फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ किस वर्ग का क्या महत्व है-उत्तमांश पारिजातांश आदि विचार । ग्रहों की प्रदीप्त, सुखित, मुदित आदि संज्ञा- । पृ०—५४-७२ ४. चौथा अध्याय : ग्रह बल । स्थान बल-कालबल-दिक्बल-अयन बल, युद्धबल चेष्टाबल-नैसर्गिक बल-दृग्बल-भावबल-भावदिक्बल चन्द्र क्रियादि—चन्द्र क्रिया फल-चन्द्र अवस्था फल । पृ ७३-१०० ५. पाँचवाँ अध्याय : कर्माजीव प्रकरण सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति-शुक्र-शनि-प्रत्येक ग्रह के अनुसार जातक के कार्य और आजीविका, किस प्रकार तथा किस कार्य से होगी-इसका विचार । पृ० १०१-१०८ ६. छठा अध्याय : योग पंच महापुरुष योग-रुचक-भद्र-हंस-मालव्य-शश-चन्द्रमा के योग सुनफा, अनफा, दुरुधरा-केमद्रुम-सूर्य के योग-वेशि वाशि-उभयचरी-अन्य योग-शुभकर्तरी-पापकर्तरी-सुशुभ-केसरी-अधम-सम-वरिष्ठ-महाभाग्य- शकट-वसुमत्-अमला-पुष्कल-शुभमाला-अशुभमाला-लक्ष्मी-गौरी-सरस्वती- श्रीकंठ-श्रीनाथ-विरंचि-द्वादश भाव स्वामियों के परस्पर स्थान विनिमय से दैन्य, खल, महायोग । पर्वत-काहल-राजयोग-शंख-संख्या योग-वल्लकी या वीणा-दाम-पाश-केदार-शूल-युग-गोल । अधियोग चामर-धेनु-शौर्य-जलधि-शस्त्र-काम-असुर-भाग्य-ख्याति-सुपारिजात-मूसल- अवयोग-निःस्वयोग-मृति-कुहू-पामर--हर्ष-दुष्कृति-सरल- निर्भाग्य-दुर्योंग- दरिद्र-विमलयोंग । दुर्योग (दूसरे प्रकार का)—इन सब योगों के लक्षण और फल । पृ० १०९-१६२