भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

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३१०रघुवंशमहाकाव्ये

उषसीति। उषसि प्रातः पटूनां पटहानाभिव ध्वनियैषां तैर्गजयूथानां हस्ति-समूहानां कर्णैरेव तालैर्वाद्यप्रभेदैर्विनीतनिद्रः स नृपस्तत्र वने मधुराणि विहगानां विहङ्गमानां विकूजितान्येव वन्दिनां मङ्गलाति मङ्गलगीतानि शृण्वन्नरमत।

भाषार्थ— वन में रहते हुए भी राजा दशरथ के सभी व्यवहार राजाओं के समान हुआ करते थे। प्रातःकाल जब बड़े-बड़े नगाड़ों के समान शब्द करने वाले हाथियों के कानों की फट-फट होती थी तब आंखें खुलती थी और उस समय वन के पक्षी चारणों के समान जो मंगल गीत गाते थे उन्हें सुन कर वे परम प्रसन्न होते थे॥ ७१ ॥

अथ जातु रुरोर्गृहीतवर्त्मा विपिने पार्श्वचरैरलक्ष्यमाणः।
श्रमफेनमुचा तपस्विगाढां तमसां प्राप नदीं तुरङ्गमेण॥ ७२ ॥

अन्वयः— अथ जातु रुरोः गृहीतवर्त्मा विपिने पार्श्वचरैः अलक्ष्यमाणः, श्रमफेनमुचा तुरङ्गमेण तपस्विगाढां तमसां नदीं प्राप ।

अथेति। अथ जातु कदाचिद्रुरोर्मृगस्य गृहीतवर्त्मा स्वीकृतरुरुमार्गो विपिने वनेपार्श्वचरैरनुचरैरलक्ष्यमाणः। तुरगवेगादित्यर्थः। श्रमेण फेनमुचा सफेनं स्विद्यतेत्यर्थः। तुरङ्गमेण तपस्विभिर्गाढामवगाढां सेवितां तमसां नाम नदीं सरितं प्राप।

भाषार्थ— इससे बाद एक दिन रुरुमृग का पीछा करते हुए राजा दशरथ को साथियों से साथ छूट गया, थकावट के कारण उनका घोड़ा मुंह से फेन फेंकने लगा उसी पर चढे हुए वे तमसा नदी के उस तीर पर पहुँच गये जहाँ तपस्वि लोग स्नान करते थे॥ ७२ ॥

कुम्भपूरणभवः पटुरुच्चैरुच्चचार निनदोऽम्भसि तस्याः।
तत्र स द्विरदबृंहितशङ्की शब्दपातिनमिषुं विससर्ज ॥ ७३ ॥

अन्वयः— तस्याः अम्भसि कुम्भपूरणभवः पटुः उच्चै निनदः उच्चचार, तत्र सः द्विरदबृंहितशङ्की सन् शब्दपातिनम् इषुं विससर्ज।

कुम्भेति। तस्यास्तमसाया अम्भसि कुम्भपूरणेन भव उत्पन्नः। पचाद्यच्। पटुर्मधुरः उच्चैर्गम्भीरो निनदो ध्वनिरुच्चचारोदियाय। तत्र निनदे स नृपः द्विरदबृंहितं शङ्कित इति द्विरदबृंहितशङ्की सन् शब्देन शब्दानुसारेण पततीति शब्दपातिनमिषुं विससर्ज। स्वागतावृत्तम्।

भाषार्थ— उस तमसा नदी में श्रवण कुमार अपने अन्धे माता-पिता के लिए घड़े में पानी भर रहा था, घड़ा भरते समय जो गम्भीर शब्द उत्पन्न हुआ