भारतकोश
संग्रह पर लौटें

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

अध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन २१३ अर्थात् तुम कुबेर के कैलास पर्वत पर चले जाओ अथवा वरुण की सभा में जाकर छिपे रहो, किन्तु जैसे काल से आहत विशाल वृक्ष भी वज्र का आघात लगते ही नष्ट हो जाता है निस्सन्देह वैसे ही तुम भी दशरथ- पुत्र के बाणों से तत्क्षण मारे जाओगे । “अपनेष्यति मां भर्ता त्वत्तः शीघ्रमरिन्दमः । असुरेभ्यः श्रियं दीप्तां विष्णुस्त्रिभिरिव क्रमैः ।।” ( वा० रा० ५।२१।२८ ) अर्थात् जैसे भगवान् विष्णु ने अपने तीन ही पगों द्वारा असुरों से उनकी उद्दीप्त राजलक्ष्मी छीन ली थी, वैसे ही मेरे स्वामी शत्रुसूदन श्रीराम मुझे शीघ्र ही तेरे यहाँ से निकाल ले जायेंगे । बुल्के लिखते हैं; लक्ष्मण भी राम को सान्त्वना देते हुए कहते हैं— “प्राप्स्यते त्वं महाप्राज्ञ मैथिलीं जनकात्मजाम् । यथा विष्णुर्महाबाहो बलिं बद्ध्वा महीमिमाम् ॥” अर्थात् हे महाबाहो, जैसे महातेजस्वी विष्णु ने बलि को बाँध कर यह पृथिवी प्राप्त की वैसे ही आप भी जनकात्मजा सीता को प्राप्त कर लेंगे । हनुमान् राम की तुलना विष्णु से करते हैं¹ और राम से कहते हैं कि जिस तरह विष्णु गरुड़ पर आरूढ होते हैं उसी तरह आप मेरी पीठ पर आरूढ़ होइये— “मम पृष्ठं समारुह्य राक्षसं शास्तुमर्हसि । विष्णुर्यथा गरुत्मन्तमारुह्यामरवैरिणम् ॥” ( वा० रा० ६।५९।२२ ) राम के दूत बनकर हनुमान् रावण से कहते हैं, मैं विष्णु की ओर से नहीं आया हूँ लेकिन राम की ओर से; “विष्णुना नास्मि चोदितः । केनचिद्रामकार्येण आगतोऽस्मि तवान्तिकम् ॥” ( वा० रा० ५।४०।१३, १८ ) इसी तरह और उदाहरण दिये जा सकते हैं । अगस्त्य राम को विष्णु का धनुष देते हुए राम और विष्णु की अभिन्नता से परिचित नहीं हैं; “इदं दिव्यं महच्चापं हेमवज्रविभूषितम् । वैष्णवं पुरुषव्याघ्र निर्मितं विश्वकर्मणा ॥” ( वा० रा० ३।१२।२३ )” परन्तु उपर्युक्त उद्धरण से यह नहीं जाना जा सकता है कि ऋषि अगस्त्य विष्णु एवं राम को अभिन्नता से परिचित नहीं थे; प्रत्युत विष्णु का दिव्य धनुष राम को देने से यही सिद्ध होता है कि राम विष्णु ही हैं । अतः उन्हें विष्णु का धनुष दिया जा रहा है । इसके अतिरिक्त यदि सीता, लक्ष्मण, हनुमान्, वसिष्ठ, विश्वामित्र आदि सब राम को विष्णु ही बताते और विष्णुरूप से ही उनसे व्यवहार करते तो रावण का वध उनसे, ब्रह्मा द्वारा प्राप्त वरदान के कारण ही, सम्भव न होता । साथ ही, रामरूप में प्रादुर्भाव की उपयोगिता भी सिद्ध नहीं होती । अतः व्यावहारिकरूप में भिन्नता है ही । इसके अतिरिक्त अभेद में भी उपमा या तुल्यता का व्यवहार होता है । उदाहरणार्थ ‘वाक् करोति’ यहाँ सन्धि के लिए सवर्ण अपेक्षित है । तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् ( पा० सू० १।१।९ ) के अनुसार तुल्य आस्य प्रयत्न होना चाहिये । वाक् करोति इस स्थल में अभेद में भी तुल्यता मान्य होती है । भूवादयो धातवः ( पा० सू० १।३।१ ) इससे भू आदि वासदृश की धातु संज्ञा होती है । इसमें वा धातु स्वयं भी वासदृश होकर ही धातुसंज्ञक होता है अतः १. रामकथा, पृष्ठ १३५ में उद्धृत वा० रा० ५।३४।२९; ५।३७।२४ ।

२१४ रामायणमीमांसा षष्ठ अभेद में तुल्यता मान्य है । इसी तरह 'सागरं चाम्बरप्रख्यमम्बरं सागरोपमम् । रामरावणयोर्युद्धं रामरावणयोरिव ।।' (वा० रा० ६।१०७।५१,५२ ) इस श्लोक में जैसे गगन और सागर की उपमा गगन और सागर से ही दी गयी है वैसे ही राम-रावण के युद्ध की उपमा राम-रावणयुद्ध से ही दी गयी है । बुल्के लिखते हैं, “राम न केवल नारायण तथा मधुसूदन ( दे० ३।६।३७ ) से प्रार्थना करते हैं, विधाता के विरुद्ध अपराध करने से डरते भी हैं। अधर्म और परलोक के भय से राज्याधिकार प्राप्त नहीं करते ( २।५३।२६ ) वरन् वह अपने आपको साधारण मनुष्य समझ कर विश्वास करते हैं कि पूर्व जन्म के किये हुए पापों का मुझे इस जन्म में फल भोगना है— “पूर्वं मया नूनमभीप्सितानि पापानि कर्माण्यसकृत्कृतानि ।।” ( वा० रा० ३।६३।४ ) “किं मया दुष्कृतं कर्म कृतमन्यत्र जन्मनि ।” (वा० रा० ६।१०१।१८ ) इसके अतिरिक्त अवतारवाद की भावना की नवीनता ब्रह्मा के प्रति राम की उक्ति से स्पष्ट है—मैं तो अपने आपको मनुष्य, दशरथ-पुत्र समझता हूँ । वास्तव में मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, इसे आप मुझसे कहिये— “आत्मानं मानुषं मन्ये रामं दशरथात्मजम् । सोऽहं यश्च यतश्चाहं भगवांस्तद् ब्रवीतु मे ।।” (वा० रा० ६।११७।११)” बुल्के के उपर्युक्त सभी तर्क कुशकाशावलम्बन ही हैं। स्वयं भगवान् विष्णु नररूप में प्रकट हुए हैं, अतः अपने इस स्वीकृत रूप के अनुकूल ही मनुष्य जैसा उनका व्यवहार उचित ही है । वास्तव में बुल्के को हिन्दी विभागा- ध्यक्ष होते हुए भी साहित्य का लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है । यदि होता तो वे 'पूर्वं मया' इस श्लोक में आये हुए 'नूनम्' शब्द का विश्वास करना अर्थ नहीं करते । क्योंकि 'नूनम्' शब्द यहाँ उत्प्रेक्षा वाचक है, जैसा कि “मन्ये शङ्के ध्रुवं प्रायो नूनमित्येवमादिभिः । उत्प्रेक्षा व्यज्यते शब्दैरिवशब्दोऽपि तादृशः ।।” इस कोष से सिद्ध होता है । तदनुसार दुःखों के मूल के रूप में दुष्कृतों की कल्पना भी होती ही है । वस्तुतः भारतीय शास्त्रों का परस्पर एक दूसरे से सम्बन्ध होता है। योगवासिष्ठ एवं पुराणों के अनुसार देवकार्यार्थ विष्णु ने भृगुपत्नी का वध किया था, भृगु ने शाप दिया था कि तुम अज्ञानी हो जाओगे और स्त्री-निमित्तक दुःख पाओगे । नारद का भी शाप था कि स्त्री-निमित्तक दुःख भोगोगे । तुलसीदासजी ने भी इस शाप की चर्चा की है । यद्यपि वह देव-कार्यार्थ ही था और ईश्वर का पुण्य-पाप से संसर्ग नहीं होता तथापि भगवान् विष्णु ने ऋषियों का शाप अङ्गीकार किया था । इसलिए अज्ञान एवं शोक, विलाप आदि उनमें दृष्ट हुए हैं । इसी दृष्टि से राम कहते हैं कि मैं अपने को साधारण मनुष्य मानता हूँ । यदि बुल्के ईमानदारी से विचार करें तो वे भी मानेंगे कि— “आत्मानं मानुषं मन्ये” इस श्लोक से भी राम की ब्रह्मरूपता ही सिद्ध होती है । कब, किससे और किस सन्दर्भ में राम ने उक्त वचन कहा है और साथ ही उसका क्या उत्तर मिला आदि प्रश्नों पर पूर्वापरप्रसङ्गों के तारतम्य को बनाये रखते हुए विचार करने पर निस्सन्देह सिद्ध हो जाता है कि वाल्मीकिरामायण में राम को ब्रह्म कहा गया है और ये वचन अथवा सर्ग प्रक्षेप नहीं हैं । फिर इस पद्य में 'मन्ये' शब्द उत्प्रेक्षावाचक ही है, इसलिए उसका 'समझता हूँ' यह अर्थ करना बुल्के के साहित्य ज्ञान को चुनौती देता है । यदि बुल्के उपर्युक्त श्लोक 'आत्मानं मानुषं मन्ये' ( वा० रा० ६।११७।११ ) को प्रक्षेप मानते हैं तब तो उनके द्वारा राम मनुष्य हैं अवतार नहीं हैं यह भी नहीं कहा जा सकता । यदि यह वचन क्षेपक नहीं है तो इससे सम्बद्ध पूर्वापर भी वचन क्षेपक नहीं हैं ।

अध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन २१९ रामाभिरामी टीका सम्मत पाठ के अनुसार प्रसङ्ग निम्नाङ्कित है— ११६ वें सर्ग में सीता वानरों, ऋक्षों और राक्षसों के समक्ष प्रज्वलित चिता में निःशङ्क होकर प्रवेश करती है। ऋषियों ने, देवताओं और गन्धर्वों ने यज्ञ की पूर्णाहुति एवं मन्त्र-संस्कृत वसोर्धारा के समान अग्नि में प्रवेश करती हुई सीता को देखा। सर्ग ११७ में धर्मात्मा राम खिन्न तथा बाष्पव्याकुललोचन होकर मुहूर्त भर ध्यान- परायण हुए। तदनन्तर ही राजा वैश्रवण (कुबेर) तथा पितरों के साथ यम तथा सहस्राक्ष देवेन्द्र और जलेश्वर वरुण और त्रिनेत्र वृषभध्वज महादेव तथा लोकपितामह ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ ब्रह्मा आदि देवता सूर्य-संनिभ विमानों द्वारा लङ्का नगरी में राम के पास आये और प्राञ्जलि हो राघव से बोले, "आप सब लोकों के कर्ता हैं, देवताओं में श्रेष्ठ हैं, फिर अग्नि में प्रवेश करती हुई सीता की उपेक्षा क्यों कर रहे हैं? देवताओं में श्रेष्ठ ! आप अपने को क्यों नहीं जान रहे हैं? यहाँ देवगण, इन्द्र आदि से भी राम को श्रेष्ठ कहा गया है। नागेश के अनुसार यह बात 'विष्णुमुखा वै देवाः' इस श्रुति से भी सिद्ध है। राम ने कहा कि मैं तो अपने को दशरथ-पुत्र (शापादिवशात्) उत्प्रेक्षित करता हूँ। मैं तत्त्वतः जो हूँ और जैसा हूँ वह आप भगवान् बताये । पश्चात् ब्रह्माजी ने कहा — भवान् नारायणो देवः श्रीमांश्चक्रायुधः प्रभुः । एकशृङ्गो वराहस्त्वं भूतभव्यसपत्नजित् ॥ १३ ॥ अक्षरं ब्रह्म सत्यं च मध्ये चान्ते च राघव । लोकानां त्वं परो धर्मो विष्वक्सेनश्चतुर्भुजः ॥ १४ ॥ शार्ङ्गधन्वा हृषीकेशः पुरुषः पुरुषोत्तमः ! अजितः खड्गधृग् विष्णुः कृष्णश्चैव बृहद्बलः ॥ १५ ॥ सेनानीर्ग्रामणीः सर्वं त्वं बुद्धिस्त्वं क्षमा दमः । प्रभवश्चाव्ययश्च त्वमुपेन्द्रो मधुसूदनः ॥ १६ ॥ इन्द्रकर्मा महेन्द्रस्त्वं पद्मनाभो रणान्तकृत् । शरण्यं शरणं च त्वामाहुर्दिव्या महर्षयः ॥ १७ ॥ सहस्रशृङ्गो वेदात्मा शतशीर्षो महर्षभः । त्वं त्रयाणां हि लोकानामादिकर्ता स्वयं प्रभुः ॥ १८ ॥ सिद्धानामपि साध्यानामाश्रयश्चापि पूर्वजः । त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमोङ्कारः परात्परः ॥ १९ ॥ प्रभवं निधनं चापि नो विदुः को भवानिति ।

  • दृश्यसे सर्वभूतेषु गोषु च ब्राह्मणेषु च ॥ २० ॥ दिक्षु सर्वासु गगने पर्वतेषु नदीषु च । सहस्रचरणः श्रीमाञ्छतशीर्षः सहस्रदृक् ॥ २१ ॥ त्वं धारयसि भूतानि पृथिवीं सर्वपर्वतान् । अन्ते पृथिव्याः सलिले दृश्यते त्वं महोरगः ॥ २२ ॥ त्रींल्लोकान् धारयन् राम देवगन्धर्वदानवान् । अहं ते हृदयं राम जिह्वा देवी सरस्वती ॥ २३ ॥ देवा रोमाणि गात्रेषु ब्रह्मणा निर्मिताः प्रभो । निमेषस्ते स्मृता रात्रिस्त्वन्मेषो दिवसस्तथा ॥ २४ ॥

२१६ रामायणमीमांसा षष्ठ संस्कारास्त्वभवन् वेदा नैतदस्ति त्वया विना । जगत् सर्वं शरीरं ते स्थैर्यं ते वसुधात लम् ॥ २५ ॥ अग्निः कोपः प्रसादस्ते सोमः श्रीवत्सलक्षणः । त्वया लोकास्त्रयः क्रान्ताः पुरा स्वैर्विक्रमैस्त्रिभिः ॥ २६ ॥ महेन्द्रश्च कृतो राजा बलिं बद्ध्वा सुदारुणम् । सीता लक्ष्मीर्भवान् विष्णुर्देवः कृष्णः प्रजापतिः ॥ २७ ॥ वधार्थं रावणस्येह प्रविष्टो मानुषीं तनुम् । तदिदं नस्त्वया कार्यं कृतं धर्मभृतां वर ॥ २८ ॥ निहतो रावणो राम प्रहृष्टो दिवमाक्रम । अमोघं देव वीर्यं ते न ते मोघाः पराक्रमाः ॥ २९ ॥ अमोघं दर्शनं राम अमोघस्तव संस्तवः । अमोघास्ते भविष्यन्ति भक्तिमन्तो नरा भुवि ॥ ३० ॥ ये त्वां देवं ध्रुवं भक्ताः पुराणं पुरुषोत्तमम् । प्राप्नुवन्ति तथा कामानिह लोके परत्र च ॥ ३१ ॥ (वा० रा० ६।११९ ) अर्थात् आप भोक्ता और भोग्यरूप सकल प्रपञ्च के आश्रय साक्षात् नारायण हैं, सुदर्शन चक्रधारी श्रीविष्णु हैं, आप ही एकशृङ्ग वराह तथा भूत भव्य सभी सपत्नों (शत्रुओं) के विजेता हैं । आप ही आदि, अन्त और मध्य में रहने- वाले सत्य अक्षर हैं । सब लोकों के आप ही परम धर्म हैं। आप ही चतुर्भुज विष्वक्सेन, शार्ङ्गधन्वा, सर्वेन्द्रियनियामक हृषीकेश पुरुष एवं पुरुषोत्तम हैं। आप अजित खड्गधर विष्णु हैं एवं आप ही सेनानी एवं ग्रामणी हैं, आप ही बुद्धि, सत्त्व, क्षमा तथा दम हैं। जगत् की उत्पत्ति और प्रलय के आप ही एकमात्र कारण हैं एवं आप ही मधुसूदन हैं। आप ही इन्द्रकर्मा इन्द्र की सृष्टि करनेवाले ( सबके अधिपति ) महेन्द्र हैं। रणान्तकृत् पद्मनाभ भी आप ही हैं। दिव्य महर्षि आपको शरणयोग्य परम आश्रय एवं रक्षक कहते हैं। आप ही सहस्रशृङ्ग वेद एवं शतशीर्ष महान् धर्म हैं। आप तीनों लोकों के आदिकर्ता स्वयंप्रभु हैं। आपका अन्य कोई प्रभु नहीं है । सिद्धों एवं साध्यों के आप ही आश्रय एवं पूर्वज अर्थात् कारण हैं। आप ही यज्ञ हैं और आप ही वषट्कार हैं। आप ही ओंकार हैं। आप परात्पर परमेश्वर हैं। आपकी उत्पत्ति एवं निधन कोई नहीं जानता अर्थात् आप उत्पत्ति तथा लय से रहित नित्य हैं। आप कौन हैं इसे लोग नहीं जानते, परन्तु आप अन्तर्यामी रूप से सब भूतों में विशेषरूप से गो एवं ब्राह्मणों में दृष्टिगोचर होते हैं। अत्यन्त अचेतन सभी दिशाओं में, आकाश में एवं पर्वतों में, नदियों में अन्तर्यामी रूप से योगियों के आप दृष्टिगोचर होते हैं। आप सहस्रचरण, शतशीर्ष तथा सहस्रदृक् हैं। महाविराट् के रूप से संसार के सभी चरण, शीर्ष और नेत्र आप ही के हैं। सभी भूतों तथा पर्वतसहित पृथ्वी को आप ही धारण करते हैं। अन्त में पृथ्वी के कारणभूत जल में, देव, गन्धर्व, दानव सहित तीनों लोकों को धारण करनेवाले महोरग शेष आप ही हैं। श्रीराम ! मैं ( ब्रह्मा ) आपका हृदय हूँ। सरस्वती आपकी जिह्वा हैं। ब्रह्मा के द्वारा निर्मित सभी देव आपके गात्रों के रोम हैं। आपका नेत्रनिमीलन रात्रि है एवं नेत्रोन्मीलन दिन है। आपके ज्ञान-विज्ञान संस्कार ही वेद हैं। वस्तुतः आपके बिना संसार कुछ भी नहीं है। सारा जगत् आपका वैराज शरीर है। आपकी स्थिरता वसुधातल है। आप का कोप ही अग्नि है। आपका प्रसाद ही श्रीवत्स- लक्षण सोम है। आपने अपने तीन विक्रमों (पगों) से तीनों लोकों को आक्रान्त कर दारुण बलि को बाँधकर महेन्द्र को राजा बनाया है। सीता लक्ष्मी हैं। आप प्रजापति विष्णु कृष्ण हैं। रावण के वधार्थ ही आप मानव देह में प्रविष्ट हुए हैं। हे देव, वह रावण-वधादि हम देवताओं का कार्य आपके द्वारा सम्पन्न हो गया है। अब आप प्रसन्नता से परम धाम में पधारिये। हे देव, आपका अमोघ वीर्य एवं अमोघ पराक्रम हैं। आपका अमोघ दर्शन तथा अमोघ

Here is the complete, line-by-line transcription of the provided image into clean Devanagari Markdown:

अध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन २१७ स्तवन है । भूतल में होनेवाले आपके भक्त नर भी अमोघ ( सर्वत्र सफल ) होंगे । वे भक्त इहलोक के सब कामों ( कामनाओं ) को प्राप्त करेंगे और अन्त में आपके पुराण पुरुषोत्तम रूप को ही प्राप्त होंगे । ब्रह्माजी के इन वचनों से भी स्पष्ट है कि राम ही परात्पर परब्रह्म हैं । "आत्मानं मानुषं मन्ये" जैसे वचन के आधार पर ही यह समझा जा सकता है कि ब्रह्मा आदि ने राम से कहा था— "कथं देवगणश्रेष्ठमात्मानं नावबुद्ध्यसे" ( वा० रा० ६।११७।६ ) तभी राम ने कहा कि मैं तो अपने को मनुष्य जानता हूँ, आप बतायें कि मैं कौन हूँ ? इसपर अवश्य ही ब्रह्मा ने भी कुछ कहा होगा । यदि पूर्वापरप्रसङ्ग को छोड़ दिया जाय तो बुल्के के द्वारा उद्धृत उक्त वचन सर्वथा असङ्गत ही होगा । उक्त वचन को बुल्के प्रक्षिप्त भी नहीं मानते । राम मर्यादापुरुषोत्तम हैं । उनके द्वारा नारायण की प्रार्थना तथा विधाता आदि के प्रति अपराध हो जाने की भावना से डरना उचित ही है, क्योंकि उनके द्वारा मनुष्योचित क्रियाओं का अनुसरण लोकशिक्षार्थ ही है । श्रीमद्भागवत में स्पष्ट उल्लेख है कि भगवान् राम का मर्त्यावतार मर्त्य-शिक्षा के लिए ही है; केवल रावणादि राक्षसों के वधमात्र के लिए नहीं— 'मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणम्, रक्षोवधायैव न केवलं विभोः ।" (भा० पु० ५।१९।५ ) राम चित्रकूट में पर्णशाला का संस्कार करते हैं, वैश्वदेव बलि तथा वैष्णव, रौद्र बलि और जप आदि सभी मनुष्योचित कार्य भी करते हैं— "वैश्वदेवबलिं कृत्वा रौद्रं वैष्णवमेव च । वास्तुसंशमनीयानि मङ्गलानि प्रवर्तयन् ॥" ( वा० रा० २।५६।३१,३२ ) १२८वें अनु० में बुल्के लिखते हैं, "रामायण के अनेक पात्र राम की तुलना विष्णु से करते हैं । इसका अर्थ यह है कि वे राम और विष्णु को भिन्न समझते हैं । अन्य स्थलों पर भी कवि स्वयं इस तुलना का प्रयोग करते हैं (वा० रा० १।७८।२९;६।५९।१२५) अथवा अन्य पात्रों द्वारा करवाते हैं । अनसूया द्वारा (वा० रा० २।११८।२०), देवताओं द्वारा (वा० रा० ३।२३।२९;३।२४।२२;३।३०।३२) एवं अयोध्यावासियों द्वारा ( वा० रा०२।२।४३ ) । न केवल राम की परन्तु अन्य पात्रों की भी तुलना विष्णु से की जाती है । उदाहरणार्थ रावण ( वा०रा० ७।२०।५ ), अतिकाय ( वा० रा० ६।७१।८ ), इन्द्रजित् ( वा० रा० ६।७३।७ ) एवं हनुमान् ( वा० रा०६।५६।३८ ) । दूसरी ओर राम की तुलना अन्य देवताओं से भी की जाती है।"** बुल्के का उपर्युक्त कथन भी निरर्थक ही है, क्योंकि काव्यों में कहीं-कहीं आंशिक गुणों के आधार पर भी तुलना की ही जाती है । "रविरिव राजते राजा" प्रसिद्ध ही है अर्थात् राजा सूर्य के तुल्य राजमान है । विष्णु के साथ राम की तुलना किये जाने के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता है कि वे राम को विष्णु से भिन्न मानते थे, क्योंकि वास्तविक अभिन्नता होने पर भी व्यावहारिक भिन्नता के आधार पर ही अभिन्न में भी तुलना होतो ही है । इस तुलना में भी प्रकारान्तर से राम के ही महत्त्व का वर्णन किया गया है । प्रथम प्रसिद्ध विष्णु की उपमा दी जा सकती है, क्योंकि उपमान उपमेय की भिन्नता और उपमान की प्रसिद्धता लोकसिद्ध है । शङ्कराचार्य के अनुसार तो अभेद होने पर भी औपाधिक भेद के आधार पर भक्ति की उपपत्ति होती है— २८

२१८ रामायणमीमांसा षष्ठ “सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम्, सामुद्रो हि तरङ्गः क्वचन समुद्रो न तारङ्गः ।” भेद न होने पर भी मैं आपका हूँ आप मेरे नहीं, क्योंकि समुद्र का तरङ्ग है यही व्यवहार होता है, तरङ्ग का समुद्र यह व्यवहार नहीं होता । “सागरः सागरोपमः” इत्यादि स्थलों में अभेद में भी तुलना की गयी है । १२८ वें अनु० में बुल्के लिखते हैं, “राम की तुलना विष्णु से १८ बार की जाती है, इन्द्र से ७७ बार । कई स्थानों पर राम तथा लक्ष्मण की तुलना क्रमशः इन्द्र तथा विष्णु से की गयी है जिससे स्पष्ट है कि विष्णु की अपेक्षा इन्द्र श्रेष्ठ माने जाते हैं ( वा० रा० ६।१९।१२; ६।३३।२८; ३।६८।२८ ) । एक उदाहरण पर्याप्त होगा— “ततो राममभिक्रम्य सौमित्रिरभिवाद्य च । तस्थौ भ्रातृसमीपस्थः शक्रस्येन्द्रानुजो यथा ॥” ( वा० रा० ६।४१।४ ) अर्थात्—लक्ष्मण भ्राता राम के समीप आकर अभिवादन कर वैसे ही समीप में बैठ गये जैसे इन्द्र के समीप उपेन्द्र बैठते हैं । इस उद्धरण में वैदिक साहित्य के अनुसार विष्णु इन्द्र के अनुज माने जाते हैं । वैदिक साहित्य के अनुसार भी प्रामाणिक 'आदिरामायण' में इन्द्र सर्वश्रेष्ठ देवता थे । राम की विजय इन्द्र की सहायता से होती है। यह भी इन्द्र की श्रेष्ठता को सूचित करता है ।” बुल्के का उक्त कथन भी अकिञ्चित्कर है, क्योंकि 'आदिरामायण' नामक कोई ग्रन्थ प्रसिद्ध नहीं है । बुल्के एवं अन्य पाश्चात्य विद्वानों द्वारा रामायण एवं महाभारत के सम्बन्ध में ऐसी विविध दुष्कल्पनाएँ की गयी हैं जिनका उद्देश्य प्रसिद्ध रामायण एवं महाभारत में शङ्का उत्पन्न करना है । अपने अनुकूल अर्थवाले कतिपय श्लोकों को आदिरामायणस्थ बताते हुए प्रामाणिक मान लेना प्रतिकूल अर्थ के द्योतक अन्य श्लोकों को प्रक्षेप कह कर अप्रामाणिक कह देना असङ्गत है । विशेषतः जब कि 'आदिरामायण' नामक कोई भी प्रामाणिक ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है । विष्णु की अपेक्षा इन्द्र की श्रेष्ठता की बात भी निराधार है । लक्ष्मण को इन्द्रानुज की उपमा देने मात्र से यह नहीं सिद्ध होता; वस्तुतः वामनावतारधारी विष्णु ही इन्द्र के अनुज हैं । मूलविष्णु नहीं; जैसे रामादि अन्य अवतार हुए हैं वैसे ही उपेन्द्र या वामनावतार भी हुआ है । यह वामन ही इन्द्र के अनुज हैं । यह कथा पुराणों के अतिरिक्त वाल्मीकिरामायण में भी वर्णित है । कश्यप ने कठिन तपस्या कर विष्णु से वरदान माँगा है कि आप मेरी पत्नी अदिति के गर्भ से पुत्ररूप में प्रकट होकर इन्द्र के छोटे भाई बनकर शोकार्त देवों की सहायता करें— “वरं वरद सुप्रीतो दातुमर्हसि सुव्रत । पुत्रत्वं गच्छ भगवन्नदित्या मम चानघ ॥ भ्राता भव यवीयांस्त्वं शक्रस्यासुरसूदनः । शोकार्तानां तु देवानां साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥” ( वा० रा० १।२९।१६, १७ ) तदनन्तर विष्णु अदिति में वामनरूप से उत्पन्न हुए और बलि के पास गये— “अथ विष्णुर्महातेजाः अदित्यां समजायत । वामनं रूपमास्थाय वैरोचनिमुपागमत् ॥” ( वा० रा० १।२९।१९ )

अध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन २१९ इस तरह वामनरूप से भगवान् विष्णु इन्द्र के अनुज हुए और उपेन्द्र कहलाये । उपेन्द्र आख्यात होने पर भी वस्तुतः इन्द्र की अपेक्षा उपेन्द्र का ही सर्वाधिक महत्त्व एवं पूज्यता है—ठीक उसी तरह जैसे श्रीमद्भागवत और महाभारत के अनुसार श्रीकृष्ण बलराम के छोटे भाई हैं । अतः व्यवहारतः श्रीकृष्ण उनको प्रणाम करते हैं, उनकी आज्ञा भी मानते हैं तथापि श्रीकृष्ण ही पूर्ण परब्रह्म होने के कारण सर्वोत्कृष्ट एवं पूज्य हैं, बलराम श्रीकृष्ण के ही अंश और उपासक हैं । लोकदृष्ट्या श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से छोटे थे, भीष्म की दृष्टि से बहुत ही छोटे थे तो भी भीष्म, युधिष्ठिर आदि सभी कृष्ण के उपासक थे और उनको परब्रह्म और परम पूज्य मानते थे । अस्तु, उपेन्द्र इन्द्र के छोटे भाई होते हुए भी इन्द्र के लिए वैसे ही आदरणीय एवं पूज्य हैं जैसे बलराम के लिए श्रीकृष्ण । उपर्युक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि विष्णु की अपेक्षा इन्द्र का श्रेष्ठत्व कहना निराधार है । वेदों में विष्णु को परब्रह्मरूप कहा गया है, परन्तु इन्द्र देवताओं के राजा देवश्रेष्ठमात्र हैं । विष्णु का स्वरूपभूत प्राप्य पद परम उत्कृष्ट है जिसे व्यवहारविरत विद्वान् सूरि ही देख पाते हैं। “तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरय ” ( ऋ० सं० १।२२।२१ ) “तद्विप्रासो विपन्यवः” ( ऋ० मं १।२२।२१) । मन्त्रों में कहा गया है कि पुराकाल में चतुर्मुख ने जिस परम पुरुष की स्तुति की है और प्रविद्वान् शक्र, इन्द्र ने भी जिसकी स्तुति की है उस परब्रह्म विष्णु को जानकर ही अमृतत्व मिलता है । जहाँ “इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते” (ऋ० सं० ६।४७।१८) आदि स्थलों में इन्द्र शब्द का परमेश्वर ही अर्थ है । वहाँ तो इन्द्र और विष्णु, दोनों एक ही तत्त्व हैं । अतः वहाँ एक के उत्कर्ष और दूसरे के अपकर्ष का प्रश्न ही असम्भव हो जाता है । बुल्के कहते हैं, “राम की विजय इन्द्र की सहायता से होती है । यह भी इन्द्र की श्रेष्ठता को सूचित करता है ।” किन्तु वस्तुस्थिति की सर्वथा उपेक्षा कर ही वे ऐसा कह पाते हैं । उपेन्द्र की सहायता से इन्द्र इन्द्रासन पर रह पाते हैं। इस दृष्टि से उपेन्द्र ही इन्द्र की तुलना में श्रेष्ठ सिद्ध होते हैं, अतः इन्द्र उपेन्द्र से श्रेष्ठ हैं, ऐसा बुल्के का उपर्युक्त कथन सुतरां बाधित हो जाता है। यथार्थतः इन्द्रादि देवताओं के हितार्थ ही राम ने रावण का वध किया; अतः राम की सहायता करना इन्द्र का कर्तव्य ही था । यह सहायता भी वैसी ही थी जैसी की वानर और भालुओं द्वारा की गयी सहायता । क्या इससे यह तात्पर्य लिया जाय कि वानर और भालू राम से श्रेष्ठ थे ? बुल्के लिखते हैं,१ “इन्द्र शरभङ्ग से बातचीत करते हुए और राम को आते देखकर साथ के देवताओं से कहते हैं—राम इधर आ रहे हैं । उनके यहाँ आने के पूर्व ही हम लोग यहाँ से चले जायें, क्योंकि राम मुझको देखने योग्य नहीं हैं । जब राम रावण पर विजय प्राप्त करेंगे तब उनकी मुझसे भेंट होगी ( वा० रा० ३।५।२२ ) । इस वृत्तान्त से जो ध्वनि निकलती है वह विष्णु नारायण अक्षर ब्रह्म के अवतार राम ( वा० रा० ३।११।७) से कितनी दूर हैं ।” किन्तु इन्द्र के वाक्यों का यथार्थ अर्थ न समझ कर ही बुल्के वैसा कहते हैं गौ० पाठ के अनुसार— “यास्याम्यहमयं रामो यावन्मां नाभिभाषते । कृतार्थमेनमचिराद् द्रष्टास्म्यहमरिन्दम् ॥” हम लोग राम के भाषण से पहले चले जायें, शीघ्र कृतार्थ होनेपर राम को देखेंगे । दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार— “यतः समभिगच्छन्तं प्रेक्ष्य रामं शचीपतिः । शरभङ्गमनुज्ञाप्य विबुधानिदमब्रवीत् ॥ १. रामकथा, पृ० १३७ ।

२२० रामायणमीमांसा षष्ठ इहोपयात्यसौ रामो यावन्मां नाभिभाषते। निष्ठां नयत तावत्तु ततो मा द्रष्टुमर्हति ॥ जितवन्तं कृतार्थं हि तदाहमचिरादिमम्। कर्म ह्यानेन कर्तव्यं महदन्यैः सुदुष्करम् ॥ ( वा० रा० ३।५।२१-२३ ) उपर्युक्त श्लोकों का शुद्ध अर्थ है : शरभङ्ग मुनि के आश्रम में आते हुए रामको देखकर इन्द्र ने शरभङ्ग से जाने की अनुमति लेकर देवताओं से कहा कि राम इधर आ रहे हैं। वे मुझसे भाषण करें उसके पूर्व ही हम लोग अदृश्य हो जायें, क्योंकि विपद्मयी अवस्था में होने के कारण राम का मुझे देखना योग्य नहीं है। नागेशभट्ट कहते हैं कि—"विपदीव स्थितेन वैभवस्थदर्शनम् अनुचितम्” विपद्ग्रस्त के लिए वैभव में स्थित का दर्शन उचित नहीं है। इससे यह नहीं सिद्ध होता कि राम में इन्द्र के दर्शन की योग्यता नहीं है। उनमें कुछ कमी है। हाँ यह प्रश्न हो सकता है कि राम इन्द्र के दर्शन के योग्य क्यों नहीं हैं ? इन्द्र जिन शरभङ्ग को लेने के लिए उनके आश्रम में गये थे वे शरभङ्ग राम से कहते हैं—राम, शचीपति इन्द्र मुझे अकृतात्माओं के दुष्प्राप्य उग्र तप से विजित ब्रह्मलोक ले जाना चाहते हैं, परन्तु नर-व्याघ्र तुम्हें समीप में आया जानकर बिना प्रिय अतिथि तुमको देखे मैं ब्रह्मलोक नहीं जाऊँगा— “अहं ज्ञात्वा नरव्याघ्र वर्तमानमदूरतः । ब्रह्मलोकं न गच्छामि त्वामदृष्ट्वा प्रियातिथिम् ।।” ( वा० रा० ३।५।२९ ) इसके अतिरिक्त यदि राम इन्द्र के द्वारा देखे जाने योग्य नहीं थे तो रावण-वध के बाद वह योग्यता कैसे आ जाती ? बुल्के इस प्रश्न का क्या उत्तर देंगे ? इन्द्र स्वयं ही कह रहे हैं कि इनको अति दुष्कर कर्म करना है, अतः विजयी तथा कृतकार्य होने पर ही मैं इनका दर्शन करूँगा। सम्बद्ध श्लोक में “जितवन्तं कृतार्थं" अधूरा वाक्य है, अतः 'द्रक्ष्यामि' क्रिया का अध्याहार करना होगा । तथाच इस इन्द्रवाक्य का निष्कर्ष यह है कि अभी वनवास-दशा में नहीं किन्तु रावण पर विजय प्राप्त करने के अनन्तर पूर्ण वैभव दशा में मैं इनका दर्शन करूँगा । “सर्वथापि राम मुझे देखने योग्य नहीं हैं” बुल्के का यह अर्थ अशुद्ध है। “स मामनादाय वनं न त्वं प्रस्थितुमर्हसि ।” ( वा० रा० २।३०।१० ) जनकनन्दिनी सीता कह रही हैं, "मुझको बिना लिए आपको वन जाना उचित नहीं है।” उक्त वचन का यह तात्पर्य कदापि नहीं लिया जा सकता कि सीता को लिये बिना राम में वन जाने की योग्यता नहीं है। ऐसे स्थानों में औचित्यबोध ही 'अर्ह' धातु का अर्थ है; गन्तुं नार्हसि, वक्तुं नार्हसि, भोक्तुं नार्हसि इत्यादि प्रयोगों द्वारा किसी में गमन, वचन एवं भोजन की अयोग्यता का प्रतिपादन नहीं होता। 'अर्हति' क्रिया के आधार पर बुल्के ने राम में इन्द्र के दर्शन की योग्यता नहीं है, ऐसा अर्थ लगा कर अपनी ही कलुषित भावनाओं का परिचय दिया है, साथ ही साहित्य ज्ञान शून्यता का भी । शब्दकल्पद्रुम कोष के अनुसार “अर्हति योग्यो भवति, उपयुक्तो भवति, उचितो भवति ।” अर्थात् 'अर्हति' पद का प्रयोग योग्य, उपयुक्त और उचित, तीनों ही अर्थों में किया जाता है। 'उचित' अर्थ में प्रयुक्त 'अर्हति' शब्द का उदाहरण श्रीमद्भगवद्गीता में मिलता है— “तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् ।” ( भ० गी० १।३७ ) अपने बान्धव धार्तराष्ट्रों का हनन करना हम लोगों के लिए उचित नहीं है। यहाँ भी ऐसा अर्थ नहीं किया जाता कि हम लोगों में उन लोगों को मारने की योग्यता नहीं है । साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिये कि यदि इन्द्र राम से मिलते तो वे उनकी वैसी ही स्तुति करते जैसे युद्धकाण्ड में मिलने पर उन्होंने देवताओं के साथ स्तुति की थी। इस स्थिति में राम की विष्णुरूपता स्पष्ट हो जाने से रावण के वध में उसके द्वारा प्राप्त वरदान के कारण ही बाधा पड़ती, क्योंकि उसका वध नर से ही होना

था किसी देवता से नहीं। इस दृष्टि से रावणवध के अनन्तर ही सब देवता राम से मिले थे और उनकी स्तुति करते हुए उन्हें विष्णु या परब्रह्म कहा। 'सुन्दरकाण्ड' में हनुमान् ने स्पष्ट कहा है कि राम के सामने युद्ध में ब्रह्मा, रुद्र या इन्द्र कोई भी टिक नहीं सकता— “ब्रह्मा स्वयम्भूश्चतुराननो वा रुद्रस्त्रिनेत्रस्त्रिपुरान्तको वा । इन्द्रो महेन्द्रः सुरनायको वा स्थातुं न शक्ता युधि राघवस्य ॥” (वा० रा० ५।५१।४४) फिर भी इन्द्र को राम से श्रेष्ठ कह कर राम को इन्द्र के दर्शन के अयोग्य ठहराना बुल्के की धृष्टता और अज्ञान ही है । कृष्णयजुर्वेदीय तैत्तिरीयसंहिता द्वितीयाष्टक द्वादश अनुवाक में निम्नाङ्कित एक आख्यायिका है। त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप का इन्द्र ने वध किया था, अतः त्वष्टा ने इन्द्ररहित सोमयाग किया। उसमें इन्द्र का आह्वान नहीं किया गया। इन्द्र ने यज्ञ का विघात कर बलात् सोमपान कर लिया। त्वष्टा ने अवशिष्ट सोम से इन्द्र-वध के लिए आहवनीय अग्नि में होम किया। उस होम में "इन्द्रशत्रो विवर्धस्व" मन्त्र का उच्चारण किया गया। इस मन्त्र का अर्थ है इन्द्र का शातयिता (घातक) पुरुष उत्पन्न होकर वृद्धि को प्राप्त हो । परन्तु मन्त्र में स्वर की त्रुटि हो गयी । तत्पुरुषसमास के अनुसार घातक पुरुष की उत्पत्ति हो सकती थी और उसका द्योतक अन्तोदात्त स्वर होता है। त्वष्टा ने मन्त्र में अन्तोदात्त स्वर का प्रयोग न कर भूल से आद्युदात्त स्वर का प्रयोग किया जो बहुव्रीहिसमास का द्योतक हो गया। इस स्वरदोष के कारण मन्त्र का "इन्द्र जिसका शातयिता (घातक) है, वह इन्द्रशत्रु वृद्धि को प्राप्त हो" ऐसा अर्थ हो गया, फलतः होम से वृत्रासुर उत्पन्न हुआ और वृद्धि को भी प्राप्त हुआ, परन्तु वह इन्द्र का घातक न हो सका। इन्द्र ही उसके घातक हुए। वह वृत्र, धनुष द्वारा प्रक्षिप्त बाण जितनी दूर जाता है उतने परिमाण में, प्रतिदिन बढ़ने लगा। इस वृद्धि के द्वारा उसने सब लोकों को आवृत्त कर लिया । उसका नाम वृत्र हुआ। उसकी इस वृद्धि से ही इन्द्र को ही भाँति स्वयं त्वष्टा भी चिन्तित हुए, अतः वृत्र को मारने के लिए इन दोनों ने मैत्री कर ली। त्वष्टा ने मन्त्र से अभिमन्त्रित जल से वज्र को सिक्त किया । वह वज्र अभिमन्त्रित होने से तपोरूप हो गया। इन्द्र उसे उठाने में समर्थ नहीं हुए। तब इन्द्र ने विष्णु से सहायता के लिए प्रार्थना की । वृत्रासुर के वीर्य का स्मरण कर इन्द्र भयभीत हुए। इन्द्र ने विष्णु से कहा कि हम दोनों वृत्र के वीर्य का हरण करे। विष्णु ने अपनी तीन मूर्तियाँ बनाकर उन्हें लोकरक्षा के लिए स्थापित किया। पृथिवी में स्थापित तीसरे विष्णु-शरीर को आगे कर इन्द्र ने विष्णु के पीछे स्थित होकर वज्र उठाया। वृत्र भयभीत हुआ। उसने कहा मेरे शरीर को मत मारो। मेरे शरीर के वीर्य (शक्ति) में पृथ्वी भर में व्याप्त हो जाने की क्षमता है। वह सब मैं तुम्हें देता हूँ। इन्द्र ने उसको स्वीकार कर विष्णु से कहा आप मुझको धारण करें, यह कहते हुए उस वीर्य को विष्णु के लिए सादर प्रदान कर दिया । विष्णु ने भी इन्द्र के हितार्थ ही उस वीर्य को ग्रहण किया । पुनश्च विष्णु का जो दूसरा रूप अन्तरिक्ष में था उससे युक्त होकर इन्द्र ने वज्र उठाया; फिर, वृत्र ने कहा, "मुझ पर प्रहार मत करो, मुझमें जो वीर्य है उसे मैं तुम्हें देता हूँ" और उसने प्रदान किया; इन्द्र ने ग्रहण किया और पुनः विष्णु से कहा कि पहले के समान दूसरी बार भी मुझको धारण करो (सँभालो) और विष्णु को वह वीर्य दे दिया। विष्णु ने इन्द्र के हितार्थ ही पुनः उस वीर्य को भी स्वीकार किया । पुनश्च द्युलोक में जो विष्णु का तीसरा रूप था उससे युक्त होकर इन्द्र ने वज्र उठाया; पुनः वृत्र ने भयभीत होकर अपना वीर्य प्रदान करने को कहा। इन्द्र ने अङ्गीकार किया । इस बार वृत्र ने कहा, "हम दोनों सन्धि कर लें। इन्द्र, मैं तुममें प्रवेश करूँगा ।" इन्द्र ने कहा मुझमें प्रवेश कर तुम मुझको ही खा जाओगे । वृत्र ने

२२२ रामायणमीमांसा षष्ठ 'कहा नहीं, तुमको नहीं खाऊँगा। तुम्हारे उदर की अग्नि को उद्दीप्त करूँगा जो तुम्हारे लिए बहुविध अन्नभक्षण के लिए उपयोगी होगा। यह कह कर वृत्र इन्द्र में प्रविष्ट हो गया । यह सब इन्द्र के हवि का त्रिधा विभाग और इन्द्र- विष्णुमिलित देवतत्व की प्रशंसा है । तस्मादिन्द्रोऽबिभेदपि त्वष्टा तस्मै वज्रमसिञ्चत्तपो वै स वज्र आसीत्तमुद्यन्तुं नाशक्नोदथ वै तर्हि विष्णुः (२) अन्या देवतासीत् सोऽब्रवीद्विष्णवे होदमाहरिष्यावो येनायमिदमिति स विष्णुस्त्रेधात्मानं वि न्यधत्त । पृथिव्यां तृतीयमन्तरिक्षे तृतीयं दिवि तृतीयम् अभिपर्या वर्त्ताद्वयबिभेद यत् पृथिव्यां तृतीयमासीत्तेनेन्द्रो वज्रमुदयच्छत् विष्ण्वनुस्थितः सोऽब्रवीन्मा मे प्रहरास्ति वा इदम् (३) मयि वीर्यं तत्ते प्रदास्यामीति तदस्मै प्रायच्छत् तत्प्रत्यगृह्णादधा मेति तद्विष्णवेऽतिप्रायच्छत् तद् विष्णुः प्रत्यगृह्णाद- स्मास्विन्द्र इन्द्रियं दधात्विति । इस प्रघट्टक से स्पष्ट है कि विष्णु की सहायता से ही इन्द्र वज्र उठाने में समर्थ हुए; विष्णु ने ही वृत्रदत्त वीर्य (शक्ति) को भी धारण किया । अतः इन्द्र की अपेक्षा विष्णु की विशेष महत्ता स्वयं सिद्ध हो जाती है। वैदिक साहित्य में कहीं भी इन्द्र की अपेक्षा विष्णु को अपकृष्ट या विष्णु की अपेक्षा इन्द्र को उत्कृष्ट नहीं कहा गया है। वेद के अनेक मन्त्रों में विष्णु के स्वरूप को ही परमपद और सूरिवेद्य कहा गया है— “तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् ।” (ऋ० सं० १।२२।२०) सूरयः विद्वांस ऋत्विगादयः । विष्णोः । परमम् उत्कृष्टम् । तत्तत् शास्त्रप्रसिद्धम् । पदं स्वर्ग- स्थानम् । शास्त्रदृष्ट्या सदा । पश्यन्ति । दिवीव आकाशे यथा । आततं सर्वतः प्रसृतम् । चक्षुः । तद् यथा निरोधाभावेन विशदं पश्यति तद्वत् । विद्वान् लोग विष्णु के उत्कृष्ट शास्त्रप्रसिद्ध पद (स्वरूप) को शास्त्रदृष्टि से इस तरह सदा देखते हैं जैसे निरोध न रहने के कारण आकाश में सर्वतः प्रसृत चाक्षुष तेज विशदरूप से देखता है । तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते । विष्णोर्यत्परमं पदम् (ऋ० सं० १।२२।२१) । विष्णोः । यत् । परमं । पदं पूर्वोक्तमस्ति । तत् पदम् । विप्रासो मेधाविनः समन्धिते सम्यक् दीपयन्ति । कीदृशाः, विपन्यवः विशेषेण स्तुतिकर्तारः । विष्णु के पद को मेधावी लोग सम्यक् प्रकाशित करते हैं जो शब्द और अर्थ के सम्बन्ध में प्रमादरहित रहकर जागरूक रहते हैं । जागृवांसः शब्दार्थयोः प्रमादराहित्येन जागरूकाः । उपर्युक्त वचनों से विष्णु की परमेश्वरता प्रसिद्ध है । ✤

सप्तम अध्याय

रामकथा का प्रारम्भिक विकास

बुल्के लिखित रामकथा में १२९ वें अनु० में कहा गया है "वैदिक साहित्य में आख्यान, इतिहास तथा पुराण मिलते हैं। ये ब्राह्मणों के अर्थवाद के एक आवश्यक अङ्ग समझे जाते थे। प्राचीन काल से धार्मिक संस्कारों तथा यज्ञों के अवसर पर ऐतिहासिक तथा पौराणिक इन्हें सुनाते थे। (शत० ब्रा० १३।४।३ ) तथा अर्वाचीन वैदिक साहित्य (शा० गृ० सू० १।२२।११ ) में ये पाँचवें वेद कहे जाते हैं— 'अथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमम् ।" (छा० उ० ७।१।२ ) आख्यानों के गद्य के साथ जो पद्य दिया जाता था, उसे गाथा कहा गया है। प्रारम्भ से ही दानस्तुति- स्वरूप 'नाराशंसी' गाथाओं का उल्लेख मिलता है (ऋ० सं० १०।८५।६ ) और इनके विषय में कहा जाता है कि ये सब झूठी हैं 'गाथानृतं नाराशंसी' (का० सं० १४।५) । इस नाराशंसी गाथासाहित्य के रचयिता तथा रक्षक राजदरबारों में रहनेवाले सूत थे। इनके अतिरिक्त कुशीलव जनसाधारण में इन गीतों का प्रचार करते थे।"¹

वेद और वेदान्त के रहस्य के अनभिज्ञ प्राञ्चात्यों की उक्त कल्पना अशुद्ध एवं निराधार है। वैदिक साहित्य के आख्यान तथा इतिहासपुराण अपौरुषेय वेदरूप ही हैं। ऋक्, साम, यजुः तथा अथर्व के मन्त्रों, ब्राह्मणों, आरण्यकों एवं उपनिषदों में आनेवाले आख्यान या पुराण-इतिहास सब अनादि अपौरुषेय ही हैं। वे ब्राह्मणों के नहीं किन्तु विधियों के अर्थवादरूप होते हैं; विधि-अर्थवाद स्वयं भी ब्राह्मण के अन्तर्गत हैं; इन वैदिक आख्यानों को वैदिक ही सुनाते थे, पौराणिक या ऐतिहासिक नहीं। मन्त्रों तथा ब्राह्मणों में आनेवाले आख्यान तथा इतिहास-पुराण तो वेद ही हैं, पञ्चम वेद नहीं। पञ्चम वेद तो पौरुषेय महाभारत, रामायण, इतिहास तथा पद्मपुराण, नारदीयपुराण आदि आर्ष इतिहास-पुराण ही हैं।

आख्यानों के गद्य के साथ जो पद्य दिया जाता है; उसे गाथा बौद्धों के यहाँ ही कहा जाता है। वेदों तथा पुराणों में तो पद्यों के साथ भी पद्यरूप गाथाएँ मिलती हैं। नाराशंसी गाथा वेदरूप ही हैं। मनुष्यों के स्तुतिवाले मन्त्र ही नाराशंसी कहे जाते हैं। मनुष्यों तथा उनके दान आदि के स्तुतिरूप मन्त्र नाराशंसी होते हैं। नरों की आशंसा (प्रशंसा) ही नाराशंसी है। ये सब सुखावबोधार्थ कल्पित आख्यायिका रूप होते हैं। इसी लिए स्वार्थ में अनृत कहे जाते हैं अर्थात् वस्तुतः किसी नर के वर्णन में उनका तात्पर्य नहीं होता है। सम्पूर्ण वेदों का धर्म या ब्रह्म ही मुख्य अर्थ है। परमार्थ वस्तु ब्रह्म ही सब वेदों का अर्थ है— "सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ।" "वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः ॥" इत्यादि श्रुति और स्मृति इसमें प्रमाण हैं जब कि बुल्के के कथन में कुछ भी प्रमाण नहीं है। गाथा नाराशंसी भी मन्त्र, ब्राह्मणादिरूप होते हैं। वे भी अपौरुषेय होते हैं। उनका रचयिता कोई नहीं होता। राजदरबारों के सूत आदि को तो इनके पठन का भी अधिकार नहीं है। मुख्य पुराणप्रवक्ता उग्रश्रवा सूत तथा उनके पुत्र सौति भी आर्ष इतिहास-पुराण के ही प्रवचन में अधिकृत थे। इसी लिए श्रीमद्भागवत में कहा है—


१. एम्. विंटरनित्सः हि० इं० लि० भाग १, पृष्ठ ३१४।

२२४ रामायणमीमांसा सप्तम “स्नातमन्यत्र छान्दसात् ।” अर्थात् सूत छन्दोविषय से अन्यत्र पुराणेतिहास में ही निष्णात थे, छन्द (वेद) में नहीं। यद्यपि वे मुख्य सूत जाति नहीं थे, किन्तु राजा पृथु के यज्ञ में ऐन्द्रबार्हस्पत्य हवि के विपर्यास से अग्निकुण्ड से उद्भूत हुए थे, अतः ऋषियों ने उन्हें इतिहास-पुराण का प्रवक्ता बनाया था। इसी लिए कौटिल्य ने दो प्रकार के सूतों का निर्देश किया है। कुशीलव भी लौकिक गाथाओं का ही प्रचार कर सकते थे, वैदिक गाथाओं का नहीं; क्योंकि वेदों में त्रैवर्णिक संस्कृत द्विज जाति का ही अधिकार है, अन्य का नहीं। यह पूर्वोत्तरमीमांसा अपशूद्राधिकरण में प्रसिद्ध है। “रैभ्यासीदनुदेयी नाराशंसी न्योचनी । सूर्याया भद्रमिद्वासो गाथयैति परिष्कृतम् ॥” (ऋ० सं० १०।८५।६) “सूर्या सावित्री ब्रूते रैभी रैभ्यः काश्चनर्चः ।” (रैभीः शंसति ऐ० ब्रा० ६।३२) रैभी अनुदेयी दीयमानवधूविनोदनायानुदीयमाना वयस्या आसीत् । तथा नाराशंसी मनुष्याणां स्तुतिः । न्योचनी वधूशुश्रूषार्थं दीयमाना दासी । सूर्याया मम भद्रं वासः विचित्रं दुकूलादिकं गाथया परिष्कृतम् अलङ्कृतम् । एति । उक्त मन्त्र में स्तुति की दृष्टि से कहा गया है कि सूर्या सावित्री के विवाह में रैभी संज्ञक ऋचाएँ सूर्या को वयस्या (सखी) के रूप में, नाराशंसी ऋचाएँ न्योचनी (दासी) के रूप में और गाथा उसके वस्त्र तथा अलङ्कार के रूप में दी गयी थीं। इससे स्पष्ट है कि यहाँ नाराशंसीया गाथा वेद-मन्त्र ही हैं। इनमें सूत आदि का अधिकार नहीं है। रामायण के 'कुशीलवौ' तो कुश और लव राम के पुत्र क्षत्रिय थे। वे 'कुशीलव' नृत्य-गीतोपजीवी जाति के नहीं थे। इसी लिए रामायण में 'कुशीलवः' या 'कुशीलवाः' जैसा प्रयोग कहीं नहीं मिलता; जो 'कुशीलवौ' प्रयोग मिलता है वह द्विवचनान्त ही है। अतः यह शब्द कुश और लव के अर्थ में ही प्रयुक्त हुआ है। गाथाएँ वैदिक, पौराणिक आदि अनेक प्रकार की होती हैं। लौकिक गाथाओं को सूत आदि भी गा सकते थे । अथ सायं धृतिषु हूयमानासु राजन्यो वीणागाथी दक्षिणत उत्तरमन्द्रामुदाघ्नंस्तिस्रः स्वयं संभृता गाथा गायतीत्ययुध्यतेत्यमुं संग्राममजयदिति तस्योक्तं ब्राह्मणम् ।” (श० ब्रा० १३।४।३।५) उक्त ब्राह्मण में कहा गया है कि वीणागाथी स्वयं रचित गाथा गाता है। इस राजन्य ने अमुक संग्राम जीता है। “अथाह वीणागाथिनो राजानं सङ्गायतेति ।” (शा० गृ० सू० १।२२।११) यजमान वीणागाथियों से कहता है सोमराजा की गान द्वारा स्तुति करो । “यस्यैवंविदेतद्धोता पारिप्लवमाख्यानमाचष्टे ।” (श० ब्रा० १३।४।३।१५) उक्त ब्राह्मण से प्रतीत होता है कि होता ही पारिप्लव आख्यान का वर्णन करता है। अश्वमेधादि यज्ञों में यज्ञ के विश्रामकाल में जो प्राचीन कथाएँ कही जाती हैं उन्हीं को पारिप्लव आख्यान कहा जाता है। सांग्रामिक रथ एवं अश्वों के अलङ्कारों की रक्षा का उत्तरदायित्व सूतों पर होना चाहिये । सूत और मागधों द्वारा गाने योग्य अन्य गाथाएँ होती हैं। सूतमागधाः शूराणां स्वर्गमस्वर्गं भीरूणां जातिसङ्घकुलकर्मवृत्तस्तवं च योधानां वर्णयेयुः । सूत और मागधों को चाहिये कि शूरों के लिए स्वर्ग और भीरुओं के लिए नरक प्राप्ति का गान एवं योद्धाओं के जाति, सङ्घ और कुल के कर्म तथा वृत्तान्त की स्तुति करें।

बृहदारण्यक-भाष्य में आद्य शङ्कराचार्य ने मन्त्रगत उर्वशी-पुरूरवा की कथा को ही इतिहास कहा है । "असद्वा इदमग्र आसीत्" इत्यादि ब्राह्मणों को पुराण, देवयजन-विद्या को ही विद्या, "प्रियमित्येतदुपासीत" इत्यादि ब्राह्मण को ही उपनिषद्, ब्राह्मण-प्रभव मन्त्रों को ही श्लोक, "आत्मैत्येवोपासीत" इत्यादि संग्रह वाक्यों को सूत्र, मन्त्र-विवरण को अनुव्याख्यान एवं अर्थवादों को व्याख्यान कहा है (बृ० उ० २।४।१०) । ऋग्वेद संहिता ( १०।८५।६ ) इतिहासपुराणम् ( ६।७।१२ ) गाथानृतं नाराशंसी ( का० सं० १४।५ ) गाथा अप्यत्र गायन्ति ( ह० पु० १।४१।४९ ) उपर्युक्त उद्धरणों के अनुसार गाथाएँ वैदिक तथा लौकिक भी होती हैं। विभिन्न विषयों में सिद्धान्तभूत प्रसिद्ध संग्राहक पद्य ही गाथा है । गाथासप्तशती प्राकृत भाषा का ग्रन्थ है। उसमें गाथाओं का ही उल्लेख है। “तवाभिगमनार्थं तु सर्वतो ब्राह्मणा गताः । वाक्यानि मम गाथाभिर्गायमाना दिशो दश ॥" (म० भा० ३।७६।२७) महाराज नल के द्वारा ऐसी आशङ्का अभिव्यक्त करने पर कि प्यार करनेवाले पत्नीव्रत पति को छोड़कर कोई पत्नी कभी दूसरे पति का वरण कर सकती है क्या, जैसा कि तुम करने जा रही हो ? दमयन्ती ने अपनी सफाई देते हुए नल से यह बात कही है कि महाराज, आपका पता लगाने के लिए ही चारों ओर ब्राह्मण यहाँ से भेजे गये हैं और उन लोगों ने मेरा अभिप्राय गाथारूप में गाते हुए सर्वत्र फैलाया है। "अत्राप्युदाहरन्तोमा गाथा देवैरुदाहृताः । मुनिरासीत्पुरा पुत्र बालधिर्नाम वीर्यवान् ।। लालप्यमानं तं दृष्ट्वा मुनयः परमार्तवत् । ऊचुर्वेदविदः सर्वे गाथां यां तां निबोध मे ।। न दिष्टमर्थमप्येतुमीशो मर्त्यः कथञ्चन । महिषेर्भेदयामास धनुषाक्षो महीधरान् ।।" (म० भा० ३।१३५।४५,५४,५५) दो मित्र थे रैभ्य और भरद्वाज । दोनों में बड़ा घनिष्ठ प्रेम था । रैभ्य के दो पुत्र थे तथा भरद्वाज को एक ही लड़का था यवक्रीत । रैभ्य दोनों पुत्रों सहित बहुत विद्वान् थे, इसलिये उनकी बहुत प्रशंसा थी । भरद्वाज केवलमात्र तपस्वी थे, अतः उनकी उतनी अधिक प्रशंसा ( प्रतिष्ठा ) नहीं थी । अपने पिता की ऐसी स्थिति देखकर यवक्रीत मन में जलने लगे और बिना पढ़े ही वेद-विद्या की प्राप्ति के लिए तप करने लगे । यवक्रीत का तप जब बहुत बढ़ा तब उनकी तपोवृद्धि से इन्द्र को सन्ताप हुआ। उन्होंने यवक्रीत के पास जाकर पूछा- "आप इतना कठोर तप किसलिये कर रहे हैं ?" यवक्रीत ने कहा, "बिना पढ़े ही वेदों की प्राप्ति और उनके रहस्य-ज्ञान के लिए तप कर रहा हूँ। मैं अपने तपोबल से सब कुछ जानना चाहता हूँ।" इन्द्र ने कहा, "ब्रह्मर्षे ! वेद-प्राप्ति के लिए आपका यह मार्ग ठीक नहीं है। इस मार्ग से आपके विनाश का खतरा है। आपको गुरुमुख से पढ़कर ही वेद प्राप्त करने चाहिए।" यह सुनकर भी यवक्रीत अपने निश्चय पर अडिग रहे। अन्त में इन्द्र ने वरदान दे दिया कि तुम्हें और तुम्हारे पिता भरद्वाज दोनों को ही बिना गुरुमुख से अध्ययन किये ही वेदज्ञान हो जायेगा। यवक्रीत ने वहाँ से अपने पिता के पास आकर यह समाचार सुनाया और कहा कि अब हम पिता और पुत्र दोनों के समान कोई विद्वान् न होगा । भरद्वाज ने उत्तर दिया कि पुत्र, तुमने ऐसा वरदान लेकर अच्छा नहीं किया, क्योकि ऐसा वेदज्ञान प्राप्त कर तुम अभिमानी हो जाओगे और विद्वानों का अपमान करोगे । फलतः तुम्हारा विनाश हो जायगा। देखो इस

२२६ रामायणमीमांसा सप्तम विषय में देवताओं द्वारा उदाहृत एक गाथा प्रसिद्ध है। प्राचीन काल में बालधि नामक बड़े तपस्वी हो चुके हैं। उनके लड़के हो होकर मर जाते थे। पुत्रशोक से घबराकर उन्होंने अत्यन्त दुष्कर तप किया। देवताओं की कृपा हुई। उन्होंने वरदान मांगा कि मेरा लड़का अमर्त्य (अमरणशील) हो। किन्तु देवताओं ने कहा कि मर्त्य अमरण- शील नहीं हो सकता। कुछ आयु का निमित्त स्वीकार करो। बालधि ने कहा कि ये पहाड़ कितने समय से ऐसे ही पड़े हुए हैं। जब यह नष्ट हो तब हमारे लड़के की आयु समाप्त हो। देवताओं ने इसे मान लिया। बालधि को लड़का हुआ। वह बहुत ही मेधावी और दूसरे का उत्कर्ष देखकर जलनेवाला था। बड़ा होने पर ऋषियों, महात्माओं सज्जनों और प्रतिष्ठितों का पद पद पर अपमान करने लगा। एक समय धनुषाक्ष नामक महाविद्वान् से उसकी मुठभेड़ हो गयी। अपनी प्रतिभा के बल पर उसने धनुषाक्ष को पराजित कर बहुत ही अपमानित किया। धनुषाक्ष ने उसे शाप दिया कि तुम भस्म हो जाओ। किन्तु उसका बाल भी बाँका नहीं हुआ। फिर धनुषाक्ष ने भैंसों को पाला और भैंसों से पहाड़ तुड़वा दिया। पहाड़ टूटते ही मेधावी पुत्र मर गया। बालधि बहुत रोने कलपने लगे। उन्हें इस तरह रोते-कलपते देखकर वेदवादियों ने जो गाथा कही वह सुना रहा हूँ। मनुष्य भाग्य द्वारा प्राप्त सुख या दुःख का उल्लङ्घन नहीं कर सकता। धनुषाक्ष ने महिषों (भैंसों) से पहाड़ तुड़वाकर बालधि के पुत्र को नष्ट कर दिया। तपस्वी लोग तप द्वारा देवताओं की कृपा से वरदान प्राप्त कर घमण्ड में आकर नष्ट हो जाते हैं। हे पुत्र यवक्रीत, तुम इससे बचना और रैभ्य तथा उनके पुत्रों से कभी सामना न हो, ऐसा प्रयत्न करना। "अत्राप्युदाहरन्तीमा गाथा नित्यं क्षमावताम् । गीताः क्षमावतां कृष्णे काश्यपेन महात्मना ॥" (महा० ३।२९।३५) द्रौपदी ने महाराज युधिष्ठिर से कहा था—बलि ने अपने पितामह प्रह्लादजी से पूछा कि क्षमा ठीक है या तेज, आप बतायें। प्रह्लादजी ने उत्तर दिया "न तो बराबर क्षमा ही ठीक होती है और न बराबर तेज हो। समय देख क्षमा अपनानी चाहिए और समय देखकर तेज।" सो आप इस समय दुर्योधन पर क्रोध कर युद्ध द्वारा उसे नष्ट कीजिए। महाराज युधिष्ठिर ने उत्तर दिया-हे कृष्णे, महात्मा काश्यप ने क्षमाशील लोगों में बैठकर क्षमा की प्रशंसा की है। इसके बाद ११ श्लोकों में क्षमा की प्रशंसा है। "अध्यत्र संश्रयार्थाय प्रजापतिरथो जगौ । पुष्करेषु कुरुश्रेष्ठ गाथां सुकृतिनां वर ॥ मनसाऽप्यभिकामस्य पुष्कराणि मनस्विनः । विप्रणश्यन्ति पापानि नाकपृष्ठे च मोदते ॥" महाराज युधिष्ठिर के पुरोहित धौम्य उनसे कहते हैं—हे कुरुश्रेष्ठ, पुष्कर तीर्थ के विषय में प्रजापति ने एक गाथा गायी है। पुष्कर तीर्थ में जाने की इच्छामात्र होने पर पाप दूर होते हैं और प्राणी स्वर्ग जाकर प्रसन्न होता है। "गाथामप्यत्र गायन्ति ये पुराणविदो जनाः । भीष्म यां तां च ते सम्यक् कथयिष्यामि भारत ॥ अन्तरात्मन्यभिहते रोषि पत्ररथाशुचि । अण्डभक्षणकर्मैतत् तव वाचमतीत्यते ॥" (म० भा० २।४१।३९, ४०) शिशुपाल ने भीष्म से कहा कि समुद्र के किनारे एक बूढ़ा हंस रहता था। वह सभी पक्षियों को उपदेश देता था कि धर्माचरण करना चाहिये। तथा उन पक्षियों की नजर बचाकर उनके अण्डे खा जाया करता था। पुराणविद लोग उस विषय में हे भीष्म, एक गाथा कहते हैं, सुनो। दुनियाँ में लोग परोपदेश में ही कुशल होते हैं;

किन्तु अपने व्यवहार में उसे नहीं लाते। इस बात को यह गाथा बताती है—हे हंस, तुम्हारे मन में काम, क्रोध आदि डेरा जमाये हैं और तुम धर्म का उपदेश कर रहे हो। कहाँ तुम्हारा नजर बचाकर अण्डों को खा जाना इतना अपवित्र कर्म और कहाँ यह धर्मोपदेश ! “अत्र पिङ्गलाया गीता गाथाः श्रूयन्ति पार्थिव । यथा सा कृच्छ्रकालेऽपि लेभे धर्मं सनातनम् ॥” ( म० भा० २।१७४।४६ ) कोई प्रेमी पिङ्गला वेश्या को सङ्केत देकर उसके पास नहीं पहुँचा। वह बहुत आतुरता से उसकी प्रतीक्षा करती रही। जब बहुत ही निराश हुई तो उसी दुःख के समय में उसे नित्य प्रसिद्ध योग ( आत्मज्ञान ) की प्राप्ति हो गयी। इस नैराश्य के विषय में पिङ्गला द्वारा गायी गाथा अब भी सुनी जाती है। “गाथाश्चाप्यब्रवीद् विद्वान् गौतमो मुनिसत्तमः । चिरकारिषु धीरेषु गुणोद्देशसमाश्रयाः ॥ चिरेण मित्रं बध्नीयात् चिरेण च कृतं त्यजेत् । चिरेण हि कृतं मित्रं चिरं धारणमर्हति ॥” (म० भा० १२।२६६।६८,६९) महाविद्वान् मुनिश्रेष्ठ गौतम ने चिरकारियों के गुण और कर्तव्य के विषय में गाथाएँ कही हैं। किसी को मित्रं बनाना हो तो जल्दी नहीं करनी चाहिये। मित्र बना लेने पर किसी कारण वश मित्र का परित्याग करना पड़े तो उसमें भी जल्दीबाजी नहीं करनी चाहिये। जिसके साथ मित्रता जोड़ने में विलम्ब होता है उससे जल्दी मित्रता टूटती भी नहीं। उक्त उद्धरणों में अनेक प्रकार की गाथाओं का उल्लेख है। सिद्धान्तभूत गाथाएँ अनृत नहीं हैं। वेदों में वास्तविक इतिहास या घटनोल्लेख मानने से वेद की अपौरुषेयता का भङ्ग होता है, अतः वहाँ की घटनासम्बन्धी गाथाएँ गुणवाद अर्थवादमात्र हैं। जो सुखावबोधार्था आख्यायिका हैं, उनका तात्पर्य ही सत्य होता है। उनका वाच्यार्थ अनृत है, यही ‘गाथानृतम्’ कहने का अभिप्राय है। अश्वमेधादि यज्ञों में पुत्रादि-परिवृत राजा को नाना प्रकार के आख्यान सुनाने का विधान है। पर वहाँ भी नियम है। प्रथमेऽह्नि मनुर्वैवस्वतो राजेत्याह; द्वितीयेऽह्नि यमो वैवस्वतो राजेत्याह; तृतीयेऽह्नि वरुण आदित्यो राजेत्याह आदि वाक्यों से नियत वैदिक आख्यायिकाओं का ही श्रवण कराया जाता है ( श० ब्रा० १३।४।३ का ब्र० सू० कल्पतरु ३।४।२३ में उद्धृत वचन ) । वेद का अध्यापन, श्रावण आदि वैदिक ब्राह्मण ही करा सकता है, सूत आदि नहीं। सूत, मागध, बन्दी आदि तो प्रसिद्ध लौकिक गाथाओं की सुनाते हैं । बुल्के १३०वें अनु० में लिखते हैं, “वाल्मीकि के पूर्व रामकथासम्बन्धी गाथाएँ प्रचलित हो चुकी थीं। इसका प्रमाण हमें बौद्ध त्रिपिटक में मिलता है। एक ओर रामकथासम्बन्धी गाथाएँ रामायण पर निर्भर नहीं हो सकती हैं और दूसरी ओर बौद्ध गाथाओं में जो रामकथासम्बन्धी सामग्री मिलती है वह रामायण के आधार के लिए पर्याप्त नहीं है। अतः रामायण तथा रामकथाविषयक बौद्ध गाथाएँ दोनों प्राचीन रामकथासम्बन्धी आख्यान काव्य पर निर्भर हैं। दशरथजातक की वर्तमान कथा में जो पोराण पण्डिताः शब्द आया है, इससे भी इस निर्णय की पुष्टि होती है। इसके अतिरिक्त हरिवंश के एक श्लोक में रामकथा के अत्यन्त संक्षिप्त वर्णन के पश्चात् इस प्रकार लिखा है— “गाथा अप्यत्र गायन्ति ये पुराणविदो जनाः । रामे निबद्धतत्त्वार्था माहात्म्यं तस्य धीमतः ॥” ( ह० पु० १।४१।१३९ )

२२८ रामायणमीमांसा सप्तम इसमें अवश्य रामायण की ओर निर्देश देखा जा सकता । फिर भी इसमें रामायण के पूर्व की प्राचीन गाथाओं का निर्देश देखना अधिक स्वाभाविक प्रतीत होता है ।"१ बुल्के का उक्त कथन रामायण के विरुद्ध है । रामायण में 'बालकाण्ड' में कहा गया है। वाल्मीकि ने नारद से मूलरामायण का श्रवण किया; तत्पश्चात् ब्रह्माजी के आदेशानुसार समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा राम, लक्ष्मण, सीता आदि के सभी वृत्तान्तों का तत्त्वतः प्रत्यक्ष साक्षात्कार कर रामायण में उनका उल्लेख किया । सम्भव है कि उस समय भी रामकथा-सम्बन्धी कुछ आख्यान प्रचलित रहे हों; परन्तु वे भी आधुनिक उपाख्यानों की तरह प्रामाणिक मान्य नहीं हो सकते । अतः वे प्रामाणिक आर्ष इतिहासरूप रामायण के आधार नहीं हो सकते । रामकथासम्बन्धी गाथाओं के आधार रामायण एवं प्रचलित उपाख्यान हो सकते हैं; बौद्ध गाथाएँ तो रामायण की अपेक्षा अत्यन्त अर्वाचीन हैं, अतः वे रामायण की आधार हों यह प्रश्न ही नहीं उठता । वाल्मीकि राम के समकालिक थे यह प्रतिपादित किया जा चुका है । हरिवंशपुराण की गाथाओं का सम्बन्ध इतिहास-पुराणप्रसिद्ध गाथाओं से ही है, क्योंकि रामायण एवं पुराणों में रामसम्बन्धित अगणित गाथाएँ प्रसिद्ध हैं । उनको छोड़कर जिनका कोई प्रामाणिक रूप उपलब्ध नहीं उन उपाख्यानरूप गाथाओं का ग्रहण करना उचित नहीं है । 'पुराणविद' शब्द से भी उन गाथाओं का पुराण से ही सम्बन्ध नहीं मानना चाहिये । इसके अतिरिक्त जब बुल्के की दृष्टि में हरिवंशपुराण आदि का प्रामाण्य स्वीकृत ही नहीं, तब उनके आधारपर किसी निर्णय तक कैसे पहुँचा जा सकता है ? और वह कहाँ तक मान्य हो सकता है ? यदि ऐसा निर्णय मान्य हो तब तो बुल्के को हरिवंशपुराण के उल्लेखानुसार ही राम का विष्णु का अवतार होना निःसन्देह मान्य होना चाहिये । हरिवंशपुराण के ४१वें अध्याय में विष्णु के अवतार का उपक्रम है— “हन्त विष्णोः प्रवृत्तिं च शृणु दिव्यां मयेरिताम् ।” वहाँ विष्णु के विविध प्रभावों का वर्णन करते हुए अनेक अवतारों का वर्णन किया गया है । तदनन्तर परशुराम के अवतार का वर्णन है— “एष विष्णोः सुरेशस्य शाश्वतस्याव्ययस्य च । जामदग्न्य इति ख्यातः प्रादुर्भावो महात्मनः ॥” इसके अनन्तर विष्णु के ही रामावतार का वर्णन है— “राज्ञो दशरथस्याथ पुत्रः पद्मायतेक्षणः । कृत्वात्मानं महाबाहुश्चतुर्धा हरिरीश्वरः ॥” प्रभु ईश्वर अपने को चतुर्धा विभक्त कर राजा दशरथ के यहाँ प्रकट हुए । इस अध्याय की सम्पूर्ण कथा वाल्मीकिरामायण से ही मिलती-जुलती है । इसमें सीता को लक्ष्मी कहा गया है— “रूपिणी यस्य पार्श्वस्था सीतेति प्रथिता जनैः । पूर्वोचिता तस्य लक्ष्मीर्भर्तारमनुगच्छति ॥” क्या बुल्के उक्त श्लोकों को प्रमाण मानने का साहस करेंगे ? वस्तुतः वे किसी भी पक्ष पर टिक नहीं सकते । आर्ष ग्रन्थों में किसी को भी देखा जाय सभी में राम को विष्णुरूप अवश्य माना गया है । १. रामकथा, पृष्ठ १३८, १३९ ।

अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २२९ १३२वें अनु० में वे लिखते हैं, "इस रामसम्बन्धी गाथासाहित्य की उत्पत्ति इक्ष्वाकुवंश में हुई थी । रामायण में लिखा है— "इक्ष्वाकूणामिदं तेषां राज्ञां वंशे महात्मनाम् । महदुत्पन्नमाख्यानं रामायणमिति श्रुतम् ॥” (वा० रा० १।५।३ ) उनका यह कथन भी अशुद्ध है, क्योंकि इस श्लोक में रामकथासम्बन्धी अन्य आख्यानों की चर्चा नहीं है । इसमें तो रामायणरूप महदाख्यान की उत्पत्ति इक्ष्वाकुवंशीय महात्मा राजाओं के वंश में हुई थी यही कहा गया है, अतः इस वाक्य में इक्ष्वाकुवंश के सूतों ने इनके विषय में गाथाएँ तथा आख्यान सुनाये होंगे, बुल्के की इस अटकल के लिए कोई अवकाश ही नहीं है । वहीं, पृष्ठ १३९ की टिप्पणी में, वे लिखते हैं, "ध्यान देने योग्य है कि वाल्मीकि का आदिरामायण सूतों की सम्पत्ति न बनकर काव्योपजीवी कुशीलवों द्वारा पहले जनता में लोकप्रियता प्राप्त करने लगा और बाद में दरबारों में प्रवेश कर सका; ऐसा ही बालकाण्ड के चतुर्थ सर्ग से प्रतीत होता है ।" बुल्के स्वयं ही बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड दोनों को ही प्रक्षिप्त मानते हैं, अतः ईमानदारी की बात यह है कि उपर्युक्त काण्डों के किसी भी अंश या सन्दर्भ को अपने कथन के प्रमाण रूप में उल्लेख करने का उनको अधिकार ही नहीं है। यदि वे उन काण्डों को प्रामाणिक स्वीकार कर लेते हैं तो उन्हें उन काण्डों के ही अनुसार यह भी मानना होगा कि 'रामायण' के कुशीलव बुल्के के तथाकथित काव्योपजीवी न होकर सीता के पुत्र कुश और लव थे और समास के अनुसार कुशीलव कहे गये । यह पीछे स्पष्ट किया जा चुका है। बुल्के यह भी कहते हैं कि "महाभारत द्रोणपर्व और शान्तिपर्व में जो संक्षिप्त रामचरित्र मिलता है, वह इस प्राचीन आख्यानकाव्य पर निर्भर प्रतीत होता है ।१" बुल्के का यह कथन भी असङ्गत है—जब कि महाभारत से बहुत पहले का विस्तृत आर्ष वाल्मीकिरामायण उपस्थित है तब उसको भुलाकर अपूर्व, अनुपलब्ध तथा अप्रामाणिक आख्यानों को उनका आधार मानना तर्कविरुद्ध ही है । महाभारत निर्माणकाल में रामायण का सर्वत्र प्रसार था, साथ ही अन्य रामसम्बन्धी उपाख्यानों का भी सर्वत्र प्रसार रहा है । ऐसा मानने में सिद्धान्त में कोई हानि नहीं होती, परन्तु विस्तृत वैदिक साहित्य में रामसम्बन्धी गाथाओं का कहीं उल्लेख नहीं है, यह कहना निष्प्रमाण है। पिछले प्रकरणों में इसका विस्तार से खण्डन किया जा चुका है। बुल्के लिखते हैं, "अतः वैदिककाल के बाद और चौथी शती ई० पूर्व के पहले सम्भवतः छठी शती में इस रामकथासम्बन्धी आख्यान काव्य की उत्पत्ति हुई थी ।'२ उनके इस कथन में भी कोई प्रमाण नहीं । रामायण के अनुसार रामकाल में ही रामायण का निर्माण हुआ, परन्तु पुराणों के अनुसार तो राम के अवतार के पूर्व ही रामायण का निर्माण अतीत, अनागत तथा वर्तमान के द्रष्टा महर्षियों ने कर रखा था। वर्तमान वाल्मीकिरामायण तो शतकोटि- प्रविस्तर रामायण का सारमात्र है । 'चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।" ( रा० माहात्म्य ) १३२वें अनु० में बुल्के लिखते हैं, "जिस दिन किसी कवि ने रामकथाविषयक स्फुट आख्यान काव्य का सङ्कलन करके उसे एक ही कथासूत्र में ग्रथित करने का प्रयास किया था उस दिन रामायण उत्पन्न हुआ । वह कवि कौन था ? प्राचीनतम परम्परा वाल्मीकि को आदि कवि मानती है । युद्धकाण्ड की फलश्रुति में लिखा है— "आदिकाव्यमिदं चार्षं पुरा वाल्मीकिना कृतम् ।” ( वा० रा० ७।१२८।१०५ ) १ रामकथा. पृष्ठ १३९ । २. रामकथा, पृष्ठ १३९ ।

कालिदास ने भी वाल्मीकि को आद्यकवि की उपाधि प्रदान की है— “कवेराद्यस्य शासनात् ।” (रघु० १५।४१ ) “वाल्मीकि द्वारा श्लोक-सृष्टि की कथा (वा० रा० १।२ ) में इतना ऐतिहासिक सत्य अवश्य होगा कि वाल्मीकि ने इस छन्द को परिष्कृत किया है ।” वस्तुतः बुल्के का यह मत अधूरा ही है। कहा जा चुका है कि रामायण के पहले रामकथासम्बन्धी आख्यान भले ही रहे हों, परन्तु वाल्मीकिरामायण आर्ष-विज्ञान के आधार पर रचा गया है, स्फुट आख्यानों के आधार पर नहीं। साथ ही, वर्तमान प्रसिद्ध रामायण से भिन्न आदिरामायण नामक कोई ग्रन्थ न था और न है। प्रसिद्ध रामायण के आदिकवि वाल्मीकि रचयिता हैं; परन्तु वे आधुनिक नहीं हैं। राम के समकालीन हैं। यह भी रामायण प्रमाण से ही सिद्ध है। बालकाण्ड और रघुवंश के द्वारा प्रथम श्लोक के निर्माण की असत्यता में कोई प्रमाण नहीं, अतः उसकी सत्यता में कोई बाधा नहीं है। बुल्के १३३वें अनु० में लिखते हैं, “आदिरामायण में न तो बालकाण्ड था और न उत्तरकाण्ड और न अवतारवाद ।” परन्तु अपने कथन के प्रमाण में बुल्के के पास निराधार अनुमान के सिवा और कोई ठोस तर्क नहीं है। आदिरामायण जैसी कोई पुस्तक प्रसिद्ध नहीं है। वह बुल्के जैसे कुछ स्वतन्त्र लोगों के मस्तिष्क की उपजमात्र है। आदिरामायण के नाम पर वे अपनी स्वतन्त्र भावना के अनुसार ही मनमानी करते हुए प्रसिद्ध वाल्मीकिरामायण के विभिन्न अंशों को प्रक्षेप बताने का साहस करते हैं। इस सन्दर्भ में वे आगे कहते हैं,१ “आदिरामायण के विस्तार के विषय में बौद्धमहाविभाषा में कहा जाता है कि रामायण में १२००० श्लोक मिलते हैं। अतः आदिरामायण के विकास में एक ऐसा समय हुआ जब इसका विस्तार आजकल प्रचलित रामायण का आधा था ।” परन्तु उपर्युक्त कथन भी निराधार हैं। यह आश्चर्य है कि जो वाल्मीकिरामायण अत्यन्त प्रामाणिक है, परम्परा से जिसका पठन-पाठन और अनुष्ठान होता आया है एवं महाभारत तथा पुराणों में जिसका समर्थन मिलता है उसके स्वरूप के निर्धारण में उसका और उससे सम्बन्धित ग्रन्थों का प्रामाण्य न मानकर अनुपलब्ध, अप्रामाणिक एवं यत्र-तत्र, छिन्न-भिन्न प्रमाणाभासों का सहारा लिया गया है और उन्हीं के बल पर वाल्मीकिरामायण के वर्तमान रूप को अप्रामाणिक और अविश्वसनीय सिद्ध करने का प्रयास किया गया है। १३४वें अनु० में बुल्के लिखते हैं, “आदिरामायण क्षत्रियों की सम्पत्ति थी। उसमें आदर्श क्षत्रिय सत्यसन्ध राम की महिमा प्रतिपादित की गयी थी। मोक्ष तथा वैराग्य के स्थान पर आदर्श अन्तगति स्वर्ग माना जाता था और उसे प्राप्त करने के लिए ब्राह्मणों की सहायता की आवश्यकता नहीं होती थी। बाद में सारे काव्य को ब्राह्मण ढाँचे में ढालकर सर्वथा नवीन रूप दिया गया है। यह डा० रूबन का मत है, पर इसके लिए कोई समीचीन प्रमाण नहीं दिया गया है। डा० रूबन के उदाहरण (ऋष्यशृङ्ग तथा विश्वामित्र की कथा, उत्तरकाण्ड के अश्वमेध) स्पष्टतया प्रक्षेप हैं। इनसे इतना ही ज्ञात होता है कि रामायण के अर्वाचीन प्रक्षेप में ब्राह्मणों का प्रभाव स्पष्ट है। इस सामग्री से आदिरामायण के रूप के विषय में कोई तर्क नहीं लिया जा सकता है। फिर भी डा० रूबन के इस मत में कुछ तत्त्व है। रामकथासम्बन्धी आख्यान-काव्य क्षत्रिय इक्ष्वाकु-वंश में उत्पन्न हुआ और इसका बहुत काल तक इन क्षत्रियों के दरबारों में प्रचार रहा था। वाल्मीकि ने उस स्फुट काव्य को एक ही प्रबन्ध-काव्य में सङ्कलित करके लगभग ३०० ई० पू० आदि- रामायण की रचना की है। यह रचना बहुत कुछ प्राचीन आख्यान-काव्य से मिलती-जुलती रही होगी। बाद के प्रक्षेपों की भावधारा स्पष्टतया भिन्न है।”

अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २३१ वस्तुतः उपर्युक्त शङ्का और समाधान दोनों ही असङ्गत एवं पाश्चात्यों की दुरभिसन्धिपूर्ण दुष्ट कल्पनामात्र हैं। भारतीय संस्कृति के अनुसार वेद, मन्वादि धर्मशास्त्र, रामायण, महाभारत, अष्टादशपुराण, न्याय-वैशेषिक, सांख्य-योग, पूर्वोत्तरमीमांसा ये धर्मग्रन्थ हैं। ब्रह्म-यज्ञ में इनका अध्ययन किया जाता है। उसके लिए गुरु-परम्परा से अध्ययन आवश्यक है। मन्वादि के अनुसार गुरु या आचार्य ब्राह्मण ही होता है। इस दृष्टि से क्षत्रियादि को भी रामायण का अध्ययन ब्राह्मण गुरु से ही करना पड़ता है। जब रामायण के निर्माता महर्षि वाल्मीकि ब्राह्मण थे तो उनकी रचना रामायण क्षत्रियों की ही सम्पत्ति कैसे हो सकती थी ? हाँ, विशेषतः क्षत्रियवंशीय राम का चरित्र होने से क्षत्रियों में इसका अधिक प्रचार एवं सम्मान असम्भावित नहीं । "आदिरामायण में मोक्ष और वैराग्य के स्थान पर आदर्श गति स्वर्ग को ही माना जाता था।" यह कथन निष्प्रमाण है। कारण रामायण वर्णित अगस्त्य, सुतीक्ष्ण, शरभङ्ग आदि ऋषि अरण्यवासी वैराग्य एवं मोक्ष के ही प्रतीक थे। रामायण में परम गति स्वर्ग ही नहीं है, किन्तु ब्रह्मलोक है। सगुण ब्रह्मलोक की प्राप्ति के अनन्तर निर्गुण ब्रह्मप्राप्ति भी होती है, यह रामायण द्वारा आदृत वेदों से ही सिद्ध होता है— "शृण्वन् रामायणं भक्त्या यः पादं पदमेव वा । स याति ब्रह्मणः स्थानं ब्रह्मणा पूजितः सदा ॥" इति लवकुशयोर्मङ्गलाचरणे चतुर्दशः श्लोकः । जो रामायण को भक्ति से सुनता है वह ब्रह्म के स्थान में जाता है और ब्रह्म द्वारा आदृत हो जाता है। ब्राह्मणों की सहायता अपेक्षित नहीं थी ऐसा कहना भी असङ्गत है, क्योंकि रामायण वैदिक संस्कृति का ग्रन्थ है। जाबालि की समालोचना करते हुए राम ने वेद एवं वैदिक परम्पराओं की प्रामाणिकता को ही सिद्ध किया है। रामायण में वैदिक यज्ञों का वर्णन है और उसी से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। उन यज्ञों का अनुष्ठान ब्राह्मणों की सहायता के बिना अनुपपन्न है, क्योंकि श्रौतसूत्रों के अनुसार ऋत्विज्य ब्राह्मण के ही हाथों रहता है। ब्राह्मणेतर द्विज यजमान तो हो सकते हैं, परन्तु वे ऋत्विज नहीं होते। यही कारण है कि दशरथ के यज्ञ में भी वसिष्ठ, ऋष्यशृङ्ग आदि ब्राह्मण ऋत्विजों का ही वरण किया गया था। बालकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड प्रक्षेप हैं, यह पक्ष खण्डित ही है, अतएव ऋष्यशृङ्ग एवं विश्वामित्र की कथाओं को प्रामाणिक मानने पर भी डा० रूबेन का मत सिद्ध नहीं हो सकता। रामायण का निर्माण ई० ३०० वर्ष पूर्व हुआ यह मत भी सर्वथा उपेक्षणीय एवं रामायण के विरुद्ध है। रामायण में ही राजसिंहासनारूढ राम के समय में उसका निर्माण होने का उल्लेख है— 'प्राप्तराज्यस्य रामस्य वाल्मीकिर्भगवानृषिः । चकार चरितं कृत्स्नं विचित्रपदमर्थवत् ॥" (वा० रा० १।४।१ ) १३५वें अनु० में बुल्के लिखते हैं, "आदिरामायण की भाषा के विषय में भी सन्देह किया गया है। मूल रचना की भाषा प्राकृत रही होगी। बाद में पहली शताब्दी ई० से इनका संस्कृत रूपान्तर चल पड़ा ।" डा० याकोबी ने अकाट्य तर्कों से इस मत का खण्डन किया है। आजकल इस मत का प्रतिपादन कोई नहीं करता। डा० याकोबी का मुख्य तर्क इस प्रकार है। ( अ ) भारत में प्राकृत मूलरामायण तथा इसके संस्कृत रूपान्तर के विषय में कोई उल्लेख नहीं मिलता । ( आ ) यदि केवल पहली शती ई० में रामायण का संस्कृत अनुवाद किया गया था, तो आर्ष प्रयोग कैसे सम्भव होते ?

२३२ रामायणमीमांसा सप्तम (इ) प्राकृत साहित्य की मुख्य विशेषता है—शृङ्गार और अद्भुत रस बाहुल्य (दे० कथासरित्सागर) । इसके अतिरिक्त पाली तथा प्राकृत की शैली बहुत अपरिष्कृत है। अतः प्राकृत साहित्य उपर्युक्त कारणों से संस्कृत-काव्य का आधार तथा आदर्श होने के नितान्त अनुपयुक्त सिद्ध होता है। वस्तुतः कथासरित्सागर भी कोई नवीन रचना नहीं है। शिवजी ने ही इतिहासपुराणों की अधिकांश कथाओं का वर्णन किया है। शिव-पार्वती के संवाद का ही पिशाचभाषा में बृहत्कथा के रूप में उल्लेख हुआ है। कथासरित्सागर उसी पर आधारित है। शृङ्गार और अद्भुत रस पुराणों में कम नहीं है। वेदों में उक्त दोनों बातें हैं ही। ई० पू० दूसरी, तीसरी शताब्दी में रामायण का निर्माण मान लेने पर भी आर्ष प्रयोगों का समर्थन नहीं हो सकता, क्योंकि “लक्ष्यैकचक्षुष्क ऋषि” ही आर्ष प्रयोग करता है। लक्षणैकचक्षुष्क कोई कवि आर्ष प्रयोग करने का अधिकारी नहीं होता। समस्त शब्दों की शुद्धि और अशुद्धि जो पाणिनि आदि के समान आर्ष ज्ञान से जान सकता है वही ऋषि पाणिनि आदि के लक्षणों, सूत्रों से असिद्ध परन्तु अपने आर्ष-विज्ञान से सिद्ध शब्दों का प्रयोग कर सकता है। जो लोग समझते हैं प्राकृत का ही संस्कार कर संस्कृत निष्पन्न होता है उनका यह भ्रम है, क्योंकि वह प्राकृत-व्याकरण के विरुद्ध है। प्राकृत व्याकरण में कहा गया है— “प्रकृतिः संस्कृतं तस्माद्भवं प्राकृतम्।” संस्कृत ही प्रकृति है, उससे उद्भूत भाषा ही प्राकृत भाषा है। अतएव वेद के मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् आदि की भाषा प्राकृत भाषा से बहुत प्राचीन है और वह संस्कृत ही है। यद्यपि संस्कृत शब्दों के साथ ही अपभ्रंश शब्द भी होते हैं; जैसे चलनी के द्वारा ग्राह्याग्राह्य पदार्थों से ग्राह्य वस्तु का पृथक्करण किया जाता है वैसे ही संस्कृत शब्दों को अपभ्रंश शब्दों से पृथक् कर देना ही शब्दों का संस्कार है। अतएव राम के समकाल में वेदार्थ उपबृंहण की दृष्टि से ही संस्कृत भाषा में ही महर्षि वाल्मीकि ने रामायण का निर्माण किया। १३६ वें अनु० के अनुसार बुल्के कहते हैं, “आठवें अध्याय में बालकाण्ड को प्रक्षिप्त सिद्ध किया गया है। डा० याकोबी के अनुसार आदिरामायण का प्रारम्भ बालकाण्ड के निम्नलिखित श्लोकों में सुरक्षित है— सर्ग ५ श्लोक १-४ रामायण की स्तुति । सर्ग ५, श्लोक ५-६ कोशल तथा अयोध्या की स्तुति । सर्ग ५, श्लोक ९ } दशरथ की स्तुति । सर्ग ६, श्लोक २-४ सर्ग १८, श्लोक १६-२१ (उत्तरार्द्ध) २२; दशरथ के पुत्रों का उल्लेख । सर्ग १८, श्लोक २५ पुत्रों की स्तुति (अथवा अयोध्याकाण्ड १, १)। सर्ग १८, श्लोक २४-१२; राम की श्रेष्ठता (अथवा अयोध्याकाण्ड १,६-८। इस भूमिका के बाद काव्य की मुख्य वस्तु का प्रारम्भ हुआ होगा। (दे० अयोध्याकाण्ड सर्ग २, श्लोक ३६ )” उपर्युक्त कल्पना के किसी आधार का बुल्के उल्लेख नहीं करते। वस्तुतः उपलब्ध सम्पूर्ण बालकाण्ड प्रामाणिक रामायण है और उसके बिना रामायण अधूरा ही रहेगा। अयोध्या तथा दशरथ का वर्णन तथा उनका अश्वमेध तथा पुत्रेष्टियज्ञ, पुत्र-जन्म, उनका संस्कार, विश्वामित्र का आगमन, राम-लक्ष्मण का उपनयन, सिद्धाश्रम- गमन, मिथिलागमन, विवाह आदि के बिना अयोध्याकाण्ड का अकस्मात् आरम्भ होना सर्वथा असङ्गत ही है। इसके अतिरिक्त बालकाण्ड को ही प्रक्षिप्त मान लेने पर उपर्युक्त तालिका के कुछ श्लोकों को ही किस आधार पर प्रामाणिक कहा जा सकता है ? निश्चय ही किसी पुष्ट प्रमाण के समर्थन के अभाव में ऐसे कथन अमान्य ही हैं।