भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 534 में से

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पृष्ठ 16

देवला, बोरदिया आदि स्थानों में प्राचीन काल के मंदिरों के भग्नावशेष और बावड़ियां आदि विद्यमान हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में यह इलाक़ा सुसमृद्ध था । प्रतापगढ़ राज्य में खुदाई का काम बिल्कुल नहीं हुआ है और न प्राचीन इतिहास की सामग्री की खोज ही हुई है । यदि खुदाई और शोध का कार्य हो तो और भी सामग्री मिल सकती है । ऐसी दशा में प्रतापगढ़ राज्य के सर्वांगपूर्ण इतिहास लिखने का श्रेय किसी भावी इतिहास-लेखक को ही मिलेगा, लेकिन उस समय भी मेरा यह इतिहास, मुझे विश्वास है, इतिहास-लेखकों के पथ-प्रदर्शक का काम करेगा । भूल मनुष्य मात्र से होती है । इसका मैं अपवाद नहीं हूं, और फिर इस समय मेरी वृद्धावस्था है । जो त्रुटियां मेरी दृष्टि में आईं उनके लिए पुस्तक के अंत में शुद्धिपत्र लगा दिया गया है । और भी जो त्रुटियां रह जाएं उनके लिए कृपालु पाठक मुझे क्षमा प्रदान करेंगे । सप्रमाण सूचना मिलने पर उनका द्वितीय आवृत्ति के समय सुधार कर दिया जायगा । वर्तमान प्रतापगढ़-नरेश महारावत सर रामसिंहजी बहादुर, के० सी० एस० आई० ने राज्य में उपलब्ध इतिहास संबंधी समस्त सामग्री मेरे पास भिजवाने की कृपा की, जिसके लिए मैं उनका हृदय से अनुगृहीत हूं। सीतामऊ राज्य के विद्याप्रेमी महाराजकुमार डॉक्टर रघुवीरसिंह, एम० ए०, एल-एल० बी०, डी० लिट्० का भी मैं अत्यंत आभारी हूं, क्योंकि उन्होंने अपने संग्रह से प्रतापगढ़ के संबंध के शाही फ़रमानों और अख़बारात का अंग्रेज़ी खुलासा मेरे पास भिजवाने का कष्ट उठाया है । प्रतापगढ़ राज्य की रघुनाथ संस्कृत पाठशाला के प्रधानाध्यापक पंडित जगन्नाथ शास्त्री तथा कामदार ख़ासगी शाह मन्नालाल पाडलिया भी मेरे धन्यवाद-भाजन हैं, क्योंकि उनके द्वारा मुझे राज्य से इतिहास-संबंधी सामग्री एवं समय-समय पर सत्परामर्श मिलता रहा है । मैं उन ग्रन्थकर्ताओं का भी अत्यन्त कृतज्ञ हूं, जिनकी रचनाओं का मैंने इस इतिहास के लिखने में उपयोग किया है और जिनका उल्लेख मैंने यथास्थान टिप्पणों में कर दिया है।