रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २४१ जीवन-वृत्तान्त का स्वयं अनुभव किया और सबको वैसा ही अनुभव करने का अवसर दिया। सीता के शपथ के प्रभाव से दिव्य सिंहासन के आविर्भाव आदि से तो उसकी सत्यता और भी निखर उठी। लङ्का में सीता की अग्नि-परीक्षा हो चुकी थी। ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, वायु, अग्नि आदि देवताओं, वानरों, राक्षसों ने वहाँ का चमत्कार देखा था, परन्तु चतुर्दश भुवन के सभी प्राणी और देश-देशान्तर के सभी मानवों ने वह सब नहीं देखा था। राम द्वारा उसका प्रचार कराकर मिथ्या-लोकापवाद मिटाने का प्रयत्न किया जा सकता था, परन्तु विप्रतिपन्न व्यक्ति उसे राजकीय प्रचार (प्रोपगेण्डा) कहकर महत्त्वहीन बता सकते थे। परन्तु एक अरण्यवासी, वल्कलधारी, कन्दमूलफलाशी, आप्तकाम, वीतराग महर्षि के अमर काव्य के सम्बन्ध में किसी को कुछ कहने का साहस नहीं हो सकता था। महर्षि का राम से कोई भी आर्थिक सम्बन्ध नहीं था। रामायण के प्रचारक कुश और लव भी कोई कथाकाव्योपजीवी साधारण व्यक्ति नहीं थे। वे दोनों मुनिवेष राजकुमार, श्रीराम के ही पुत्र थे। उनमें वक्ता के सर्वोत्तम गुण विद्यमान थे। वक्ता में उत्तम रूप, सौन्दर्य, कण्ठमाधुर्य, सौस्वर्य तथा वेदादि शास्त्र-विज्ञान के साथ ही साथ गान्धर्व कला-कौशल भी आवश्यक होता है। उपर्युक्त सब गुण कुश और लव में थे। उनमें राम के समान ही लोकोत्तर सुन्दरता थी, वे वेद-शास्त्रों में पारङ्गत, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद आदि में पूर्ण निष्णात थे। उनमें उत्तम कण्ठ-माधुर्य, सौस्वर्य एवं सङ्गीतकौशल विद्यमान था। वीतराग ऋषिमुनि भी उनके रामायण-गान से मुग्ध हो गये। इतने पर भी यदि वक्ता सस्पृह (लोभी) हो तो महान् से महान् गुण भी फीके पड़ जाते हैं। उनका प्रभाव महत्त्वहीन हो जाता है। अतः महर्षि ने उन्हें दिव्य, मधुर फलमूल खिलाकर कह दिया था कि अपने लोग कन्दमूलफलाशी वनवासी हैं, हम लोगों को धन से कोई प्रयोजन नहीं; अतः किसी के देने पर भी कुछ लेना नहीं। पर जो सादर सुनना चाहें उन्हें सुनाना। प्रथम दिन की कथा श्रवण कर ही राम ने प्रभूत सुवर्णराशि देने का प्रयत्न किया, परन्तु कुश-लव ने उसको स्वीकार नहीं किया। ये सब ऐसे गुण थे जिनका प्रभाव अनिवार्यरूप से सब पर पड़ा। रामायण द्वारा वर्णित कथावस्तु इतनी सत्य थी कि अयोध्या के वृद्ध लोग उसे सुनकर चिरवृत्त वृत्तान्त को प्रत्यक्ष सा अनुभव करने लगे— “चिरनिर्वृत्तमप्येतत् प्रत्यक्षमिव दर्शितम् । प्रविश्य तावुभौ सुष्ठु तथाभावमगायताम् ॥ सहितौ मधुरं रक्तं सम्पन्नं स्वरसम्पदा ।” (वा० रा० १।४।१८) नैमिषारण्य में श्रीराम का अश्वमेध यज्ञ हो रहा था। अयोध्यावासी नागरिक अधिक मात्रा में आये हुए थे। अयोध्याकाण्ड की घटनाओं में उन्हें प्रत्यक्ष अनुभूति थी। वे लोग प्रथमतः तो कुश-लव के त्याग, निःस्पृहता, दिव्य सौन्दर्य तथा तन्त्रीवादनपूर्वक मधुर सुस्वर सङ्गीत पर मुग्ध हुए। फिर, स्वानुभूत कथावस्तु का यथावत् वर्णन सुनकर आश्चर्यमग्न होकर चित्रलिखित से स्तब्ध रह गये। चिरप्रवृत्त वृत्तान्त का यथावत् वर्णन रामायण में सुनकर उन्हें आश्चर्य हुआ। वाल्मीकिरामायण आर्ष कथा होते हुए आर्ष इतिहास भी है। सीता-चरित्र की स्वच्छता की अभिव्यक्ति उसका प्रथम उद्देश्य था, अतः उसमें अप्रिय सत्य का भी स्पष्ट उल्लेख हुआ है। राजा दशरथ का भरत के प्रति शङ्का करना तथा कौशल्या का मातुल-कुल से प्रत्यागत भरत के प्रति व्यवहार अप्रिय सत्य की अभिव्यक्ति ही है। स्वानुभूत घटनाओं के यथावत् वर्णन से अत्यन्त प्रभावित अयोध्यावासियों के मन में इस महाकाव्य के रचयिता के सम्बन्ध में भी जिज्ञासा होना स्वाभाविक ही था। कोई वीतराग निःस्पृह वनवासी महर्षि वाल्मीकि उसके रचयिता हैं यह जानकर और अधिक विश्वास हुआ। स्वभावतः राम के वनवासकालिक वृत्तान्तों और सीताहरण, सुग्रीव-मैत्री, बालि-वध, सेतु-बन्धन, रावण-सीता-संवाद आदि के सम्बन्ध की सत्यता जानने की भी ३१