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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 307 में से

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पातंजल-योगसूत्र १३३

व्याख्या—जब हमारी दो अनुभूतियाँ आपस में विरोधी नही होती, तब उसे हम प्रमाण कहते है। मान लो, मैंने कुछ सुना, यदि वह पहले अनुभव की हुई किसी बात का खण्डन करे, तो मेरे भीतर उसके विरुद्ध तर्क-वितर्क होने लगते है और मैं उस पर विश्वास नही करता। प्रमाण के फिर तीन प्रकार हैं। साक्षात् अनुभव या प्रत्यक्ष—यह एक प्रकार का प्रमाण है। यदि हम किसी प्रकार आँख और कान के भ्रम मे न पड़े हो, तो हम जो कुछ देखते या अनुभव करते हैं, उसे प्रत्यक्ष कहा जायगा। मैं इस दुनिया को देखता हूँ, बस यह उसके अस्तित्व का पर्याप्त प्रमाण है। दूसरा है अनुमान—लक्षण से लक्ष्य वस्तु पर आना। तुमने कोई संकेत देखा और उससे तुम उस वस्तु पर आ गए, जिसका कि वह संकेत है। तीसरा है आप्तवाक्य—योगियों अर्थात् सत्यद्रष्टा ऋषियों की प्रत्यक्ष अनुभूति। हम सभी ज्ञान की प्राप्ति के लिए सतत प्रयत्न कर रहे हैं, पर तुम्हें और मुझे उसके लिए कड़ी चेष्टा करनी पड़ती है, दीर्घकाल तक विचाररूप अरुचिकर रास्ते से होकर अग्रसर होना पड़ता है; किन्तु विशुद्धसत्त्व योगी इन सबके पार चले गए हैं। उनके मनश्चक्षु के सामने भूत, भविष्य और वर्तमान सब एक हो गए हैं, उनके लिए वे सब मानो एक पाठ्य पुस्तक के समान हैं। हम लोगों को ज्ञान-लाभ के लिए जिस अरुचिकर प्रणाली में से होकर जाना पड़ता है, उनके लिए उसकी फिर और आवश्यकता नही रह जाती। उनका वाक्य ही प्रमाण है, क्योंकि वे अपने भीतर ही सारे ज्ञान की उपलब्धि करते हैं। वे सर्वज्ञ पुरुष हैं। ऐसे व्यक्ति ही पवित्र शास्त्रग्रन्थों के प्रणेता हैं, और इसीलिए शास्त्र प्रमाण-रूप से ग्राह्य हैं। यदि वर्तमान समय में

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