प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
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| प्रश्न ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६१ |
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| ( बृ० उ० २ । ४ । १४ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । अतो मन्द-ब्रह्मविदामेवेयमाशङ्का न तु एकात्मविदाम् । | देखे ?" इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है । अतः यह शङ्का मन्द ब्रह्मज्ञानियोंकी ही है, एकात्मवेत्ताओंकी नहीं । |
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| नन्वेवं सति "अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः" ( बृ० उ० ४ । ३ । १४ ) इति विशेषणमनर्थकं भवति । | पूर्व०—ऐसा माननेपर तो "इस स्वप्नावस्थामें यह पुरुष स्वयंज्योति है" इस वाक्यसे बतलाया हुआ आत्माका [स्वयंज्योति] विशेषण व्यर्थ हो जायगा । |
| अत्रोच्यते; अत्यल्पमिदम् उच्यते "य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते" ( बृ० उ० २ । १ । १७ ) इत्यन्तर्हृदय-परिच्छेदे सुतरां स्वयंज्योतिष्ट्वं बाध्येत । | सिद्धान्ती—इसपर हमें यह कहना है कि आपका यह कथन तो बहुत थोड़ा है । "यह जो हृदयके भीतरका आकाश है उसमें वह (आत्मा) शयन करता है" इस वाक्यसे आत्माका अन्तर्हृदयरूप-परिच्छेद सिद्ध होनेसे तो उसका स्वयंप्रकाशत्व और भी बाधित हो जाता है । |
| सत्यमेवमयं दोषो यद्यपि स्यात्स्वप्ने केवलतया स्वयंज्योतिष्ट्वेनार्धं तावदपनीतं भारस्येति चेत् । | पूर्व०—यद्यपि यह दोष तो ठीक ही है; तथापि स्वप्नमें केवलतां (मनका अभाव हो जाने) के कारण आत्माके स्वयंप्रकाशत्वसे उसका आधा भार¹ तो हल्का हो ही जाता है । |
¹ १. यहाँ भार हल्का होनेका अभिप्राय है स्वयंप्रकाशताके प्रतिबन्धकका दूर होना ।