रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२८ रामायणमीमांसा सप्तम इसमें अवश्य रामायण की ओर निर्देश देखा जा सकता । फिर भी इसमें रामायण के पूर्व की प्राचीन गाथाओं का निर्देश देखना अधिक स्वाभाविक प्रतीत होता है ।"१ बुल्के का उक्त कथन रामायण के विरुद्ध है । रामायण में 'बालकाण्ड' में कहा गया है। वाल्मीकि ने नारद से मूलरामायण का श्रवण किया; तत्पश्चात् ब्रह्माजी के आदेशानुसार समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा राम, लक्ष्मण, सीता आदि के सभी वृत्तान्तों का तत्त्वतः प्रत्यक्ष साक्षात्कार कर रामायण में उनका उल्लेख किया । सम्भव है कि उस समय भी रामकथा-सम्बन्धी कुछ आख्यान प्रचलित रहे हों; परन्तु वे भी आधुनिक उपाख्यानों की तरह प्रामाणिक मान्य नहीं हो सकते । अतः वे प्रामाणिक आर्ष इतिहासरूप रामायण के आधार नहीं हो सकते । रामकथासम्बन्धी गाथाओं के आधार रामायण एवं प्रचलित उपाख्यान हो सकते हैं; बौद्ध गाथाएँ तो रामायण की अपेक्षा अत्यन्त अर्वाचीन हैं, अतः वे रामायण की आधार हों यह प्रश्न ही नहीं उठता । वाल्मीकि राम के समकालिक थे यह प्रतिपादित किया जा चुका है । हरिवंशपुराण की गाथाओं का सम्बन्ध इतिहास-पुराणप्रसिद्ध गाथाओं से ही है, क्योंकि रामायण एवं पुराणों में रामसम्बन्धित अगणित गाथाएँ प्रसिद्ध हैं । उनको छोड़कर जिनका कोई प्रामाणिक रूप उपलब्ध नहीं उन उपाख्यानरूप गाथाओं का ग्रहण करना उचित नहीं है । 'पुराणविद' शब्द से भी उन गाथाओं का पुराण से ही सम्बन्ध नहीं मानना चाहिये । इसके अतिरिक्त जब बुल्के की दृष्टि में हरिवंशपुराण आदि का प्रामाण्य स्वीकृत ही नहीं, तब उनके आधारपर किसी निर्णय तक कैसे पहुँचा जा सकता है ? और वह कहाँ तक मान्य हो सकता है ? यदि ऐसा निर्णय मान्य हो तब तो बुल्के को हरिवंशपुराण के उल्लेखानुसार ही राम का विष्णु का अवतार होना निःसन्देह मान्य होना चाहिये । हरिवंशपुराण के ४१वें अध्याय में विष्णु के अवतार का उपक्रम है— “हन्त विष्णोः प्रवृत्तिं च शृणु दिव्यां मयेरिताम् ।” वहाँ विष्णु के विविध प्रभावों का वर्णन करते हुए अनेक अवतारों का वर्णन किया गया है । तदनन्तर परशुराम के अवतार का वर्णन है— “एष विष्णोः सुरेशस्य शाश्वतस्याव्ययस्य च । जामदग्न्य इति ख्यातः प्रादुर्भावो महात्मनः ॥” इसके अनन्तर विष्णु के ही रामावतार का वर्णन है— “राज्ञो दशरथस्याथ पुत्रः पद्मायतेक्षणः । कृत्वात्मानं महाबाहुश्चतुर्धा हरिरीश्वरः ॥” प्रभु ईश्वर अपने को चतुर्धा विभक्त कर राजा दशरथ के यहाँ प्रकट हुए । इस अध्याय की सम्पूर्ण कथा वाल्मीकिरामायण से ही मिलती-जुलती है । इसमें सीता को लक्ष्मी कहा गया है— “रूपिणी यस्य पार्श्वस्था सीतेति प्रथिता जनैः । पूर्वोचिता तस्य लक्ष्मीर्भर्तारमनुगच्छति ॥” क्या बुल्के उक्त श्लोकों को प्रमाण मानने का साहस करेंगे ? वस्तुतः वे किसी भी पक्ष पर टिक नहीं सकते । आर्ष ग्रन्थों में किसी को भी देखा जाय सभी में राम को विष्णुरूप अवश्य माना गया है । १. रामकथा, पृष्ठ १३८, १३९ ।