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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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३५ वें सर्ग में शूर्पणखा से समाचार पाकर इतिकर्तव्य का निर्णय कर रावण पुनः मारीच के पास गया। आज भी राजाओं को घटनाओं के सम्बन्ध में विभिन्न सूत्रों से समाचार मिलते हैं और यथासमय विभिन्न प्रतिक्रियाएँ भी होती हैं। इतनेमात्र से उसे प्रक्षेप नहीं कहा जा सकता। आदिरामायण का प्रमाण देना भी उचित नहीं है, क्योंकि इस नाम का कोई प्रामाणिक ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है। अनुपलब्ध प्रमाण के आधार पर किसी अंश के सम्बन्ध में भी 'इदमित्थम्' कहना सर्वथा तर्क-विरुद्ध है। ३१वें सर्ग में जनस्थान से जाकर अकम्पन ने वहाँ के बहुत से राक्षसों तथा खर के मारे जाने का समाचार बताया। रावण ने क्रुद्ध होकर कहा, जिसने मेरा विप्रिय किया है वह कौन है ? मेरा विप्रिय कर इन्द्र, कुबेर, यम तथा विष्णु भी सुखपूर्वक नहीं रह सकते । मैं पावक को भी दग्ध कर सकता हूँ, मृत्यु को भी मार सकता हूँ। मैं काल का भी काल हूँ।" अकम्पन ने यह सुनकर अभय वर माँगकर रावण के सामने राम का पराक्रम वर्णन किया। सब कुछ सुनकर रावण मारीच के पास गया और उससे राम-भार्या के हरण में सहायता माँगी। मारीच ने राम के पराक्रम का वर्णन कर उसे समझाया तब वह लङ्का लौट गया। ३४वें सर्ग की कथा के अनुसार रावण ने शूर्पणखा के मुख से राम का पराक्रम, आयुध और सीता के महत्त्व का विधिवत् श्रवण किया। ३५वें सर्ग की कथा के अनुसार रावण अपने मन्त्रियों से कर्तव्याकर्त्तव्य पर विचार कर इति-कर्तव्यता का निर्णय कर स्थिर बुद्धि और स्वस्थता के साथ वनों और पर्वतों का अवलोकन करता हुआ पुनः मारीच के पास गया। यह स्वाभाविक घटना-क्रम है, जिसका महर्षि ने यथावत् उल्लेख किया है। इस घटनाक्रम में पुनरुक्ति का आभास भी नहीं है। उपर्युक्त वर्णन को क्षेपक कहना निराधार है। इसी तरह अत्रि, वाल्मीकि, शरभङ्ग आदि के आश्रमों का वर्णन भी समुचित ही है। वन एवं आश्रमों का वर्णन काव्य का विषय भी होता है। विराध, अयोमुखी आदि राक्षसों के वध का वर्णन क्यों प्रक्षेप है ? इसका कोई कारण नहीं दिया गया। राम के मायामय सिर का वृत्तान्त ( ६।३१ ), मायामयी सीतावध के वृत्तान्त ( ६।८१ ) का अनुकरणमात्र है, ऐसी मान्यता का आधार भी क्या है ? क्या दोनों पृथक् पृथक् घटनाएँ नहीं हैं ? केवल प्रतिज्ञा- मात्र से कोई वस्तु सिद्ध नहीं होती; हेतु का उपन्यास आवश्यक है। इसी तरह अद्भुत रस की सामग्री, लङ्का-दहन जिसमें हास्य रस का भी समावेश है, ओषधि-पर्वत को दो बार ले आना, अग्निपरीक्षा आदि सब बुल्के के अनुसार क्षेपक हैं। करुणात्मक स्थलों की पुनरुक्ति, विलाप ( ३, सर्ग ६०, ६१, ६३ ), हनुमान् का सीता से विदा लेना ( ५।५८-६० ) तथा हनुमान् द्वारा सीता के भेंट के वर्णन ( ५।६६-६८ ) को भी बुल्के प्रक्षेप मानते हैं। वह भी निराधार है, कारण पाश्चात्य लोग वस्तुस्थिति का विचार न कर अपनी भावना की कसौटी पर प्राचीन ग्रन्थों को कसना चाहते हैं। जब विभिन्न प्राणियों के बुद्धि-वैभव और दृष्टि-कोण पाये ही जाते हैं तब यह कैसे कहा जा सकता है कि प्राचीन लोगों के विचार हमारे विचारों जैसे ही रहे होंगे। वस्तुतः ग्रन्थ देख कर उनके विचारों तथा उनकी पद्धतियों का निर्णय करना चाहिये। इतिहास घटना के औचित्य-अनौचित्य का विचार न कर उनकी यथार्थता का ही अनुसरण करता है। व्यक्तिविशेष के विचार अतीत घटनाक्रम के नियामक नहीं हो सकते । इस दृष्टि से देखने पर ही गङ्गा का वर्णन ( २।५२ ), वर्षाऋतु का वर्णन ( ४।२८ ) तथा शरदऋतु का वर्णन ( ४।३० ) उचित हैं। रामायण को ज्ञान का भण्डार बनाने की प्रवृत्ति ( २।१०० ) नीति के उपदेश, जाबालि का लोकायतदर्शन प्रस्तुत करना ( २।१०८ ), दिग्वर्णन ( ४।४०-४३ ) तथा राम का बालिवध को न्यायसङ्गत सिद्ध करने का प्रयास ( ४।१७,१८ ) प्रक्षेप हैं, यह कहना अशुद्ध है। वस्तुतः इन्हीं श्लोकों के अनुसार वाल्मीकि के भावों, विचारों तथा पद्धति का निर्णय करना उचित है। किसी के विचारों के अनुसार यह विश्रृङ्खल प्रतीत हो तो भी इससे