भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 308

अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २३१ वस्तुतः उपर्युक्त शङ्का और समाधान दोनों ही असङ्गत एवं पाश्चात्यों की दुरभिसन्धिपूर्ण दुष्ट कल्पनामात्र हैं। भारतीय संस्कृति के अनुसार वेद, मन्वादि धर्मशास्त्र, रामायण, महाभारत, अष्टादशपुराण, न्याय-वैशेषिक, सांख्य-योग, पूर्वोत्तरमीमांसा ये धर्मग्रन्थ हैं। ब्रह्म-यज्ञ में इनका अध्ययन किया जाता है। उसके लिए गुरु-परम्परा से अध्ययन आवश्यक है। मन्वादि के अनुसार गुरु या आचार्य ब्राह्मण ही होता है। इस दृष्टि से क्षत्रियादि को भी रामायण का अध्ययन ब्राह्मण गुरु से ही करना पड़ता है। जब रामायण के निर्माता महर्षि वाल्मीकि ब्राह्मण थे तो उनकी रचना रामायण क्षत्रियों की ही सम्पत्ति कैसे हो सकती थी ? हाँ, विशेषतः क्षत्रियवंशीय राम का चरित्र होने से क्षत्रियों में इसका अधिक प्रचार एवं सम्मान असम्भावित नहीं । "आदिरामायण में मोक्ष और वैराग्य के स्थान पर आदर्श गति स्वर्ग को ही माना जाता था।" यह कथन निष्प्रमाण है। कारण रामायण वर्णित अगस्त्य, सुतीक्ष्ण, शरभङ्ग आदि ऋषि अरण्यवासी वैराग्य एवं मोक्ष के ही प्रतीक थे। रामायण में परम गति स्वर्ग ही नहीं है, किन्तु ब्रह्मलोक है। सगुण ब्रह्मलोक की प्राप्ति के अनन्तर निर्गुण ब्रह्मप्राप्ति भी होती है, यह रामायण द्वारा आदृत वेदों से ही सिद्ध होता है— "शृण्वन् रामायणं भक्त्या यः पादं पदमेव वा । स याति ब्रह्मणः स्थानं ब्रह्मणा पूजितः सदा ॥" इति लवकुशयोर्मङ्गलाचरणे चतुर्दशः श्लोकः । जो रामायण को भक्ति से सुनता है वह ब्रह्म के स्थान में जाता है और ब्रह्म द्वारा आदृत हो जाता है। ब्राह्मणों की सहायता अपेक्षित नहीं थी ऐसा कहना भी असङ्गत है, क्योंकि रामायण वैदिक संस्कृति का ग्रन्थ है। जाबालि की समालोचना करते हुए राम ने वेद एवं वैदिक परम्पराओं की प्रामाणिकता को ही सिद्ध किया है। रामायण में वैदिक यज्ञों का वर्णन है और उसी से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। उन यज्ञों का अनुष्ठान ब्राह्मणों की सहायता के बिना अनुपपन्न है, क्योंकि श्रौतसूत्रों के अनुसार ऋत्विज्य ब्राह्मण के ही हाथों रहता है। ब्राह्मणेतर द्विज यजमान तो हो सकते हैं, परन्तु वे ऋत्विज नहीं होते। यही कारण है कि दशरथ के यज्ञ में भी वसिष्ठ, ऋष्यशृङ्ग आदि ब्राह्मण ऋत्विजों का ही वरण किया गया था। बालकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड प्रक्षेप हैं, यह पक्ष खण्डित ही है, अतएव ऋष्यशृङ्ग एवं विश्वामित्र की कथाओं को प्रामाणिक मानने पर भी डा० रूबेन का मत सिद्ध नहीं हो सकता। रामायण का निर्माण ई० ३०० वर्ष पूर्व हुआ यह मत भी सर्वथा उपेक्षणीय एवं रामायण के विरुद्ध है। रामायण में ही राजसिंहासनारूढ राम के समय में उसका निर्माण होने का उल्लेख है— 'प्राप्तराज्यस्य रामस्य वाल्मीकिर्भगवानृषिः । चकार चरितं कृत्स्नं विचित्रपदमर्थवत् ॥" (वा० रा० १।४।१ ) १३५वें अनु० में बुल्के लिखते हैं, "आदिरामायण की भाषा के विषय में भी सन्देह किया गया है। मूल रचना की भाषा प्राकृत रही होगी। बाद में पहली शताब्दी ई० से इनका संस्कृत रूपान्तर चल पड़ा ।" डा० याकोबी ने अकाट्य तर्कों से इस मत का खण्डन किया है। आजकल इस मत का प्रतिपादन कोई नहीं करता। डा० याकोबी का मुख्य तर्क इस प्रकार है। ( अ ) भारत में प्राकृत मूलरामायण तथा इसके संस्कृत रूपान्तर के विषय में कोई उल्लेख नहीं मिलता । ( आ ) यदि केवल पहली शती ई० में रामायण का संस्कृत अनुवाद किया गया था, तो आर्ष प्रयोग कैसे सम्भव होते ?