रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४२ रामायणमीमांसा सप्तम
उत्सुकता होनी स्वाभाविक थी। कुछ लोग जिनकी संख्या नगण्य ही थी सीता के प्रति शङ्का भी करते थे । स्वभावतः निःस्पृह मुनि द्वारा निर्मित तथा निःस्पृह वक्ता द्वारा वर्ण्यमान रामायण से अरण्य एवं लङ्का की घटनाओं के प्रति शङ्का की निवृत्ति सम्भव हो सकती थी । इस तरह विविध दृष्टियों तथा भावनाओं से रामचरित्र की ओर लोगों का आकर्षण हुआ । तुलसीदास के अनुसार नीति, प्रीति, परमार्थ तथा स्वार्थ के सम्बन्ध में राम से अधिक कोई नहीं जान सकता है— “नीति प्रीति परमारथ स्वारथ कोउ न राम सम जान जथारथ ।” ( रा० मा० २।२५३।३ ) जनापवाद सुनकर राम विचलित नहीं हुए । वे जानते थे कि दण्ड देकर जनता का मुख बन्द नहीं किया जा सकता । दो एक मुख बन्द कर देने पर वही आवाज सैकड़ों मुखों से निकलने लगती है; अतः उन्होंने बहुजन- हिताय बहुजनसुखाय ही नहीं किन्तु सर्वजनहिताय सर्वजनसुखाय का ही सिद्धान्त अपनाकर स्वयं अपने विरुद्ध अल्पमत का भी सम्मान कर परम विशुद्ध जानते हुए भी सीता को वनवास