भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 319, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 319

२४२ रामायणमीमांसा सप्तम

उत्सुकता होनी स्वाभाविक थी। कुछ लोग जिनकी संख्या नगण्य ही थी सीता के प्रति शङ्का भी करते थे । स्वभावतः निःस्पृह मुनि द्वारा निर्मित तथा निःस्पृह वक्ता द्वारा वर्ण्यमान रामायण से अरण्य एवं लङ्का की घटनाओं के प्रति शङ्का की निवृत्ति सम्भव हो सकती थी । इस तरह विविध दृष्टियों तथा भावनाओं से रामचरित्र की ओर लोगों का आकर्षण हुआ । तुलसीदास के अनुसार नीति, प्रीति, परमार्थ तथा स्वार्थ के सम्बन्ध में राम से अधिक कोई नहीं जान सकता है— “नीति प्रीति परमारथ स्वारथ कोउ न राम सम जान जथारथ ।” ( रा० मा० २।२५३।३ ) जनापवाद सुनकर राम विचलित नहीं हुए । वे जानते थे कि दण्ड देकर जनता का मुख बन्द नहीं किया जा सकता । दो एक मुख बन्द कर देने पर वही आवाज सैकड़ों मुखों से निकलने लगती है; अतः उन्होंने बहुजन- हिताय बहुजनसुखाय ही नहीं किन्तु सर्वजनहिताय सर्वजनसुखाय का ही सिद्धान्त अपनाकर स्वयं अपने विरुद्ध अल्पमत का भी सम्मान कर परम विशुद्ध जानते हुए भी सीता को वनवास