रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४० रामायणमीमांसा सप्तम था। धरणी देवी उसी अलौकिक दिव्य सिंहासन पर स्वागत और अभिनन्दन पूर्वक मैथिली को अपनी बाहुओं से ग्रहण कर दिव्य आसन पर बैठाती है। उस दिव्य आसन पर समासीन होकर रसातल में प्रविष्ट होती हुई सीता पर देवताओं द्वारा महान् जय-जयकार तथा साधुकार के साथ अविच्छिन्न रूप से मुक्त दिव्य पुष्प-वृष्टि हुई। “तथा शपन्त्यां वैदेह्यां प्रादुरासीत् तदद्भुतम् । भूतलादुत्थितं दिव्यं सिंहासनमनुत्तमम् ॥ ध्रियमाणं शिरोभिस्तु नागैरमितविक्रमैः । दिव्यं दिव्येन वपुषा दिव्यरत्नविभूषितैः ॥ तस्मिंस्तु धरणी देवी बाहुभ्यां गृह्य मैथिलीम् । स्वागतेनाभिनन्द्यैनामासने चोपवेशयत् ॥ तामासनगतां दृष्ट्वा प्रविशन्तीं रसातलम् । पुष्पवृष्टिरविच्छिन्ना दिव्या सीतामवाकिरत् ॥ साधुकारश्च सुमहान् देवानां सहसोत्थितः । साधु वै साध्विति सीते यस्यास्ते शीलमीदृशम् ॥” (वा० रा० ७।९६।१७-२१) “सीते ! साधु—तुम्हारा शील लोकोत्तर है” इस प्रकार अन्तरिक्षस्थ देवताओं की बहुविध वाणियां प्रकट हुई—यज्ञवाट के सभी राजागण विस्मित हुए। अन्तरिक्ष तथा भूमि के सभी स्थावर, जङ्गम तथा महाकाय दानव एवं पाताल के पन्नगेन्द्र विस्मयान्वित होकर, कोई प्रहृष्ट होकर ‘जय जय’ एवं ‘साधु साधु’ नाद करने लगे; कोई ध्यानपरायण हो गये। कोई राम को और कोई सीता को देखते हुए विसंज्ञ हो रहे थे। सीता के रसातल प्रवेश से वानर, राक्षस, मानव सभी संतप्त हुए । श्रीराम अत्यन्त संतप्त हुए । ब्रह्माजी देवताओं के साथ आकर राम और सीता के दिव्य वैष्णव माहात्म्य का वर्णन करके सान्त्वना देते हैं। पद्मपुराण के उल्लेखानुसार सीता के लिए रसातल से गरुड़जी प्रकट हुए और अपनी पीठ पर रत्नमय सिंहासन को लेकर आये। उसपर धरणी देवी विराजमान थीं। उन्होंने मैथिली का स्वागत और अभिनन्दन कर उन्हें सिंहासन पर बैठाया। सनातनी सीता देवादिकों से पूज्यमान होकर योगिगम्य सनातन परम धाम को चली गयीं— “नानारत्नमयं पीठं पृष्ठे कृत्वा खगेश्वरः । रसातलादाविरभूद्विस्मयं जनयन्नृणाम् ॥ तस्मिन् पीठे महादेवीं हस्ताभ्यां गृह्य मैथिलीम् । स्वागतेनाभिनन्द्येमां संनिवेश्य तिरोदधे ॥ सा च दिव्याप्सरोभिस्तु पूज्यमाना सनातनी । वैनतेयं समारुह्य अचिरादिपथाद् रमा ॥ दासीगणैः पूर्वभवैः संवृता जगदीश्वरी । संप्राप्ता परमं धाम योगिगम्यं सनातनम् ॥” रामाभिरामीटीकायां समुद्धृताः श्लोकाः । पूर्वापर प्रसङ्ग का भलीभांति विचार करने पर स्पष्टतः विदित होता है कि वाल्मीकि महर्षि श्रीराम के समकालिक ही हैं। सीता के निर्मल चरित्र का वर्णन और प्रचार कर वे मिथ्या लोकापवाद का समूल उन्मूलन ही करने में सफल हुए हैं। उस दृष्टि से राम ने देवताओं, ऋषियों, राजाओं तथा नाना देशागत मानवों की सभा में रामायण का सबके साथ ही श्रवण किया और रामायण द्वारा वर्णित कथावस्तु की यथार्थता और सीता के वास्तविक