भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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प्रथम प्रश्न


सम्बन्धभाष्य

मन्त्रोक्तस्यार्थस्य विस्तारानुवादीदं ब्राह्मणमारभ्यते। ऋषिप्रश्नप्रतिवचनाख्यायिका तु विद्यास्तुतये। एवं संवत्सरब्रह्मचर्यसंवासाद्युक्तैस्तपोयुक्तैर्ग्राह्या पिप्पलादादिवत्सर्वज्ञकल्पैराचार्यैर्वक्तव्या च, न सा येन केनचिदिति विद्यां स्तौति। ब्रह्मचर्यादिसाधनसूचनाच्च तत्कर्तव्यता स्यात्।अथर्वणमन्त्रोक्त [मुण्डकोपनिषद्के] अर्थका विस्तारपूर्वक अनुवाद करनेवाली यह ब्राह्मणभागीय उपनिषद् अब आरम्भ की जाती है*। इसमें जो ऋषियोंके प्रश्न और उत्तररूप आख्यायिका है वह विद्याकी स्तुतिके लिये है। यह विद्या आगे कहे प्रकारसे एक वर्षतक ब्रह्मचर्यपूर्वक गुरुकुलमें रहना तथा तप आदि साधनोंसे युक्त पुरुषोंद्वारा ही ग्रहण की जानेयोग्य है तथा पिप्पलादके समान सर्वज्ञतुल्य आचार्योंसे ही कथन की जा सकती है, जिस किसीसे नहीं—इस प्रकार विद्याकी स्तुति की जाती है। तथा ब्रह्मचर्यादि साधनोंकी सूचना देनेसे उनकी कर्त्तव्यता भी प्राप्त होती है।

सुकेशा आदिकी गुरूपपत्ति

ॐ सुकेशा च भारद्वाजः शैब्यश्च सत्यकामः सौर्यायणी च गार्ग्यः कौसल्यश्चाश्वलायनो भार्गवो वैदर्भिः कबन्धी कात्यायनस्ते हैते ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मा-


* दश उपनिषदोंमें प्रश्न, मुण्डक और माण्डूक्य ये तीन अथर्ववेदीय हैं। इनमें मुण्डक मन्त्रभागकी है तथा शेष दो ब्राह्मणभागकी हैं।