रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 293, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें२१६ रामायणमीमांसा षष्ठ संस्कारास्त्वभवन् वेदा नैतदस्ति त्वया विना । जगत् सर्वं शरीरं ते स्थैर्यं ते वसुधात लम् ॥ २५ ॥ अग्निः कोपः प्रसादस्ते सोमः श्रीवत्सलक्षणः । त्वया लोकास्त्रयः क्रान्ताः पुरा स्वैर्विक्रमैस्त्रिभिः ॥ २६ ॥ महेन्द्रश्च कृतो राजा बलिं बद्ध्वा सुदारुणम् । सीता लक्ष्मीर्भवान् विष्णुर्देवः कृष्णः प्रजापतिः ॥ २७ ॥ वधार्थं रावणस्येह प्रविष्टो मानुषीं तनुम् । तदिदं नस्त्वया कार्यं कृतं धर्मभृतां वर ॥ २८ ॥ निहतो रावणो राम प्रहृष्टो दिवमाक्रम । अमोघं देव वीर्यं ते न ते मोघाः पराक्रमाः ॥ २९ ॥ अमोघं दर्शनं राम अमोघस्तव संस्तवः । अमोघास्ते भविष्यन्ति भक्तिमन्तो नरा भुवि ॥ ३० ॥ ये त्वां देवं ध्रुवं भक्ताः पुराणं पुरुषोत्तमम् । प्राप्नुवन्ति तथा कामानिह लोके परत्र च ॥ ३१ ॥ (वा० रा० ६।११९ ) अर्थात् आप भोक्ता और भोग्यरूप सकल प्रपञ्च के आश्रय साक्षात् नारायण हैं, सुदर्शन चक्रधारी श्रीविष्णु हैं, आप ही एकशृङ्ग वराह तथा भूत भव्य सभी सपत्नों (शत्रुओं) के विजेता हैं । आप ही आदि, अन्त और मध्य में रहने- वाले सत्य अक्षर हैं । सब लोकों के आप ही परम धर्म हैं। आप ही चतुर्भुज विष्वक्सेन, शार्ङ्गधन्वा, सर्वेन्द्रियनियामक हृषीकेश पुरुष एवं पुरुषोत्तम हैं। आप अजित खड्गधर विष्णु हैं एवं आप ही सेनानी एवं ग्रामणी हैं, आप ही बुद्धि, सत्त्व, क्षमा तथा दम हैं। जगत् की उत्पत्ति और प्रलय के आप ही एकमात्र कारण हैं एवं आप ही मधुसूदन हैं। आप ही इन्द्रकर्मा इन्द्र की सृष्टि करनेवाले ( सबके अधिपति ) महेन्द्र हैं। रणान्तकृत् पद्मनाभ भी आप ही हैं। दिव्य महर्षि आपको शरणयोग्य परम आश्रय एवं रक्षक कहते हैं। आप ही सहस्रशृङ्ग वेद एवं शतशीर्ष महान् धर्म हैं। आप तीनों लोकों के आदिकर्ता स्वयंप्रभु हैं। आपका अन्य कोई प्रभु नहीं है । सिद्धों एवं साध्यों के आप ही आश्रय एवं पूर्वज अर्थात् कारण हैं। आप ही यज्ञ हैं और आप ही वषट्कार हैं। आप ही ओंकार हैं। आप परात्पर परमेश्वर हैं। आपकी उत्पत्ति एवं निधन कोई नहीं जानता अर्थात् आप उत्पत्ति तथा लय से रहित नित्य हैं। आप कौन हैं इसे लोग नहीं जानते, परन्तु आप अन्तर्यामी रूप से सब भूतों में विशेषरूप से गो एवं ब्राह्मणों में दृष्टिगोचर होते हैं। अत्यन्त अचेतन सभी दिशाओं में, आकाश में एवं पर्वतों में, नदियों में अन्तर्यामी रूप से योगियों के आप दृष्टिगोचर होते हैं। आप सहस्रचरण, शतशीर्ष तथा सहस्रदृक् हैं। महाविराट् के रूप से संसार के सभी चरण, शीर्ष और नेत्र आप ही के हैं। सभी भूतों तथा पर्वतसहित पृथ्वी को आप ही धारण करते हैं। अन्त में पृथ्वी के कारणभूत जल में, देव, गन्धर्व, दानव सहित तीनों लोकों को धारण करनेवाले महोरग शेष आप ही हैं। श्रीराम ! मैं ( ब्रह्मा ) आपका हृदय हूँ। सरस्वती आपकी जिह्वा हैं। ब्रह्मा के द्वारा निर्मित सभी देव आपके गात्रों के रोम हैं। आपका नेत्रनिमीलन रात्रि है एवं नेत्रोन्मीलन दिन है। आपके ज्ञान-विज्ञान संस्कार ही वेद हैं। वस्तुतः आपके बिना संसार कुछ भी नहीं है। सारा जगत् आपका वैराज शरीर है। आपकी स्थिरता वसुधातल है। आप का कोप ही अग्नि है। आपका प्रसाद ही श्रीवत्स- लक्षण सोम है। आपने अपने तीन विक्रमों (पगों) से तीनों लोकों को आक्रान्त कर दारुण बलि को बाँधकर महेन्द्र को राजा बनाया है। सीता लक्ष्मी हैं। आप प्रजापति विष्णु कृष्ण हैं। रावण के वधार्थ ही आप मानव देह में प्रविष्ट हुए हैं। हे देव, वह रावण-वधादि हम देवताओं का कार्य आपके द्वारा सम्पन्न हो गया है। अब आप प्रसन्नता से परम धाम में पधारिये। हे देव, आपका अमोघ वीर्य एवं अमोघ पराक्रम हैं। आपका अमोघ दर्शन तथा अमोघ