भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished131 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 131 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 76
६६प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न ४
तेजसा । अथ तदैतस्मिञ्शरीर एतत्सुखं भवति यद्विज्ञानं निराबाधमविशेषेण शरीरव्यापकं प्रसन्नं भवतीत्यर्थः ॥ ६ ॥उन्हें देखनेका द्वार तेजसे रुक जाता है । तदनन्तर इस शरीरमें यह सुख होता है; तात्पर्य यह कि जो निराबाध और सामान्यरूपसे सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त विज्ञान है वही स्फुट हो जाता है ॥ ६ ॥

एतस्मिन्कालेऽविद्याकामकर्मनिबन्धनानि कार्यकारणानि शान्तानि भवन्ति । तेषु शान्तेषु आत्मस्वरूपमुपाधिभिरन्यथा विभाव्यमानमद्वयमेकं शिवं शान्तं भवतीत्येतामेवावस्थां पृथिव्याद्यविद्याकृतमात्रानुप्रवेशेन दर्शयितुं दृष्टान्तमाह—इस समय अविद्या, काम और कर्मजनित शरीर एवं इन्द्रियाँ शान्त हो जाती हैं। उनके शान्त हो जानेपर, उपाधियोंके कारण अन्यरूपसे भासित होनेवाला आत्मस्वरूप अद्वितीय, एक, शिव और शान्त हो जाता है । अतः पृथिवी आदि अविद्याकृत मात्राओं (विषयों) के अनुप्रवेशद्वारा इसी अवस्थाको दिखलानेके लिये दृष्टान्त दिया जाता है—

स यथा सोम्य वयांसि वासोवृक्षं संप्रतिष्ठन्ते एवं ह वै तत्सर्वं पर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥ ७ ॥

हे सोम्य ! जिस प्रकार पक्षी अपने वसेरेके वृक्षपर जाकर बैठ जाते हैं उसी प्रकार वह सब (कार्यकरणसंघात) सबसे उत्कृष्ट आत्मामें जाकर स्थित हो जाता है ॥ ७ ॥

स दृष्टान्तो यथा येन प्रकारेण सोम्य प्रियदर्शन वयांसिवह दृष्टान्त इस प्रकार है— हे सोम्य—हे प्रियदर्शन ! जिस