रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २३९ जाकर अमितप्रभ महात्मा वाल्मीकि से सब कुछ कहा। मुनि ने सब सुनकर और राम की इच्छा को जानकर कहा कि ठीक है जैसा राम कहते हैं वैसा ही होगा। सीता वैसा ही करेगी, क्योंकि स्त्री का परम दैवत पति ही होता है। राजदूतों ने आकर राम को मुनि का कथन सुनाया। राम प्रसन्न हुए और एकत्रित ऋषियों और राजाओं से उन्होंने कहा, शिष्यों सहित सभी ऋषि तथा अपने परिकरों सहित नृपतिगण तथा और भी जो चाहते हों सभी आकर सीता का शपथ लेना (पातिव्रत्य तथा शुद्धि का प्रमाण, प्रत्यय) देखें। महात्मा राघव के उक्त वचन सुनकर महर्षियों तथा राजाओं में महान् साधुवाद हुआ। प्रभावशाली महान् राजा तथा मुनिश्रेष्ठगण राघव की प्रशंसा करने लगे। इसी काण्ड के ९६ वें सर्ग के उल्लेखात्नुसार रात के बीतते ही राम ने वसिष्ठ, विश्वामित्र, वामदेव, जाबालि, कश्यप, दीर्घतमा, दुर्वासा, पुलस्त्य, शक्ति, भार्गव, दीर्घायु मार्कण्डेय, महायशा मौद्गल्य, गर्ग, च्यवन, शतानन्द, भरद्वाज, अग्निपुत्र सुप्रभ, नारद, पर्वत, गौतम आदि आदि मुनिवरों को बुलवाया और वे सब आये। महावीर्य राक्षस तथा महाबल वानर एवं अन्य सभी लोग कौतूहलवश आये। सहस्रों क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र तथा नाना देशों के ब्राह्मण सीता का शपथ देखने के लिये आये। सबके आने की बात जानकर सीता के साथ मुनिवर वाल्मीकि वहाँ आये। ऋषि के पीछे-पीछे राम को मन में रखकर अवाङ्मुखी कृताञ्जलि, बाष्पकलायुक्त सीता आयीं। ब्रह्मा का अनुगमन करती हुई श्रुति के समान मुनि के पीछे-पीछे आती हुई सीता को देखकर जन-समूह में महान् साधुवाद हुआ। सीता और राम के जन्म से लेकर होनेवाले विशाल दुःख-परम्परा का चिन्तन करके सभी के अन्तःकरण क्षुब्ध हो उठे। कोई राम का और कोई सीता का साधुवाद करने लगे। कोई प्रेक्षक दोनों का साधुवाद करने लगे। उस समय उस महान् जनौघ में सीता को साथ लिए हुए वाल्मीकि बोले, "दाशरथे ! सीता सुव्रता एवं धर्मचारिणी है; अपवादभय से आप द्वारा मेरे आश्रम के समीप परित्यक्ता होकर मेरे आश्रम में रही, सीता आप के समक्ष अपने सतीत्व का प्रमाण, प्रत्यय देगी। ये दोनों बालक, कुश और लव जानकी में उत्पन्न तुम्हारे पुत्र हैं। मैं प्रचेता का दसवाँ पुत्र हूँ—मैंने कभी अनृत वाक्य कहा हो तो इसका मुझे स्मरण नहीं होता; बहुत वर्षों तक मैंने तपश्चर्या की है; यदि मैथिली दुष्टा हो तो मैं उन तपश्चर्याओं का फल न पाऊँ । मनसा, वाचा और कर्मणा मुझसे कभी किल्बिष नहीं हुआ। यदि मैथिली निष्पाप है तो मैं उसका फल भोगूँगा, पञ्च ज्ञानन्द्रियों सहित मन से चिन्तन करके सीता को अत्यन्तशुद्धसमाचार एवं निष्पाप जानकर ही मैंने वन में उसे अपने आश्रम में रखा है। यद्यपि आप भी सीता को शुद्ध मानते हैं तो भी सीता प्रत्यय देगी। सर्ग ९७ में उल्लेख है; राम ने कहा ब्रह्मन्, आप के अकल्मष वचनों में मुझे पूर्ण विश्वास है। देवताओं के सन्निधान में जानकी ने पहले भी, लङ्का में, प्रत्यय दिया है तो भी लोकापवाद के भय से मैंने जानकी को निष्पाप जानते हुए भी उनका त्याग किया था। ये कुश और लव मेरे पुत्र हैं, यह भी मैं जानता हूँ। मेरा आशय जानकर सीता-शपथ के प्रसङ्ग में सभी देवगण आये हैं। लोकपितामह ब्रह्मा को आगे कर आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वे- देव, मरुद्गण तथा साध्य देवता एवं सभी परम महर्षि, नाग, सुपर्ण और सिद्ध सब आये हैं। राघव ने सबको देखकर कहा, "ऋषि के निष्कल्मष वाक्यों में हमें सीता के प्रति पूर्ण प्रत्यय (विश्वास) है और संसार में परम पवित्र सीता में मेरी स्थिर प्रीति है। उस समय दिव्य, शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु जनौघ को आह्लादित करने लगा। सभी राष्ट्रों से आये हुए मानवों ने सत्ययुगीय उस अद्भुत शीतल, मन्द, सुगन्ध दिव्य वायु का अनुभव किया। काषायवसना सीता ने चतुर्दश भुवनस्थ जनसमुदाय को देखकर अवाङ्मुखी तथा अधोदृष्टि प्राञ्जलि-बद्ध होकर कहा मैं राघव से अन्य किसी का कभी मन से भी चिन्तन नहीं करती, यदि यह सत्य है तो माधवी धरित्री देवी मुझे अवकाश प्रदान करे। इस तरह सीता शपथ कर रही थी कि एक अद्भुतचमत्कार हुआ भूतल से एक अत्यन्त उत्तम दिव्य सिंहासन प्रकट हुआ। जिसे अमित विक्रमवाले दिव्य रत्नभूषित नागों ने अपने फणों पर धारण कर रखा