भारतकोश
राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 307 में से

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पातंजल-योगसूत्र

प्रथम अध्याय

समाधिपाद

अथ योगानुशासनम् ॥ १ ॥

सूत्रार्थ—अब योग की व्याख्या करते हैं।

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥ २ ॥

सूत्रार्थ—चित्त को विभिन्न वृत्तियों अर्थात् आकार में परिणत होने से रोकना ही योग है।

व्याख्या—यहाँ बहुतसी बातें समझाने की आवश्यकता है। पहले हमें यह समझ लेना होगा कि यह चित्त और ये वृत्तियाँ क्या हैं। मेरी ये आँखें हैं। आँखें वास्तव में नहीं देखतीं। यदि मस्तिष्क में स्थित दर्शनेन्द्रिय या दर्शनशक्ति को नष्ट कर दो, तो भले ही तुम्हारी आँखें रहें, आँखों की पुतलियाँ भी साबूत रहें और आँख के ऊपर जिस छवि के पड़ने से दर्शन होता है, वह भी रहे, पर फिर भी आँखें देख न सकेंगी। अतः आँख दर्शन का गौण यन्त्र मात्र हुईं। वह वास्तव में दर्शनेन्द्रिय नहीं है। दर्शनेन्द्रिय तो मस्तिष्क के अन्तर्गत स्नायु-केन्द्र में अवस्थित है। अतएव हमने देखा कि दर्शन-क्रिया के लिए केवल दो आँखें ही पर्याप्त नहीं हैं। कभी-कभी मनुष्य आँखें खुली रखकर सो जाता है। वस्तु का चित्र आँखों पर बना हुआ है, दर्शनेन्द्रिय भी है, पर और एक तीसरी वस्तु की आवश्यकता है—और वह है मन। मन को इन्द्रिय के साथ संयुक्त रहना चाहिए। अतः दर्शन-क्रिया के लिए चक्षुरूप बहिर्यन्त्र, मस्तिष्क में स्थित स्नायु-केन्द्र और मन—ये तीन

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