प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
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प्रश्न १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९
जिस समय सूर्य उदित होकर पूर्व दिशामें प्रवेश करता है तो उसके द्वारा वह पूर्व दिशाके प्राणोंको अपनी किरणोंमें धारण करता है। इसी प्रकार जिस समय वह दक्षिण, पश्चिम, उत्तर, नीचे, ऊपर और अवान्तर दिशाओंको प्रकाशित करता है उससे भी वह उन सबके प्राणोंको अपनी किरणोंमें धारण करता है ॥ ६ ॥
| अथादित्य उदयन्नुद्गच्छन् प्राणिनां चक्षुर्गोचरमागच्छन् यत्प्राचीं दिशं स्वप्रकाशेन प्रविशति व्याप्नोति; तेन स्वात्मव्याप्त्या सर्वांस्तत्स्थान्प्राणान् प्राच्यानन्तर्भूतान् रश्मिषु स्वात्मावभासरूपेषु व्याप्तिमत्सु व्याप्तत्वात्प्राणिनः संधत्ते संनिवेशयति; आत्मभूतान्करोति इत्यर्थः । तथैव यत्प्रविशति दक्षिणां यत्प्रतीचीं यदुदीचीमध ऊर्ध्वं यत्प्रविशति यच्चान्तरा दिशः कोणदिशोऽवान्तरदिशो यच्चान्यत् सर्वं प्रकाशयति तेन स्वप्रकाशव्याप्त्या सर्वान्सर्वदिक्स्थान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ॥ ६॥ | जिस समय सूर्य उदित होकर—ऊपरकी ओर जाकर अर्थात् प्राणियोंके नेत्रोंका विषय होकर अपने प्रकाशसे पूर्व दिशामें प्रवेश करता है—उसे [अपने तेजसे] व्याप्त करता है; उसके द्वारा अपनी व्याप्तिसे वह उस (पूर्व दिशा) में स्थित सम्पूर्ण अन्तर्भूत प्राच्य प्राणोंको अपने अवभासरूप और सर्वत्र व्याप्त किरणोंमें व्याप्त होनेके कारण वह सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करता यानी अपनेमें प्रविष्ट कर लेता है, अर्थात् उन्हें आत्मभूत कर लेता है। इसी प्रकार जब वह दक्षिण, पश्चिम, उत्तर, नीचे और ऊपरकी ओर प्रवेश करता है अथवा अवान्तर दिशाओंको—कोणस्थ दिशाएँ अवान्तर दिशाएँ हैं उनको या अन्य सबको प्रकाशित करता है तो अपने प्रकाशकी व्याप्तिसे वह सम्पूर्ण—समस्त दिशाओंमें स्थित प्राणोंको अपनी किरणोंमें धारण कर लेता है ॥ ६ ॥ |