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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

> अथ योगानुशासनम् ॥ १ ॥

पातंजल-योगसूत्र

प्रथम अध्याय

समाधिपाद

अथ योगानुशासनम् ॥ १ ॥

सूत्रार्थ—अब योग की व्याख्या करते हैं।

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥ २ ॥

सूत्रार्थ—चित्त को विभिन्न वृत्तियों अर्थात् आकार में परिणत होने से रोकना ही योग है।

व्याख्या—यहाँ बहुतसी बातें समझाने की आवश्यकता है। पहले हमें यह समझ लेना होगा कि यह चित्त और ये वृत्तियाँ क्या हैं। मेरी ये आँखें हैं। आँखें वास्तव में नहीं देखतीं। यदि मस्तिष्क में स्थित दर्शनेन्द्रिय या दर्शनशक्ति को नष्ट कर दो, तो भले ही तुम्हारी आँखें रहें, आँखों की पुतलियाँ भी साबूत रहें और आँख के ऊपर जिस छवि के पड़ने से दर्शन होता है, वह भी रहे, पर फिर भी आँखें देख न सकेंगी। अतः आँख दर्शन का गौण यन्त्र मात्र हुईं। वह वास्तव में दर्शनेन्द्रिय नहीं है। दर्शनेन्द्रिय तो मस्तिष्क के अन्तर्गत स्नायु-केन्द्र में अवस्थित है। अतएव हमने देखा कि दर्शन-क्रिया के लिए केवल दो आँखें ही पर्याप्त नहीं हैं। कभी-कभी मनुष्य आँखें खुली रखकर सो जाता है। वस्तु का चित्र आँखों पर बना हुआ है, दर्शनेन्द्रिय भी है, पर और एक तीसरी वस्तु की आवश्यकता है—और वह है मन। मन को इन्द्रिय के साथ संयुक्त रहना चाहिए। अतः दर्शन-क्रिया के लिए चक्षुरूप बहिर्यन्त्र, मस्तिष्क में स्थित स्नायु-केन्द्र और मन—ये तीन

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चीजे चाहिए। कभी-कभी ऐसा होता है कि रास्ते से गाड़ियाँ दौड़ती हुई निकल जाती हैं, पर तुम उन्हे सुन नही पाते। क्यो ? इसलिए कि तुम्हारा मन श्रवणेन्द्रिय के साथ सयुक्त नही रहता। अतएव, प्रत्येक अनुभव-क्रिया के लिए पहले तो बाहर का यन्त्र, उसके बाद इन्द्रिय, और तृतीयत, इन दोनो के साथ मन का योग चाहिए। मन, विषय के अभिघात से उत्पन्न हुई सवेदना को और भी अन्दर ले जाकर निश्चयात्मिका बुद्धि के सामने पेश करता है। तब बुद्धि से प्रतिक्रिया होती है। इस प्रतिक्रिया के साथ अह-भाव जाग उठता है। फिर क्रिया और प्रतिक्रिया का यह मिश्रण पुरुष अर्थात् प्रकृत आत्मा के सामने लाया जाता है। तब वे पुरुष इस मिश्रण को एक (ससीम) वस्तु के रूप में अनुभव करते हैं। पाँचो इन्द्रिय, मन, निश्चयात्मिका बुद्धि और अहकार को मिलाकर अन्त करण कहते हैं। ये सब मन के उपादान स्वरूप चित्त के भीतर होनेवाली भिन्न-भिन्न प्रक्रियाएँ हैं। चित्त में उठनेवाली विचार-तरंगों को वृत्ति (भँवर) कहते हैं। अब प्रश्न यह है कि यह विचार है क्या चीज ? गुरुत्वाकर्षण या विकर्षण शक्ति के समान विचार भी एक शक्ति है। प्रकृति के अक्षय शक्ति-भंडार से चित्त नामक करण कुछ शक्ति को ग्रहण कर लेता है, अपने में भिदा लेता है और उसे विचार के रूप में बाहर भेजता है। यह शक्ति हमे खाद्यान्न के जरिये प्राप्त होती है और इस खाद्यान्न से शरीर गति आदि की शक्ति प्राप्त करता है। दूसरी अर्थात् सूक्ष्मतर शक्तियो को वह विचार के रूप में बाहर भेजता है। अतएव मन चेतन नही है, फिर भी वह चेतन-सा प्रतीत होता है। क्यों ? इसलिए कि चेतन आत्मा उसके पीछे है। तुम ही एकमात्र चेतन पुरुष

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हो—मन तो केवल एक करण अर्थात् यन्त्र मात्र है, जिसके द्वारा तुम बाह्य जगत् की उपलब्धि करते हो। इस पुस्तक की ही बात लो, बाहर मे इसका पुस्तकरूपी अस्तित्व नही है। बाहर मे वस्तुत जो है, वह तो अज्ञात और अज्ञेय है। वह केवल स्फूर्ति (सकेत) देनेवाला कारण मात्र है। जैसे पानी में एक पत्थर फेंकने पर पानी प्रवाहाकार में बँटकर उस पत्थर पर प्रतिघात करता है, ठीक वैसे ही वह अज्ञात वस्तु जाकर मन मे आघात प्रदान करती है, और मन से पुस्तक के रूप में एक प्रतिक्रिया होती है। यथार्थ वहिर्जगत् तो स्फूर्ति देनेवाला कारण मात्र है, जिससे मानसिक प्रतिक्रिया होती है। एक पुस्तक का रूप, हाथी का रूप या मनुष्य का रूप बाहर में कोई अस्तित्व नही रखता, हम जो कुछ जानते हैं, वह बाहर की स्फूर्ति से होनेवाली हमारी मानसिक प्रतिक्रिया मात्र है। जॉन स्टुअर्ट मिल ने कहा है— “अनुभव की नित्य सम्भाव्यता का नाम जड पदार्थ है।” बाहर मे जो है, वह है केवल इस प्रतिक्रिया को उत्पन्न करनेवाली स्फूर्ति मात्र। उदाहरणार्थ, मोती की एक सीप को लो। तुम लोग जानते हो, मोती किस तरह पैदा होता है। बालुका का एक कण * या अन्य कोई चीज़ सीप मे घुस जाती है और उसमें क्षोभ उत्पन्न करने लगती है। इससे वह सीप उस बालुका-कण के चारो ओर 'एनामेल' के समान एक प्रकार का लेप-सा डालने लगती है। बस उसी से मोती तैयार होता है। यह सारा अनुभवात्मक जगत् मानो हमारे अपने उस लेप के समान है,


* वैज्ञानिको के मतानुसार, लोगो में प्रचलित बालुका-कण से मोती की उत्पत्ति सम्बन्धी विश्वास की कोई दृढ भित्ति नही है, सम्भवत क्षुद्र कीटाणुविशेष (Parasites) से मोती की उत्पत्ति होती है।

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'और यथार्थ जगत् मानो वह बालुका-कण है। सामान्य मनुष्य उसे कभी समझ न सकेगा, क्योकि जब कभी वह उसे समझने की कोशिश करता है, त्योही वह बाहर मे मानो अपना लेप डालने लगता है, और बस अपने उस लेप को ही देखता है। अब हम समझे कि वृत्ति का सच्चा अर्थ क्या है। मनुष्य का जो असल स्वरूप है, वह मन के अतीत है। मन तो उसके हाथो एक यन्त्रस्वरूप है। उसी का चैतन्य इस मन के भीतर मे से होकर आ रहा है। जब तुम इस मन के पीछे द्रष्टा-रूप से अवस्थित रहते हो, तभी वह चैतन्यमय होता है। जब मनुष्य इस मन को बिल्कुल त्याग देता है, तो उस मन का सम्पूर्ण नाश हो जाता है, उसका अस्तित्व ही नही रह जाता। अब समझ मे आया कि चित्त का क्या तात्पर्य है। वह मन का उपादान-स्वरूप है, और वृत्तियां उस पर उठनेवाली लहरे और तरगे है। जब बाहर के कुछ कारण उस पर कार्य करने लगते है, त्योही वह तरग-रूप धारण कर लेता है। हम जिसे जगत् कहते हैं, वह तो इन वृत्तियो की समष्टि मात्र है।

हम लोग सरोवर की तली को नही देख सकते, क्योकि उसकी सतह छोटी-छोटी लहरो से व्याप्त रहती है। उस तली की झलक मिलना तभी सम्भव है, जब ये सारी लहरे शान्त हो जायें और पानी स्थिर हो जाय। यदि पानी गँदला हो, या सारे समय उसमे हलचल होती रहे, तो वह तली कभी दिखाई न देगी। पर यदि पानी निर्मल हो और उसमें एक भी लहर न रहे, तब हम उस तली को अवश्य देख सकेंगे। यह चित्त मानो उस सरोवर के समान है और हमारा असल स्वरूप मानो उसकी तली है, वृत्तियां उस पर उठनेवाली लहरे है। फिर यह भी

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देखा जाता है कि यह मन तीन प्रकार की अवस्थाओ में रहता है। एक है तम की अर्थात् अन्धकारमय अवस्था, जैसा कि हम पशुओ और अत्यन्त मूर्खों में पाते हैं। ऐसे मन की प्रवृत्ति केवल औरो को अनिष्ट पहुँचाने में ही होती है; मन की इस अवस्था में और दूसरा कोई विचार ही नही सूझता। दूसरा है—रज अर्थात् मन की क्रियाशील अवस्था, जिसमे केवल प्रभुत्व और भोग की इच्छा रहती है। उस समय यही भाव रहता है कि मैं शक्तिमान होऊँगा और दूसरो पर प्रभुत्व करूँगा। तीसरा है—सत्त्व अर्थात् मन की गम्भीर और शान्त अवस्था, जिसमें समस्त तरंगे शान्त हो जाती हैं और मानस-सरोवर का जल निर्मल हो जाता है। यह कोई जडावस्था नही है, प्रत्युत यह तो तीव्र क्रियाशील अवस्था है। शान्त होना शक्ति की महत्तम अभिव्यक्ति है। क्रियाशील होना तो सहज है। बस लगाम ढीली कर दो, तो घोडे स्वय तुम्हे भगा ले जायेंगे। यह तो कोई भी कर सकता है, पर शक्तिमान पुरुष तो वह है, जो इन तेज घोडो को थाम सके। किसमें अधिक शक्ति लगती है—लगाम ढीली कर देने में अथवा उसे थामे रखने मे ? शान्त मनुष्य और आलसी मनुष्य एक समान नही हैं। सत्त्व को कहीं आलस्य न समझ बैठना। शान्त मनुष्य वह है, जो मन की इन लहरो को अपने वश में लाने मे समर्थ हुआ है। क्रियाशीलता निम्नतर शक्ति का प्रकाश है और शान्तभाव उच्चतर शक्ति का।

यह चित्त अपनी स्वाभाविक पवित्र अवस्था को फिर से प्राप्त करने के लिए सतत चेष्टा कर रहा है, किन्तु इन्द्रियाँ उसे बाहर खीचे रखती है। उसका दमन करना, उसकी इस बाहर जाने की प्रवृत्ति को रोकना और उसे लौटाकर उस चैतन्यघन पुरुष के

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पास ले जानेवाले रास्ते पर लाना—यही योग का पहला सोपान है; क्योकि केवल इसी उपाय से चित्त अपने यथार्थ रास्ते पर आ सकता है।

यद्यपि उच्चतम से लेकर निम्नतम तक सभी प्राणियो में यह चित्त विद्यमान है, तथापि केवल मनुष्य-शरीर मे ही हम उसे बुद्धि-रूप मे विकसित देख पाते है। जब तक यह चित्त बुद्धि का रूप धारण नही कर लेता, तब तक उसके लिए इन सब विभिन्न सोपानो में से होते हुए लौटकर आत्मा को मुक्त करना सम्भव नही। यद्यपि गाय या कुत्ते के भी मन है पर उनके लिए सद्योमुक्ति असम्भव है, क्योकि उनका चित्त अभी बुद्धि का रूप धारण नही कर सकता।

यह चित्त अवस्था-भेद से बहुत से रूप धारण करता है जैसे—क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त और एकाग्र (विवेकख्याति या प्रसंख्यान) *। मन इन चार प्रकार की अवस्थाओ मे चार प्रकार के रूप धारण करता है। पहला है क्षिप्त, जिसमें मन चारो ओर बिखर जाता है और कर्मवासना प्रबल रहती है। इस अवस्था मे मन की प्रवृत्ति केवल सुख और दुःख इन दो भावो मे ही प्रकाशित होने की होती है। उसके बाद है मूढ अवस्था। यह अवस्था तमोगुणात्मक है और इसमे मन की प्रवृत्ति केवल औरो का अनिष्ट करने में होती है। विक्षिप्त अवस्था वह है, जब मन अपने केन्द्र की ओर जाने का प्रयत्न करता है। यहाँ पर टीकाकार कहते हैं कि विक्षिप्त अवस्था देवताओ के लिए स्वाभाविक है और मूढावस्था असुरों के लिए। एकाग्र चित्त ही हमे समाधि मे ले जाता है।


* यहाँ निरुद्ध (धर्ममेघ या परप्रसंख्यान) अवस्था की बात नही कही गई, क्योकि वास्तव में निरुद्धावस्था को चित्तवृत्ति नही कही जा सकती।

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तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥ ३ ॥

सूत्रार्थ—उस समय (अर्थात् इस निरोध की अवस्था में) द्रष्टा (पुरुष) अपने (अपरिवर्तनशील) स्वरूप में अवस्थित रहते हैं।

व्याख्या—ज्योंही लहरे शान्त हो जाती हैं और पानी स्थिर हो जाता है, त्योंही हम सरोवर की तली को देख पाते हैं। मन के बारे में भी ठीक ऐसा ही समझो। जब यह शान्त हो जाता है, तब हम देख पाते हैं कि अपना असल स्वरूप क्या है, फिर हम उन तरंगों के साथ अपने आपको एकरूप नहीं कर लेते, वरन् अपने स्वरूप में अवस्थित रहते हैं।

वृत्तिसारूप्यमितरत्र ॥४॥

सूत्रार्थ—(इस निरोध की अवस्था को छोड़कर) दूसरे समय में द्रष्टा वृत्ति के साथ एकरूप होकर रहते हैं।

व्याख्या—उदाहरणार्थ, मान लो किसी ने मेरी निन्दा की। बस वह मेरे मन में एक वृत्ति उठा देता है और मैं उसके साथ अपने आपको एकरूप कर देता हूँ। इसका परिणाम होता है—दुख।

वृत्तयः पंचतय्यः क्लिष्टा अक्लिष्टाः ॥५॥

सूत्रार्थ—वृत्तियां पांच प्रकार की हैं—(कुछ) क्लेशयुक्त और (कुछ) क्लेशशून्य।

प्रमाण-विपर्यय-विकल्प-निद्रा-स्मृतयः ॥६॥

सूत्रार्थ—(ये हैं) प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति—अर्थात् सत्यज्ञान, भ्रमज्ञान, शब्द-भ्रम, निद्रा और स्मृति।

प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ॥७॥

सूत्रार्थ—प्रत्यक्ष अर्थात् साक्षात् अनुभव, अनुमान और आगम अर्थात् विश्वस्त लोगों के वाक्य—(ये तीन) प्रमाण हैं।

पातंजल-योगसूत्र १३३

पातंजल-योगसूत्र १३३

व्याख्या—जब हमारी दो अनुभूतियाँ आपस में विरोधी नही होती, तब उसे हम प्रमाण कहते है। मान लो, मैंने कुछ सुना, यदि वह पहले अनुभव की हुई किसी बात का खण्डन करे, तो मेरे भीतर उसके विरुद्ध तर्क-वितर्क होने लगते है और मैं उस पर विश्वास नही करता। प्रमाण के फिर तीन प्रकार हैं। साक्षात् अनुभव या प्रत्यक्ष—यह एक प्रकार का प्रमाण है। यदि हम किसी प्रकार आँख और कान के भ्रम मे न पड़े हो, तो हम जो कुछ देखते या अनुभव करते हैं, उसे प्रत्यक्ष कहा जायगा। मैं इस दुनिया को देखता हूँ, बस यह उसके अस्तित्व का पर्याप्त प्रमाण है। दूसरा है अनुमान—लक्षण से लक्ष्य वस्तु पर आना। तुमने कोई संकेत देखा और उससे तुम उस वस्तु पर आ गए, जिसका कि वह संकेत है। तीसरा है आप्तवाक्य—योगियों अर्थात् सत्यद्रष्टा ऋषियों की प्रत्यक्ष अनुभूति। हम सभी ज्ञान की प्राप्ति के लिए सतत प्रयत्न कर रहे हैं, पर तुम्हें और मुझे उसके लिए कड़ी चेष्टा करनी पड़ती है, दीर्घकाल तक विचाररूप अरुचिकर रास्ते से होकर अग्रसर होना पड़ता है; किन्तु विशुद्धसत्त्व योगी इन सबके पार चले गए हैं। उनके मनश्चक्षु के सामने भूत, भविष्य और वर्तमान सब एक हो गए हैं, उनके लिए वे सब मानो एक पाठ्य पुस्तक के समान हैं। हम लोगों को ज्ञान-लाभ के लिए जिस अरुचिकर प्रणाली में से होकर जाना पड़ता है, उनके लिए उसकी फिर और आवश्यकता नही रह जाती। उनका वाक्य ही प्रमाण है, क्योंकि वे अपने भीतर ही सारे ज्ञान की उपलब्धि करते हैं। वे सर्वज्ञ पुरुष हैं। ऐसे व्यक्ति ही पवित्र शास्त्रग्रन्थों के प्रणेता हैं, और इसीलिए शास्त्र प्रमाण-रूप से ग्राह्य हैं। यदि वर्तमान समय में

१३४ राजयोग

१३४ राजयोग

ऐसे मनुष्य कोई हो, तो उनकी बात भी अवश्य प्रमाण-रूप से ग्राह्य होगी। दूसरे दार्शनिकों ने इस आप्त के बारे मे बहुत से तर्क-वितर्क किए हैं। उनका प्रश्न है कि आप्तवाक्य को सत्य क्यो माना जाय ? इसका उत्तर यह है कि वह उनकी प्रत्यक्ष अनुभूति है। मान लो, तुमने या मैने कोई बात देखी। यदि वह पहले किए हुए अनुभव की विरोधी न हो, तो वह प्रमाण-रूप से ग्राह्य होती है। ठीक इसी तरह उसका भी प्रामाण्य समझना चाहिए। इन्द्रियों के भी अतीत एक ज्ञान है, और जब कभी यह ज्ञान युक्ति और मनुष्य की पूर्व-अनुभूति का खण्डन नही करता, तब उसे प्रमाण कहते हैं। यदि कोई पागल इस कमरे में घुस आए और कहने लगे, 'मै सब ओर देवता देख रहा हूँ,' तो वह प्रमाण न कहा जायगा। पहले तो, वह ज्ञान सत्य होना चाहिए। दूसरे, वह पहले के किसी ज्ञान का खण्डन न करे। और तीसरे, वह उस मनुष्य के चरित्र-बल पर आधारित हो। मैंने बहुतो को यह कहते सुना है कि मनुष्य का चरित्र उतने महत्त्व का नही है, जितना कि उसके शब्द, वह क्या कहता है, बस उसी को पहले सुनो। अन्य विषयों के सम्बन्ध मे यह बात भले ही सत्य हो, पर धर्म के सम्बन्ध में तो यह सम्भव नही। एक व्यक्ति दुष्ट स्वभाववाला होता हुआ भी ज्योतिष के बारे में कुछ आविष्कार कर सकता है, पर धर्म के बारे मे बात अलग है, क्योकि कोई भी अपवित्र मनुष्य धर्म के यथार्थ सत्य को किसी काल में प्राप्त नही कर सकता। अतएव, सबसे पहले हमे देखना होगा कि जो व्यक्ति अपने आपको आप्त कहकर ढिंढोरा पीटता है, वह पूर्णतया नि स्वार्थ और पवित्र है अथवा नही। दूसरे, उसने अतीन्द्रिय ज्ञान की प्राप्ति की है या नही। तीसरे, वह जो

पातंजल-योगसूत्र १३५

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कुछ कहता है, वह मनुष्य-जाति के किसी पूर्व-ज्ञान या पूर्व-अनुभव का खण्डन तो नही करता। आविष्कृत कोई भी नया सत्य पूर्व-कालीन किसी सत्य का खण्डन नही करता, वरन् वह तो पूर्व सत्य के साथ पूरी तरह मेल खाता है। और चौथे, दूसरो के लिए उस सत्य की प्राप्ति करना सम्भव होना चाहिये। यदि कोई मनुष्य कहे कि मुझे एक दर्शन हुआ है और साथ ही यह भी बोले कि उसे मै ही देख सकता हूँ—और किसी के वश की वह बात नही, तो मै उसकी बात पर विश्वास नही करता। प्रत्येक मनुष्य स्वयं प्रत्यक्ष उपलब्धि करके यह देख सके कि वह सत्य है या नही। फिर, जो व्यक्ति अपना ज्ञान बेचता फिरता है, वह आप्त नहीं है। ये सब शर्तें अवश्य पूरी होनी चाहिए। तुम्हे पहले देखना होगा कि वह व्यक्ति पवित्र और नि स्वार्थ है, उसमे रुपया-कौडी या नाम-यश की तृष्णा नहीं। दूसरे, उसके जीवन से यह प्रकट होना चाहिए कि वह ज्ञानातीत भूमि पर पहुँच गया है। तीसरे, उसे हम लोगो को ऐसा कुछ देना चाहिए, जो हम इन्द्रियो से न पा सकते हो और जो ससार के कल्याण के लिए हो। साथ ही, वह किसी दूसरे सत्य का खण्डन न करे; यदि वह दूसरे वैज्ञानिक सत्यो का खण्डन करता हो, तो उसे तुरन्त त्याग दो। और चौथे, वह व्यक्ति किसी सत्य की ठेकेदारी न करे, अर्थात् वह ऐसा न कहे कि इस सत्य में मेरा ही अधिकार है, किसी दूसरे का नहीं। वह अपने जीवन मे उसी को कार्यरूप मे परिणत करके दिखाए, जो दूसरो के लिए भी प्राप्त करना सम्भव हो। अतएव, प्रमाण तीन प्रकार के हुए—प्रत्यक्ष अर्थात् इन्द्रियो द्वारा विषयो की अनुभूति, अनुमान और आप्तवाक्य। मै इस 'आप्त' शब्द का अँगरेजी में अनुवाद नही

१३६ राजयोग

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कर सकता। इसे 'अनुप्राणित' (inspired) शब्द द्वारा व्यक्त नही किया जा सकता, क्योकि यह अनुप्राणन बाहर से आता है, और यहाँ जिस भाव की बात हो रही है, वह भीतर से आता है। इसका शाब्दिक अर्थ है—"जिन्होने पाया है"।

विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ॥८॥

सूत्रार्थ—विपर्यय का अर्थ है मिथ्याज्ञान, जो उस वस्तु के यथार्थ स्वरूप में प्रतिष्ठित नहीं है। (इसके तीन प्रकार हैं—संशय, विपर्यय और तर्क।)

व्याख्या—दूसरे प्रकार की वृत्ति है—एक वस्तु में किसी दूसरे वस्तु की भ्रान्ति, जैसे शुक्ति मे रजत का भ्रम। इसे विपर्यय कहते हैं।

शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ॥९॥

सूत्रार्थ—यदि किसी शब्द से सूचित वस्तु का अस्तित्व न रहे, तो उस शब्द से जो एक प्रकार का ज्ञान उठता है, उसे विकल्प अर्थात् शब्द-जात भ्रम कहते हैं। (इसके तीन प्रकार हैं—वस्तु, क्रिया व अभाव।)

व्याख्या—विकल्प नामक और एक प्रकार की वृत्ति है। कोई बात हम सुनते हैं, और उसके अर्थ पर शान्तिभाव से विचार न कर झट से एक सिद्धान्त कर बैठते हैं। यह चित्त की कमजोरी का लक्षण है। अब संयमवाद अच्छी तरह समझ मे आ सकेगा। मनुष्य जितना कमजोर होता है, उसकी संयम की शक्ति उतनी ही कम रहती है। तुम अपने आपको सदा इस संयम की कसौटी पर कसो। जब तुममे क्रोध या दुखित होने का भाव आए, तो उस समय विचार करके देखना कि यह कैसे हो रहा है, यह कैसे है कि कोई खबर तुम्हारे पास आते ही तुम्हारे मन को वृत्तियो मे परिणत किए दे रही है।

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अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ॥१०॥

सूत्रार्थ—जो वृत्ति शून्यभाव का अवलम्बन करके रहती है, उसे निद्रा कहते हैं।

व्याख्या—और एक प्रकार की वृत्ति का नाम है निद्रा (स्वप्न और सुषुप्ति)। हम जब जाग उठते हैं, तब हम जान पाते हैं कि हम सो रहे थे। केवल अनुभूत विषय की ही स्मृति हो सकती है। हम जिसका अनुभव नहीं करते, उस विषय की हमें कोई स्मृति नहीं आ सकती। हर एक प्रतिक्रिया मानो चित्तरूपी सरोवर की एक तरंग है। अब, यदि निद्रा में मन की किसी प्रकार की वृत्ति न रहती, तो उस अवस्था में हमें भावात्मक या अभावात्मक कोई भी अनुभूति न होती। अतः हम उसका स्मरण भी नहीं कर पाते। हम जो निद्रावस्था का स्मरण कर सकते हैं, उसी से यह प्रमाणित हो जाता है कि निद्रावस्था में मन में एक प्रकार की तरंग थी। स्मृति भी एक प्रकार की वृत्ति है।

अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः ॥११॥

सूत्रार्थ—अनुभव किए हुए विषयों का मन से लोप न होना (और संस्कारवश उनका ज्ञान के स्तर पर आ उठना) स्मृति कहलाता है। (इसके दो प्रकार हैं—भावित और अनुद्भावित।)

व्याख्या—ऊपर में जिन चार प्रकार की वृत्तियों के बारे में कहा गया है, उनमें से प्रत्येक से स्मृति आ सकती है। मान लो, तुमने एक शब्द सुना। यह शब्द चित्तरूपी सरोवर में फेंके गए एक पत्थर के समान है, उससे एक छोटीसी लहर पैदा हो जाती है और यह लहर फिर बहुतसी छोटी-छोटी लहरों को उत्पन्न करती है। यही स्मृति है। निद्रा में भी यही घटना होती रहती.

१३८ राजयोग

१३८ राजयोग

हैं। जब निद्रा नामक लहरविशेष चित्त के अन्दर स्मृतिरूप अनेक लहरें उत्पन्न कर देती है, तब उसे स्वप्न कहते हैं। जाग्रत् अवस्था मे जिसे स्मृति कहते है, निद्राकाल मे उसी प्रकार की वृत्ति को स्वप्न कहते हैं।

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥१२॥

सूत्रार्थ—अभ्यास और वैराग्य से उन (वृत्तियो) का निरोध होता है।

व्याख्या—इस वैराग्य को प्राप्त करने के लिए यह विशेष रूप से आवश्यक है कि मन निर्मल, सत् और विचारपूर्ण हो। अभ्यास करने की क्या आवश्यकता है? प्रत्येक कार्य सरोवर के वक्षस्थल पर काँपते हुए प्रवाह के समान है। प्रत्येक कार्य से मानो चित्तरूपी सरोवर के ऊपर एक तरग खेल जाती है। यह कम्पन कुछ समय बाद नष्ट हो जाता है। फिर क्या शेष रहता है?—केवल सस्कारसमूह। मन मे ऐसे बहुतसे सस्कार पडने पर वे इकट्ठे होकर अभ्यास के रूप में परिणत हो जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि "अभ्यास ही द्वितीय स्वभाव है।" केवल द्वितीय स्वभाव नही, वरन् वह 'प्रथम' स्वभाव भी है—मनुष्य का समस्त स्वभाव इस अभ्यास पर निर्भर रहता है। हमारा अभी जो स्वभाव है, वह पूर्व अभ्यास का फल है। यह जान सकने से कि सब कुछ अभ्यास का ही फल है, मन में शान्ति आती है, क्योकि यदि हमारा वर्तमान स्वभाव केवल अभ्यासवश हुआ हो, तो हम चाहे तो किसी भी समय उस अभ्यास को नष्ट भी कर सकते हैं। हमारे मन मे जो विचार-धाराएँ बह जाती हैं, उनमें से प्रत्येक अपना एक एक चिह्न छोड़ जाती है। उन्ही की समष्टि को सस्कार कहते हैं।

पातंजल-योगसूत्र १३९-

पातंजल-योगसूत्र १३९-

हमारा चरित्र इन सब सस्कारो की समष्टिस্বরূপ है। जब कोई विशेष वृत्ति-प्रवाह प्रबल होता है, तब मनुष्य उसी प्रकार का हो जाता है। जब सद्गुण प्रबल होता है, तब मनुष्य सत् हो जाता है। यदि खराब भाव प्रबल हो, तो मनुष्य खराब हो जाता है। यदि आनन्द का भाव प्रबल हो, तो मनुष्य सुखी होता है। असत् अभ्यास का एकमात्र प्रतिकार है—उसका विपरीत अभ्यास। हमारे चित्त में जितने असत् अभ्यास सस्कार-बद्ध हो गए है, उन्हे सत् अभ्यास द्वारा नष्ट करना होगा। केवल सत्कार करते रहो, सर्वदा पवित्र चिन्तन करो, असत् संस्कार रोकने का बस यही एक उपाय है। ऐसा कभी मत कहो कि अमुक के उद्धार की कोई आशा नही है। क्यों ? इसलिए कि वह व्यक्ति केवल एक विशिष्ट प्रकार के चरित्र का—कुछ अभ्यासो की समष्टि का द्योतक मात्र है, और ये अभ्यास नए और सत् अभ्यास से दूर किए जा सकते हैं। चरित्र बस पुन. पुन. अभ्यास की समष्टि मात्र है और इस प्रकार का पुन पुन अभ्यास ही चरित्र का पुनर्गठन कर सकता है।

तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः ॥१३॥

**सूत्रार्थ—**उन (वृत्तियो) को पूर्णतया वश में रखने के लिए जो सतत प्रयत्न है, उसे अभ्यास कहते हैं।

**व्याख्या—**अभ्यास किसे कहते हैं? मन को दमन करने की चेष्टा अर्थात् प्रवाह-रूप में उसकी बाहर जाने की प्रवृत्ति को रोकने की चेष्टा ही अभ्यास है।

स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः ॥१४॥

**सूत्रार्थ—**दीर्घकाल तक परम श्रद्धा के साथ (उस परमपद की प्राप्ति के लिए) सतत चेष्टा करने से वह (अभ्यास) दृढभूमि (अर्थात् दृढ अवस्थावाला) हो जाता है।

-१४० राजयोग

-१४० राजयोग

व्याख्या—यह संयम एक दिन में नही आता, इसके लिए तो दीर्घकाल तक निरन्तर अभ्यास करना पडता है।

दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ॥१५॥

सूत्रार्थ—देखे और सुने हुए विषयों के प्रति तृष्णा का सर्वथा त्याग कर देनेवाले के पास जो एक अपूर्व भाव आता है, जिससे वह समस्त विषय-वासनाओं का दमन करने में समर्थ होता है, उसे वैराग्य या अनासक्ति कहते हैं। (उसके चार प्रकार हैं--यतमान, व्यतिरेक, एकेन्द्रिय और वशीकार।)

व्याख्या—दो शक्तियाँ हमारी सारी कार्य-प्रवृत्तियो की नियामक हैं। एक है हमारी अपनी अभिज्ञता और दूसरी है, दूसरो की अनुभूति। ये दो शक्तियाँ हमारे मानस-सरोवर में नाना प्रकार की तरंगे पैदा करती रहती हैं। इन दोनो शक्तियो के विरुद्ध लडाई ठानने और मन को वश मे रखने के लिए हमें वैराग्यरूपी शक्ति की सहायता लेनी पडती है। इन दोनो का त्याग ही हमारा अभीष्ट है। मान लो, मैं एक सडक से जा रहा हूँ। एक मनुष्य आता है और मेरी घडी छीन लेता है। यह मेरा निजी अनुभव हुआ। यह मैं स्वय देखता हूँ। वह तुरन्त मेरे चित्त मे एक तरग उत्पन्न कर देता है, जो क्रोध का आकार ले लेती है। अब मुझे चाहिए कि मैं उस भाव को न आने दूँ। यदि मैं उसे न रोक सकूँ, तो फिर मुझमें है ही क्या ? कुछ भी नही। यदि मैं रोक सका, तभी समझा जायगा कि मुझमे वैराग्य है। फिर, ससारी लोगो का अनुभव हमें सिखाता है कि विषय-भोग ही जीवन का चरम लक्ष्य है। ये सब हमारे लिए भयानक प्रलोभन हैं। उन सबके प्रति पूर्णतया उदासीन हो जाना और उन सबसे प्रभावित होकर मन को तद्रूप,

पातंजल-योगसूत्र १४१

पातंजल-योगसूत्र १४१

वृत्ति के आकार मे परिणत न होने देना ही वैराग्य है। स्वय अपने अनुभव किए हुए और दूसरो के अनुभव किए हुए विषयों से हममे जो दो प्रकार की कार्य-प्रवृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं, उन्हे दबाना और इस प्रकार चित्त को उनके वश मे नही आने देना ही वैराग्य कहलाता है। वे सब मेरे अधीन रहे, मै उनके अधीन न होऊँ—इस प्रकार के मनोबल को वैराग्य कहते है, और यह वैराग्य ही मुक्ति का एकमात्र उपाय है।

तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् ॥१६॥

सूत्रार्थ—जो (वैराग्य) पुरुष के (असल स्वरूप के) ज्ञान से आता है और जो गुणों का भी सर्वथा त्याग कर देता है, वह पर-वैराग्य है।

व्याख्या—वैराग्य की शक्ति का उच्चतम विकास तो तब होता है, जब वह गुणो के प्रति हमारी आसक्ति को भी दूर हटा देता है। पहले हमे समझ लेना होगा कि यह पुरुष या आत्मा क्या है, ये गुण क्या है। योगशास्त्र के मत से, यह सारी प्रकृति त्रिगुणात्मिका है। ये गुण हैं—तम, रज और सत्त्व। ये तीनो गुण बाह्य जगत् मे क्रमश तम (अन्धकार) या जड़ता, आकर्षण या विकर्षण और उन दोनो का सामजस्य, इन तीन प्रकार के भावो मे प्रकाशित होते हैं। प्रकृति की सारी वस्तुएँ, यह सारा-का-सारा प्रपच ही इन तीनो शक्तियो के विभिन्न मेल से उत्पन्न हुआ है। सांख्य मतवालो ने प्रकृति को नाना प्रकार के तत्त्वो में विभक्त किया है, मनुष्य की आत्मा इन सबके बाहर है, प्रकृति के बाहर है, वह स्वयंप्रकाश, शुद्ध और पूर्णस्वरूप है। प्रकृति में हम जो कुछ चैतन्य का प्रकाश देख पाते है, वह सभी प्रकृति में आत्मा का प्रतिबिम्ब मात्र है। प्रकृति स्वयं जड़-

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है। यह स्मरण रखना चाहिए कि मन भी प्रकृति शब्द के अन्तर्भूत है, वह प्रकृति के भीतर की वस्तु है। हमारे जो कुछ विचार है, वे सब-के-सब प्रकृति के ही अन्तर्गत हैं। विचार से लेकर सबसे स्थूलतम जड पदार्थ तक सभी प्रकृति के अन्तर्गत हैं—प्रकृति की विभिन्न अभिव्यक्ति मात्र हैं। इस प्रकृति ने मनुष्य की आत्मा को आवृत कर रखा है, और जब वह अपने इस आवरण को हटा लेती है, तब आत्मा आवरण-मुक्त हो अपनी महिमा में प्रकाशित हो जाती है। पन्द्रहवे सूत्र में जिस वैराग्य की बात बतलाई गई है, जिसके द्वारा समस्त विषयो को अर्थात् प्रकृति को वश में लाया जाता है, वह आत्मा के प्रकाशित होने में सबसे बड़ा सहायक है। अगले सूत्र में समाधि या पूर्ण एकाग्रता के लक्षण का वर्णन किया गया है। यह समाधि ही योगी का चरम लक्ष्य है।

वितर्कविचारानन्दास्मितानुगमात् सम्प्रज्ञातः ॥१७॥

सूत्रार्थ—वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता—इन चारों के सम्बन्ध से युक्त (जो समाधि है, वह) सम्प्रज्ञात या सम्यक् ज्ञानपूर्वक समाधि कहलाती है।

व्याख्या—समाधि दो प्रकार की है। एक है सम्प्रज्ञात और दूसरी, असम्प्रज्ञात। इस सम्प्रज्ञात समाधि में प्रकृति को वश में करने की समस्त शक्तियाँ आती है। सम्प्रज्ञात समाधि के चार प्रकार है। इसके प्रथम प्रकार को सवितर्क समाधि कहते हैं। सब समाधियो में ही मन को अन्य सब विषयो से हटाकर विशिष्ट विषय के ध्यान मे पुन-पुन नियुक्त करना पड़ता है। इस तरह के विचार या ध्यान के विषय दो प्रकार के है। एक तो, चौबीस जड तत्त्व और दूसरा, चेतन पुरुष।

पातंजल-योगसूत्र १४३

पातंजल-योगसूत्र १४३

योग का यह अंश सम्पूर्णतया सांख्यदर्शन पर स्थापित है। इस सांख्यदर्शन के बारे मे मैं तुमसे पहले ही कह चुका हूँ। तुम्हें शायद याद होगा कि मन, बुद्धि और अहंकार की एक साधारण आधारभूमि है। उसे चित्त कहते हैं, चित्त से ही उनकी उत्पत्ति है। यह चित्त प्रकृति की विभिन्न शक्तियो को लेकर उन्हे विचार के रूप मे परिणत करता है। फिर यह भी अवश्य स्वीकार करना होगा कि शक्ति और जड पदार्थ दोनों का कारणस्वरूप एक पदार्थ है, जहाँ पर वे दोनों एक हैं। यह पदार्थ अव्यक्त कहलाता है—वह सृष्टि के पूर्व प्रकृति की अप्रकाशित अवस्था है। उसमे एक कल्प के बाद सारी प्रकृति लौट आती है, फिर दूसरे कल्प में उससे पुन सब प्रादुर्भूत होते हैं। इन सबके अतीत चैतन्यघन पुरुष विद्यमान है। ज्ञान ही वास्तविक शक्ति है। किसी वस्तु का ज्ञान प्राप्त होने पर ही हम उस पर अपना अधिकार चलाने में समर्थ होते है। इसी प्रकार, जब हमारा मन इन सब विभिन्न तत्त्वो पर ध्यान करने लगता है, तो उन पर अधिकार प्राप्त करता जाता है। जिस प्रकार की समाधि में बाह्य स्थूल भूत ही ध्यान के विषय होते हैं, उसे सवितर्क कहते हैं। वितर्क का अर्थ है प्रश्न, और सवितर्क का अर्थ है प्रश्न के साथ—मानो उन स्थूल भूतो से पूछना, जिससे वे अपने अन्तर्गत सत्य और अपनी सारी शक्ति अपने ऊपर ध्यान करनेवाले पुरुष को दे दे—इसी को सवितर्क कहते है। किन्तु सिद्धियाँ प्राप्त करने से ही मुक्ति नही हो जाती। वह तो भोग के लिए साधन मात्र है। पर यहाँ, इस जीवन में, यथार्थ भोग-सुख है ही नही। ससार मे यही सबसे पुराना उपदेश है कि यहाँ भोग-सुख का अन्वेषण वृथा है; पर मनुष्य के लिए इसे समझना अत्यन्त कठिन है। किन्तु जब वह

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इसकी धारणा कर लेता है, तब इस जगत्-प्रपञ्च से अतीत होकर मुक्त हो जाता है। जिन्हें साधारणत सिद्धियां कहते हैं, उनको प्राप्त करने का अर्थ है दुनियादारी तथा संसार के जञ्जाल को और भी बढ़ाना। अन्त मे उनसे क्लेश की ही वृद्धि होती है। यह सत्य है कि विज्ञान की दृष्टि को अपनाते हुए पतञ्जलि ने इन सिद्धियों के लाभ की सम्भावना को स्वीकार किया है, पर साथ ही वे इन सब सिद्धियों के प्रलोभन से हमें सावधान करते रहने मे भी कभी नहीं चूके।

फिर, उसी ध्यान मे जब उन भूतों को देश और काल से अलग करके उनके स्वरूप का चिन्तन किया जाता है, तब उस समाधि को निर्वितर्क समाधि कहते हैं। जब और एक कदम आगे बढ़कर तन्मात्राओं को ध्यान का विषय बनाया जाता है और उन्हें देश-काल के अन्तर्गत समझकर उन पर ध्यान किया जाता है, तब उसे सविचार समाधि कहते हैं। फिर जब इसी समाधि में देश-काल के अतीत जाकर उन सूक्ष्म भूतों के स्वरूप का चिन्तन किया जाता है, तब उसे निर्विचार समाधि कहते हैं। इसके बाद का कदम वह है, जिसमे सूक्ष्म और स्थूल दोनों प्रकार के भूतों का चिन्तन छोड़कर अन्त करण को ध्यान का विषय बनाया जाता है। जब अन्त करण को रज और तम इन दोनों गुणों से रहित सोचा जाता है, तब उसे आनन्द समाधि कहते हैं। जब स्वयं मन ध्यान का विषय होता है, जब ध्यान बिलकुल परिपक्व और एकाग्र हो जाता है, जब स्थूल और सूक्ष्म भूतों की समस्त भावनाएँ त्याग दी जाती हैं और जब अन्य सब विषयों से पृथक् होकर अहंकार की केवल सत्त्वावस्था ही शेष रहती है, तब उसे अस्मिता समाधि कहते हैं। इस अवस्था में भी पूर्णतया मन के अतीत होना सम्भव

पातजल-योगसूत्र १४५

पातजल-योगसूत्र १४५

नही होता। जिस मनुष्य ने इस अवस्था की प्राप्ति कर ली है, उसे वेदो मे 'विदेह' कहा गया है। ऐसा व्यक्ति स्वयं का स्थूल देह से रहित रूप में चिन्तन कर सकता है, पर तो भी उसे स्वयं को एक सूक्ष्मशरीरधारी के रूप मे सोचना ही पडता है। जो लोग इस अवस्था मे रहते हुए, उस परमपद की प्राप्ति बिना किए, प्रकृति मे लीन हो जाते है, उन्हे प्रकृतिलय कहते है, पर जो लोग इस प्रकार के सूक्ष्म भोग-सुख से भी सन्तुष्ट नही होते, वे ही चरम लक्ष्य—मुक्ति— प्राप्त करते है।

विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः ॥१८॥

सूत्रार्थ—दूसरे प्रकार की समाधि में समस्त मानसिक क्रियाओ के विराम का सतत अभ्यास किया जाता है, (उसमें व्युत्थान-प्रत्ययहीन) संस्कार-मात्र ही शेष रहता है।

व्याख्या—यही वह पूर्ण ज्ञानातीत असम्प्रज्ञात समाधि है, जो हमें मुक्त कर देती है। पहले जिस समाधि की बात कही गई है, वह हमे मुक्ति नही दे सकती—आत्मा को मुक्त नही कर सकती। भले ही कोई मनुष्य समस्त शक्तियां प्राप्त कर ले, पर तो भी उसका पतन हो सकता है। जब तक आत्मा प्रकृति के अतीत होकर सम्प्रज्ञात समाधि के भी बाहर नही चली जाती, तब तक पतन का भय बना ही रहता है। यद्यपि इसकी साधन-प्रणाली बहुत सरल मालूम होती है, पर इसे प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है। यह साधन-प्रणाली ऐसी है कि इसमें स्वयं मन पर ध्यान करना पडता है, और जब कभी कोई विचार उठता है, तो तत्क्षण उसे दबा देना पडता है; मन के अन्दर किसी प्रकार के विचार को स्थान न देकर उसे सम्पूर्णतया शून्य कर देना पड़ता है। जब हम सचमुच यह करने मे समर्थ हो जायेंगे,

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