भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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[Header] भाषाटीकासमेतम् । (४०७)

फिरभी विचारने लगा कि "इसको उस कूपमें लेजाकर सम्पूर्ण दायादोका नाश करूं। कहा है-- शत्रुभिर्योजयेच्छत्रुं बलिना बलवत्तरम्। स्वकार्याय यतो न स्यात्काचित्पीडात्र तत्क्षये ॥ १८ ॥ शत्रुओंके साथ शत्रुओंको भिड़ावै, बलवान्‌के साथ बलवान्‌को अपने कार्यके निमित्त लगावै कारण कि, उसके क्षयमें फिर कुछ पीडा नहीं होती १८ तथाच- और देखो- शत्रुमुन्मूलयेत्प्राज्ञस्तीक्ष्णं तीक्ष्णेन शत्रुना। व्यथाकरं सुखार्थाय कण्टकेनेव कण्टकम् ॥ १९ ॥ " बुद्धिमान् तीक्ष्ण शत्रुको तीक्ष्ण शत्रुसे नष्ट करावै व्यथा करनेवाला काटा सुखके निमित्त कांटेसेही निकाला जाता है ॥ १९ ॥" एवं स विभाव्य बिलद्वारं गत्वा तमाहूतवान्-"एहि ! एहि !! प्रियदर्शन ! एहि !" तत् श्रुत्वा सर्पश्चिन्तयामास । "य एष मां आह्वयति, स स्वजातीयो न भवति यतो नैषा सर्पवाणी । अन्येन केनापि सह मम मर्त्यलोके सन्धानं नास्ति । तदत्र एव दुर्गे स्थितः तावत् वेद्मि कोऽयं भवि- ष्यति । उक्तञ्च-- ऐसा विचार बिलके द्वारे जाकर उसे बुलाता हुआ--"आओ ! आओ !! प्रियदर्शन ! आओ ।" तब सुनकर साप विचारने लगा। "यह मुझे बुलाता है सो अवश्यही मेरी जातीका न होगा। कारण कि यह सर्पकी वाणी नहीं है। और किसीके साथ मर्त्यलोकमें मेरी मित्रता नहीं है। सो इसी दुर्गमें स्थित हुआ पहले जानू कि यह कौन होगा। कहा है कि-- यस्य न ज्ञायते शीलं न कुलं न च संश्रयः। न तेन सङ्गतिं कुर्यादित्यवाच बृहस्पतिः ॥ २० ॥ जिसका कुल शील और आश्रय न जाना हो उसकी संगति न करे ऐसा बृहस्पतिजीने कहा है ॥ २० ॥ कदाचित् कोऽपि मन्त्रवादी औषधचतुरो वा मामाहूय

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