रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
by धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज
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Read in contextअध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन २१९ रामाभिरामी टीका सम्मत पाठ के अनुसार प्रसङ्ग निम्नाङ्कित है— ११६ वें सर्ग में सीता वानरों, ऋक्षों और राक्षसों के समक्ष प्रज्वलित चिता में निःशङ्क होकर प्रवेश करती है। ऋषियों ने, देवताओं और गन्धर्वों ने यज्ञ की पूर्णाहुति एवं मन्त्र-संस्कृत वसोर्धारा के समान अग्नि में प्रवेश करती हुई सीता को देखा। सर्ग ११७ में धर्मात्मा राम खिन्न तथा बाष्पव्याकुललोचन होकर मुहूर्त भर ध्यान- परायण हुए। तदनन्तर ही राजा वैश्रवण (कुबेर) तथा पितरों के साथ यम तथा सहस्राक्ष देवेन्द्र और जलेश्वर वरुण और त्रिनेत्र वृषभध्वज महादेव तथा लोकपितामह ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ ब्रह्मा आदि देवता सूर्य-संनिभ विमानों द्वारा लङ्का नगरी में राम के पास आये और प्राञ्जलि हो राघव से बोले, "आप सब लोकों के कर्ता हैं, देवताओं में श्रेष्ठ हैं, फिर अग्नि में प्रवेश करती हुई सीता की उपेक्षा क्यों कर रहे हैं? देवताओं में श्रेष्ठ ! आप अपने को क्यों नहीं जान रहे हैं? यहाँ देवगण, इन्द्र आदि से भी राम को श्रेष्ठ कहा गया है। नागेश के अनुसार यह बात 'विष्णुमुखा वै देवाः' इस श्रुति से भी सिद्ध है। राम ने कहा कि मैं तो अपने को दशरथ-पुत्र (शापादिवशात्) उत्प्रेक्षित करता हूँ। मैं तत्त्वतः जो हूँ और जैसा हूँ वह आप भगवान् बताये । पश्चात् ब्रह्माजी ने कहा — भवान् नारायणो देवः श्रीमांश्चक्रायुधः प्रभुः । एकशृङ्गो वराहस्त्वं भूतभव्यसपत्नजित् ॥ १३ ॥ अक्षरं ब्रह्म सत्यं च मध्ये चान्ते च राघव । लोकानां त्वं परो धर्मो विष्वक्सेनश्चतुर्भुजः ॥ १४ ॥ शार्ङ्गधन्वा हृषीकेशः पुरुषः पुरुषोत्तमः ! अजितः खड्गधृग् विष्णुः कृष्णश्चैव बृहद्बलः ॥ १५ ॥ सेनानीर्ग्रामणीः सर्वं त्वं बुद्धिस्त्वं क्षमा दमः । प्रभवश्चाव्ययश्च त्वमुपेन्द्रो मधुसूदनः ॥ १६ ॥ इन्द्रकर्मा महेन्द्रस्त्वं पद्मनाभो रणान्तकृत् । शरण्यं शरणं च त्वामाहुर्दिव्या महर्षयः ॥ १७ ॥ सहस्रशृङ्गो वेदात्मा शतशीर्षो महर्षभः । त्वं त्रयाणां हि लोकानामादिकर्ता स्वयं प्रभुः ॥ १८ ॥ सिद्धानामपि साध्यानामाश्रयश्चापि पूर्वजः । त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमोङ्कारः परात्परः ॥ १९ ॥ प्रभवं निधनं चापि नो विदुः को भवानिति ।
- दृश्यसे सर्वभूतेषु गोषु च ब्राह्मणेषु च ॥ २० ॥ दिक्षु सर्वासु गगने पर्वतेषु नदीषु च । सहस्रचरणः श्रीमाञ्छतशीर्षः सहस्रदृक् ॥ २१ ॥ त्वं धारयसि भूतानि पृथिवीं सर्वपर्वतान् । अन्ते पृथिव्याः सलिले दृश्यते त्वं महोरगः ॥ २२ ॥ त्रींल्लोकान् धारयन् राम देवगन्धर्वदानवान् । अहं ते हृदयं राम जिह्वा देवी सरस्वती ॥ २३ ॥ देवा रोमाणि गात्रेषु ब्रह्मणा निर्मिताः प्रभो । निमेषस्ते स्मृता रात्रिस्त्वन्मेषो दिवसस्तथा ॥ २४ ॥