रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 290, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन २१३ अर्थात् तुम कुबेर के कैलास पर्वत पर चले जाओ अथवा वरुण की सभा में जाकर छिपे रहो, किन्तु जैसे काल से आहत विशाल वृक्ष भी वज्र का आघात लगते ही नष्ट हो जाता है निस्सन्देह वैसे ही तुम भी दशरथ- पुत्र के बाणों से तत्क्षण मारे जाओगे । “अपनेष्यति मां भर्ता त्वत्तः शीघ्रमरिन्दमः । असुरेभ्यः श्रियं दीप्तां विष्णुस्त्रिभिरिव क्रमैः ।।” ( वा० रा० ५।२१।२८ ) अर्थात् जैसे भगवान् विष्णु ने अपने तीन ही पगों द्वारा असुरों से उनकी उद्दीप्त राजलक्ष्मी छीन ली थी, वैसे ही मेरे स्वामी शत्रुसूदन श्रीराम मुझे शीघ्र ही तेरे यहाँ से निकाल ले जायेंगे । बुल्के लिखते हैं; लक्ष्मण भी राम को सान्त्वना देते हुए कहते हैं— “प्राप्स्यते त्वं महाप्राज्ञ मैथिलीं जनकात्मजाम् । यथा विष्णुर्महाबाहो बलिं बद्ध्वा महीमिमाम् ॥” अर्थात् हे महाबाहो, जैसे महातेजस्वी विष्णु ने बलि को बाँध कर यह पृथिवी प्राप्त की वैसे ही आप भी जनकात्मजा सीता को प्राप्त कर लेंगे । हनुमान् राम की तुलना विष्णु से करते हैं¹ और राम से कहते हैं कि जिस तरह विष्णु गरुड़ पर आरूढ होते हैं उसी तरह आप मेरी पीठ पर आरूढ़ होइये— “मम पृष्ठं समारुह्य राक्षसं शास्तुमर्हसि । विष्णुर्यथा गरुत्मन्तमारुह्यामरवैरिणम् ॥” ( वा० रा० ६।५९।२२ ) राम के दूत बनकर हनुमान् रावण से कहते हैं, मैं विष्णु की ओर से नहीं आया हूँ लेकिन राम की ओर से; “विष्णुना नास्मि चोदितः । केनचिद्रामकार्येण आगतोऽस्मि तवान्तिकम् ॥” ( वा० रा० ५।४०।१३, १८ ) इसी तरह और उदाहरण दिये जा सकते हैं । अगस्त्य राम को विष्णु का धनुष देते हुए राम और विष्णु की अभिन्नता से परिचित नहीं हैं; “इदं दिव्यं महच्चापं हेमवज्रविभूषितम् । वैष्णवं पुरुषव्याघ्र निर्मितं विश्वकर्मणा ॥” ( वा० रा० ३।१२।२३ )” परन्तु उपर्युक्त उद्धरण से यह नहीं जाना जा सकता है कि ऋषि अगस्त्य विष्णु एवं राम को अभिन्नता से परिचित नहीं थे; प्रत्युत विष्णु का दिव्य धनुष राम को देने से यही सिद्ध होता है कि राम विष्णु ही हैं । अतः उन्हें विष्णु का धनुष दिया जा रहा है । इसके अतिरिक्त यदि सीता, लक्ष्मण, हनुमान्, वसिष्ठ, विश्वामित्र आदि सब राम को विष्णु ही बताते और विष्णुरूप से ही उनसे व्यवहार करते तो रावण का वध उनसे, ब्रह्मा द्वारा प्राप्त वरदान के कारण ही, सम्भव न होता । साथ ही, रामरूप में प्रादुर्भाव की उपयोगिता भी सिद्ध नहीं होती । अतः व्यावहारिकरूप में भिन्नता है ही । इसके अतिरिक्त अभेद में भी उपमा या तुल्यता का व्यवहार होता है । उदाहरणार्थ ‘वाक् करोति’ यहाँ सन्धि के लिए सवर्ण अपेक्षित है । तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् ( पा० सू० १।१।९ ) के अनुसार तुल्य आस्य प्रयत्न होना चाहिये । वाक् करोति इस स्थल में अभेद में भी तुल्यता मान्य होती है । भूवादयो धातवः ( पा० सू० १।३।१ ) इससे भू आदि वासदृश की धातु संज्ञा होती है । इसमें वा धातु स्वयं भी वासदृश होकर ही धातुसंज्ञक होता है अतः १. रामकथा, पृष्ठ १३५ में उद्धृत वा० रा० ५।३४।२९; ५।३७।२४ ।