BharatKosha
Back to the archive

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages
Page 24Permalink

अवतरणिका ११

हमें मालूम है कि मन की एक ऐसी शक्ति है, जिससे वह अपने अन्दर जो कुछ हो रहा है उसे देख सकता है—इसको अन्त-पर्यवेक्षण-शक्ति कह सकते हैं। मैं तुमसे बातचीत कर रहा हूँ, फिर साथ ही मैं मानो एक और व्यक्ति होकर बाहर खड़ा हूँ और जो कुछ कह रहा हूँ, वह जान-सुन रहा हूँ। तुम एक ही समय काम और चिन्तन दोनों कर रहे हो, परन्तु तुम्हारे मन का एक और अंश मानो बाहर खड़े होकर तुम जो कुछ चिन्तन कर रहे हो, उसे देख रहा है। मन की समस्त शक्तियों को एकत्रित करके मन पर ही उनका प्रयोग करना होगा। जैसे सूर्य की तीक्ष्ण किरणों के सामने घने अन्धकारमय स्थान भी अपने गुप्त तथ्य खोल देते हैं, उसी तरह यह एकाग्र मन अपने सब अन्तरतम रहस्य प्रकाशित कर देगा। तब हम विश्वास की सच्ची बुनियाद पर पहुँचेंगे। तभी हमको सही-सही धर्म-प्राप्ति होगी। तभी, आत्मा है या नहीं, जीवन केवल इस सामान्य जीवितकाल तक ही सीमित है अथवा अनन्तकालव्यापी है और संसार में कोई ईश्वर है या नहीं, यह सब हम स्वयं देख सकेंगे। सब कुछ हमारे ज्ञानचक्षुओं के सामने उद्भासित हो उठेगा। राजयोग हमें यही शिक्षा देने के लिए अग्रसर होता है। इसमें जितने उपदेश हैं, उन सबका उद्देश्य, प्रथमतः, मन की एकाग्रता का साधन है, इसके बाद है—उसके गम्भीरतम प्रदेश में कितने प्रकार के भिन्न-भिन्न कार्य हो रहे हैं, उनका ज्ञान प्राप्त करना, और तत्पश्चात् उनसे साधारण सत्यों को निकालकर उनसे अपने एक सिद्धान्त पर उपनीत होना। इसी लिए राजयोग की शिक्षा किसी धर्मविशेष पर आधारित नहीं है। तुम्हारा धर्म चाहे जो हो—तुम चाहे आस्तिक हो या नास्तिक, यहूदी या बौद्ध या ईसाई—इससे कुछ बनता-बिगड़ता

Page 25Permalink

१२ राजयोग

= नही, तुम मनुष्य हो, बस यही पर्याप्त है। प्रत्येक मनुष्य में धर्मतत्त्व का अनुसन्धान करने की शक्ति है, उसे उसका अधिकार है। प्रत्येक व्यक्ति का, किसी भी विषय में क्यो न हो, कारण पूछने का अधिकार है, और उसमें ऐसी शक्ति भी है कि वह अपने भीतर से ही उन प्रश्नो के उत्तर पा सके। पर हाँ, उसे इसके लिए कुछ कष्ट उठाना पड़ेगा।

अब तक हमने देखा, इस राजयोग की साधना में किसी प्रकार के विश्वास की आवश्यकता नही। जब तक कोई बात स्वयं प्रत्यक्ष न कर सको, तब तक उस पर विश्वास न करो—राजयोग यही शिक्षा देता है। सत्य को प्रतिष्ठित करने के लिए अन्य किसी सहायता की आवश्यकता नही। क्या तुम कहना चाहते हो कि जाग्रत् अवस्था की सत्यता के प्रमाण के लिए स्वप्न अथवा कल्पना की सहायता की जरूरत है ? नही, कभी नही। इस राजयोग की साधना में दीर्घ काल और निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता है। इस अभ्यास का कुछ अंश शरीर-संयम विषयक है, परन्तु इसका अधिकांश मन संयमात्मक है। हम क्रमशः समझेंगे, मन और शरीर में किस प्रकार का सम्बन्ध है। यदि हम विश्वास करे कि मन शरीर की केवल एक सूक्ष्म अवस्थाविशेष है और मन शरीर पर कार्य करता है, तो हमे यह भी स्वीकार करना होगा कि शरीर भी मन पर कार्य करता है। शरीर के अस्वस्थ होने पर मन भी अस्वस्थ हो जाता है, शरीर स्वस्थ रहने पर मन भी स्वस्थ और तेजस्वी रहता है। जब किसी व्यक्ति को क्रोध आता है, तब उसका मन अस्थिर हो जाता है। मन की अस्थिरता के कारण शरीर भी पूरी तरह अस्थिर हो जाता है। अधिकांश लोगो का मन शरीर के सम्पूर्ण अधीन रहता है। असल

Page 26Permalink

अवतरणिका १३-

मे उनके मन की शक्ति बहुत थोडे परिमाण मे विकसित हुई रहती है। यदि तुम लोग कुछ बुरा न मानो, तो कहूँ, अधिकांश मनुष्य पशु से बहुत थोडे ही उन्नत है, क्योकि अधिकांश स्थलो मे तो उनकी संयम की शक्ति पशु-पक्षियो से कोई विशेष अधिक नही। हममे मन के निग्रह की शक्ति बहुत थोडी है। मन पर यह अधिकार पाने के लिए, शरीर और मन पर आधिपत्य लाने के लिए कुछ बहिरंग साधनाओ की—दैहिक साधनाओ की आवश्यकता है। शरीर जब पूरी तरह अधिकार मे आ जायगा, तब मन को हिलाने-डुलाने का समय आयगा। इस तरह मन जब बहुत-कुछ वश मे आ जायगा, तब हम इच्छानुसार उससे काम ले सकेगे, उसकी वृत्तियो को एकमुखी होने के लिए मजबूर कर सकेगे।

राजयोगी के मतानुसार यह सम्पूर्ण बहिर्जगत् अन्तर्जगत् या सूक्ष्म जगत् का स्थूल विकास मात्र है। सभी स्थलो मे सूक्ष्म को कारण और स्थूल को कार्य समझना होगा। इस नियम से, बहिर्जगत् कार्य है और अन्तर्जगत् कारण। इसी हिसाब से, स्थूल जगत् की परिदृश्यमान शक्तियाँ आभ्यन्तरिक सूक्ष्मतर शक्तियो का स्थूल भाग मात्र है। जिन्होने इन आभ्यन्तरिक शक्तियो का आविष्कार करके उन्हे इच्छानुसार चलाना सीख लिया है, वे सम्पूर्ण प्रकृति को वश मे कर सकते है। सम्पूर्ण जगत को वशीभूत करना और सारी प्रकृति पर अधिकार हासिल करना—इस बृहत् कार्य को योगी अपना कर्त्तव्य समझते है। वे एक ऐसी अवस्था मे जाना चाहते हैं, जहाँ, हम जिन्हे 'प्रकृति के नियम' कहते हैं, वे उन पर कोई प्रभाव नही डाल सकते, जिस अवस्था में वे उन सब को पार कर जाते हैं। तब वे आभ्यन्तरिक और बाह्य समस्त

Page 27Permalink

९४

राजयोग

-प्रकृति पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेते हैं। मनुष्य-जाति की उन्नति और सभ्यता इस प्रकृति को वशीभूत करने की शक्ति पर निर्भर है।

इस प्रकृति को वशीभूत करने के लिए भिन्न-भिन्न जातियाँ भिन्न-भिन्न प्रणालियों का सहारा लेती हैं। जैसे एक ही समाज के भीतर कुछ व्यक्ति वाह्य प्रकृति को और कुछ अन्त प्रकृति को वशीभूत करने की चेष्टा करते हैं, वैसे ही भिन्न-भिन्न जातियों में कोई-कोई जातियाँ वाह्य प्रकृति को, तो कोई-कोई अन्त प्रकृति को वशीभूत करने का प्रयत्न करती हैं। किसी के मत से, अन्त - प्रकृति को वशीभूत करने पर सब कुछ वशीभूत हो जाता है, फिर दूसरों के मत से, वाह्य प्रकृति को वशीभूत करने पर सब कुछ वश में आ जाता है। इन दो सिद्धान्तों के चरम भावों को देखने पर यह प्रतीत होता है कि दोनों ही सिद्धान्त सही हैं, क्योंकि यथार्थत प्रकृति में वाह्य और अभ्यन्तर जैसा कोई भेद नहीं। यह केवल एक काल्पनिक विभाग है। ऐसे विभाग का कोई अस्तित्व ही नहीं, और यह कभी था भी नहीं। वहिर्वादी और अन्तर्वादी जब अपने-अपने ज्ञान की चरम सीमा प्राप्त कर लेंगे, तब दोनों अवश्य एक ही स्थान पर पहुँच जायेंगे। जैसे वहिर्विज्ञानवादी जब अपने ज्ञान को चरम सीमा पर ले जायेंगे, तो अन्त में उन्हें दार्शनिक होना होगा, उसी प्रकार दार्शनिक भी देखेंगे कि वे मन और भूत के नाम से जो दो भेद कर रहे थे, वह वास्तव में कल्पना मात्र है, वह एक दिन बिलकुल विलीन हो जायगी।

जिससे यह बहु उत्पन्न हुआ है जो एक पदार्थ बहु रूपों में प्रकाशित हुआ है, उसका निर्णय करना ही समस्त विज्ञान का मुख्य उद्देश्य और लक्ष्य है। राजयोगी कहते हैं, हम पहले

Page 28Permalink

अवतरणिका १५

अन्तर्जगत् का ज्ञान प्राप्त करेंगे, फिर उसी के द्वारा बाह्य और अन्दर उभय प्रकृति को वशीभूत कर लेंगे। प्राचीन काल से ही लोग इसके लिए प्रयत्नशील रहे हैं। भारतवर्ष में इसकी विशेष चेष्टा होती रही है, परन्तु दूसरी जातियों ने भी इस ओर कुछ प्रयत्न किए हैं। पाश्चात्य देशों में लोग इसको रहस्य या गुप्त-विद्या सोचते थे, जो लोग इसका अभ्यास करने जाते थे, उन पर अघोरी, डाइन, ऐन्द्रजालिक आदि अपवाद लगाकर उन्हें जला दिया अथवा मार डाला जाता था। भारतवर्ष में अनेक कारणों से यह विद्या ऐसे व्यक्तियों के हाथ पड़ी, जिन्होंने इसका ९० प्रतिशत अंश नष्ट कर डाला और शेष को गुप्त रीति से रखने की चेष्टा की। आजकल पश्चिमी देशों में, भारतवर्ष के गुरुओं की अपेक्षा निकृष्टतर अनेक गुरु-नामधारी व्यक्ति दिखाई पड़ते हैं। भारतवर्ष के गुरु फिर भी कुछ जानते थे, पर ये आधुनिक गुरु तो कुछ भी नहीं जानते।

इन सारी योग-प्रणालियों में जो कुछ गुह्य या रहस्यात्मक है, सब छोड़ देना पड़ेगा। जिससे बल मिलता है, उसी का अनुसरण करना चाहिए। अन्यान्य विषयों में जैसा है, धर्म में भी ठीक वैसा ही है—जो तुमको दुर्बल बनाता है, वह समूल त्याज्य है। रहस्य-स्पृहा मानव-मस्तिष्क को दुर्बल कर देती है। इसके कारण ही आज योगशास्त्र नष्ट-सा हो गया है। किन्तु वास्तव में यह एक महाविज्ञान है। चार हजार वर्ष से भी पहले यह आविष्कृत हुआ था। तब से भारतवर्ष में यह प्रणालीबद्ध होकर वर्णित और प्रचारित होता रहा है। यह एक आश्चर्यजनक बात है कि व्याख्याकार जितना आधुनिक है, उसका भ्रम भी उतना ही अधिक है, और लेखक जितना प्राचीन है,

१६ राजयोग

Page 29Permalink

१६ राजयोग

उसने उतनी ही अधिक युक्तियुक्त बात कही है। आधुनिक लेखको मे ऐसे अनेक हैं, जो नाना प्रकार की रहस्यात्मक और अद्भुत-अद्भुत बाते कहा करते हैं। इस प्रकार, जिनके हाथ यह शास्त्र पडा, उन्होने समस्त शक्तियाॅँ अपने अधिकार मे कर रखने की इच्छा से इसको महा गोपनीय और आश्चर्यजनक बना डाला और युक्तिरूप प्रभाकर का पूर्ण आलोक इस पर न पडने दिया।

मै पहले ही कह देना चाहता हूँ कि मै जो कुछ प्रचार कर रहा हूँ, उसमे गुह्य नाम की कोई चीज नहीं है। मै जो कुछ थोडासा जानता हूँ, वही तुमसे कहूँगा। जहाँ तक यह युक्ति से समझाया जा सकता है, वहाँ तक समझाने की कोशिश करूँगा। परन्तु मै जो नही समझ सकता, उसके बारे मे कह दूँगा, "शास्त्र का यह कथन है।" अन्धविश्वास करना अन्याय है। अपनी विचार-शक्ति और युक्ति काम मे लानी होगी। यह प्रत्यक्ष करके देखना होगा कि शास्त्र मे जो कुछ लिखा है, वह सत्य है या नही। जडविज्ञान तुम जिस ढग से सीखते हो, ठीक उसी प्रणाली से यह धर्मविज्ञान भी सीखना होगा। इसमे गुप्त रखने की कोई बात नही, किसी विपत्ति की भी आशका नही। इसमे जहाँ तक सत्य है, उसका सबके समक्ष राजपथ पर प्रकट रूप से प्रचार करना आवश्यक है। यह सब किसी प्रकार छिपा रखने की चेष्टा करने से अनेक प्रकार की विपत्तियाँ उत्पन्न होती हैं।

कुछ और अधिक कहने के पहले मै सांख्य-दर्शन के सम्बन्ध में कुछ कहूँगा। इस सांख्य-दर्शन पर राजयोग-विद्या स्थापित है। सांख्य-दर्शन के मत से किसी विषय के ज्ञान की प्रणाली इस प्रकार है—प्रथमत विषय के साथ चक्षु आदि वाह्य करणो का सयोग

Page 30Permalink

अवतरणिका १७

होता है। ये चक्षु आदि बाहरी करण फिर उसे मस्तिष्क-स्थित अपने-अपने केन्द्र अर्थात् इन्द्रियों के पास भेजते हैं, इन्द्रियाँ मन के निकट, और मन उसे निश्चयात्मिका बुद्धि के पास ले जाता है, तब पुरुष या आत्मा उसका ग्रहण करती है। फिर जिस सोपान-क्रम में से होता हुआ वह विषय अन्दर आया था, उसी में से होते हुए लौट जाने की पुरुष मानो उसे आज्ञा देता है। इस प्रकार विषय गृहीत होता है। पुरुष को छोड़कर शेष सब जड़ है। पर आँख आदि बाहरी करणों की अपेक्षा मन सूक्ष्मतर भूत से निर्मित है। मन जिस उपादान से निर्मित है, उसके क्रमशः स्थूलतर होने पर तन्मात्राओं की उत्पत्ति होती है। उनके और भी स्थूल हो जाने पर परिदृश्यमान भूतों की उत्पत्ति होती है। यही सांख्य का मनोविज्ञान है। अतएव बुद्धि और स्थूल भूत में अन्तर केवल मात्रा के तारतम्य में है। एकमात्र पुरुष ही चेतन है। मन तो मानो आत्मा के हाथो एक यन्त्र है। उसके द्वारा आत्मा बाहरी विषयों को ग्रहण करती है। मन सतत परिवर्तनशील है, इधर से उधर दौड़ता रहता है, कभी सभी इन्द्रियों से लगा रहता है, तो कभी एक से, और कभी किसी भी इन्द्रिय से संलग्न नहीं रहता। मान लो, मैं मन लगाकर एक घड़ी की टिक-टिक सुन रहा हूँ। ऐसी दशा में आँखें खुली रहने पर भी मैं कुछ देख न पाऊँगा। इससे स्पष्ट समझ में आ जाता है कि मन जब श्रवणेन्द्रिय से लगा था, तो दर्शनेन्द्रिय से उसका संयोग न था। पर पूर्णता-प्राप्त मन सभी इन्द्रियों से एक साथ लगाया जा सकता है। उसकी अन्तर्दृष्टि की शक्ति है, जिसके बल से मनुष्य अपने अन्तर के सबसे गहरे प्रदेश तक में नजर डाल सकता है। इस अन्तर्दृष्टि का विकास-साधन ही योगी का उद्देश्य है। मन की समस्त शक्तियों

१८ राजयोग

Page 31Permalink

१८ राजयोग

को एकत्र करके भीतर की ओर मोड़कर वे जानना चाहते हैं कि भीतर क्या हो रहा है। इसमे केवल विश्वास की कोई बात नही, यह तो दार्शनिको के मनस्तत्त्व-विश्लेषण का फल मात्र है। आधुनिक शरीरतत्त्ववित् पण्डितो का कथन है कि आंखे यथार्थतः दर्शन का करण नही है, वह करण तो मस्तिष्क के अन्तर्गत स्नायु-केन्द्र मे अवस्थित है। समस्त करणो के सम्बन्ध मे ठीक ऐसा ही समझना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि मस्तिष्क जिस पदार्थ से निर्मित है, ये केन्द्र भी ठीक उसी पदार्थ से बने हैं। सांख्य-मतानुयायी भी ऐसा ही कहते हैं। भेद यह है कि सांख्य का सिद्धान्त आध्यात्मिकता की ओर झुका हुआ है और वैज्ञानिको का भौतिकता की ओर। फिर भी दोनो एक ही बात है। हमें इससे अतीत राज्य का अन्वेषण करना होगा।

योगी प्रयत्न करते है कि वे अपने को ऐसा सूक्ष्म अनुभूति-सम्पन्न कर ले, जिससे वे विभिन्न मानसिक अवस्थाओ को प्रत्यक्ष कर सके। समस्त मानसिक प्रक्रियाओ को पृथक्-पृथक् रूप से मानस-प्रत्यक्ष करना आवश्यक है। इन्द्रिय-गोलको पर विषयो का आघात होते ही उससे उत्पन्न हुई संवेदनाएँ उस-उस करण की सहायता से किस तरह स्नायु में से होती हुई जाती है, मन किस प्रकार उनको ग्रहण करता है, किस प्रकार फिर वे निश्चयात्मिका बुद्धि के पास जाती है, तत्पश्चात् किस प्रकार पुरुष के पास उपनीत होती है—इन समस्त व्यापारो को पृथक्-पृथक् रूप से देखना होगा। प्रत्येक विषय की शिक्षा की अपनी एक निर्दिष्ट प्रणाली है। कोई भी विज्ञान क्यो न सीखो, पहले अपने आपको उसके लिए तैयार करना होगा, फिर एक निर्दिष्ट प्रणाली का अनुसरण करना होगा। इसके अतिरिक्त उस विज्ञान के सिद्धान्तों

Page 32Permalink

अवतरणिका १९

को समझने का और कोई दूसरा उपाय नही है। राजयोग के सम्बन्ध मे भी ठीक ऐसा ही है।

भोजन के सम्बन्ध मे कुछ नियम आवश्यक हैं। जिससे मन खूब पवित्र रहे, ऐसा भोजन करना चाहिए। तुम यदि किसी चिड़ियाघर मे जाओ, तो भोजन के साथ जीव का क्या सम्बन्ध है यह भलीभाँति समझ में आ जायगा। हाथी बड़ा भारी प्राणी है, परन्तु उसकी प्रकृति बड़ी शान्त है। और यदि तुम सिंह या बाघ के पिंजडे की ओर जाओ, तो देखोगे, वे बड़े चंचल है। इससे समझ में आ जाता है कि आहार का तारतम्य कितना भयानक परिवर्तन कर देता है। हमारे शरीर के अन्दर जितनी शक्तियाँ खेल कर रही हैं, वे सारी आहार से पैदा हुई है। और यह हम प्रतिदिन प्रत्यक्ष देखते हैं। यदि तुम उपवास करना आरम्भ कर दो, तो तुम्हारा शरीर दुर्बल हो जायगा, दैहिक शक्तियो का ह्रास हो जायगा और कुछ दिनो बाद मानसिक शक्तियाँ भी क्षीण होने लगेगी। पहले स्मृति-शक्ति जाती रहेगी, फिर ऐसा एक समय आयगा, जब सोचने के लिए भी सामर्थ्य न रह जायगी—किसी विषय पर गम्भीर रूप से विचार करना तो दूर की बात रहे। इसीलिए साधना की पहली अवस्था मे, भोजन के सम्बन्ध मे विशेष ध्यान रखना होगा, फिर बाद में साधना मे विशेष अग्रसर हो जाने पर उतना सावधान न रहने से भी चलेगा। जब तक पौधा छोटा रहता है, तब तक उसे घेर कर रखते हैं, नही तो जानवर उसे चर जायें। उसके बड़े हो जाने पर घेरा आवश्यक नही रह जाता। तब वह सारे आघात झेल सकता है।

योगी को अधिक विलास और कठोरता दोनो का ही

Page 33Permalink

२० राजयोग

त्याग करना चाहिए। उनके लिए उपवास करना या देह को किसी प्रकार कष्ट देना उचित नही। गीताकार कहते हैं, जो अपने को अनर्थक क्लेश देते हैं, वे कभी योगी नही हो सकते। अतिभोजनकारी, उपवासशील, अधिक जागरणशील, अधिक निद्रालु, अत्यन्त कर्मी अथवा बिलकुल आलसी—इनमे से कोई भी योगी नही हो सकता।

"नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नत ।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥
युक्ताहारविहारस्य युवतचेष्टस्य कर्मसु ।
युवतस्वप्नाववोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥"*


* गीता, ६।१६-१७

द्वितीय अध्याय

Page 34Permalink

द्वितीय अध्याय

साधना के प्राथमिक सोपान

राजयोग आठ अंगों में विभक्त है। पहला है यम—अर्थात् अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी का अभाव), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। दूसरा है नियम—अर्थात् शौच, सन्तोष, तपस्या, स्वाध्याय (अध्यात्म-शास्त्रपाठ) और ईश्वर-प्रणिधान अर्थात् ईश्वर को आत्म-समर्पण। तीसरा है आसन—अर्थात् बैठने की प्रणाली। चौथा है प्राणायाम। पाँचवाँ है प्रत्याहार—अर्थात् मन की विषयाभिमुखी गति को फेरकर उसे अन्तर्मुखी करना। छठा है धारणा अर्थात् एकाग्रता। सातवाँ है ध्यान। और आठवाँ है समाधि अर्थात् ज्ञानातीत अवस्था। हम देख रहे हैं, यम और नियम चरित्र-निर्माण के साधन हैं। इनको नींव बनाए बिना किसी तरह की योग-साधना सिद्ध न होगी। यम और नियम के दृढ़प्रतिष्ठ हो जाने पर योगी अपनी साधना का फल अनुभव करना आरम्भ कर देते हैं। इनके न रहने पर साधना का कोई फल न होगा। योगी को चाहिए कि वे तन-मन-वचन से किसी के विरुद्ध हिंसाचरण न करे। मनुष्य ही नहीं, वरन् अन्य प्राणियों के विरुद्ध भी हिंसा का भाव न रहे, दया मनुष्य-जाति में ही आबद्ध न रहे, वरन् वह और भी फैलकर मानो सारे संसार का आलिंगन कर ले।

यम और नियम के बाद आसन आता है। जब तक बहुत उच्च अवस्था की प्राप्ति नहीं हो जाती, तब तक रोज नियमानुसार कुछ शारीरिक और मानसिक क्रियाएँ करनी पड़ती हैं। अतएव जिससे दीर्घकाल तक एक भाव से बैठा जा सके, ऐसे

३२ राजयोग

Page 35Permalink

३२ राजयोग

एक आसन का अभ्यास आवश्यक है। जिनको जिस आसन से सुभीता मालूम होता हो, उनको उसी आसन पर बैठना चाहिए। एक व्यक्ति के लिए एक प्रकार से बैठकर सोचना सहज हो सकता है, परन्तु दूसरे के लिए, सम्भव है, वह बहुत कठिन जान पड़े। हम बाद में देखेंगे कि योग-साधना के समय शरीर के भीतर नाना प्रकार के कार्य होते रहते हैं। स्नायविक शक्तिप्रवाह की गति को फेरकर उसे नए रास्ते से दौड़ाना होगा, तब शरीर में नए प्रकार के कम्पन या क्रिया शुरू होगी, सारा शरीर मानो नए रूप से गठित हो जायगा। इस क्रिया का अधिकांश मेरुदण्ड के भीतर होगा, इसलिए आसन के सम्बन्ध में इतना समझ लेना होगा कि मेरुदण्ड को सहज भाव से रखना आवश्यक है—ठीक सीधा बैठना होगा—वक्ष, ग्रीवा और मस्तक सीधे और समुन्नत रहे, जिससे देह का सारा भार पसलियों पर पड़े। यह तुम सहज ही समझ सकोगे कि वक्ष यदि नीचे की ओर झुका रहे, तो किसी प्रकार का उच्च चिन्तन करना सम्भव नहीं। राजयोग का यह भाग हठयोग से बहुत-कुछ मिलता जुलता है। हठयोग केवल स्थूल देह को लेकर व्यस्त रहता है। इसका उद्देश्य केवल स्थूल देह को सबल बनाना है। हठयोग के सम्बन्ध में यहाँ कुछ कहने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि उसकी क्रियाएँ बहुत कठिन हैं। एक दिन में उसकी शिक्षा भी सम्भव नहीं। फिर, उससे कोई आध्यात्मिक उन्नति भी नहीं होती। डेलसर्ट और अन्यान्य व्यायाम-आचार्यों के ग्रन्थों में इन क्रियाओं के अनेक अङ्ग देखने को मिलते हैं। उन लोगों ने भी शरीर को भिन्न-भिन्न स्थितियों में रखने की व्यवस्था की है। हठयोग की तरह उनका भी उद्देश्य दैहिक उन्नति है, आध्यात्मिक उन्नति नहीं। शरीर की ऐसी कोई पेशी नहीं, जिसे

Page 36Permalink

साधना के प्राथमिक सोपान २३

हठयोगी अपने वश मे न ला सके। हृदय-यंत्र उसकी इच्छा के अनुसार बंद किया या चलाया जा सकता है —शरीर के सारे अंश वह अपनी इच्छानुसार चला सकता है।

मनुष्य किस प्रकार दीर्घजीवी हो, यही हठयोग का एकमात्र उद्देश्य है। शरीर किस प्रकार पूर्ण स्वस्थ रहे, यही हठयोगियो का एकमात्र लक्ष्य है। हठयोगियो का यही दृढ़ सकल्प है कि मुझे और पीडा न हो। और इस दृढ़ संकल्प के बल से उनको पीडा होती भी नही। वे दीर्घजीवी हो सकते है, सौ वर्ष तक जीवित रहना तो उनके लिए मामूली-सी बात है। उनकी १५० वर्ष की आयु हो जाने पर भी, देखोगे, वे पूर्ण युवा और सतेज है, उनका एक केश भी सफेद नही हुआ किन्तु इसका फल बस यही तक है। वटवृक्ष भी कभी-कभी ५००० वर्ष जीवित रहता है, किन्तु वह वटवृक्ष का वटवृक्ष ही बना रहता है। फिर वे लोग भी यदि उसी तरह दीर्घजीवी हुए, तो उससे क्या ? वे बस एक बडे स्वस्थकाय जीव भर रहते है। हठ-योगियो के दो-एक साधारण उपदेश बडे उपकारी है। सिर की पीडा होने पर, शय्या-त्याग करते ही नाक से शीतल जल पीए, इससे सारा दिन मस्तिष्क अत्यन्त शीतल रहेगा और कभी सर्दी न होगी। नाक से पानी पीना कोई कठिन काम नही, बडा सरल है। नाक को पानी के भीतर डुबाकर गले मे पानी खींचते रहो। पानी अपने-आप ही धीरे-धीरे भीतर जाने लगेगा।

आसन सिद्ध होने पर, किसी-किसी सम्प्रदाय के मतानुसार नाडी-शुद्धि करनी पड़ती है। बहुत से लोग यह सोचकर कि यह राजयोग के अन्तर्गत नहीं है, इसकी आवश्यकता स्वीकार नहीं करते। परन्तु जब शंकराचार्य जैसे भाष्यकार ने इसका विधान

Page 37Permalink

२४

राजयोग

किया है तब मेरे लिए भी इसका उल्लेख करना उचित जान पड़ता है। मैं श्वेताश्वतर उपनिषद् पर उनके भाष्य* से इस सम्बन्ध मे उनका मत उद्धृत करूँगा—"प्राणायाम के द्वारा जिस मन का मैल घुल गया है, वही मन ब्रह्म में स्थिर होता है। इसलिए शास्त्रो मे प्राणायाम के विषय का उल्लेख है। पहले नाडी-शुद्धि करनी पडती है तभी प्राणायाम करने की शक्ति आती है। अंगूठे से दाहिना नथुना दवाकर वाएँ नथुने से यथाशक्ति वायु अन्दर खींचो, फिर बीच मे तनिक देर भी विश्राम किए बिना वाईं नासिका वन्द करके दाहिनी नासिका से वायु निकालो। फिर दाहिनी नासिका से वायु ग्रहण करके बाईं नासिका से निकालो। दिन भर मे चार बार अर्थात् उषा, मध्याह्न, सायाह्न और निशीथ, इन चार समय पूर्वोक्त क्रिया का तीन बार या पाँच बार अभ्यास करने पर, एक पक्ष या महीने भर मे नाडी-शुद्धि हो जाती है। उसके बाद प्राणायाम पर अधिकार होगा।"

सदा अभ्यास आवश्यक है। तुम रोज देर तक बैठे हुए मेरी बात सुन सकते हो, परन्तु अभ्यास किए बिना तुम एक कदम भी आगे नही बढ़ सकते। सब कुछ साधना पर निर्भर है। प्रत्यक्ष अनुभूति बिना इन तत्त्वो का कुछ भी समझ मे नही आता। स्वय अनुभव करना होगा, केवल व्याख्या और मत


  • प्राणायामक्षपितमनोमलस्य चित्त ब्रह्मणि स्थित भवतीति प्राणायामो निर्दिश्यते। प्रथम नाडीशोधन कर्तव्यम्। तत प्राणायामे अधिकार। दक्षिण-नासिकापुटमंगुल्यावष्टभ्य वामेन वायु पूरयेत् यथाशक्ति। ततोऽनन्तर-मुत्सृज्यैव दक्षिणेन पुटेन समुत्सृजेत्। सव्यमपि धारयेत्। पुनर्दक्षिणेन पूरयित्वा सव्येन समुत्सृजेत् यथाशक्ति। त्रि पञ्चकृत्वो वा एव अभ्यस्यतः सवनचतुष्टयमपररात्रे मध्याह्ने पूर्वरात्रेऽर्धरात्रे च पक्षान्मासात् विशुद्धिर्भवति।

श्वेताश्वतर उपनिषद्, शांकरभाष्य—द्वितीय अध्याय, अष्टम श्लोक।

Page 38Permalink

साधना के प्राथमिक सोपान २५

सुनने से न होगा। फिर साधना मे बहुत से विघ्न भी हैं। पहला तो व्याधिग्रस्त देह है। शरीर स्वस्थ न रहे, तो साधना मे बाधा पडती है। अत शरीर को स्वस्थ रखना आवश्यक है। किस प्रकार का खान-पान करना होगा, किस प्रकार जीवन यापन करना होगा, इन सब बातो की ओर हमे विशेष ध्यान देना होगा। मन से सोचना होगा कि शरीर सबल हो—जैसा कि यहाँ के क्रिश्चियन साइन्स* मतावलम्बी करते है। बस, शरीर के लिये फिर और कुछ करने की जरूरत नही। यह हम कभी न भूले कि स्वास्थ्य उद्देश्य के साधन का एक उपाय मात्र है। यदि स्वास्थ्य ही उद्देश्य होता, तो हम तो पशुतुल्य हो गए होते। पशु प्राय अस्वस्थ नही होते।

दूसरा विघ्न है सन्देह। हम जो कुछ नही देख पाते, उसके सम्बन्ध मे सन्दिग्ध हो जाते हैं। मनुष्य कितनी भी चेष्टा क्यो न करे, वह केवल बात के भरोसे नही रह सकता। यही कारण है कि योगशास्त्रोक्त सत्यता के सम्बन्ध मे सन्देह उपस्थित हो जाता है। यह सन्देह बहुत अच्छे आदमियो में भी देखने को मिलता है। परन्तु साधना का श्रीगणेश कर देने पर बहुत थोडे दिनो में ही कुछ-कुछ अलौकिक व्यापार देखने को


*क्रिश्चियन साइन्स (Christian Science)—यह सम्प्रदाय मिसेज एड्डि नामक एक अमेरिकन महिला द्वारा प्रतिष्ठित हुआ है। इनके मतानुसार सचमुच जड नामक कोई पदार्थ नही, वह हमारे मन का केवल भ्रम है। विश्वास करना होगा—‘हमें कोई रोग नहीं,’ तो हम उसी समय रोगमुक्त हो जायँगे। इसका ‘क्रिश्चियन साइन्स’ नाम पडने का कारण यह है कि इसके मतावलम्बी कहते हैं, “हम ईसा का ठीक-ठीक पदानुसरण कर रहे हैं। ईसा ने जो अद्भुत क्रियाएँ की थी, हम भी वैसा करने में समर्थ है, और सब प्रकार से दोषशून्य जीवन यापन करना हमारा उद्देश्य है।”

Page 39Permalink

२६ राजयोग

मिलेंगे, और तब साधना के लिए तुम्हारा उत्साह बड़ जायगा। योगशास्त्र के एक टीकाकार ने कहा भी है, "योगशास्त्र की सत्यता के सम्बन्ध मे यदि एक बिलकुल सामान्य प्रमाण भी मिल जाय, तो उतने से ही सम्पूर्ण योगशास्त्र पर विश्वास हो जायगा।" उदाहरणस्वरूप तुम देखोगे कि कुछ महीनो की साधना के वाद तुम दूसरो का मनोभाव समझ सक रहे हो, वे तुम्हारे पास तस्वीर के रूप में आयेंगे, यदि बहुत दूर पर कोई शब्द या बातचीत हो रही हो, तो मन एकाग्र करके सुनने की चेष्टा करने से ही तुम उसे सुन लोगे। पहले पहल अवश्य ये व्यापार बहुत थोडा-थोडा करके दिखेंगे। परन्तु उसी से तुम्हारा विश्वास, बल और आशा बढती रहेगी। मान लो, नासिका के अग्रभाग मे तुम चित्त का सयम करने लगे, तब तो थोडे ही दिनो मे तुम्हे दिव्य सुगन्ध मिलने लगेगी, इसी से तुम समझ जाओगे कि हमारा मन कभी-कभी वस्तु के प्रत्यक्ष सस्पर्श मे न आकर भी उसका अनुभव कर लेता है। पर यह हमे सदा याद रखना चाहिए कि इन सिद्धियो का और कोई स्वतन्त्र मूल्य नही, वे हमारे प्रकृत उद्देश्य के साधन में कुछ सहायता मात्र करती हैं। हमे याद रखना होगा कि इन सब साधनो का एकमात्र लक्ष्य, एकमात्र उद्देश्य 'आत्मा की मुक्ति' है। प्रकृति को पूर्ण रूप से अपने अधीन कर लेना ही हमारा एकमात्र लक्ष्य है। इसके सिवा और कुछ भी हमारा प्रकृत लक्ष्य नही हो सकता। मामूली सिद्धियों से सन्तुष्ट हो गए, तो पूरा न पडेगा। हम ही प्रकृति पर प्रभुत्व करेंगे, प्रकृति को अपने ऊपर प्रभुत्व न करने देगे। शरीर या मन कुछ भी हम पर प्रभुत्व न कर सके। हम यह कभी न भूले कि 'शरीर हमारा है'—'हम शरीर के नही'।

Page 40Permalink

साधना के प्राथमिक सोपान

२७०

एक देवता और एक असुर किसी महापुरुष के पास आत्म-जिज्ञासु होकर गए । उन्होने उन महापुरुष के पास एक अरसे तक रहकर शिक्षा प्राप्त की । कुछ दिन बाद उन महापुरुष ने उनसे कहा, “तुम लोग जिसको खोज रहे हो, वह तो तुम ही हो ।” उन लोगो ने सोचा, “तो देह ही आत्मा है ।” फिर उन लोगों ने यह सोचकर कि जो कुछ मिलना था मिल गया, सन्तुष्ट-चित्त से अपनी-अपनी जगह को प्रस्थान किया । उन लोगो ने जाकर अपने-अपने आत्मीय जनो से कहा, “जो कुछ सीखना था, सब सीख आए । अब आओ, भोजन, पान और आनन्द मे दिन बिताएँ—हम ही वह आत्मा है, इसके सिवा और कोई पदार्थ नही ।” उस असुर का स्वभाव अज्ञान से ढका हुआ था, इसलिए इस विषय मे उसने अधिक अन्वेषण नही किया । अपने को ईश्वर समझकर वह पूर्ण रूप से सन्तुष्ट हो गया, उसने ‘आत्मा’ शब्द से देह समझी । परन्तु देवता का स्वभाव अपेक्षाकृत पवित्र था । वे भी पहले इस भ्रम मे पडे थे कि “ ‘मैं’ का अर्थ यह शरीर ही है, यह देह ही ब्रह्म है, इसलिए इसे स्वस्थ और सबल रखना, सुन्दर स्वच्छ वस्त्रादि पहनना और सब प्रकार के दैहिक सुखो का सम्भोग करना ही कर्तव्य है ।” परन्तु कुछ दिन जाने पर उन्हे यह बोध होने लगा कि गुरु के उपदेश का अर्थ यह नही हो सकता कि देह ही आत्मा है, वरन् देह से भी श्रेष्ठ कुछ अवश्य है । तब उन्होने गुरु के निकट आकर पूछा, “गुरो, आपके वाक्य का क्या यह तात्पर्य है कि देह ही आत्मा है? परन्तु यह कैसे हो सकता है ? सभी शरीर तो नष्ट होते है, पर आत्मा का तो नाश नही । ” आचार्य ने कहा, “तुम स्वय इसका निर्णय करो, तुम वही हो—तत्त्वमसि ।” तब शिष्य ने सोचा, शरीर के-

-२८ राजयोग

Page 41Permalink

-२८ राजयोग

भीतर जो प्राण है, शायद उनको लक्ष्य कर गुरु ने पूर्वोक्त उपदेश दिया था। वे वापस चले गए। परन्तु फिर शीघ्र ही देखा कि भोजन करने पर प्राण तेजस्वी रहते है और न करने पर मुरझाने लगते हैं। तब वे पुन गुरु के पास आए और कहा, "गुरो, आपने क्या प्राणों को आत्मा कहा है?" गुरु ने कहा, "स्वय तुम इसका निर्णय करो, तुम वही हो।" उस अध्यवसायशील शिष्य ने गुरु के यहाँ से लौटकर सोचा, "तो शायद मन ही आत्मा होगा।" परन्तु वे शीघ्र ही समझ गए कि मनोवृत्तियाँ बहुत तरह की हैं, मन में कभी साधु-वृत्ति, तो कभी असत्-वृत्ति उठती है, अत मन इतना परिवर्तनशील है कि वह कभी आत्मा नही हो सकता। तब फिर से गुरु के पास आकर उन्होने कहा, "मन आत्मा है, ऐसा तो मुझे नही जान पडता। आपने क्या ऐसा ही उपदेश दिया है?" गुरु ने कहा, "नही, तुम ही वह हो, तुम स्वय इसका निर्णय करो।" वे देवपुगव फिर लौट गए, तब उनको यह ज्ञान हुआ, "मैं समस्त मनोवृत्तियो के अतीत एकमेवाद्वितीय आत्मा हूँ। मेरा जन्म नही, मृत्यु नही, मुझे तलवार नही काट सकती, आग नही जला सकती, हवा नही सुखा सकती, जल नही गला सकता, मै अनादि हूँ, जन्मरहित, अचल, अस्पर्श, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान पुरुष हूँ। आत्मा शरीर या मन नही, वह तो इन सबके अतीत है।" इस प्रकार देवता मे ज्ञान का उदय हुआ और वे तत्प्रसूत आनन्द से तृप्त हो गए। पर उस असुर विचारे को सत्यलाभ न हुआ, क्योकि देह मे उसकी अत्यन्त आसक्ति थी।

इस जगत् मे ऐसी असुर-प्रकृति के अनेक लोग है, फिर भी देवता-प्रकृतिवाले बिलकुल ही न हो, ऐसा नही। यदि कोई कहे, - "आओ, तुम लोगो को मैं एक ऐसी विद्या सिखाऊँगा, जिससे

Page 42Permalink

साधना के प्राथमिक सोपान २९

तुम्हारा इन्द्रिय-सुख अनन्तगुना बढ जायगा,” तो अगणित लोग उसके पास दौड पडेगे। परन्तु यदि कोई कहे, “आओ, मै तुम लोगो को तुम्हारे जीवन का चरम लक्ष्य परमात्मा का विषय सिखलाऊँ,” तो शायद उनकी बात की कोई परवाह भी न करेगा। ऊँचे तत्त्व की धारणा करने की शक्ति वहुत कम लोगो मे देखने को मिलती है, सत्य को प्राप्त करने के लिए अध्यवसाय-शील लोगो की सख्या तो और भी विरली है। पर ससार मे ऐसे महापुरुष भी है, जिनकी यह निश्चित धारणा है कि शरीर चाहे हजार वर्ष रहे या लाख वर्ष, अन्त मे गति एक ही होगी। जिन शक्तियो के बल से देह कायम है, उनके चले जाने पर देह न रहेगी। कोई भी व्यक्ति पल भर के लिए भी शरीर का परिवर्तन रोकने मे समर्थ नही हो सकता। शरीर और है क्या? वह कुछ सतत-परिवर्तनशील परमाणुओ की समष्टि मात्र है। नदी के दृष्टान्त से यह तत्त्व सहज बोधगम्य हो सकता है। तुम अपने सामने नदी मे जलराशि देख रहे हो, वह देखो, पल भर मे वह चली गई और उसकी जगह एक नयी जलराशि आ गई। जो जलराशि आई, वह सम्पूर्ण नयी है, परन्तु देखने मे पहली ही जलराशि की तरह है। शरीर भी ठीक इसी तरह सतत परिवर्तन-शील है। उसके इस प्रकार परिवर्तनशील होने पर भी उसे स्वस्थ और वलिष्ठ रखना आवश्यक है, क्योकि शरीर की सहायता से ही हमे ज्ञान की प्राप्ति करनी होगी। इसके सिवा और कोई उपाय नही।

सब प्रकार के शरीरो मे मानव-देह ही श्रेष्ठतम है, मनुष्य ही श्रेष्ठतम जीव है। मनुष्य सब प्रकार के निकृष्ट प्राणियो से—यहाँ तक कि देवादि से भी श्रेष्ठ है। मनुष्य से

-३० राजयोग

Page 43Permalink

-३० राजयोग

श्रेष्ठतर जीव और नही। देवताओ को भी ज्ञान-लाभ के लिए मनुष्य-देह धारण करनी पडती है। एकमात्र मनुष्य ही ज्ञान-लाभ का अधिकारी है, देवता भी इसमे वञ्चित है। यहूदी और मुसलमानों के मत मे, ईश्वर ने, देवता और अन्यान्य समुदाय सृष्टियो के बाद मनुष्य की सृष्टि करके, देवताओं से मनुष्य को प्रणाम और अभिनन्दन कर आने के लिए कहा। इब्लिस को छोडकर बाकी सबने ऐसा किया। अतएव ईश्वर ने इब्लिस को अभिशाप दे दिया। इससे वह शैतान बन गया। उक्त रूपक के अन्दर यह महान् सत्य निहित है कि ससार मे मनुष्य-जन्म ही अन्य सबकी अपेक्षा श्रेष्ठ है। पशु आदि तिर्यक्-सृष्टि तम प्रधान है। पशु किसी ऊँचे तत्त्व की धारणा नहीं कर सकते। देवता भी मनुष्य-जन्म लिए बिना मुक्तिलाभ नहीं कर सकते। देखो, मनुष्य की आत्मोन्नति के लिए अधिक धन अनुकूल नही। फिर बिलकुल निर्धन होने पर भी उन्नति दूर रहती है। ससार मे जितने महात्मा पैदा हुए है, सभी मध्यम श्रेणी के लोगो से हुए थे। मध्यम श्रेणीवालो में सब विरोधी शक्तियो का समन्वय रहता है।

अब हम यथार्थ विषय पर आएँ। हमें अब प्राणायाम के सम्बन्ध मे आलोचना करनी चाहिए। देखें, चित्तवृत्तियो के निरोध से प्राणायाम का क्या सम्बन्ध है। श्वास-प्रश्वास मानो देह-यन्त्र का गतिनियामक मूल यन्त्र (fly-wheel) है। एक बृहत् इजिन पर निगाह डालने पर देखोगे कि एक बडा चक्र घूम रहा है और उस चक्र की गति क्रमश सूक्ष्म से सूक्ष्मतर यन्त्रो में सञ्चारित होती है। इस प्रकार उस इजिन के अत्यन्त सूक्ष्मतम यन्त्र तक गतिशील हो जाते हैं। श्वास-प्रश्वास ठीक वैसा ही एक गतिनियामक चक्र है। वही इस शरीर के सब अगो मे जहाँ