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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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कालिदास ने भी वाल्मीकि को आद्यकवि की उपाधि प्रदान की है— “कवेराद्यस्य शासनात् ।” (रघु० १५।४१ ) “वाल्मीकि द्वारा श्लोक-सृष्टि की कथा (वा० रा० १।२ ) में इतना ऐतिहासिक सत्य अवश्य होगा कि वाल्मीकि ने इस छन्द को परिष्कृत किया है ।” वस्तुतः बुल्के का यह मत अधूरा ही है। कहा जा चुका है कि रामायण के पहले रामकथासम्बन्धी आख्यान भले ही रहे हों, परन्तु वाल्मीकिरामायण आर्ष-विज्ञान के आधार पर रचा गया है, स्फुट आख्यानों के आधार पर नहीं। साथ ही, वर्तमान प्रसिद्ध रामायण से भिन्न आदिरामायण नामक कोई ग्रन्थ न था और न है। प्रसिद्ध रामायण के आदिकवि वाल्मीकि रचयिता हैं; परन्तु वे आधुनिक नहीं हैं। राम के समकालीन हैं। यह भी रामायण प्रमाण से ही सिद्ध है। बालकाण्ड और रघुवंश के द्वारा प्रथम श्लोक के निर्माण की असत्यता में कोई प्रमाण नहीं, अतः उसकी सत्यता में कोई बाधा नहीं है। बुल्के १३३वें अनु० में लिखते हैं, “आदिरामायण में न तो बालकाण्ड था और न उत्तरकाण्ड और न अवतारवाद ।” परन्तु अपने कथन के प्रमाण में बुल्के के पास निराधार अनुमान के सिवा और कोई ठोस तर्क नहीं है। आदिरामायण जैसी कोई पुस्तक प्रसिद्ध नहीं है। वह बुल्के जैसे कुछ स्वतन्त्र लोगों के मस्तिष्क की उपजमात्र है। आदिरामायण के नाम पर वे अपनी स्वतन्त्र भावना के अनुसार ही मनमानी करते हुए प्रसिद्ध वाल्मीकिरामायण के विभिन्न अंशों को प्रक्षेप बताने का साहस करते हैं। इस सन्दर्भ में वे आगे कहते हैं,१ “आदिरामायण के विस्तार के विषय में बौद्धमहाविभाषा में कहा जाता है कि रामायण में १२००० श्लोक मिलते हैं। अतः आदिरामायण के विकास में एक ऐसा समय हुआ जब इसका विस्तार आजकल प्रचलित रामायण का आधा था ।” परन्तु उपर्युक्त कथन भी निराधार हैं। यह आश्चर्य है कि जो वाल्मीकिरामायण अत्यन्त प्रामाणिक है, परम्परा से जिसका पठन-पाठन और अनुष्ठान होता आया है एवं महाभारत तथा पुराणों में जिसका समर्थन मिलता है उसके स्वरूप के निर्धारण में उसका और उससे सम्बन्धित ग्रन्थों का प्रामाण्य न मानकर अनुपलब्ध, अप्रामाणिक एवं यत्र-तत्र, छिन्न-भिन्न प्रमाणाभासों का सहारा लिया गया है और उन्हीं के बल पर वाल्मीकिरामायण के वर्तमान रूप को अप्रामाणिक और अविश्वसनीय सिद्ध करने का प्रयास किया गया है। १३४वें अनु० में बुल्के लिखते हैं, “आदिरामायण क्षत्रियों की सम्पत्ति थी। उसमें आदर्श क्षत्रिय सत्यसन्ध राम की महिमा प्रतिपादित की गयी थी। मोक्ष तथा वैराग्य के स्थान पर आदर्श अन्तगति स्वर्ग माना जाता था और उसे प्राप्त करने के लिए ब्राह्मणों की सहायता की आवश्यकता नहीं होती थी। बाद में सारे काव्य को ब्राह्मण ढाँचे में ढालकर सर्वथा नवीन रूप दिया गया है। यह डा० रूबन का मत है, पर इसके लिए कोई समीचीन प्रमाण नहीं दिया गया है। डा० रूबन के उदाहरण (ऋष्यशृङ्ग तथा विश्वामित्र की कथा, उत्तरकाण्ड के अश्वमेध) स्पष्टतया प्रक्षेप हैं। इनसे इतना ही ज्ञात होता है कि रामायण के अर्वाचीन प्रक्षेप में ब्राह्मणों का प्रभाव स्पष्ट है। इस सामग्री से आदिरामायण के रूप के विषय में कोई तर्क नहीं लिया जा सकता है। फिर भी डा० रूबन के इस मत में कुछ तत्त्व है। रामकथासम्बन्धी आख्यान-काव्य क्षत्रिय इक्ष्वाकु-वंश में उत्पन्न हुआ और इसका बहुत काल तक इन क्षत्रियों के दरबारों में प्रचार रहा था। वाल्मीकि ने उस स्फुट काव्य को एक ही प्रबन्ध-काव्य में सङ्कलित करके लगभग ३०० ई० पू० आदि- रामायण की रचना की है। यह रचना बहुत कुछ प्राचीन आख्यान-काव्य से मिलती-जुलती रही होगी। बाद के प्रक्षेपों की भावधारा स्पष्टतया भिन्न है।”