भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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पृष्ठ 18

प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न १


निश्चय आदित्य ही प्राण है और रयि ही चन्द्रमा है। यह जो कुछ मूर्त्त (स्थूल) और अमूर्त्त (सूक्ष्म) है सब रयि ही है; अतः मूर्त्ति ही रयि है ॥ ५ ॥

तत्रादित्यो ह वै प्राणोऽत्ता अग्निः। रयिरेव चन्द्रमाः, रयिः एवान्नं सोम एव। तदेतदेकमत्ता चान्नं च, प्रजापतिरेकं तु मिथुनम्, गुणप्रधानकृतो भेदः। कथम्? रयिर्वा अन्नं वा एतत् सर्वम्; किं तद्यन्मूर्त्तं च स्थूलं चामूर्त्तं च सूक्ष्मं च मूर्त्तामूर्ते अत्रान्नरूपे रयिरेव। तस्मात्प्रविभक्ताद् अमूर्ताद्यदन्यन्मूर्तरूपं मूर्तिः सैव रयिरमूर्तेनाद्यमानत्वात् ॥ ५ ॥यहाँ निश्चयपूर्वक आदित्य ही प्राण अर्थात् भोक्ता अग्नि है और रयि ही चन्द्रमा है। रयि ही अन्न है और वह चन्द्रमा ही है। यह भोक्ता (अग्नि) और अन्न एक ही हैं। एक प्रजापति ही यह मिथुनरूप हो गया है, इसमें भेद केवल गौण और प्रधान भावका ही है। सो किस प्रकार? [इसपर कहते हैं—] यह सब रयि—अन्न ही है। वह क्या है? यह जो मूर्त्त यानी स्थूल है और जो अमूर्त्त यानी सूक्ष्म है वह मूर्त्त और अमूर्त्त भोक्ता-भोग्यरूप होनेपर भी रयि ही है। अतः इस प्रकार विभक्त हुए अमूर्त्तसे अन्य जो मूर्त्तरूप है वही रयि—अन्न है क्योंकि वह अमूर्त्त भोक्तासे भोगा जाता है ॥ ५ ॥
तथामूर्त्तोऽपि प्राणोऽत्ता सर्वमेव यच्चाद्यम्। कथम्—इसी प्रकार अमूर्त्त प्राणरूप भोक्ता भी जो कुछ अन्न है वह सभी है। किस प्रकार—

अथादित्य उद्यन्यत्प्राचीं दिशं प्रविशति तेन प्राच्यान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते। यद्दक्षिणां यत्प्रतीचीं यदुदीचीं यदधो यदूर्ध्वं यदन्तरा दिशो यत्सर्वं प्रकाशयति तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ॥ ६ ॥