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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

कालिदास ने भी वाल्मीकि को आद्यकवि की उपाधि प्रदान की है— “कवेराद्यस्य शासनात् ।” (रघु० १५।४१ ) “वाल्मीकि द्वारा श्लोक-सृष्टि की कथा (वा० रा० १।२ ) में इतना ऐतिहासिक सत्य अवश्य होगा कि वाल्मीकि ने इस छन्द को परिष्कृत किया है ।” वस्तुतः बुल्के का यह मत अधूरा ही है। कहा जा चुका है कि रामायण के पहले रामकथासम्बन्धी आख्यान भले ही रहे हों, परन्तु वाल्मीकिरामायण आर्ष-विज्ञान के आधार पर रचा गया है, स्फुट आख्यानों के आधार पर नहीं। साथ ही, वर्तमान प्रसिद्ध रामायण से भिन्न आदिरामायण नामक कोई ग्रन्थ न था और न है। प्रसिद्ध रामायण के आदिकवि वाल्मीकि रचयिता हैं; परन्तु वे आधुनिक नहीं हैं। राम के समकालीन हैं। यह भी रामायण प्रमाण से ही सिद्ध है। बालकाण्ड और रघुवंश के द्वारा प्रथम श्लोक के निर्माण की असत्यता में कोई प्रमाण नहीं, अतः उसकी सत्यता में कोई बाधा नहीं है। बुल्के १३३वें अनु० में लिखते हैं, “आदिरामायण में न तो बालकाण्ड था और न उत्तरकाण्ड और न अवतारवाद ।” परन्तु अपने कथन के प्रमाण में बुल्के के पास निराधार अनुमान के सिवा और कोई ठोस तर्क नहीं है। आदिरामायण जैसी कोई पुस्तक प्रसिद्ध नहीं है। वह बुल्के जैसे कुछ स्वतन्त्र लोगों के मस्तिष्क की उपजमात्र है। आदिरामायण के नाम पर वे अपनी स्वतन्त्र भावना के अनुसार ही मनमानी करते हुए प्रसिद्ध वाल्मीकिरामायण के विभिन्न अंशों को प्रक्षेप बताने का साहस करते हैं। इस सन्दर्भ में वे आगे कहते हैं,१ “आदिरामायण के विस्तार के विषय में बौद्धमहाविभाषा में कहा जाता है कि रामायण में १२००० श्लोक मिलते हैं। अतः आदिरामायण के विकास में एक ऐसा समय हुआ जब इसका विस्तार आजकल प्रचलित रामायण का आधा था ।” परन्तु उपर्युक्त कथन भी निराधार हैं। यह आश्चर्य है कि जो वाल्मीकिरामायण अत्यन्त प्रामाणिक है, परम्परा से जिसका पठन-पाठन और अनुष्ठान होता आया है एवं महाभारत तथा पुराणों में जिसका समर्थन मिलता है उसके स्वरूप के निर्धारण में उसका और उससे सम्बन्धित ग्रन्थों का प्रामाण्य न मानकर अनुपलब्ध, अप्रामाणिक एवं यत्र-तत्र, छिन्न-भिन्न प्रमाणाभासों का सहारा लिया गया है और उन्हीं के बल पर वाल्मीकिरामायण के वर्तमान रूप को अप्रामाणिक और अविश्वसनीय सिद्ध करने का प्रयास किया गया है। १३४वें अनु० में बुल्के लिखते हैं, “आदिरामायण क्षत्रियों की सम्पत्ति थी। उसमें आदर्श क्षत्रिय सत्यसन्ध राम की महिमा प्रतिपादित की गयी थी। मोक्ष तथा वैराग्य के स्थान पर आदर्श अन्तगति स्वर्ग माना जाता था और उसे प्राप्त करने के लिए ब्राह्मणों की सहायता की आवश्यकता नहीं होती थी। बाद में सारे काव्य को ब्राह्मण ढाँचे में ढालकर सर्वथा नवीन रूप दिया गया है। यह डा० रूबन का मत है, पर इसके लिए कोई समीचीन प्रमाण नहीं दिया गया है। डा० रूबन के उदाहरण (ऋष्यशृङ्ग तथा विश्वामित्र की कथा, उत्तरकाण्ड के अश्वमेध) स्पष्टतया प्रक्षेप हैं। इनसे इतना ही ज्ञात होता है कि रामायण के अर्वाचीन प्रक्षेप में ब्राह्मणों का प्रभाव स्पष्ट है। इस सामग्री से आदिरामायण के रूप के विषय में कोई तर्क नहीं लिया जा सकता है। फिर भी डा० रूबन के इस मत में कुछ तत्त्व है। रामकथासम्बन्धी आख्यान-काव्य क्षत्रिय इक्ष्वाकु-वंश में उत्पन्न हुआ और इसका बहुत काल तक इन क्षत्रियों के दरबारों में प्रचार रहा था। वाल्मीकि ने उस स्फुट काव्य को एक ही प्रबन्ध-काव्य में सङ्कलित करके लगभग ३०० ई० पू० आदि- रामायण की रचना की है। यह रचना बहुत कुछ प्राचीन आख्यान-काव्य से मिलती-जुलती रही होगी। बाद के प्रक्षेपों की भावधारा स्पष्टतया भिन्न है।”

अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २३१ वस्तुतः उपर्युक्त शङ्का और समाधान दोनों ही असङ्गत एवं पाश्चात्यों की दुरभिसन्धिपूर्ण दुष्ट कल्पनामात्र हैं। भारतीय संस्कृति के अनुसार वेद, मन्वादि धर्मशास्त्र, रामायण, महाभारत, अष्टादशपुराण, न्याय-वैशेषिक, सांख्य-योग, पूर्वोत्तरमीमांसा ये धर्मग्रन्थ हैं। ब्रह्म-यज्ञ में इनका अध्ययन किया जाता है। उसके लिए गुरु-परम्परा से अध्ययन आवश्यक है। मन्वादि के अनुसार गुरु या आचार्य ब्राह्मण ही होता है। इस दृष्टि से क्षत्रियादि को भी रामायण का अध्ययन ब्राह्मण गुरु से ही करना पड़ता है। जब रामायण के निर्माता महर्षि वाल्मीकि ब्राह्मण थे तो उनकी रचना रामायण क्षत्रियों की ही सम्पत्ति कैसे हो सकती थी ? हाँ, विशेषतः क्षत्रियवंशीय राम का चरित्र होने से क्षत्रियों में इसका अधिक प्रचार एवं सम्मान असम्भावित नहीं । "आदिरामायण में मोक्ष और वैराग्य के स्थान पर आदर्श गति स्वर्ग को ही माना जाता था।" यह कथन निष्प्रमाण है। कारण रामायण वर्णित अगस्त्य, सुतीक्ष्ण, शरभङ्ग आदि ऋषि अरण्यवासी वैराग्य एवं मोक्ष के ही प्रतीक थे। रामायण में परम गति स्वर्ग ही नहीं है, किन्तु ब्रह्मलोक है। सगुण ब्रह्मलोक की प्राप्ति के अनन्तर निर्गुण ब्रह्मप्राप्ति भी होती है, यह रामायण द्वारा आदृत वेदों से ही सिद्ध होता है— "शृण्वन् रामायणं भक्त्या यः पादं पदमेव वा । स याति ब्रह्मणः स्थानं ब्रह्मणा पूजितः सदा ॥" इति लवकुशयोर्मङ्गलाचरणे चतुर्दशः श्लोकः । जो रामायण को भक्ति से सुनता है वह ब्रह्म के स्थान में जाता है और ब्रह्म द्वारा आदृत हो जाता है। ब्राह्मणों की सहायता अपेक्षित नहीं थी ऐसा कहना भी असङ्गत है, क्योंकि रामायण वैदिक संस्कृति का ग्रन्थ है। जाबालि की समालोचना करते हुए राम ने वेद एवं वैदिक परम्पराओं की प्रामाणिकता को ही सिद्ध किया है। रामायण में वैदिक यज्ञों का वर्णन है और उसी से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। उन यज्ञों का अनुष्ठान ब्राह्मणों की सहायता के बिना अनुपपन्न है, क्योंकि श्रौतसूत्रों के अनुसार ऋत्विज्य ब्राह्मण के ही हाथों रहता है। ब्राह्मणेतर द्विज यजमान तो हो सकते हैं, परन्तु वे ऋत्विज नहीं होते। यही कारण है कि दशरथ के यज्ञ में भी वसिष्ठ, ऋष्यशृङ्ग आदि ब्राह्मण ऋत्विजों का ही वरण किया गया था। बालकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड प्रक्षेप हैं, यह पक्ष खण्डित ही है, अतएव ऋष्यशृङ्ग एवं विश्वामित्र की कथाओं को प्रामाणिक मानने पर भी डा० रूबेन का मत सिद्ध नहीं हो सकता। रामायण का निर्माण ई० ३०० वर्ष पूर्व हुआ यह मत भी सर्वथा उपेक्षणीय एवं रामायण के विरुद्ध है। रामायण में ही राजसिंहासनारूढ राम के समय में उसका निर्माण होने का उल्लेख है— 'प्राप्तराज्यस्य रामस्य वाल्मीकिर्भगवानृषिः । चकार चरितं कृत्स्नं विचित्रपदमर्थवत् ॥" (वा० रा० १।४।१ ) १३५वें अनु० में बुल्के लिखते हैं, "आदिरामायण की भाषा के विषय में भी सन्देह किया गया है। मूल रचना की भाषा प्राकृत रही होगी। बाद में पहली शताब्दी ई० से इनका संस्कृत रूपान्तर चल पड़ा ।" डा० याकोबी ने अकाट्य तर्कों से इस मत का खण्डन किया है। आजकल इस मत का प्रतिपादन कोई नहीं करता। डा० याकोबी का मुख्य तर्क इस प्रकार है। ( अ ) भारत में प्राकृत मूलरामायण तथा इसके संस्कृत रूपान्तर के विषय में कोई उल्लेख नहीं मिलता । ( आ ) यदि केवल पहली शती ई० में रामायण का संस्कृत अनुवाद किया गया था, तो आर्ष प्रयोग कैसे सम्भव होते ?

२३२ रामायणमीमांसा सप्तम (इ) प्राकृत साहित्य की मुख्य विशेषता है—शृङ्गार और अद्भुत रस बाहुल्य (दे० कथासरित्सागर) । इसके अतिरिक्त पाली तथा प्राकृत की शैली बहुत अपरिष्कृत है। अतः प्राकृत साहित्य उपर्युक्त कारणों से संस्कृत-काव्य का आधार तथा आदर्श होने के नितान्त अनुपयुक्त सिद्ध होता है। वस्तुतः कथासरित्सागर भी कोई नवीन रचना नहीं है। शिवजी ने ही इतिहासपुराणों की अधिकांश कथाओं का वर्णन किया है। शिव-पार्वती के संवाद का ही पिशाचभाषा में बृहत्कथा के रूप में उल्लेख हुआ है। कथासरित्सागर उसी पर आधारित है। शृङ्गार और अद्भुत रस पुराणों में कम नहीं है। वेदों में उक्त दोनों बातें हैं ही। ई० पू० दूसरी, तीसरी शताब्दी में रामायण का निर्माण मान लेने पर भी आर्ष प्रयोगों का समर्थन नहीं हो सकता, क्योंकि “लक्ष्यैकचक्षुष्क ऋषि” ही आर्ष प्रयोग करता है। लक्षणैकचक्षुष्क कोई कवि आर्ष प्रयोग करने का अधिकारी नहीं होता। समस्त शब्दों की शुद्धि और अशुद्धि जो पाणिनि आदि के समान आर्ष ज्ञान से जान सकता है वही ऋषि पाणिनि आदि के लक्षणों, सूत्रों से असिद्ध परन्तु अपने आर्ष-विज्ञान से सिद्ध शब्दों का प्रयोग कर सकता है। जो लोग समझते हैं प्राकृत का ही संस्कार कर संस्कृत निष्पन्न होता है उनका यह भ्रम है, क्योंकि वह प्राकृत-व्याकरण के विरुद्ध है। प्राकृत व्याकरण में कहा गया है— “प्रकृतिः संस्कृतं तस्माद्भवं प्राकृतम्।” संस्कृत ही प्रकृति है, उससे उद्भूत भाषा ही प्राकृत भाषा है। अतएव वेद के मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् आदि की भाषा प्राकृत भाषा से बहुत प्राचीन है और वह संस्कृत ही है। यद्यपि संस्कृत शब्दों के साथ ही अपभ्रंश शब्द भी होते हैं; जैसे चलनी के द्वारा ग्राह्याग्राह्य पदार्थों से ग्राह्य वस्तु का पृथक्करण किया जाता है वैसे ही संस्कृत शब्दों को अपभ्रंश शब्दों से पृथक् कर देना ही शब्दों का संस्कार है। अतएव राम के समकाल में वेदार्थ उपबृंहण की दृष्टि से ही संस्कृत भाषा में ही महर्षि वाल्मीकि ने रामायण का निर्माण किया। १३६ वें अनु० के अनुसार बुल्के कहते हैं, “आठवें अध्याय में बालकाण्ड को प्रक्षिप्त सिद्ध किया गया है। डा० याकोबी के अनुसार आदिरामायण का प्रारम्भ बालकाण्ड के निम्नलिखित श्लोकों में सुरक्षित है— सर्ग ५ श्लोक १-४ रामायण की स्तुति । सर्ग ५, श्लोक ५-६ कोशल तथा अयोध्या की स्तुति । सर्ग ५, श्लोक ९ } दशरथ की स्तुति । सर्ग ६, श्लोक २-४ सर्ग १८, श्लोक १६-२१ (उत्तरार्द्ध) २२; दशरथ के पुत्रों का उल्लेख । सर्ग १८, श्लोक २५ पुत्रों की स्तुति (अथवा अयोध्याकाण्ड १, १)। सर्ग १८, श्लोक २४-१२; राम की श्रेष्ठता (अथवा अयोध्याकाण्ड १,६-८। इस भूमिका के बाद काव्य की मुख्य वस्तु का प्रारम्भ हुआ होगा। (दे० अयोध्याकाण्ड सर्ग २, श्लोक ३६ )” उपर्युक्त कल्पना के किसी आधार का बुल्के उल्लेख नहीं करते। वस्तुतः उपलब्ध सम्पूर्ण बालकाण्ड प्रामाणिक रामायण है और उसके बिना रामायण अधूरा ही रहेगा। अयोध्या तथा दशरथ का वर्णन तथा उनका अश्वमेध तथा पुत्रेष्टियज्ञ, पुत्र-जन्म, उनका संस्कार, विश्वामित्र का आगमन, राम-लक्ष्मण का उपनयन, सिद्धाश्रम- गमन, मिथिलागमन, विवाह आदि के बिना अयोध्याकाण्ड का अकस्मात् आरम्भ होना सर्वथा असङ्गत ही है। इसके अतिरिक्त बालकाण्ड को ही प्रक्षिप्त मान लेने पर उपर्युक्त तालिका के कुछ श्लोकों को ही किस आधार पर प्रामाणिक कहा जा सकता है ? निश्चय ही किसी पुष्ट प्रमाण के समर्थन के अभाव में ऐसे कथन अमान्य ही हैं।

अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २३३ १३७ वें अनु० में 'आदिरामायण के विकास के सम्बन्ध में बुल्के लिखते हैं, “आदिरामायण का विकास समझने के लिए उसके प्रचार की रीति को ध्यान में रखना परमावश्यक है। बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड में लिखा गया है कि वाल्मीकि ने अपने शिष्यों को रामायण सिखलाकर उसे राजाओं, ऋषियों तथा जनसाधारण को सुनाने का आदेश दिया— “कृत्स्नं रामायणं काव्यं गायतां परया मुदा । ऋषिवाटेषु पुण्येषु ब्राह्मणावसथेषु च ॥ रथ्यासु राजमार्गेषु पार्थिवानां गृहेषु च ॥” (वा० रा० ७।९३।४, ५) इससे ज्ञात होता है रामायण काव्य मौखिकरूप से प्रचलित था । कुशीलव सारे देश में उसे गाकर सुनाते थे और इस प्रकार अपनी जीविका चलाते थे । वे काव्योपजीवी ही थे । रामायण काव्य उनको कण्ठस्थ था और वे उसे अपने पुत्रों को सिखलाते थे । रामायण का कोई ग्रन्थ प्रचलित नहीं था और न प्राचीन फलश्रुति और श्रवणफलस्तुति ही थी । “श्रुत्वा रामायणमिदं दीर्घमायुश्च विन्दति ।” ( वा० रा० ६।१२८।१०९ ) बाद में रामायण के पढ़ने तथा लिखने का भी उल्लेख मिलता है— “रामायणमिदं कृत्स्नं शृण्वतः पठतः सदा ।” ( वा० रा० ६।११७।११८ ) "भक्त्या रामस्य ये चेमां संहितामृषिणा कृताम् । ये लिखन्तीह च नरास्तेषां वासस्त्रिविष्टपे ॥” ( वा० रा० ६।१२८।१२० ) लेकिन फलश्रुति का यह अंग गौड़ीयपाठ में नहीं मिलता । टीकाकार कतक ने भी उसे प्रक्षिप्त माना है ।" वस्तुतः ऐसे कथन उत्तरदायित्व-हीन हैं । किसी भी ठोस प्रमाण के सर्वथा अभाव में किसी भी ग्रन्थ के किसी भी अंश को प्रक्षेप कह देना और उन्हीं अंशों में से अपने स्वार्थ के अनुगुण कुछ अंशों को स्वीकार कर लेना नितान्त साभिप्राय कुतर्क ही है । यदि ऐसे लेखकों से प्रश्न किया जाय कि वे किस अधार पर यह कहते हैं कि अमुक अंश महर्षि वाल्मीकि की रचना है और अमुक प्रक्षेप है ? इसे किसने देखा है ? किस वर्ष, किस समय, किस पक्ष, किस तिथि में किसने कब इस अंश को लिखकर रामायण में जोड़ा था इसका प्रमाण क्या है ? और उस प्रमाण की प्रामाणिकता क्या है ? तो निश्चय ही वे कोई युक्तिसङ्गत उत्तर नहीं दे सकेंगे । उसी बालकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड को प्रक्षिप्त भी कहना और उसमें से ही प्रमाणरूप से श्लोक उद्धृत भी करना अर्धकुक्कुटी-न्याय है । जैसे कोई कुक्कुटी के एक अंश को पाक के लिए और दूसरे अंश को प्रजनन के लिए रखना चाहता हो । उक्त दोनों क्रियाएँ एक ही साथ कदापि सम्भव नहीं, क्योंकि यह असङ्गत है । ठीक इसी तरह बालकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड को प्रक्षेप कहते हुए उसके कुछ श्लोकों से स्वमन्तव्य की पुष्टि भी करना दोनों ही असङ्गत हैं । यह ठीक है कि उस समय कण्ठस्थ करने की पद्धति ही अधिक थी, परन्तु लेखन प्रणाली थी ही नहीं, यह कहना भी अनभिज्ञता का ही परिचय देना है । बहुत प्राचीनकाल से मन्त्रलेखन की पद्धति प्रचलित है। उसी आधार पर 'ये लिखन्तीह' यह फलश्रुति भी सङ्गत ही है । वह गौड़ीय पाठ में भले न मिलती हो, परन्तु दाक्षिणात्य आदि पाठों में तो मिलती ही है । रामायण के अनुसार वाल्मीकि ने जिन शिष्यों को रामायण पढ़ाकर राजाओं, ऋषियों तथा जनसाधारण में गाने को कहा उनमें प्रमुख कुश और लव थे, जो सीता के पुत्र थे, उन्हीं को कुशीलव भी कह दिया गया है । वे ३०

२३४ रामायणमीमांसा सप्तम काव्योपजीवी तथा उसके द्वारा जीविका चलानेवाले नहीं थे । बुल्के का उक्त कथन उपजीव्यविरोधी होने से अत्यन्त हेय है । वे जिस ( उत्तरकाण्ड सर्ग ९३ ) आधार पर रामायण के कण्ठस्थ गाने का समर्थन करते हैं और कुश एवं लव को काव्योपजीवी कुशीलव सिद्ध करने का दुःसाहस करते हैं उसी से उनका कथन विरुद्ध है । वहाँ महर्षि ने अन्य शिष्यों को नहीं, किन्तु कुश एवं लव दो ही शिष्यों को रामायण-गान का आदेश दिया— “स शिष्यावब्रवीदृष्टो युवां गत्वा समाहितौ । कृत्स्नं रामायणं काव्यं गायतां परया मुदा ॥ ऋषिवाटेपु पुण्येषु ब्राह्मणावसथेषु च । रथ्यासु राजमार्गेषु पार्थिवानां गृहेषु च ॥ रामस्य भवनद्वारे यत्र कर्म च कुर्वते । ऋत्विजामग्रतश्चैव तत्र गेयं विशेषतः ॥” ( वा० रा० ७।९३।४-६ ) अर्थात् महर्षि वाल्मीकि ने अपने दोनों शिष्यों—कुश एवं लव को, जो सीता के पुत्र थें, कहा कि तुम दोनों जाकर समाहित होकर प्रसन्नता से सम्पूर्ण रामायण का गान करो । पुण्य ऋषिवाटों ( अहातों ), ब्राह्मणों के आवासों, रथ्याओं, राजमार्गों, छोटे राजाओं के महलों और रामभवन के द्वार पर और ऋत्विज जहाँ अश्वमेधसम्बन्धी कर्म कर रहे हों विशेषतः वहाँ गान करो । बुल्के यदि उत्तरकाण्ड और बालकाण्ड को प्रमाण मान लेते हैं तो उनके कल्पना के सभी महल ढह जायँगे । इसी लिए वे उन्हें पहले से ही प्रक्षेप कहने की कल्पना करते हैं । वे काव्योपजीवी कुशीलव थे, उसके द्वारा जीविका चलाते थे उनकी यह कल्पना भी आगे के श्लोकों से समूल ध्वस्त हो जाती है । महर्षि कुश और लव को सम्बोधन कर कहते हैं । “वत्सो ! इन उत्तम स्वादवाले विविध फलों को, जो कि पर्वताग्रों में उत्पन्न हुए हैं, खाकर तुम गायन करना, इन सुमिष्ट फल-मूलों को खाने से तुम दोनों को श्रम ( थकावट ) न होगा और इनके खाने से तुम दोनों का कण्ठमाधुर्यरूप राग भी नहीं मिटेगा । महर्षि ने पुनः सावधान किया कि महीपति राम यदि तुमको श्रवण के लिए बुलायें तो जाना और उपविष्ट ऋषियों के समक्ष यथायोग्य गान करना । परन्तु धन की वाञ्छा से स्वल्प भी लोभ न करना, क्योंकि हम फलमूलाशी आश्रमवासियों के लिए धन का क्या प्रयोजन है— “लोभश्चापि न कर्तव्यः स्वल्पोऽपि धनवाञ्छया । किं धनेनाश्रमस्थानां फलमूलाशिनां सदा ॥” ( वा० रा० ७।९३।११ ) राम ने पहले ही दिन रामायण के बीस सर्ग सुनने पर प्रसन्न होकर लक्ष्मण को आदेश दिया कि अठारह- अठारह हजार सुवर्ण मुद्राएँ दोनों बालकों को पृथक्-पृथक् दी जायँ और भी जो इनकी इच्छा हो दिया जाय । लक्ष्मण ने वैसा ही किया, परन्तु दोनों ने सुवर्ण मुद्राओं को लेना अस्वीकार किया और कहा “इस सुवर्ण-राशि से हमें क्या प्रयोजन है ? हम लोग तो वनवासी हैं, वन्य फलमूल से ही तृप्त हैं ।” उनकी ऐसी बातें सुनकर सभी श्रोताओं और राम को बड़ा कौतूहल और विस्मय हुआ— “श्रुत्वा विंशतिसर्गास्तान् भ्रातरं भ्रातृवत्सलः । अष्टादशसहस्राणि सुवर्णस्य महात्मनोः ॥ प्रयच्छ शीघ्रं काकुत्स्थ यदन्यदभिकाङ्क्षितम् । ददौ स शीघ्रं काकुत्स्थो बालयोर्वे पृथक्-पृथक् ॥ दीयमानं सुवर्णं तु नागृह्णीतां कुशीलवौ । ऊचतुश्च महात्मानौ किमनेनेति विस्मितौ ॥

अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २३५ वन्येन फलमूलेन निरतौ वनवासिनौ । सुवर्णेन हिरण्येन कि करिष्यावहे वने ॥" (वा० रा० ७।९४।१७-२०) क्या ऐसी उक्ति काव्योपजीवी जाति कुशीलवों के लिए सम्भव थी ? क्या कुशीलव वनवासी होते थे ? बुल्के इस तथ्य को क्यों नहीं समझना चाह रहे हैं कि "कुशीलवौ" शब्द से प्रकृत में द्वन्द्वसमास के द्वारा कुश और लव सीता के दो पुत्र ही विवक्षित हैं, कोई कुशीलव नामक काव्योपजीवी जाति नहीं । बालकाण्ड में भी कुश-लव को 'कुशीलवौ' कहा गया गया है—यहाँ एकवचन या बहुवचन का नहीं, किन्तु अश्विनौ के समान द्विवचन का ही सर्वत्र प्रयोग हुआ है । साथ ही उन्हें मुनिवेष-धारी राजकुमार कहा गया है— "तस्य चिन्तयमानस्य महर्षेर्भावितात्मनः । अगृह्णीतां ततः पादौ मुनिवेषौ कुशीलवौ ॥ कुशीलवौ तु धर्मज्ञौ राजपुत्रौ यशस्विनौ । भ्रातरौ स्वरसम्पन्नौ ददर्शाश्रमवासिनौ ॥" ( वा० रा० १।४।४,५ ) उत्तरकाण्ड में महर्षि वाल्मीकि राम से कुश और लव के सम्बन्ध में कहते हैं, "ये दोनों जानकी से उत्पन्न तुम्हारे हो यमज पुत्र हैं, यह मैं सत्य कहता हूँ—" "इमौ तु जानकीपुत्रावुभौ च यमजातको । सुतो तवैव दुर्धर्षौ सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥" ( वा० रा० ७।९६।१७ ) बुल्के उपर्युक्त सम्पूर्ण तथ्यों की उपेक्षा कर कुश और लव को काव्योपजीवी कुशीलव कहते हैं । वस्तुतः साङ्गोपाङ्ग रामायण का प्रमाण न मानने से ऐसे ही भ्रान्तिपूर्ण अनर्थ की सम्भावना होती हैं। बुल्के के लिए यह समझना उचित है कि काव्योपजीवी कुशीलव को काव्य से जीविका चलाना होता तो वे रथ्याओं, राजमार्गों, राजाओं के महलों, ऋषिवाटों, ब्राह्मणावसथों तथा जनसाधारण में रामायण का गान करते हुए क्यों घूमते ? यदि वे सादर उत्तरकाण्ड का अध्ययन करें तो उनके लिए भी स्पष्ट हो जायगा कि वस्तुतः इस सब का उद्देश्य सीता के चरित्र की पवित्रता और निर्मलता स्थापन करना ही था । यह भी विचारणीय है कि आश्रम में सीता के आने के बाद ही रामायण के निर्माण का प्रसङ्ग क्यों आता है ? लक्ष्मण वाल्मीकि आश्रम के समीप अन्तर्वत्नी सीता को पहुँचा कर लौट गये । रुदन करती हुई सीता को देखकर मुनि-बालकों ने जाकर वाल्मीकि को बताया कि कोई अदृष्टपूर्वा श्री के समान किसी की पत्नी स्वर्गच्युत देवता के समान दुःखित है । मुनिपुङ्गव वाल्मीकि ने शोकव्याकुल सीता से मधुर एवं आह्लादिनी वाणी से कहा कि तुम दशरथ की स्नुषा और राम की पत्नी तथा जनक की पुत्री हो मैंने सब समाधि से जान लिया है । तुम्हारे त्याग का कारण भी मैंने जान लिया है । तुम निष्पाप हो यह भी मैंने तपोबललब्ध चक्षु से देख लिया है। यहीं समीप में तापसी लोग हैं, ये सब तुम्हारी रक्षा करेंगी । सीता ऋषि की आज्ञा के अनुसार आश्रम में रहने लगी । निर्वासिता सीता के करुण क्रन्दन जनित करुण रस से महर्षि का हृदय परिपूर्ण था; निषाद द्वारा क्रोञ्च के वध से संतप्त क्रौञ्ची के करुण क्रन्दन ने महर्षि के तादृश हृदय को आलोड़ित कर दिया, वही करुण रस महर्षि के हृदय से उच्छलित हो श्लोक बन गया— "शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोको भवतु नान्यथा ।" ( वा० रा० १।२।१८) शोकाकुलित वाल्मीकि महर्षि को मार्ग-प्रदर्शन करने के लिए ब्रह्माजी आये और उन्होंने कहा कि मेरी प्रेरणा से ही सरस्वती इस श्लोक रूप में प्रकट हुई है; तुम धर्मात्मा एवं धीर राम के सम्पूर्ण चरित्र को जैसे नारद

से सुना है वैसे और भी उनके जो रहस्य और प्रकाशमय चरित्र हैं, जो अभीतक अविदित हैं वे भी तुम्हें विदित होंगे, इस काव्य में तुम्हारी कोई भी वाणी अनृत नहीं होगी— “रामस्य चरितं कृत्स्नं कुरु त्वमृषिसत्तम । धर्मात्मनो भगवतो लोके रामस्य धीमतः ॥ वृत्तं कथय धीरस्य यथा ते नारदाच्छ्रुतम् । रहस्यं च प्रकाशं च यद् वृत्तं तस्य धीमतः ॥ रामस्य सहसौमित्रे राक्षसानां च सर्वशः । वैदेह्याश्चैव यद् वृत्तं प्रकाशं यदि वा रहः ॥ तच्चाप्यविदितं सर्वं विदितं ते भविष्यति । न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति ॥ कुरु रामकथां पुण्यां श्लोकबद्धां मनोरमाम् ।” (वा० रा० १।२।३२-३५½) पुनः तीसरे सर्ग में स्पष्टतः कहा गया है— “उपस्पृश्योदकं सम्यङ्मुनिः स्थित्वा कृताञ्जलिः । प्राचीनाग्रेषु दर्भेषु धर्मेणान्वेषते गतिम् ॥ रामलक्ष्मणसीताभी राज्ञा दशरथेन च । सभार्येण सराष्ट्रेण यत् प्राप्तं तत्र तत्त्वतः ॥ हसितं भाषितं चैव गतिर्यावच्च चेष्टितम् । तत् सर्वं धर्मवीर्येण यथावत् सम्प्रपश्यति ॥ स्त्रीतृतीयेन च तथा यत् प्राप्तं चरता वने । सत्यसन्धेन रामेण तत् सर्वं चान्ववैक्षत ॥ ततः पश्यति धर्मात्मा तत् सर्वं योगमास्थितः । पुरा यत् तत्र निर्वृत्तं पाणावामलकं यथा ॥ तत् सर्वं तत्त्वतो दृष्ट्वा धर्मेण स महामतिः । अभिरामस्य रामस्य तत् सर्वं कर्तुमुद्यतः ॥” (वा० रा० १।३।२-७) महर्षि ने आचमन कर प्राचीनाग्र कुशों पर आसीन होकर योगज धर्म से राम आदि के चरित्रों को ध्यान से देखा । राम, लक्ष्मण, सीता तथा सराष्ट्र एवं तीनों भार्याओं सहित दशरथ ने जो कुछ भी हसित, भाषित, चेष्टित, गमन आदि किया धर्मबल से ऋषि ने सब कुछ देखा । योग का आश्रयण करके पुराकाल में जो कुछ भी घटनाएँ घटी उनको करतल में स्थित आँवले की तरह सम्पूर्णतः ओर सम्यगरूप से महर्षि ने देख लिया । उन महर्षि के आश्रम में ही सीता के दो पुत्र हुए । उत्तरकाण्ड के ६०वें सर्ग में उल्लेख है कि जिस रात में मथुरा जाते हुए शत्रुघ्न वाल्मीकि महर्षि के आश्रम में जाकर रुके थे उसी रात में सीता ने दो बालकों को जन्म दिया । मुनिबालकों से समाचार पाकर मुनि ने वहाँ जाकर बालकों की राक्षसादि-विनाशिनी रक्षा की व्यवस्था की । कुश से ऋषि ने जिस बालक की रक्षा की व्यवस्था की उसका नाम कुश हुआ और लव से जिसका मार्जन किया उसका नाम लव हुआ । नागेश के अनुसार छिन्न कुशों का अग्रभाग कुश कहा जाता है एवं अधोभाग लव कहा जाता है । इसी तरह वाल्मीकि मुनि के आश्रम में ही पालित, पोषित एवं संस्कृत होकर उन दोनों बालकों कुश और लव ने मुनिवेष

अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २३७ में महर्षि वाल्मीकि के समीप में ही वेदादि शास्त्रों तथा धनुर्वेद आदि का अध्ययन किया। यह सब पूर्वापरप्रसङ्गों से सुतरां सिद्ध हो जाता है। राजा द्वारा त्यक्त सीता को अपने आश्रम में आवास देकर मुनि को सीता और उसके बालकों के सम्बन्ध में चिन्ता होनी स्वाभाविक ही थी। इस सबके लिए परमावश्यक था कि सीता के विशुद्ध चरित्र का प्रख्यापन हो, इस दृष्टि से ही ब्रह्मा के आदेशानुसार ऋषि ने ऋतम्भरा प्रज्ञा से सीता, राम, लक्ष्मण आदि के गुप्त और प्रकट हसित, भाषित, इङ्गित, चेष्टित आदि अतीत चरित्रों का साक्षात्कार कर रामायण का निर्माण किया (सर्ग ३,४)। वस्तुतः वह सीताचरित्र ही था, परन्तु एक पतिव्रता का चरित्र उसके पति के चरित्र से ही साङ्गोपाङ्ग सम्पन्न होता है, इसलिए वह रामचरित्र रामायण भी है। “काव्यं रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत्। पौलस्त्यवधमित्येवं चकार चरितव्रतः॥” (वा० रा० १।४।७) रामचरित्र रामायण और सीताचरित्र के उस महाकाव्य का पौलस्त्यवध यह नाम रखा गया। सीताचरित्र होने से ही धीरोदात्त नायक राम रामायण के श्रवण में प्रवृत्त हुए थे। आत्मचरित्रश्रवण से तो धीरोदात्त नायक को संकोच ही होता है। सीता के निर्मल चरित्र का काव्य बन गया, परन्तु उसका प्रचार कैसे हो यह विचार मुनि के सामने उपस्थित हो ही रहा था उसी समय कुश और लव दोनों ने आकर मुनि का पाद-वन्दन किया। दोनों राजपुत्र हैं, आश्रमवासी हैं और उन्होंने वेदाध्ययन कर लिया है. अतः वेद के उपबृंहणार्थ मुनि ने उन दोनों बालकों को रामायण का अध्ययन कराया— “स तु मेधाविनौ दृष्ट्वा वेदेषु परिनिष्ठितौ। वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः॥” (वा० रा० १।४।६) सीता के निर्मल चरित्र के प्रख्यापन के लिए रामायण का प्रखर प्रचार अनिवार्य था, अतः प्रचार का ढङ्ग भी अत्यन्त आकर्षक होना आवश्यक था। रामायण पाठ्य होने के साथ ही उत्कृष्ट गेय भी था। कुश और लव दोनों गान्धर्वशास्त्र के भी तत्त्वज्ञ थे। साथ ही स्थान, मूर्च्छना आदि के भी विद्वान् थे और स्वर (मधुरकण्ठ) सम्पन्न थे एवं गन्धर्वों के समान अत्यन्त रूपवान् भी थे। उत्तम रूप एवं लक्षणों से युक्त तथा मधुरस्वरभाषी वे दोनों राम के पुत्र सूर्य-बिम्ब से उत्थित दो प्रतिबिम्बों के तुल्य ही राम के प्रतिबिम्ब जैसे ही लगते थे। उन दोनों धर्मज्ञ राजपुत्रों ने इस काव्य को वाचाविधेय (कण्ठस्थ) कर लिया। द्रुत, मध्य, विलम्ब तीनों प्रमाणों तथा षड्जादि सप्त स्वरों एवं वीणातन्त्रीलय के साथ इस महाकाव्य रामायण को ऋषियों की सभा में गाया। उनके गान को सुनकर सब मुनियों के नेत्र आनन्दाश्रु से पूर्ण हो गये। सभी साधु साधु कहते हुए गानकौशल और माधुर्य से विस्मित तथा प्रसन्न होकर प्रशंसा करने लगे। इस काव्य का वृत्त यद्यपि बहुत पहले का था तो भी लोकोत्तर काव्य के लोकोत्तर गान से सब प्रत्यक्षवत् प्रतीत होने लगा। उनके अति मधुर गान से प्रसन्न हो भिन्न-भिन्न मुनियों ने सुन्दर कलश, वल्कल वसन, कृष्णाजिन, यज्ञसूत्र, कमण्डलु, मौञ्जी, वृधी, कौपीन, कुठार, काषाय वस्त्र, चीर, जटाबन्धन काष्ठरज्जु, यज्ञ-भाण्ड आदि विभिन्न वस्तुएँ पुरस्कार के रूप में उन दोनों राजकुमारों को प्रदान कीं। उसी समय नैमिषारण्य में राम का अश्वमेध चल रहा था। देश-देशान्तर के सभी प्रतिष्ठित ब्रह्मर्षि, राजर्षि तथा अन्य प्रतिष्ठित व्यक्ति एकत्रित थे। महर्षि वाल्मीकि भी निमन्त्रित होकर वहाँ गये थे। कुश और लव के सर्वश्रुतिमनोहर रामायण के गान से सभी प्रभावित थे। उन विशिष्ट जनों तथा जन साधारण से भी कुश, लव की प्रशंसा सुनकर भरताग्रज राम ने उन्हें अपने भवन में बुलाकर उनका सम्मान किया और विशिष्ट जनों की महती

सभा में उन्हें इस काव्य के गान के लिए प्रेरित किया। तब कुश और लव ने विचित्र अर्थ और पदवाले उत्तम रामायण महाकाव्य का तन्त्रीलय के साथ अपने मधुर कण्ठों से सबके सर्व गात्र, श्रोत्र, मन और हृदयों को आह्लादित करते हुए गायन किया। सभासदों सहित उस समय राम भी सङ्गीत-श्रवण में दत्तचित्त हो गये। उक्त काव्यश्रवण से सीता और राम आदि के गुप्त एवं प्रकट दिव्य चरित्रों का स्फुट प्रकाश हुआ। सीता के प्रति कुछ लोगों के मन में उत्पन्न विविध संशय, विपर्यय आदि का समूल उन्मूलन हो गया; सीता का निर्मल चरित्र सबके हृदय में प्रकाशित हो गया। उत्तरकाण्ड के ९४वें सर्ग के प्रसङ्गानुसार राम ने अश्वमेध यज्ञ के प्रसङ्ग से महामुनियों, राजाओं तथा नैगमों, वैदिकों, पौराणिकों, शब्दविदों, वृद्धों, द्विजातियों तथा स्वरों के लक्षणज्ञों, उत्कृष्ट द्विजसत्तमों, लक्षणज्ञों, गान्धर्वतत्त्वज्ञों तथा पाद-अक्षर-समास-विदों, छन्दपरिनिष्ठित जनों, कलातत्त्वज्ञों, ज्योतिषविशेषज्ञों, क्रियाकल्पज्ञों, कार्यविशारदों, हेतूपचारकुशल जनों, चित्रकलानिपुण जनों, वृत्तिसूत्रज्ञों तथा नृत्य-गीतविशारदों आदि सब श्रेणी के विशेषज्ञों को निमन्त्रित कर उनकी महतो सभा में कुश और लव को रामायण का गान करने के लिए आमन्त्रित किया। कुश और लव के अतिमानुष मधुर गन्धर्व-स्वर से सभी श्रोता मन्त्र-मुग्ध हो गये। मुनिगण एवं पार्थिवगण बारम्बार चक्षु से पान करते हुए वे उन दोनों बालकों, कुश और लव को बारम्बार देखते हुए आपस में कह रहे थे कि ये दोनों इस तरह राम के तुल्य लगते हैं जैसे सूर्यविम्ब से दूसरा सूर्य-बिम्ब ही उदित हुआ हो। यदि ये दोनों बालक जटायुक्त और वल्कलधारी न होते तो राघवेन्द्र राम और इन दोनों बालकों में कोई भेद अवगत न होता — “जटिलौ यदि न स्यातां न वल्कलधरौ यदि। विशेषं नाधिगच्छामो गायतो राघवस्य च॥” (वा० रा० ७।९४।१४) उपर्युक्त सम्पूर्ण वक्तव्य से स्पष्ट है कि कुश और लव दोनों ही राम के पुत्र, राजकुमार थे न कि तथा- कथित कुशीलव नृत्यगीत-काव्योपजीवी जातिविशेष। उत्तरकाण्ड के ९५वें सर्ग में कहा गया है राम ने बहुत दिनों तक परम शुभ गीत मुनियों, राजाओं एवं सुग्रीव-हनुमान् वानर आदिकों के साथ सुना और उस गानप्रसङ्ग में ही कुश और लव को सीता पुत्र जान लिया— “तस्मिन् गीते तु विज्ञाय सीतापुत्रौ कुशीलवौ। तस्याः परिषदो मध्ये रामो वचनमब्रवीत्॥” (वा० रा० ७।९५।२) यदि बुल्के ने इन सब वचनों को ध्यान से पढ़ा होता तो निश्चय ही वे ऐसी विपरीत कल्पना नहीं कर सकते थे। अपने काल्पनिक मन्तव्य की रक्षा के लिए ही बुल्के ने इन सब सर्गों को प्रक्षेप कहा है। उपर्युक्त प्रकरणों से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वाल्मीकिरामायण का निर्माणकाल राम का सिंहासनारूढ़ होने का काल ही था, क्योकि राम द्वारा किये गये अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर ही कुश और लव द्वारा इसका गान हुआ था, अतः निश्चय के साथ कहा जा सकता है कि इसका निर्माणकाल ई० पू० दूसरी शती कदापि नहीं हो सकता। आश्चर्य तो यह है कि जिन प्रसङ्गों के आधार पर 'कुशीलव' शब्द को मान लेते हैं उन्हीं प्रसङ्गों से व्यक्त, उन्हीं से सम्बद्ध अन्य बातों को, कुश और लव का सीता-पुत्र या राम-पुत्र होना, राम-सभा में रामायण का सुना जाना आदि को, प्रक्षेप मान लेते हैं यही अर्ध-जरतीय न्याय है। इसी सर्ग में यह भी उल्लेख है कि उसी महापरिषद् में शुद्ध समाचारवाले दूतों को बुलाकर राम ने उनसे कहा “भगवान् बाल्मीकि के समीप जाकर यह कहो कि यदि सीता शुद्धसमाचारा हैं, वीतकल्मषा हैं, तो मुनि की अनुमति से आत्मशुद्धि को प्रमाणित करें; यदि मुनि की इच्छा हो तो उनके मनोगत भावों को जानकर बताओ। कल प्रातः समय जनकात्मजा मैथिली अपनी और मेरी शुद्धि के लिए सभा में सबके समक्ष शपथ करें।” उन दूतों ने

अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २३९ जाकर अमितप्रभ महात्मा वाल्मीकि से सब कुछ कहा। मुनि ने सब सुनकर और राम की इच्छा को जानकर कहा कि ठीक है जैसा राम कहते हैं वैसा ही होगा। सीता वैसा ही करेगी, क्योंकि स्त्री का परम दैवत पति ही होता है। राजदूतों ने आकर राम को मुनि का कथन सुनाया। राम प्रसन्न हुए और एकत्रित ऋषियों और राजाओं से उन्होंने कहा, शिष्यों सहित सभी ऋषि तथा अपने परिकरों सहित नृपतिगण तथा और भी जो चाहते हों सभी आकर सीता का शपथ लेना (पातिव्रत्य तथा शुद्धि का प्रमाण, प्रत्यय) देखें। महात्मा राघव के उक्त वचन सुनकर महर्षियों तथा राजाओं में महान् साधुवाद हुआ। प्रभावशाली महान् राजा तथा मुनिश्रेष्ठगण राघव की प्रशंसा करने लगे। इसी काण्ड के ९६ वें सर्ग के उल्लेखात्नुसार रात के बीतते ही राम ने वसिष्ठ, विश्वामित्र, वामदेव, जाबालि, कश्यप, दीर्घतमा, दुर्वासा, पुलस्त्य, शक्ति, भार्गव, दीर्घायु मार्कण्डेय, महायशा मौद्गल्य, गर्ग, च्यवन, शतानन्द, भरद्वाज, अग्निपुत्र सुप्रभ, नारद, पर्वत, गौतम आदि आदि मुनिवरों को बुलवाया और वे सब आये। महावीर्य राक्षस तथा महाबल वानर एवं अन्य सभी लोग कौतूहलवश आये। सहस्रों क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र तथा नाना देशों के ब्राह्मण सीता का शपथ देखने के लिये आये। सबके आने की बात जानकर सीता के साथ मुनिवर वाल्मीकि वहाँ आये। ऋषि के पीछे-पीछे राम को मन में रखकर अवाङ्मुखी कृताञ्जलि, बाष्पकलायुक्त सीता आयीं। ब्रह्मा का अनुगमन करती हुई श्रुति के समान मुनि के पीछे-पीछे आती हुई सीता को देखकर जन-समूह में महान् साधुवाद हुआ। सीता और राम के जन्म से लेकर होनेवाले विशाल दुःख-परम्परा का चिन्तन करके सभी के अन्तःकरण क्षुब्ध हो उठे। कोई राम का और कोई सीता का साधुवाद करने लगे। कोई प्रेक्षक दोनों का साधुवाद करने लगे। उस समय उस महान् जनौघ में सीता को साथ लिए हुए वाल्मीकि बोले, "दाशरथे ! सीता सुव्रता एवं धर्मचारिणी है; अपवादभय से आप द्वारा मेरे आश्रम के समीप परित्यक्ता होकर मेरे आश्रम में रही, सीता आप के समक्ष अपने सतीत्व का प्रमाण, प्रत्यय देगी। ये दोनों बालक, कुश और लव जानकी में उत्पन्न तुम्हारे पुत्र हैं। मैं प्रचेता का दसवाँ पुत्र हूँ—मैंने कभी अनृत वाक्य कहा हो तो इसका मुझे स्मरण नहीं होता; बहुत वर्षों तक मैंने तपश्चर्या की है; यदि मैथिली दुष्टा हो तो मैं उन तपश्चर्याओं का फल न पाऊँ । मनसा, वाचा और कर्मणा मुझसे कभी किल्बिष नहीं हुआ। यदि मैथिली निष्पाप है तो मैं उसका फल भोगूँगा, पञ्च ज्ञानन्द्रियों सहित मन से चिन्तन करके सीता को अत्यन्तशुद्धसमाचार एवं निष्पाप जानकर ही मैंने वन में उसे अपने आश्रम में रखा है। यद्यपि आप भी सीता को शुद्ध मानते हैं तो भी सीता प्रत्यय देगी। सर्ग ९७ में उल्लेख है; राम ने कहा ब्रह्मन्, आप के अकल्मष वचनों में मुझे पूर्ण विश्वास है। देवताओं के सन्निधान में जानकी ने पहले भी, लङ्का में, प्रत्यय दिया है तो भी लोकापवाद के भय से मैंने जानकी को निष्पाप जानते हुए भी उनका त्याग किया था। ये कुश और लव मेरे पुत्र हैं, यह भी मैं जानता हूँ। मेरा आशय जानकर सीता-शपथ के प्रसङ्ग में सभी देवगण आये हैं। लोकपितामह ब्रह्मा को आगे कर आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वे- देव, मरुद्गण तथा साध्य देवता एवं सभी परम महर्षि, नाग, सुपर्ण और सिद्ध सब आये हैं। राघव ने सबको देखकर कहा, "ऋषि के निष्कल्मष वाक्यों में हमें सीता के प्रति पूर्ण प्रत्यय (विश्वास) है और संसार में परम पवित्र सीता में मेरी स्थिर प्रीति है। उस समय दिव्य, शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु जनौघ को आह्लादित करने लगा। सभी राष्ट्रों से आये हुए मानवों ने सत्ययुगीय उस अद्भुत शीतल, मन्द, सुगन्ध दिव्य वायु का अनुभव किया। काषायवसना सीता ने चतुर्दश भुवनस्थ जनसमुदाय को देखकर अवाङ्मुखी तथा अधोदृष्टि प्राञ्जलि-बद्ध होकर कहा मैं राघव से अन्य किसी का कभी मन से भी चिन्तन नहीं करती, यदि यह सत्य है तो माधवी धरित्री देवी मुझे अवकाश प्रदान करे। इस तरह सीता शपथ कर रही थी कि एक अद्भुतचमत्कार हुआ भूतल से एक अत्यन्त उत्तम दिव्य सिंहासन प्रकट हुआ। जिसे अमित विक्रमवाले दिव्य रत्नभूषित नागों ने अपने फणों पर धारण कर रखा

२४० रामायणमीमांसा सप्तम था। धरणी देवी उसी अलौकिक दिव्य सिंहासन पर स्वागत और अभिनन्दन पूर्वक मैथिली को अपनी बाहुओं से ग्रहण कर दिव्य आसन पर बैठाती है। उस दिव्य आसन पर समासीन होकर रसातल में प्रविष्ट होती हुई सीता पर देवताओं द्वारा महान् जय-जयकार तथा साधुकार के साथ अविच्छिन्न रूप से मुक्त दिव्य पुष्प-वृष्टि हुई। “तथा शपन्त्यां वैदेह्यां प्रादुरासीत् तदद्भुतम् । भूतलादुत्थितं दिव्यं सिंहासनमनुत्तमम् ॥ ध्रियमाणं शिरोभिस्तु नागैरमितविक्रमैः । दिव्यं दिव्येन वपुषा दिव्यरत्नविभूषितैः ॥ तस्मिंस्तु धरणी देवी बाहुभ्यां गृह्य मैथिलीम् । स्वागतेनाभिनन्द्यैनामासने चोपवेशयत् ॥ तामासनगतां दृष्ट्वा प्रविशन्तीं रसातलम् । पुष्पवृष्टिरविच्छिन्ना दिव्या सीतामवाकिरत् ॥ साधुकारश्च सुमहान् देवानां सहसोत्थितः । साधु वै साध्विति सीते यस्यास्ते शीलमीदृशम् ॥” (वा० रा० ७।९६।१७-२१) “सीते ! साधु—तुम्हारा शील लोकोत्तर है” इस प्रकार अन्तरिक्षस्थ देवताओं की बहुविध वाणियां प्रकट हुई—यज्ञवाट के सभी राजागण विस्मित हुए। अन्तरिक्ष तथा भूमि के सभी स्थावर, जङ्गम तथा महाकाय दानव एवं पाताल के पन्नगेन्द्र विस्मयान्वित होकर, कोई प्रहृष्ट होकर ‘जय जय’ एवं ‘साधु साधु’ नाद करने लगे; कोई ध्यानपरायण हो गये। कोई राम को और कोई सीता को देखते हुए विसंज्ञ हो रहे थे। सीता के रसातल प्रवेश से वानर, राक्षस, मानव सभी संतप्त हुए । श्रीराम अत्यन्त संतप्त हुए । ब्रह्माजी देवताओं के साथ आकर राम और सीता के दिव्य वैष्णव माहात्म्य का वर्णन करके सान्त्वना देते हैं। पद्मपुराण के उल्लेखानुसार सीता के लिए रसातल से गरुड़जी प्रकट हुए और अपनी पीठ पर रत्नमय सिंहासन को लेकर आये। उसपर धरणी देवी विराजमान थीं। उन्होंने मैथिली का स्वागत और अभिनन्दन कर उन्हें सिंहासन पर बैठाया। सनातनी सीता देवादि‍कों से पूज्यमान होकर योगिगम्य सनातन परम धाम को चली गयीं— “नानारत्नमयं पीठं पृष्ठे कृत्वा खगेश्वरः । रसातलादाविरभूद्विस्मयं जनयन्नृणाम् ॥ तस्मिन् पीठे महादेवीं हस्ताभ्यां गृह्य मैथिलीम् । स्वागतेनाभिनन्द्येमां संनिवेश्य तिरोदधे ॥ सा च दिव्याप्सरोभिस्तु पूज्यमाना सनातनी । वैनतेयं समारुह्य अचिरादिपथाद् रमा ॥ दासीगणैः पूर्वभवैः संवृता जगदीश्वरी । संप्राप्ता परमं धाम योगिगम्यं सनातनम् ॥” रामाभिरामीटीकायां समुद्धृताः श्लोकाः । पूर्वापर प्रसङ्ग का भलीभांति विचार करने पर स्पष्टतः विदित होता है कि वाल्मीकि महर्षि श्रीराम के समकालिक ही हैं। सीता के निर्मल चरित्र का वर्णन और प्रचार कर वे मिथ्या लोकापवाद का समूल उन्मूलन ही करने में सफल हुए हैं। उस दृष्टि से राम ने देवताओं, ऋषियों, राजाओं तथा नाना देशागत मानवों की सभा में रामायण का सबके साथ ही श्रवण किया और रामायण द्वारा वर्णित कथावस्तु की यथार्थता और सीता के वास्तविक

अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २४१ जीवन-वृत्तान्त का स्वयं अनुभव किया और सबको वैसा ही अनुभव करने का अवसर दिया। सीता के शपथ के प्रभाव से दिव्य सिंहासन के आविर्भाव आदि से तो उसकी सत्यता और भी निखर उठी। लङ्का में सीता की अग्नि-परीक्षा हो चुकी थी। ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, वायु, अग्नि आदि देवताओं, वानरों, राक्षसों ने वहाँ का चमत्कार देखा था, परन्तु चतुर्दश भुवन के सभी प्राणी और देश-देशान्तर के सभी मानवों ने वह सब नहीं देखा था। राम द्वारा उसका प्रचार कराकर मिथ्या-लोकापवाद मिटाने का प्रयत्न किया जा सकता था, परन्तु विप्रतिपन्न व्यक्ति उसे राजकीय प्रचार (प्रोपगेण्डा) कहकर महत्त्वहीन बता सकते थे। परन्तु एक अरण्यवासी, वल्कलधारी, कन्दमूलफलाशी, आप्तकाम, वीतराग महर्षि के अमर काव्य के सम्बन्ध में किसी को कुछ कहने का साहस नहीं हो सकता था। महर्षि का राम से कोई भी आर्थिक सम्बन्ध नहीं था। रामायण के प्रचारक कुश और लव भी कोई कथाकाव्योपजीवी साधारण व्यक्ति नहीं थे। वे दोनों मुनिवेष राजकुमार, श्रीराम के ही पुत्र थे। उनमें वक्ता के सर्वोत्तम गुण विद्यमान थे। वक्ता में उत्तम रूप, सौन्दर्य, कण्ठमाधुर्य, सौस्वर्य तथा वेदादि शास्त्र-विज्ञान के साथ ही साथ गान्धर्व कला-कौशल भी आवश्यक होता है। उपर्युक्त सब गुण कुश और लव में थे। उनमें राम के समान ही लोकोत्तर सुन्दरता थी, वे वेद-शास्त्रों में पारङ्गत, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद आदि में पूर्ण निष्णात थे। उनमें उत्तम कण्ठ-माधुर्य, सौस्वर्य एवं सङ्गीतकौशल विद्यमान था। वीतराग ऋषिमुनि भी उनके रामायण-गान से मुग्ध हो गये। इतने पर भी यदि वक्ता सस्पृह (लोभी) हो तो महान् से महान् गुण भी फीके पड़ जाते हैं। उनका प्रभाव महत्त्वहीन हो जाता है। अतः महर्षि ने उन्हें दिव्य, मधुर फलमूल खिलाकर कह दिया था कि अपने लोग कन्दमूलफलाशी वनवासी हैं, हम लोगों को धन से कोई प्रयोजन नहीं; अतः किसी के देने पर भी कुछ लेना नहीं। पर जो सादर सुनना चाहें उन्हें सुनाना। प्रथम दिन की कथा श्रवण कर ही राम ने प्रभूत सुवर्णराशि देने का प्रयत्न किया, परन्तु कुश-लव ने उसको स्वीकार नहीं किया। ये सब ऐसे गुण थे जिनका प्रभाव अनिवार्यरूप से सब पर पड़ा। रामायण द्वारा वर्णित कथावस्तु इतनी सत्य थी कि अयोध्या के वृद्ध लोग उसे सुनकर चिरवृत्त वृत्तान्त को प्रत्यक्ष सा अनुभव करने लगे— “चिरनिर्वृत्तमप्येतत् प्रत्यक्षमिव दर्शितम् । प्रविश्य तावुभौ सुष्ठु तथाभावमगायताम् ॥ सहितौ मधुरं रक्तं सम्पन्नं स्वरसम्पदा ।” (वा० रा० १।४।१८) नैमिषारण्य में श्रीराम का अश्वमेध यज्ञ हो रहा था। अयोध्यावासी नागरिक अधिक मात्रा में आये हुए थे। अयोध्याकाण्ड की घटनाओं में उन्हें प्रत्यक्ष अनुभूति थी। वे लोग प्रथमतः तो कुश-लव के त्याग, निःस्पृहता, दिव्य सौन्दर्य तथा तन्त्रीवादनपूर्वक मधुर सुस्वर सङ्गीत पर मुग्ध हुए। फिर, स्वानुभूत कथावस्तु का यथावत् वर्णन सुनकर आश्चर्यमग्न होकर चित्रलिखित से स्तब्ध रह गये। चिरप्रवृत्त वृत्तान्त का यथावत् वर्णन रामायण में सुनकर उन्हें आश्चर्य हुआ। वाल्मीकिरामायण आर्ष कथा होते हुए आर्ष इतिहास भी है। सीता-चरित्र की स्वच्छता की अभिव्यक्ति उसका प्रथम उद्देश्य था, अतः उसमें अप्रिय सत्य का भी स्पष्ट उल्लेख हुआ है। राजा दशरथ का भरत के प्रति शङ्का करना तथा कौशल्या का मातुल-कुल से प्रत्यागत भरत के प्रति व्यवहार अप्रिय सत्य की अभिव्यक्ति ही है। स्वानुभूत घटनाओं के यथावत् वर्णन से अत्यन्त प्रभावित अयोध्यावासियों के मन में इस महाकाव्य के रचयिता के सम्बन्ध में भी जिज्ञासा होना स्वाभाविक ही था। कोई वीतराग निःस्पृह वनवासी महर्षि वाल्मीकि उसके रचयिता हैं यह जानकर और अधिक विश्वास हुआ। स्वभावतः राम के वनवासकालिक वृत्तान्तों और सीताहरण, सुग्रीव-मैत्री, बालि-वध, सेतु-बन्धन, रावण-सीता-संवाद आदि के सम्बन्ध की सत्यता जानने की भी ३१

२४२ रामायणमीमांसा सप्तम

उत्सुकता होनी स्वाभाविक थी। कुछ लोग जिनकी संख्या नगण्य ही थी सीता के प्रति शङ्का भी करते थे । स्वभावतः निःस्पृह मुनि द्वारा निर्मित तथा निःस्पृह वक्ता द्वारा वर्ण्यमान रामायण से अरण्य एवं लङ्का की घटनाओं के प्रति शङ्का की निवृत्ति सम्भव हो सकती थी । इस तरह विविध दृष्टियों तथा भावनाओं से रामचरित्र की ओर लोगों का आकर्षण हुआ । तुलसीदास के अनुसार नीति, प्रीति, परमार्थ तथा स्वार्थ के सम्बन्ध में राम से अधिक कोई नहीं जान सकता है— “नीति प्रीति परमारथ स्वारथ कोउ न राम सम जान जथारथ ।” ( रा० मा० २।२५३।३ ) जनापवाद सुनकर राम विचलित नहीं हुए । वे जानते थे कि दण्ड देकर जनता का मुख बन्द नहीं किया जा सकता । दो एक मुख बन्द कर देने पर वही आवाज सैकड़ों मुखों से निकलने लगती है; अतः उन्होंने बहुजन- हिताय बहुजनसुखाय ही नहीं किन्तु सर्वजनहिताय सर्वजनसुखाय का ही सिद्धान्त अपनाकर स्वयं अपने विरुद्ध अल्पमत का भी सम्मान कर परम विशुद्ध जानते हुए भी सीता को वनवास

विशेषकस्य लक्ष्मीपतेः साम्यांशस्य लक्ष्मीवतो राजाधिराजस्य लोकाभिरामस्य निकटोक्योः श्रीरामात्मज- योरादिकविशिष्ययोः कुशलवयोराख्याने श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये चतुर्विंशत्साहस्रिकायां संहितायां श्रीमद्युद्धकाण्डे पञ्चविंशेऽह्नि वर्तमानकथाप्रसङ्गः समाप्तः ।" इस पुष्पिका में 'कुशीलव' का प्रयोग न होकर 'कुशलवयोः' का प्रयोग है और इसमें उन्हें राम के आत्मज कहा गया है । कुशीलव शब्द का उल्लेख बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड में ही मिलता है, परन्तु बुल्के की दृष्टि से वे दोनों ही काण्ड प्रक्षेप हैं । यदि बुल्के उपर्युक्त काण्डों को प्रक्षेप मानते हैं तो यह भी मानना पड़ेगा कि कुशीलव ने रामायण का प्रचार किया अंश भी प्रक्षेप है, अतः प्रामाणिक नहीं है । यदि उन दोनों काण्डों से कुशीलव शब्द को स्वीकार करना है तो उन्हीं काण्डों के आधार पर कुशीलव का व्यक्तित्व भी समझना पड़ेगा—तद्नुसार अत्यन्त स्पष्ट है कि कुशीलव नृत्य-गीत-काव्योपजीवी कोई जातिविशेष न होकर राम के आत्मज, राजकुमार आदिकवि वाल्मीकि के शिष्यद्वय कुश और लव थे—वे ही अश्विनौ के समान कुशीलवौ शब्द से निर्दिष्ट हुए हैं । इसी तरह महर्षि वाल्मीकि ने कैसे रामायण की रचना की यह भी बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड से ही सिद्ध होता है । यदि उक्त दोनों काण्ड और पुष्पिका अमान्य हो तो रामायण वाल्मीकि-निर्मित है यह सिद्ध करना बुल्के के लिए भी असम्भव है । यदि प्रसिद्धि के आधार पर ऐसा मान लिया जाय तो फिर स्वभावतः वाल्मीकि कुश और लव के गुरु और राम के समकालीन थे तथा उनकी रचना वाल्मीकिरामायण का निर्माण सिंहासनारूढ़ राम के काल में ही हुआ था इन प्रसिद्धियों को भी निश्चितरूप से मानना ही युक्तिसङ्गत होगा । यह स्वाभाविक है कि ग्रन्थकर्ता ग्रन्थ में ही कहीं न कहीं अपने ग्रन्थ का नाम और स्वात्मसम्बन्ध सूचित करता है । तदनुसार उपर्युक्त दोनों काण्डों में रामायण की उत्पत्ति, भूमिका, लेखक तथा प्रचारक का नाम दिया गया है । साथ ही उक्त पुष्पिका से स्पष्टरूप से विदित होता है कि सीता लक्ष्मीरूप से और राम विष्णुरूप से वाल्मीकि को मान्य थे । कुश और लव दोनों भाई राम के आत्मज तथा आदिकवि के शिष्य थे । उन्हीं के द्वारा रामायण आर्ष महाकाव्य श्रीराम को सुनाया गया था । फलतः राम के समय में ही रामायण का निर्माण हो चुका था । लोकापवाद-निवृत्ति और सीता के दिव्य चरित्रों का प्रकाश सीता और राम के समकाल में ही अपेक्षित भी था । तभी महर्षि की प्रचार में इतनी तत्परता तथा सर्वगुणसम्पन्न योग्य कुश और लव जैसे शिष्यों द्वारा सभी श्रेणियों के लोगों में प्रभावी ढङ्ग से प्रचार की बात सङ्गत हो सकती थी । १३८ वें अनु० में बुल्के लिखते हैं, "बहुत से प्रक्षेप पुनरुक्तिमात्र से उत्पन्न हुए हैं । उदाहरणार्थ— रावण का मारीच के यहाँ जाना ( ३, सर्ग ३१ और सर्ग ३५ ), रावण के गुप्तचर का वृत्तान्त ( ६, सर्ग २० और सर्ग २५-३० ), सीता की गंगा-यमुना से प्रार्थना ( २।५२ और ५५ ), आश्रमों में आगमन । अत्रि, वाल्मीकि, शरभंग, सुतीक्ष्ण, अगस्त्य के आश्रमों का उल्लेख आदिरामायण में नहीं मिलता था, विराध तथा अयोमुखी राक्षसी का वध, राम के मायामय सिर का वृत्तान्त ( ६।३१ ) मायामयी सीता के वध के वृत्तान्त ६।८१ का अनुकरणमात्र है ।" उपर्युक्त कथन मिथ्या है । वस्तुतः अरण्यकाण्ड के सर्ग ३१ में अकम्पन ने रावण के समीप जाकर जनस्थान का समाचार सुनाया था । उसे सुनकर रावण मारीच के निकट गया । मारीच के तत्त्वोपदेश से लौट आया ।

३५ वें सर्ग में शूर्पणखा से समाचार पाकर इतिकर्तव्य का निर्णय कर रावण पुनः मारीच के पास गया। आज भी राजाओं को घटनाओं के सम्बन्ध में विभिन्न सूत्रों से समाचार मिलते हैं और यथासमय विभिन्न प्रतिक्रियाएँ भी होती हैं। इतनेमात्र से उसे प्रक्षेप नहीं कहा जा सकता। आदिरामायण का प्रमाण देना भी उचित नहीं है, क्योंकि इस नाम का कोई प्रामाणिक ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है। अनुपलब्ध प्रमाण के आधार पर किसी अंश के सम्बन्ध में भी 'इदमित्थम्' कहना सर्वथा तर्क-विरुद्ध है। ३१वें सर्ग में जनस्थान से जाकर अकम्पन ने वहाँ के बहुत से राक्षसों तथा खर के मारे जाने का समाचार बताया। रावण ने क्रुद्ध होकर कहा, जिसने मेरा विप्रिय किया है वह कौन है ? मेरा विप्रिय कर इन्द्र, कुबेर, यम तथा विष्णु भी सुखपूर्वक नहीं रह सकते । मैं पावक को भी दग्ध कर सकता हूँ, मृत्यु को भी मार सकता हूँ। मैं काल का भी काल हूँ।" अकम्पन ने यह सुनकर अभय वर माँगकर रावण के सामने राम का पराक्रम वर्णन किया। सब कुछ सुनकर रावण मारीच के पास गया और उससे राम-भार्या के हरण में सहायता माँगी। मारीच ने राम के पराक्रम का वर्णन कर उसे समझाया तब वह लङ्का लौट गया। ३४वें सर्ग की कथा के अनुसार रावण ने शूर्पणखा के मुख से राम का पराक्रम, आयुध और सीता के महत्त्व का विधिवत् श्रवण किया। ३५वें सर्ग की कथा के अनुसार रावण अपने मन्त्रियों से कर्तव्याकर्त्तव्य पर विचार कर इति-कर्तव्यता का निर्णय कर स्थिर बुद्धि और स्वस्थता के साथ वनों और पर्वतों का अवलोकन करता हुआ पुनः मारीच के पास गया। यह स्वाभाविक घटना-क्रम है, जिसका महर्षि ने यथावत् उल्लेख किया है। इस घटनाक्रम में पुनरुक्ति का आभास भी नहीं है। उपर्युक्त वर्णन को क्षेपक कहना निराधार है। इसी तरह अत्रि, वाल्मीकि, शरभङ्ग आदि के आश्रमों का वर्णन भी समुचित ही है। वन एवं आश्रमों का वर्णन काव्य का विषय भी होता है। विराध, अयोमुखी आदि राक्षसों के वध का वर्णन क्यों प्रक्षेप है ? इसका कोई कारण नहीं दिया गया। राम के मायामय सिर का वृत्तान्त ( ६।३१ ), मायामयी सीतावध के वृत्तान्त ( ६।८१ ) का अनुकरणमात्र है, ऐसी मान्यता का आधार भी क्या है ? क्या दोनों पृथक् पृथक् घटनाएँ नहीं हैं ? केवल प्रतिज्ञा- मात्र से कोई वस्तु सिद्ध नहीं होती; हेतु का उपन्यास आवश्यक है। इसी तरह अद्भुत रस की सामग्री, लङ्का-दहन जिसमें हास्य रस का भी समावेश है, ओषधि-पर्वत को दो बार ले आना, अग्निपरीक्षा आदि सब बुल्के के अनुसार क्षेपक हैं। करुणात्मक स्थलों की पुनरुक्ति, विलाप ( ३, सर्ग ६०, ६१, ६३ ), हनुमान् का सीता से विदा लेना ( ५।५८-६० ) तथा हनुमान् द्वारा सीता के भेंट के वर्णन ( ५।६६-६८ ) को भी बुल्के प्रक्षेप मानते हैं। वह भी निराधार है, कारण पाश्चात्य लोग वस्तुस्थिति का विचार न कर अपनी भावना की कसौटी पर प्राचीन ग्रन्थों को कसना चाहते हैं। जब विभिन्न प्राणियों के बुद्धि-वैभव और दृष्टि-कोण पाये ही जाते हैं तब यह कैसे कहा जा सकता है कि प्राचीन लोगों के विचार हमारे विचारों जैसे ही रहे होंगे। वस्तुतः ग्रन्थ देख कर उनके विचारों तथा उनकी पद्धतियों का निर्णय करना चाहिये। इतिहास घटना के औचित्य-अनौचित्य का विचार न कर उनकी यथार्थता का ही अनुसरण करता है। व्यक्तिविशेष के विचार अतीत घटनाक्रम के नियामक नहीं हो सकते । इस दृष्टि से देखने पर ही गङ्गा का वर्णन ( २।५२ ), वर्षाऋतु का वर्णन ( ४।२८ ) तथा शरदऋतु का वर्णन ( ४।३० ) उचित हैं। रामायण को ज्ञान का भण्डार बनाने की प्रवृत्ति ( २।१०० ) नीति के उपदेश, जाबालि का लोकायतदर्शन प्रस्तुत करना ( २।१०८ ), दिग्वर्णन ( ४।४०-४३ ) तथा राम का बालिवध को न्यायसङ्गत सिद्ध करने का प्रयास ( ४।१७,१८ ) प्रक्षेप हैं, यह कहना अशुद्ध है। वस्तुतः इन्हीं श्लोकों के अनुसार वाल्मीकि के भावों, विचारों तथा पद्धति का निर्णय करना उचित है। किसी के विचारों के अनुसार यह विश्रृङ्खल प्रतीत हो तो भी इससे

अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २४५ किसी घटना का अपलाप नही हो सकता। किसी समय कुछ लोगों को शङ्कराचार्य के भाष्य की शैली असङ्गत प्रतीत हो सकती है, परन्तु एतावता शाङ्करभाष्य या उसका कोई अंशविशेष प्रक्षेप नहीं कहा जा सकता। वालिवध के औचि- त्यानौचित्य का प्रश्न भी स्वाभाविक ही है; फिर वाल्मीकि के अनुसार यह मानने में आपत्ति ही क्या है कि वालि ने राम के इस कार्य को अनुचित कहा और राम ने उसका उत्तर दिया। ऐसी स्थिति में वाली के वध का औचित्य- प्रतिपादन के कारण ही उस अंश को प्रक्षेप कहना भी निष्प्रमाण ही है। इसी प्रकार बालकाण्ड, उत्तरकाण्ड और अवतारवाद की सामग्री को प्रक्षेप कहना भी निराधार है। आदि- रामायण खपुष्पतुल्य है, अतः उसमें वर्णित अथवा अवर्णित विषयों के आधार की चर्चा भी निराधार ही है। जब अयोध्याकाण्ड में राम को वनवास क्यों और कैसे हुआ आदि का वर्णन हुआ तो सीता-राम कौन थे, उनका विवाह कब और कैसे हुआ ? इन प्रश्नों को जब बुल्के भी नितान्त स्वाभाविक समझते हैं तो यह कैसे कहा जा सकता है कि वाल्मीकि ने इस प्रश्न पर प्रकाश नहीं डाला होगा । अतः उपर्युक्त अंशों को अन्य की रचना कहना दुष्टता ही है। इतर काण्डों से भी सुन्दरकाण्ड की शैली का भी भेद है। क्या इस आधार पर उसे भी प्रक्षेप माना जाय ? पौराणिक सामग्री के सम्मिश्रण की कल्पना भी निराधार है। ब्राह्मणों का प्रभाव तो वैदिक संस्कृति के ग्रन्थों में होना स्वाभाविक ही है। अवतार भी वस्तु-स्थिति है; वेदों, पुराणों तथा वैदिक संस्कृति की असाधारण वस्तु है। अतः वेद के उपबृंहणभूत वाल्मीकिरामायण में उसका वर्णन अत्यन्त स्वाभाविक है। रामायण में पौराणिक कथाओं का उद्धरण नहीं है, अपितु रामायण से ही पुराणों में उन कथाओं का आना कहीं अधिक युक्ति-युक्त है, क्योंकि रामायण पुराणों से अधिक प्राचीन है। सार यह है कि जहाँ-जहाँ अवतार का वर्णन, सीता का लक्ष्मी होना कहा गया है और ब्राह्मणों का महत्त्व वर्णन है उन सब स्थलों को बुल्के प्रक्षेप कहते हैं। उक्त वर्ण्य-विषय ही उनकी कसौटी है। अस्तु, कहना पड़ता है कि यह बुल्के और पाश्चात्यों की सनकमात्र है, इसका कोई आधार नहीं है। अवतारवाद पर विचार करते हुए १४० वें अनु० में बुल्के लिखते हैं, “अवतारवाद की भावना हमें पहले पहल शतपथ-ब्राह्मण में मिलती है। प्रारम्भ में विष्णु की अपेक्षा प्रजापति को इस सम्बन्ध में अधिक महत्त्व दिया जाता था। शतपथब्राह्मण के अनुसार प्रजापति ने ही मत्स्य ( १।८।१।१ ), कूर्म (७।५।१।५; १४।१।२।११) तथा वराह ( १४।१।२।११ ) का अवतार लिया था। प्रजापति के वराहरूप धारण करने की कथा तैत्तिरीयसंहिता ( ७।१।५।१ ), तैत्तिरीयब्राह्मण ( १।१।३।६ ), तैत्तिरीय आरण्यक ( १०।१।८ ) तथा काठकसंहिता ( ८।१ ) में भी प्रारम्भिकरूप में विद्यमान हैं। रामायण के दाक्षिणात्य पाठ में इसका उल्लेख है— “ततः समभवद् ब्रह्मा स्वयंभूदैवतैः सह । स वराहस्ततो भूत्वा प्रोज्जहार वसुन्धराम् ॥” अन्य दो पाठों में इस स्थल पर परवर्ती भावना के अनुसार विष्णु का नाम लिया गया है। १ शतपथब्राह्मण के अतिरिक्त तैत्तिरीय आरण्यक में भी कूर्म को प्रजापति का अवतार माना गया है ( दे० १।२३।३ )। महाभारत में समुद्रमन्थन के प्रसङ्ग में कूर्मराज का उल्लेख तो हुआ है, किन्तु इसमें कहीं भी किसी देवता की ओर निर्देश नहीं मिलता। सुरासुर कूर्मराज से निवेदन करते हैं कि वे मन्दराचल के आधार बनने की कृपा करें— “ऊचुश्च कूर्मराजानमकूपारे सुरासुराः । गिरेरधिष्ठानमस्य भवान् भवितुमर्हति ॥” १. दे० गौ० रा० २।११९ और प० रा० २।११३ ।

२४६ रामायणमीमांसा सप्तमं रामायण के उदीच्य पाठ में समुद्र-मन्थन के वृत्तान्त में कूर्म का उल्लेख नहीं है, १ किन्तु दाक्षिणात्य पाठ के एक प्रक्षेप में इस अवसर पर विष्णु के वराह अवतार लेने की कथा मिलती है। २ मत्स्य अवतार तथा प्रजापति का सम्बन्ध महाभारत में उल्लिखित है— “अहं प्रजापतिर्ब्रह्मा मत्परं नाधिगम्यते । मत्स्यरूपेण यूयं च मयास्मान्मोक्षिता भयात् ॥” ( म० भा० ३।१८७।५२ ) विष्णुपुराण में भी मत्स्य, कूर्म तथा वराह तीनों प्रजापति के अवतार माने गये हैं— “तोयान्तःस्थां महीं ज्ञात्वा जगत्येकार्णवीकृते । अनुमानात्तदुद्धारं कर्तुकामः प्रजापतिः ॥ अकरोत्स्वतनूमन््यां कल्पादिषु यथा पुरा । मत्स्यकूर्मादिकां तद्वद्वाराहं वपुरास्थितः ॥” (वि० पु० १।४।७,८) किन्तु विष्णुपुराण में विष्णु तथा ब्रह्मस्वरूप नारायण की अभिन्नता का प्रतिपादन किया जाता है; अतः इसी चतुर्थ अध्याय में विष्णु के रूप में वराह की स्तुति की गयी है तथा एक अन्य अध्याय में कूर्म को भी विष्णु का अवतार माना गया है ( दे० १।९ )। इस प्रकार हम देखते हैं कि मत्स्य, कूर्म तथा वराह अवतार प्रारम्भ में प्रजापति से सम्बन्ध रखते थे, किन्तु बाद में विष्णु का महत्त्व बढ़ जाने के कारण तीनों विष्णु के ही अवतार माने जाने लगे। महाभारत के नारायणीय उपाख्यान ( दे० म० भा० १२।३३६।७२ तथा १२।३३७।३६ ) तथा हरिवंशपुराण ( १।१।४१ ) में वराह तथा विष्णु का सम्बन्ध मान लिया गया है। आगे चलकर तीनों का नाम लेकर एक-एक महापुराण की सृष्टि हुई जिसमें विष्णु से उनकी अभिन्नता प्रतिपादित है ।” ३ उपर्युक्त विचार भारतीय ग्रन्थों की वस्तुस्थिति न जानने का ही दुष्परिणाम है। बुल्के की दृष्टि से विष्णु या उनका उत्कर्ष या अवतार कोई वास्तविक वस्तु नहीं है, किन्तु विचारविकास का ही सब परिणाम है। परन्तु वस्तुस्थिति ठीक इससे विपरीत है। वेद अनादि अपौरुषेय प्रमाणभूत ग्रन्थ हैं। जैसे रूप-ज्ञान में नेत्र स्वतन्त्र प्रमाण हैं, वैसे ही धर्म, ब्रह्म और ज्ञान के लिए स्वतन्त्र एवं एकमात्र वेद ही प्रमाण हैं ( देखें वेदप्रामाण्यवाद )। विष्णु कौन हैं ? प्रजापति कौन हैं ? उनका कौन-कौन अवतार कब-कब हुआ यह सब किसने देखा ? इत्यादि प्रश्नों का उत्तर प्रत्यक्ष तथा अनुमान के आधार पर नहीं दिया जा सकता। आधुनिक इतिहास इस सम्बन्ध में कुछ बताने में समर्थ नहीं है। मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् सब वेद हैं, अपौरुषेय हैं। रामायण, महाभारत, पुराण, उपपुराण, मन्वादि धर्मशास्त्र, दर्शन सब वेदमूलक होने के कारण ही प्रमाण होते हैं। उन सब का समन्वय है; वे विशृङ्खलित नहीं हैं। जैसे किसी संविधान की एक धारा का अन्य धाराओं के साथ विरोध नहीं होता, साथ ही उनका समन्वय भी अभीष्ट होता है उसी तरह इन सभी ग्रन्थों का समन्वय अभीष्ट होता है। रामायण, महाभारत आदि सभी ग्रन्थों का वेद के साथ समन्वय होता है। वेद में भी आपाततः प्रतीत विरोधों को ऋषियों ने समन्वित कर उनका वास्तविक अविरोध ही बताया है। किसी शाखा में पञ्चाग्नि में ६ अग्नियों का निर्देश है तो किसी में ५ ही अग्नियों का विधान है। गुणोपसंहारानुपसंहार प्रकरण द्वारा महर्षि व्यास ने ऐसे विरोधाभासों का समाधान १. दे० गौ० रा० १।४६; प० रा० १।४१ । २. दे० रा० १।४५।२७–३२ । ३. रामकथा, पृष्ठ १४५–१४७ दे० मत्स्य, कूर्म तथा वराह पुराण ।

अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २४७ किया है। तदनुसार विचार करने से स्पष्ट विदित होता है कि अवतारवाद भावनामात्र नहीं है। वह कल्पनामात्र नहीं है अथवा कोई दिमागी फितूर भी नहीं है, किन्तु सूर्य-चन्द्र से भी ज्वलन्त सत्य है जिसका परम प्रमाणभूत वेदों में वर्णन है। उसमें प्रारम्भ और अन्त में कोई भेद नहीं है। अतएव प्रारम्भ में "विष्णु की अपेक्षा प्रजापति को उस सम्बन्ध में अधिक महत्त्व दिया जाता था" यह कल्पना निस्सार है। प्रकृत में विष्णु और प्रजापति में भेद नहीं है, नाम-भेद से लक्ष्य भेद नहीं होता, किन्तु लक्षण-भेद से लक्ष्य-भेद होता है। जैसे ब्रह्मसूत्रों में 'जन्माद्यस्य यतः' 'प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् । यह ब्रह्म का लक्षण कहा गया है, उक्त लक्षण जिसमें घटता हो वह ब्रह्म है, फिर नाम भले ही आकाश, प्राण आदि भिन्न-भिन्न हों । १४५ वें अनु० में बुल्के कहते हैं "रामकथाविषयक गाथाओं से लेकर प्रचलित वाल्मीकिरामायणरूप तक रामकथा के प्रारम्भिक विकास की रूपरेखा अङ्कित करने का प्रयत्न प्रस्तुत अध्याय में किया गया है। यह उत्तरोत्तर विकास ही रामकथा की लोकप्रियता का प्रमाण है।" परन्तु बुल्के को यह समझना चाहिए कि भारत में काल्पनिक किसी विकास को महत्त्व नहीं दिया जाता है। क्योंकि वह निराधार होता है। इसी लिए आगम प्रमाण पर विचार करते हुए पौरुषेय तथा अपौरुषेय विविध आगमों पर विचार कर अपौरुषेय आगम का ही मुख्य प्रामाण्य माना गया है। पौरुषेय उसी आगम को प्रमाण माना गया है, जो कि अपौरुषेयवेदमूलक है। पुरुषों में भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव आदि दोषों की सम्भावना प्रायः होती है; इसी लिए पौरुषेय ग्रन्थों का स्वतन्त्र प्रामाण्य मान्य नहीं होता है। नैयायिक, वैशेषिक आदि भी आप्तवाक्य का ही प्रामाण्य मानते हैं। ईश्वर सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् आप्त है उसके वचन होने से वेद प्रमाण हैं। अन्य ऋषि, महर्षि वेदानुयायी वेदानुसारी होने से आदरणीय होते हैं। अतएव जिस किसी के ग्रन्थ का प्रामाण्य नहीं माना जाता है। मार्क्सवादी विकासवादी कहते हैं, "आदिम मानव वनवासी था, जङ्गली जानवरों के समान ही वह भी वृक्षों पर या कन्दराओं में जीवन व्यतीत करता था। प्राकृत अग्नि, वायु, बादल और बिजली से प्रभावित होता रहता था। उसका भीरु मस्तिष्क अपने इर्द-गिर्द बहुत भूत, प्रेत, पिशाच आदि आत्माओं की कल्पना करता हुआ उनकी पूजा-स्तुति कर आत्मरक्षा की आशा करता था। वही भूत-प्रेत की कल्पना विकसित मानव के मस्तिष्क में सभ्यता के साबुन से धुल-धुलकर देवकल्पना बन गयी। वही वैज्ञानिक विविध चमत्कृतियों से चमत्कृत होकर ईश्वर-कल्पना या ब्रह्म-कल्पना का रूप धारण कर सकी है। समझदार व्यक्ति सहज ही में समझ जायगा कि वस्तुतः भीरु मस्तिष्क की भूत-प्रेत-कल्पना ही देव, ईश्वर या ब्रह्म कल्पना का मूल है। वास्तविक वह कुछ भी नहीं है। इसी तरह विकास-क्रम के अनुसार महिमा का विस्तार है।" किन्तु ईश्वरत्व का विकास किसी में हो जाये एतावता वह ईश्वर नहीं हो सकता। इसी तरह यदि राम वस्तुतः मनुष्यमात्र थे, ईश्वर नहीं थे तो कालक्रम या विकासक्रम से उनकी महिमा बढ़ जाने पर भी उनकी ईश्वरत्व-ख्याति हो जाने पर भी उनको ईश्वर मानना उचित नहीं है और उससे कोई वास्तविक लाभ नहीं हो सकता। उलटा अनीश्वर में ईश्वरत्वभ्रान्ति का दोष भी हो सकता है। अतः स्पष्ट है कि राम का ईश्वरत्व, परब्रह्मत्व, श्रीराम का अनन्त कल्याणगुणगणास्पदत्व स्वाभाविक ही था और यह अपौरुषेय मन्त्रों, ब्राह्मणों, उपनिषदों से ही सिद्ध है। उन्हीं आधारों पर वाल्मीकि ने शतकोटिप्रविस्तर रामायण का आविर्भाव किया। उसी का सार वर्तमान चतुर्विंशतिसाहस्रिका संहिता वाल्मीकिरामायण है। उसी आधार पर पुराणों में अध्यात्मरामायण, अद्भुतरामायण, आनन्दरामायण, महारामायण आदि रामायणों तथा संहिताओं का निर्माण हुआ है। उसी आधार पर अनेक संस्कृत, प्राकृत, देशी, विदेशी भाषाओं में विविध रामकथाओं का आविर्भाव हुआ है। एकस्वर से सर्वत्र राम का परमेश्वरत्व, ब्रह्मत्व प्रसिद्ध है। कोटि-कोटि नर-नारी राम की उपासना करते हैं। केवल मिथ्या विकासवादी कल्पना के आधार पर यह सब नहीं हो सकता था।

२४८ रामायणमीमांसा सप्तम “रामायणं महाकाव्यमुद्दिश्य नाटकं कृतम् । जन्म विष्णोरमेयस्य राक्षसेन्द्रवधेप्सया ।।” (ह० पु० विष्णुपर्व अ० ९२) बुल्के ने हरिवंश के उक्त श्लोक का उद्धरण कर कहा है कि प्राचीन काल में रामकथा का अभिनय होता था । किन्तु उसी श्लोक से स्पष्टतः राम को अप्रमेय विष्णुस्वरूप भी कहा गया है, पर उसे बुल्के स्वीकार नहीं करते हैं । श्लोकार्थ यह है—रामायण महाकाव्य के आधार पर नाटकों का निर्माण हुआ है । उसमें राक्षसेन्द्र रावण के वधार्थ अप्रमेय विष्णु के जन्म आदि का वर्णन है । रामकथा की लोकप्रियता राम के स्वाभाविक महत्त्व, परमेश्वरत्व तथा विशेषतः रामावतार के स्वाभाविक मर्यादामयी लीलाओं के कारण थी, किसी के मानने न मानने के आधार पर नहीं । राम के विद्यमान गुणों का भी वर्णन असम्भव है फिर महत्त्व वृद्ध्यर्थ अविद्यमान गुणों के वर्णन का प्रसङ्ग ही कैसे सम्भव है ? किसी व्यक्ति में अविद्यमान गुणों का आरोप कर वर्णन करना स्तुति कही जाती है । जैसे राजा को सूर्यतुल्य कहा जाता है । ‘रविरिव राजते राजा ।’ परन्तु ईश्वरस्वरूप राम में विद्यमान ही अनन्त गुण हैं जिनका सामस्त्येन वर्णन नहीं हो सकता । जैसे आकाश में अपनी शक्ति के अनुसार मच्छर और गरुड़ दोनों ही उड़ते हैं, परन्तु आकाश का अन्त कोई नहीं पाता— “नभः पतन्त्यात्मसमं पतत्रिणः ।” उसी तरह अपनी-अपनी शक्ति भर ब्रह्मादि एवं सामान्य जन भी भगवद्गुणों का वर्णन करते हैं पर अन्त कोई नहीं पाता । अपनी वाणी पवित्र करना ही भगवद्गुण-गणवर्णन करने का उद्देश्य है । स्तुति न सम्भव ही है न उद्देश्य ही है । बुल्के कहते हैं “रामकथा की लोकप्रियता का एक और महत्त्वपूर्ण प्रमाण बौद्ध तथा जैन साहित्य में मिलता है । बौद्धों ने ईसवी सन् की कई शताब्दियों पहले राम को बोधिसत्त्व मानकर रामकथा की लोकप्रियता, आकर्षकता का साक्ष्य दिया है । जैनियों ने वाल्मीकि की रचना को मिथ्या कहकर कथा के एक नये रूप में राम को ( जैनी रूप में ) अपनाने का प्रयत्न किया है । इसी तरह रामकथा प्रारम्भ से ही भारत की संस्कृति में इतनी फैल गयी कि राम ने उस समय के प्रचलित तीन धर्मों में प्रमुख स्थान प्राप्त किया ब्राह्मणधर्म में विष्णु के अवतार, बौद्ध- धर्म में बोधिसत्त्व तथा जैनधर्म में आठवें बलदेव के रूप में । आगे चलकर संस्कृतसाहित्य की प्रत्येक शाखा में, अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य में एवं भारत के निकटवर्ती देशों में सर्वत्र रामकथा का प्रभाव दिखलायी देता है ।” परन्तु यह सब सर्वप्राणिपरप्रेमास्पद राम और उनकी कथा में आकर्षण स्वाभाविक है, विकास-क्रम के अनुसार काल्पनिक विशेषता के आधार पर नहीं । बौद्धों और विशेषकर जैनों ने तो राम की कथा की ओर जन-प्रवृत्ति देखकर बौद्ध तथा जैन जनता की स्वाभाविक रामकथा में प्रवृत्ति होने से वेदप्रामाण्य तथा ईश्वरवाद का खतरा देखकर रामकथा को विकृत कर राम को बौद्ध और जैन बनाकर अपनी जनता को अपना अनुयायी बनाये रखने के उद्देश्य से वैसा किया था । फिर भी सत्यान्वेषी बौद्ध और जैन भी वाल्मीकिरामायण की ओर आकृष्ट हुए बिना नहीं रहे हैं ।

अष्टम अध्याय अवतार-सामग्री “मनवे ह वै प्रातः। अवनेज्यमुदकमाजह्रर्यथेदं पाणिभ्यामवनेजनायाहरन्त्येवं तस्यावने- निजानस्य मत्स्यः पाणी आपेदे ॥१॥ स हास्मै वाचमुवाद। बिभृहि मा पारयिष्यामि त्वेति कस्मान्मा पारयिष्यसीत्यौघ इमाः सर्वाः प्रजा निर्वोढा ततस्त्वा पारयिताऽस्मीति। कथं ते भृतिरिति ॥२॥ स होवाच। यावद्वै क्षुल्लका भवामो बह्वी वै नस्तावन्नाष्ट्रा भवत्युत मत्स्य एव मत्स्यं गिलति कुम्भ्यां माग्रे बिभरासि स यदा तामतिवर्धा अथ कर्षू खात्वा तस्यां मा बिभरासि स यदा तामतिवर्धा अथ मा समुद्रम- भ्यवहरासि तर्हि वा अतिनाष्ट्रो भवितास्मीति ॥३॥ शश्वद्ध झष आस। स हि ज्येष्ठं वर्धतेऽथेतिथीं समां तदौघ आगन्ता। तन्मा नावमुप कल्प्योपासासे स औघ उत्थिते नावमापद्यासै ततस्त्वा पारयितास्मीति ।” (श० ब्रा० १।८।१।१-४) उपर्युक्त वचनों में कहा गया हैं कि मनु ने अवनेजन के लिए दोनों हाथों में जल लिया तो उसमें एक मत्स्य आ गया और उसने मनु से कहा, 'मेरी रक्षा करो, मैं प्रजा सहित तुम्हें प्रलय के महौघ से पार करूँगा।' तब मनु ने कहा 'कैसे तुम्हारा भरण हो ?' तो मत्स्य ने कहा जब तक मत्स्य छोटे रहते हैं तभी तक उनके नाश का भय रहता है। एक मत्स्य ही दूसरे मत्स्य का भक्षण करता है, अतः कुम्भी में रखकर मेरा पालन करो। मनु ने कुम्भ में मत्स्य को रखा।” जब वह अधिक बढ़ गया तो उसने कहा, “बड़ा कर्षू 'सरोवर' बनाकर हमें उसमें रखो।” मनुजी ने वैसा ही किया। जब उससे भी अधिक बढ़ गया तब उसने कहा, "अब समुद्र में मुझे रखो।” तब मनु ने समुद्र में रख दिया। मत्स्य अत्यधिक बढ़ गया और उसने मनु से कहा, “अमुक समय में महौघ आयेगा तब नौका की कल्पना कर उसमें आरूढ़ होना। मैं पार करूँगा।” “तमेवं भृत्वा समुद्रमभ्यवजहार। स यतिथीं तत्समां परिदिदेश ततिथीं समां नावमुपकल्प्योपा- सांचक्रे। स औघ उत्थिते नावमापेदे। तं स मत्स्य उपन्यापुप्लुवे तस्य शृङ्गे नावः पाशं प्रतिमुमोच तेनैत- मुत्तरं गिरिमधिदुद्राव ॥५॥ स होवाच अपीपरं वै त्वा वृक्षे नावं प्रतिबध्नीष्व तं तु त्वा मा गिरौ सन्तमुदकमन्तश्छेत्सीद्यावदुदकं समवायात्तावत्तावदन्ववसर्पासीति । स ह तावत्तावदेवान्ववसर्प तदप्येत- दुत्तरस्य गिरेर्मनोरवसर्पणमित्यौघो ह ताः सर्वाः प्रजा निरुवाहायेह मनुरेवैकः परिशिशिषे ॥६॥” (श० ब्रा० १।८।१।५,६) मनु ने समुद्र में मत्स्य को डाल दिया। जितने दिनों में महौघ आने को मत्स्य ने कहा था उतने ही दिनों में महौघ आया। मनु ने पृथिवी को नाव बनाकर उसमें स्थान प्राप्त किया और उसी मत्स्य के शृङ्ग में नाव को बाँध दिया। उसी मत्स्य के द्वारा मनु उत्तर गिरि हिमालय पहुँचे। तत्पश्चात् महामत्स्य ने कहा—मैंने तुम्हें पार कर दिया नाव को वृक्ष में बाँध दो। “ऊचुश्च कूर्मराजानमकूपारे सुरासुराः। अधिष्ठानं गिरेरस्य भवान् भवितुमर्हति ॥ कूर्मेण तु तथेत्युक्त्वा पृष्ठमस्य समर्पितम्। तं शैलं तस्य पृष्ठस्थं यन्त्रेणेन्द्रो न्यपीडयत् ॥ ३२