राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें-१४० राजयोग
व्याख्या—यह संयम एक दिन में नही आता, इसके लिए तो दीर्घकाल तक निरन्तर अभ्यास करना पडता है।
दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ॥१५॥
सूत्रार्थ—देखे और सुने हुए विषयों के प्रति तृष्णा का सर्वथा त्याग कर देनेवाले के पास जो एक अपूर्व भाव आता है, जिससे वह समस्त विषय-वासनाओं का दमन करने में समर्थ होता है, उसे वैराग्य या अनासक्ति कहते हैं। (उसके चार प्रकार हैं--यतमान, व्यतिरेक, एकेन्द्रिय और वशीकार।)
व्याख्या—दो शक्तियाँ हमारी सारी कार्य-प्रवृत्तियो की नियामक हैं। एक है हमारी अपनी अभिज्ञता और दूसरी है, दूसरो की अनुभूति। ये दो शक्तियाँ हमारे मानस-सरोवर में नाना प्रकार की तरंगे पैदा करती रहती हैं। इन दोनो शक्तियो के विरुद्ध लडाई ठानने और मन को वश मे रखने के लिए हमें वैराग्यरूपी शक्ति की सहायता लेनी पडती है। इन दोनो का त्याग ही हमारा अभीष्ट है। मान लो, मैं एक सडक से जा रहा हूँ। एक मनुष्य आता है और मेरी घडी छीन लेता है। यह मेरा निजी अनुभव हुआ। यह मैं स्वय देखता हूँ। वह तुरन्त मेरे चित्त मे एक तरग उत्पन्न कर देता है, जो क्रोध का आकार ले लेती है। अब मुझे चाहिए कि मैं उस भाव को न आने दूँ। यदि मैं उसे न रोक सकूँ, तो फिर मुझमें है ही क्या ? कुछ भी नही। यदि मैं रोक सका, तभी समझा जायगा कि मुझमे वैराग्य है। फिर, ससारी लोगो का अनुभव हमें सिखाता है कि विषय-भोग ही जीवन का चरम लक्ष्य है। ये सब हमारे लिए भयानक प्रलोभन हैं। उन सबके प्रति पूर्णतया उदासीन हो जाना और उन सबसे प्रभावित होकर मन को तद्रूप,