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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 307 में से

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१३६ राजयोग

कर सकता। इसे 'अनुप्राणित' (inspired) शब्द द्वारा व्यक्त नही किया जा सकता, क्योकि यह अनुप्राणन बाहर से आता है, और यहाँ जिस भाव की बात हो रही है, वह भीतर से आता है। इसका शाब्दिक अर्थ है—"जिन्होने पाया है"।

विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ॥८॥

सूत्रार्थ—विपर्यय का अर्थ है मिथ्याज्ञान, जो उस वस्तु के यथार्थ स्वरूप में प्रतिष्ठित नहीं है। (इसके तीन प्रकार हैं—संशय, विपर्यय और तर्क।)

व्याख्या—दूसरे प्रकार की वृत्ति है—एक वस्तु में किसी दूसरे वस्तु की भ्रान्ति, जैसे शुक्ति मे रजत का भ्रम। इसे विपर्यय कहते हैं।

शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ॥९॥

सूत्रार्थ—यदि किसी शब्द से सूचित वस्तु का अस्तित्व न रहे, तो उस शब्द से जो एक प्रकार का ज्ञान उठता है, उसे विकल्प अर्थात् शब्द-जात भ्रम कहते हैं। (इसके तीन प्रकार हैं—वस्तु, क्रिया व अभाव।)

व्याख्या—विकल्प नामक और एक प्रकार की वृत्ति है। कोई बात हम सुनते हैं, और उसके अर्थ पर शान्तिभाव से विचार न कर झट से एक सिद्धान्त कर बैठते हैं। यह चित्त की कमजोरी का लक्षण है। अब संयमवाद अच्छी तरह समझ मे आ सकेगा। मनुष्य जितना कमजोर होता है, उसकी संयम की शक्ति उतनी ही कम रहती है। तुम अपने आपको सदा इस संयम की कसौटी पर कसो। जब तुममे क्रोध या दुखित होने का भाव आए, तो उस समय विचार करके देखना कि यह कैसे हो रहा है, यह कैसे है कि कोई खबर तुम्हारे पास आते ही तुम्हारे मन को वृत्तियो मे परिणत किए दे रही है।

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