भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 294

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अध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन २१७ स्तवन है । भूतल में होनेवाले आपके भक्त नर भी अमोघ ( सर्वत्र सफल ) होंगे । वे भक्त इहलोक के सब कामों ( कामनाओं ) को प्राप्त करेंगे और अन्त में आपके पुराण पुरुषोत्तम रूप को ही प्राप्त होंगे । ब्रह्माजी के इन वचनों से भी स्पष्ट है कि राम ही परात्पर परब्रह्म हैं । "आत्मानं मानुषं मन्ये" जैसे वचन के आधार पर ही यह समझा जा सकता है कि ब्रह्मा आदि ने राम से कहा था— "कथं देवगणश्रेष्ठमात्मानं नावबुद्ध्यसे" ( वा० रा० ६।११७।६ ) तभी राम ने कहा कि मैं तो अपने को मनुष्य जानता हूँ, आप बतायें कि मैं कौन हूँ ? इसपर अवश्य ही ब्रह्मा ने भी कुछ कहा होगा । यदि पूर्वापरप्रसङ्ग को छोड़ दिया जाय तो बुल्के के द्वारा उद्धृत उक्त वचन सर्वथा असङ्गत ही होगा । उक्त वचन को बुल्के प्रक्षिप्त भी नहीं मानते । राम मर्यादापुरुषोत्तम हैं । उनके द्वारा नारायण की प्रार्थना तथा विधाता आदि के प्रति अपराध हो जाने की भावना से डरना उचित ही है, क्योंकि उनके द्वारा मनुष्योचित क्रियाओं का अनुसरण लोकशिक्षार्थ ही है । श्रीमद्भागवत में स्पष्ट उल्लेख है कि भगवान् राम का मर्त्यावतार मर्त्य-शिक्षा के लिए ही है; केवल रावणादि राक्षसों के वधमात्र के लिए नहीं— 'मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणम्, रक्षोवधायैव न केवलं विभोः ।" (भा० पु० ५।१९।५ ) राम चित्रकूट में पर्णशाला का संस्कार करते हैं, वैश्वदेव बलि तथा वैष्णव, रौद्र बलि और जप आदि सभी मनुष्योचित कार्य भी करते हैं— "वैश्वदेवबलिं कृत्वा रौद्रं वैष्णवमेव च । वास्तुसंशमनीयानि मङ्गलानि प्रवर्तयन् ॥" ( वा० रा० २।५६।३१,३२ ) १२८वें अनु० में बुल्के लिखते हैं, "रामायण के अनेक पात्र राम की तुलना विष्णु से करते हैं । इसका अर्थ यह है कि वे राम और विष्णु को भिन्न समझते हैं । अन्य स्थलों पर भी कवि स्वयं इस तुलना का प्रयोग करते हैं (वा० रा० १।७८।२९;६।५९।१२५) अथवा अन्य पात्रों द्वारा करवाते हैं । अनसूया द्वारा (वा० रा० २।११८।२०), देवताओं द्वारा (वा० रा० ३।२३।२९;३।२४।२२;३।३०।३२) एवं अयोध्यावासियों द्वारा ( वा० रा०२।२।४३ ) । न केवल राम की परन्तु अन्य पात्रों की भी तुलना विष्णु से की जाती है । उदाहरणार्थ रावण ( वा०रा० ७।२०।५ ), अतिकाय ( वा० रा० ६।७१।८ ), इन्द्रजित् ( वा० रा० ६।७३।७ ) एवं हनुमान् ( वा० रा०६।५६।३८ ) । दूसरी ओर राम की तुलना अन्य देवताओं से भी की जाती है।"** बुल्के का उपर्युक्त कथन भी निरर्थक ही है, क्योंकि काव्यों में कहीं-कहीं आंशिक गुणों के आधार पर भी तुलना की ही जाती है । "रविरिव राजते राजा" प्रसिद्ध ही है अर्थात् राजा सूर्य के तुल्य राजमान है । विष्णु के साथ राम की तुलना किये जाने के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता है कि वे राम को विष्णु से भिन्न मानते थे, क्योंकि वास्तविक अभिन्नता होने पर भी व्यावहारिक भिन्नता के आधार पर ही अभिन्न में भी तुलना होतो ही है । इस तुलना में भी प्रकारान्तर से राम के ही महत्त्व का वर्णन किया गया है । प्रथम प्रसिद्ध विष्णु की उपमा दी जा सकती है, क्योंकि उपमान उपमेय की भिन्नता और उपमान की प्रसिद्धता लोकसिद्ध है । शङ्कराचार्य के अनुसार तो अभेद होने पर भी औपाधिक भेद के आधार पर भक्ति की उपपत्ति होती है— २८