रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २४५ किसी घटना का अपलाप नही हो सकता। किसी समय कुछ लोगों को शङ्कराचार्य के भाष्य की शैली असङ्गत प्रतीत हो सकती है, परन्तु एतावता शाङ्करभाष्य या उसका कोई अंशविशेष प्रक्षेप नहीं कहा जा सकता। वालिवध के औचि- त्यानौचित्य का प्रश्न भी स्वाभाविक ही है; फिर वाल्मीकि के अनुसार यह मानने में आपत्ति ही क्या है कि वालि ने राम के इस कार्य को अनुचित कहा और राम ने उसका उत्तर दिया। ऐसी स्थिति में वाली के वध का औचित्य- प्रतिपादन के कारण ही उस अंश को प्रक्षेप कहना भी निष्प्रमाण ही है। इसी प्रकार बालकाण्ड, उत्तरकाण्ड और अवतारवाद की सामग्री को प्रक्षेप कहना भी निराधार है। आदि- रामायण खपुष्पतुल्य है, अतः उसमें वर्णित अथवा अवर्णित विषयों के आधार की चर्चा भी निराधार ही है। जब अयोध्याकाण्ड में राम को वनवास क्यों और कैसे हुआ आदि का वर्णन हुआ तो सीता-राम कौन थे, उनका विवाह कब और कैसे हुआ ? इन प्रश्नों को जब बुल्के भी नितान्त स्वाभाविक समझते हैं तो यह कैसे कहा जा सकता है कि वाल्मीकि ने इस प्रश्न पर प्रकाश नहीं डाला होगा । अतः उपर्युक्त अंशों को अन्य की रचना कहना दुष्टता ही है। इतर काण्डों से भी सुन्दरकाण्ड की शैली का भी भेद है। क्या इस आधार पर उसे भी प्रक्षेप माना जाय ? पौराणिक सामग्री के सम्मिश्रण की कल्पना भी निराधार है। ब्राह्मणों का प्रभाव तो वैदिक संस्कृति के ग्रन्थों में होना स्वाभाविक ही है। अवतार भी वस्तु-स्थिति है; वेदों, पुराणों तथा वैदिक संस्कृति की असाधारण वस्तु है। अतः वेद के उपबृंहणभूत वाल्मीकिरामायण में उसका वर्णन अत्यन्त स्वाभाविक है। रामायण में पौराणिक कथाओं का उद्धरण नहीं है, अपितु रामायण से ही पुराणों में उन कथाओं का आना कहीं अधिक युक्ति-युक्त है, क्योंकि रामायण पुराणों से अधिक प्राचीन है। सार यह है कि जहाँ-जहाँ अवतार का वर्णन, सीता का लक्ष्मी होना कहा गया है और ब्राह्मणों का महत्त्व वर्णन है उन सब स्थलों को बुल्के प्रक्षेप कहते हैं। उक्त वर्ण्य-विषय ही उनकी कसौटी है। अस्तु, कहना पड़ता है कि यह बुल्के और पाश्चात्यों की सनकमात्र है, इसका कोई आधार नहीं है। अवतारवाद पर विचार करते हुए १४० वें अनु० में बुल्के लिखते हैं, “अवतारवाद की भावना हमें पहले पहल शतपथ-ब्राह्मण में मिलती है। प्रारम्भ में विष्णु की अपेक्षा प्रजापति को इस सम्बन्ध में अधिक महत्त्व दिया जाता था। शतपथब्राह्मण के अनुसार प्रजापति ने ही मत्स्य ( १।८।१।१ ), कूर्म (७।५।१।५; १४।१।२।११) तथा वराह ( १४।१।२।११ ) का अवतार लिया था। प्रजापति के वराहरूप धारण करने की कथा तैत्तिरीयसंहिता ( ७।१।५।१ ), तैत्तिरीयब्राह्मण ( १।१।३।६ ), तैत्तिरीय आरण्यक ( १०।१।८ ) तथा काठकसंहिता ( ८।१ ) में भी प्रारम्भिकरूप में विद्यमान हैं। रामायण के दाक्षिणात्य पाठ में इसका उल्लेख है— “ततः समभवद् ब्रह्मा स्वयंभूदैवतैः सह । स वराहस्ततो भूत्वा प्रोज्जहार वसुन्धराम् ॥” अन्य दो पाठों में इस स्थल पर परवर्ती भावना के अनुसार विष्णु का नाम लिया गया है। १ शतपथब्राह्मण के अतिरिक्त तैत्तिरीय आरण्यक में भी कूर्म को प्रजापति का अवतार माना गया है ( दे० १।२३।३ )। महाभारत में समुद्रमन्थन के प्रसङ्ग में कूर्मराज का उल्लेख तो हुआ है, किन्तु इसमें कहीं भी किसी देवता की ओर निर्देश नहीं मिलता। सुरासुर कूर्मराज से निवेदन करते हैं कि वे मन्दराचल के आधार बनने की कृपा करें— “ऊचुश्च कूर्मराजानमकूपारे सुरासुराः । गिरेरधिष्ठानमस्य भवान् भवितुमर्हति ॥” १. दे० गौ० रा० २।११९ और प० रा० २।११३ ।