राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपातंजल-योगसूत्र १४१
वृत्ति के आकार मे परिणत न होने देना ही वैराग्य है। स्वय अपने अनुभव किए हुए और दूसरो के अनुभव किए हुए विषयों से हममे जो दो प्रकार की कार्य-प्रवृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं, उन्हे दबाना और इस प्रकार चित्त को उनके वश मे नही आने देना ही वैराग्य कहलाता है। वे सब मेरे अधीन रहे, मै उनके अधीन न होऊँ—इस प्रकार के मनोबल को वैराग्य कहते है, और यह वैराग्य ही मुक्ति का एकमात्र उपाय है।
तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् ॥१६॥
सूत्रार्थ—जो (वैराग्य) पुरुष के (असल स्वरूप के) ज्ञान से आता है और जो गुणों का भी सर्वथा त्याग कर देता है, वह पर-वैराग्य है।
व्याख्या—वैराग्य की शक्ति का उच्चतम विकास तो तब होता है, जब वह गुणो के प्रति हमारी आसक्ति को भी दूर हटा देता है। पहले हमे समझ लेना होगा कि यह पुरुष या आत्मा क्या है, ये गुण क्या है। योगशास्त्र के मत से, यह सारी प्रकृति त्रिगुणात्मिका है। ये गुण हैं—तम, रज और सत्त्व। ये तीनो गुण बाह्य जगत् मे क्रमश तम (अन्धकार) या जड़ता, आकर्षण या विकर्षण और उन दोनो का सामजस्य, इन तीन प्रकार के भावो मे प्रकाशित होते हैं। प्रकृति की सारी वस्तुएँ, यह सारा-का-सारा प्रपच ही इन तीनो शक्तियो के विभिन्न मेल से उत्पन्न हुआ है। सांख्य मतवालो ने प्रकृति को नाना प्रकार के तत्त्वो में विभक्त किया है, मनुष्य की आत्मा इन सबके बाहर है, प्रकृति के बाहर है, वह स्वयंप्रकाश, शुद्ध और पूर्णस्वरूप है। प्रकृति में हम जो कुछ चैतन्य का प्रकाश देख पाते है, वह सभी प्रकृति में आत्मा का प्रतिबिम्ब मात्र है। प्रकृति स्वयं जड़-