भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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२१४ रामायणमीमांसा षष्ठ अभेद में तुल्यता मान्य है । इसी तरह 'सागरं चाम्बरप्रख्यमम्बरं सागरोपमम् । रामरावणयोर्युद्धं रामरावणयोरिव ।।' (वा० रा० ६।१०७।५१,५२ ) इस श्लोक में जैसे गगन और सागर की उपमा गगन और सागर से ही दी गयी है वैसे ही राम-रावण के युद्ध की उपमा राम-रावणयुद्ध से ही दी गयी है । बुल्के लिखते हैं, “राम न केवल नारायण तथा मधुसूदन ( दे० ३।६।३७ ) से प्रार्थना करते हैं, विधाता के विरुद्ध अपराध करने से डरते भी हैं। अधर्म और परलोक के भय से राज्याधिकार प्राप्त नहीं करते ( २।५३।२६ ) वरन् वह अपने आपको साधारण मनुष्य समझ कर विश्वास करते हैं कि पूर्व जन्म के किये हुए पापों का मुझे इस जन्म में फल भोगना है— “पूर्वं मया नूनमभीप्सितानि पापानि कर्माण्यसकृत्कृतानि ।।” ( वा० रा० ३।६३।४ ) “किं मया दुष्कृतं कर्म कृतमन्यत्र जन्मनि ।” (वा० रा० ६।१०१।१८ ) इसके अतिरिक्त अवतारवाद की भावना की नवीनता ब्रह्मा के प्रति राम की उक्ति से स्पष्ट है—मैं तो अपने आपको मनुष्य, दशरथ-पुत्र समझता हूँ । वास्तव में मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, इसे आप मुझसे कहिये— “आत्मानं मानुषं मन्ये रामं दशरथात्मजम् । सोऽहं यश्च यतश्चाहं भगवांस्तद् ब्रवीतु मे ।।” (वा० रा० ६।११७।११)” बुल्के के उपर्युक्त सभी तर्क कुशकाशावलम्बन ही हैं। स्वयं भगवान् विष्णु नररूप में प्रकट हुए हैं, अतः अपने इस स्वीकृत रूप के अनुकूल ही मनुष्य जैसा उनका व्यवहार उचित ही है । वास्तव में बुल्के को हिन्दी विभागा- ध्यक्ष होते हुए भी साहित्य का लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है । यदि होता तो वे 'पूर्वं मया' इस श्लोक में आये हुए 'नूनम्' शब्द का विश्वास करना अर्थ नहीं करते । क्योंकि 'नूनम्' शब्द यहाँ उत्प्रेक्षा वाचक है, जैसा कि “मन्ये शङ्के ध्रुवं प्रायो नूनमित्येवमादिभिः । उत्प्रेक्षा व्यज्यते शब्दैरिवशब्दोऽपि तादृशः ।।” इस कोष से सिद्ध होता है । तदनुसार दुःखों के मूल के रूप में दुष्कृतों की कल्पना भी होती ही है । वस्तुतः भारतीय शास्त्रों का परस्पर एक दूसरे से सम्बन्ध होता है। योगवासिष्ठ एवं पुराणों के अनुसार देवकार्यार्थ विष्णु ने भृगुपत्नी का वध किया था, भृगु ने शाप दिया था कि तुम अज्ञानी हो जाओगे और स्त्री-निमित्तक दुःख पाओगे । नारद का भी शाप था कि स्त्री-निमित्तक दुःख भोगोगे । तुलसीदासजी ने भी इस शाप की चर्चा की है । यद्यपि वह देव-कार्यार्थ ही था और ईश्वर का पुण्य-पाप से संसर्ग नहीं होता तथापि भगवान् विष्णु ने ऋषियों का शाप अङ्गीकार किया था । इसलिए अज्ञान एवं शोक, विलाप आदि उनमें दृष्ट हुए हैं । इसी दृष्टि से राम कहते हैं कि मैं अपने को साधारण मनुष्य मानता हूँ । यदि बुल्के ईमानदारी से विचार करें तो वे भी मानेंगे कि— “आत्मानं मानुषं मन्ये” इस श्लोक से भी राम की ब्रह्मरूपता ही सिद्ध होती है । कब, किससे और किस सन्दर्भ में राम ने उक्त वचन कहा है और साथ ही उसका क्या उत्तर मिला आदि प्रश्नों पर पूर्वापरप्रसङ्गों के तारतम्य को बनाये रखते हुए विचार करने पर निस्सन्देह सिद्ध हो जाता है कि वाल्मीकिरामायण में राम को ब्रह्म कहा गया है और ये वचन अथवा सर्ग प्रक्षेप नहीं हैं । फिर इस पद्य में 'मन्ये' शब्द उत्प्रेक्षावाचक ही है, इसलिए उसका 'समझता हूँ' यह अर्थ करना बुल्के के साहित्य ज्ञान को चुनौती देता है । यदि बुल्के उपर्युक्त श्लोक 'आत्मानं मानुषं मन्ये' ( वा० रा० ६।११७।११ ) को प्रक्षेप मानते हैं तब तो उनके द्वारा राम मनुष्य हैं अवतार नहीं हैं यह भी नहीं कहा जा सकता । यदि यह वचन क्षेपक नहीं है तो इससे सम्बद्ध पूर्वापर भी वचन क्षेपक नहीं हैं ।