भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 306

अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २२९ १३२वें अनु० में वे लिखते हैं, "इस रामसम्बन्धी गाथासाहित्य की उत्पत्ति इक्ष्वाकुवंश में हुई थी । रामायण में लिखा है— "इक्ष्वाकूणामिदं तेषां राज्ञां वंशे महात्मनाम् । महदुत्पन्नमाख्यानं रामायणमिति श्रुतम् ॥” (वा० रा० १।५।३ ) उनका यह कथन भी अशुद्ध है, क्योंकि इस श्लोक में रामकथासम्बन्धी अन्य आख्यानों की चर्चा नहीं है । इसमें तो रामायणरूप महदाख्यान की उत्पत्ति इक्ष्वाकुवंशीय महात्मा राजाओं के वंश में हुई थी यही कहा गया है, अतः इस वाक्य में इक्ष्वाकुवंश के सूतों ने इनके विषय में गाथाएँ तथा आख्यान सुनाये होंगे, बुल्के की इस अटकल के लिए कोई अवकाश ही नहीं है । वहीं, पृष्ठ १३९ की टिप्पणी में, वे लिखते हैं, "ध्यान देने योग्य है कि वाल्मीकि का आदिरामायण सूतों की सम्पत्ति न बनकर काव्योपजीवी कुशीलवों द्वारा पहले जनता में लोकप्रियता प्राप्त करने लगा और बाद में दरबारों में प्रवेश कर सका; ऐसा ही बालकाण्ड के चतुर्थ सर्ग से प्रतीत होता है ।" बुल्के स्वयं ही बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड दोनों को ही प्रक्षिप्त मानते हैं, अतः ईमानदारी की बात यह है कि उपर्युक्त काण्डों के किसी भी अंश या सन्दर्भ को अपने कथन के प्रमाण रूप में उल्लेख करने का उनको अधिकार ही नहीं है। यदि वे उन काण्डों को प्रामाणिक स्वीकार कर लेते हैं तो उन्हें उन काण्डों के ही अनुसार यह भी मानना होगा कि 'रामायण' के कुशीलव बुल्के के तथाकथित काव्योपजीवी न होकर सीता के पुत्र कुश और लव थे और समास के अनुसार कुशीलव कहे गये । यह पीछे स्पष्ट किया जा चुका है। बुल्के यह भी कहते हैं कि "महाभारत द्रोणपर्व और शान्तिपर्व में जो संक्षिप्त रामचरित्र मिलता है, वह इस प्राचीन आख्यानकाव्य पर निर्भर प्रतीत होता है ।१" बुल्के का यह कथन भी असङ्गत है—जब कि महाभारत से बहुत पहले का विस्तृत आर्ष वाल्मीकिरामायण उपस्थित है तब उसको भुलाकर अपूर्व, अनुपलब्ध तथा अप्रामाणिक आख्यानों को उनका आधार मानना तर्कविरुद्ध ही है । महाभारत निर्माणकाल में रामायण का सर्वत्र प्रसार था, साथ ही अन्य रामसम्बन्धी उपाख्यानों का भी सर्वत्र प्रसार रहा है । ऐसा मानने में सिद्धान्त में कोई हानि नहीं होती, परन्तु विस्तृत वैदिक साहित्य में रामसम्बन्धी गाथाओं का कहीं उल्लेख नहीं है, यह कहना निष्प्रमाण है। पिछले प्रकरणों में इसका विस्तार से खण्डन किया जा चुका है। बुल्के लिखते हैं, "अतः वैदिककाल के बाद और चौथी शती ई० पूर्व के पहले सम्भवतः छठी शती में इस रामकथासम्बन्धी आख्यान काव्य की उत्पत्ति हुई थी ।'२ उनके इस कथन में भी कोई प्रमाण नहीं । रामायण के अनुसार रामकाल में ही रामायण का निर्माण हुआ, परन्तु पुराणों के अनुसार तो राम के अवतार के पूर्व ही रामायण का निर्माण अतीत, अनागत तथा वर्तमान के द्रष्टा महर्षियों ने कर रखा था। वर्तमान वाल्मीकिरामायण तो शतकोटि- प्रविस्तर रामायण का सारमात्र है । 'चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।" ( रा० माहात्म्य ) १३२वें अनु० में बुल्के लिखते हैं, "जिस दिन किसी कवि ने रामकथाविषयक स्फुट आख्यान काव्य का सङ्कलन करके उसे एक ही कथासूत्र में ग्रथित करने का प्रयास किया था उस दिन रामायण उत्पन्न हुआ । वह कवि कौन था ? प्राचीनतम परम्परा वाल्मीकि को आदि कवि मानती है । युद्धकाण्ड की फलश्रुति में लिखा है— "आदिकाव्यमिदं चार्षं पुरा वाल्मीकिना कृतम् ।” ( वा० रा० ७।१२८।१०५ ) १ रामकथा. पृष्ठ १३९ । २. रामकथा, पृष्ठ १३९ ।