे च चौरे भग्नव्रते शठे । निष्कृतिर्विहिता सद्भिः कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः ॥ ११ ॥ २६