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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 320

विशेषकस्य लक्ष्मीपतेः साम्यांशस्य लक्ष्मीवतो राजाधिराजस्य लोकाभिरामस्य निकटोक्योः श्रीरामात्मज- योरादिकविशिष्ययोः कुशलवयोराख्याने श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये चतुर्विंशत्साहस्रिकायां संहितायां श्रीमद्युद्धकाण्डे पञ्चविंशेऽह्नि वर्तमानकथाप्रसङ्गः समाप्तः ।" इस पुष्पिका में 'कुशीलव' का प्रयोग न होकर 'कुशलवयोः' का प्रयोग है और इसमें उन्हें राम के आत्मज कहा गया है । कुशीलव शब्द का उल्लेख बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड में ही मिलता है, परन्तु बुल्के की दृष्टि से वे दोनों ही काण्ड प्रक्षेप हैं । यदि बुल्के उपर्युक्त काण्डों को प्रक्षेप मानते हैं तो यह भी मानना पड़ेगा कि कुशीलव ने रामायण का प्रचार किया अंश भी प्रक्षेप है, अतः प्रामाणिक नहीं है । यदि उन दोनों काण्डों से कुशीलव शब्द को स्वीकार करना है तो उन्हीं काण्डों के आधार पर कुशीलव का व्यक्तित्व भी समझना पड़ेगा—तद्नुसार अत्यन्त स्पष्ट है कि कुशीलव नृत्य-गीत-काव्योपजीवी कोई जातिविशेष न होकर राम के आत्मज, राजकुमार आदिकवि वाल्मीकि के शिष्यद्वय कुश और लव थे—वे ही अश्विनौ के समान कुशीलवौ शब्द से निर्दिष्ट हुए हैं । इसी तरह महर्षि वाल्मीकि ने कैसे रामायण की रचना की यह भी बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड से ही सिद्ध होता है । यदि उक्त दोनों काण्ड और पुष्पिका अमान्य हो तो रामायण वाल्मीकि-निर्मित है यह सिद्ध करना बुल्के के लिए भी असम्भव है । यदि प्रसिद्धि के आधार पर ऐसा मान लिया जाय तो फिर स्वभावतः वाल्मीकि कुश और लव के गुरु और राम के समकालीन थे तथा उनकी रचना वाल्मीकिरामायण का निर्माण सिंहासनारूढ़ राम के काल में ही हुआ था इन प्रसिद्धियों को भी निश्चितरूप से मानना ही युक्तिसङ्गत होगा । यह स्वाभाविक है कि ग्रन्थकर्ता ग्रन्थ में ही कहीं न कहीं अपने ग्रन्थ का नाम और स्वात्मसम्बन्ध सूचित करता है । तदनुसार उपर्युक्त दोनों काण्डों में रामायण की उत्पत्ति, भूमिका, लेखक तथा प्रचारक का नाम दिया गया है । साथ ही उक्त पुष्पिका से स्पष्टरूप से विदित होता है कि सीता लक्ष्मीरूप से और राम विष्णुरूप से वाल्मीकि को मान्य थे । कुश और लव दोनों भाई राम के आत्मज तथा आदिकवि के शिष्य थे । उन्हीं के द्वारा रामायण आर्ष महाकाव्य श्रीराम को सुनाया गया था । फलतः राम के समय में ही रामायण का निर्माण हो चुका था । लोकापवाद-निवृत्ति और सीता के दिव्य चरित्रों का प्रकाश सीता और राम के समकाल में ही अपेक्षित भी था । तभी महर्षि की प्रचार में इतनी तत्परता तथा सर्वगुणसम्पन्न योग्य कुश और लव जैसे शिष्यों द्वारा सभी श्रेणियों के लोगों में प्रभावी ढङ्ग से प्रचार की बात सङ्गत हो सकती थी । १३८ वें अनु० में बुल्के लिखते हैं, "बहुत से प्रक्षेप पुनरुक्तिमात्र से उत्पन्न हुए हैं । उदाहरणार्थ— रावण का मारीच के यहाँ जाना ( ३, सर्ग ३१ और सर्ग ३५ ), रावण के गुप्तचर का वृत्तान्त ( ६, सर्ग २० और सर्ग २५-३० ), सीता की गंगा-यमुना से प्रार्थना ( २।५२ और ५५ ), आश्रमों में आगमन । अत्रि, वाल्मीकि, शरभंग, सुतीक्ष्ण, अगस्त्य के आश्रमों का उल्लेख आदिरामायण में नहीं मिलता था, विराध तथा अयोमुखी राक्षसी का वध, राम के मायामय सिर का वृत्तान्त ( ६।३१ ) मायामयी सीता के वध के वृत्तान्त ६।८१ का अनुकरणमात्र है ।" उपर्युक्त कथन मिथ्या है । वस्तुतः अरण्यकाण्ड के सर्ग ३१ में अकम्पन ने रावण के समीप जाकर जनस्थान का समाचार सुनाया था । उसे सुनकर रावण मारीच के निकट गया । मारीच के तत्त्वोपदेश से लौट आया ।