प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
पृष्ठ 20, कुल 131 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 20
| १० | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न १ |
|---|
स एष वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते । तदेत- दृचाभ्युक्तम् ॥ ७ ॥
वह यह (भोक्ता) वैश्वानर विश्वरूप प्राण अग्नि ही प्रकट होता है । यही बात ऋक्ने भी कही है ॥ ७ ॥
| स एषोऽत्ता प्राणो वैश्वानरः सर्वात्मा विश्वरूपो विश्वात्मत्वाच्च प्राणोऽग्निश्च स एवान्नोदयत उद्गच्छति प्रत्यहं सर्वा दिश आत्मसात्कुर्वन् । तदेतदुक्तं वस्तु ऋचा मन्त्रेणाप्यभ्युक्तम् ॥ ७ ॥ | वह यह भोक्ता प्राण वैश्वानर (समष्टि जीवरूप), सर्वात्मा और सर्वरूप है तथा सर्वमय होनेके कारण ही प्राण और अग्निरूप है। वह भोक्ता ही प्रतिदिन सम्पूर्ण दिशाओंको आत्मभूत करता हुआ उदित होता अर्थात् ऊपरकी ओर जाता है। यह ऊपर कही बात ही ऋक् अर्थात् मन्त्रद्वारा भी कही गयी है ॥ ७ ॥ |
विश्वरूपं हरिणं जातवेदसं परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम् । सहस्ररश्मिः शतधा वर्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः॥ ८ ॥
सर्वरूप, रश्मिवान्, ज्ञानसम्पन्न, सबके आश्रय, ज्योतिर्मय, अद्वितीय और तपते हुए सूर्यको [विद्वानोंने अपने आत्मारूपसे जाना है]। यह सूर्य सहस्रों किरणोंवाला, सैकड़ों प्रकारसे वर्तमान और प्रजाओंके प्राणरूपसे उदित होता है ॥ ८ ॥