भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( ४०६ ) पञ्चतन्त्रम् । और बोला- "मित्र ! हास्यसे मैंने आपका अभिप्राय जाना । उसको कुछभी तुम्हारे हृदयसे प्रयोजन नहीं है । सो आओ अतिथिरूपसे हमारे घर चलो । तेरी भाभी उत्कंठित है" । वानर बोला- "भो दुष्ट ! अब जाओ । मैं नहीं आऊंगा । कहा है- बुभुक्षितः किं न करोति पापं क्षीणा जना निष्करुणा भवन्ति । आख्याहि भद्रे प्रियदर्शनस्य न गङ्गदत्तः पुनरेति कूपम् ॥ १६ ॥" भूखा क्या पाप नहीं करता ? क्षीण मनुष्य करुणाहीन हो जाते है, हे भद्रे ! प्रियदर्शनसे कहना गंगदत्त फिर कूपमें नहीं आवेगा ॥ १६ ॥” मकर आह- "कथमेतत् ?" स आह- मकर बोला- "यह कैसी कथा है ?" वह बोला- कथा २. कस्मिंश्चित् कूपे गङ्गदत्तो नाम मण्डूकराजः प्रतिवसति स्म । स कदाचित दायादैः उद्वेजितोऽरघट्टघटीमारुह्य निष्क्रान्तः। अथ तेन चिन्तितम् । "यत् कथं तेषां दायादानां मया प्रत्यपकारः कर्त्तव्यः । उक्तञ्च- किसी कूपमें गंगदत्त नामक मेडकराजा रहता था, वह कभी हिस्सेदारोंसे उद्वेजित हुआ कुएकी ढेकलीको आलम्बन कर बाहर निकला । और उसने विचारा "इन गोतियोंका अपकार किस प्रकार करूं। कहा है- आपदि येनापकृतं येन च हसितं दशासु विषमासु । अपकृत्य तयोरुभयोः पुनरपि जातं नरं मन्ये ॥ १७ ॥” जिसने आपत्तिमें अपकार किया और विषम दशामें हँसा उन दोनोंके प्रति फिर अपकार करकेही मनुष्यको उत्पन्न हुआ ऐसा मैं मानता हूं ॥ १७ ॥" एवं चिन्तयन् बिले प्रविशन्तं कृष्णसर्पमपश्यत् । तं दृष्ट्वा भूयोऽपि अचिन्तयत् । "यत् एनं तत्र कूपे नीत्वा सकलदा- यादानां उच्छेदं करोमि । उक्तञ्च- ऐसा विचार कर बिलमें प्रवेश करते काले सांपको देखा । उसको देखकर