भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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सभा में उन्हें इस काव्य के गान के लिए प्रेरित किया। तब कुश और लव ने विचित्र अर्थ और पदवाले उत्तम रामायण महाकाव्य का तन्त्रीलय के साथ अपने मधुर कण्ठों से सबके सर्व गात्र, श्रोत्र, मन और हृदयों को आह्लादित करते हुए गायन किया। सभासदों सहित उस समय राम भी सङ्गीत-श्रवण में दत्तचित्त हो गये। उक्त काव्यश्रवण से सीता और राम आदि के गुप्त एवं प्रकट दिव्य चरित्रों का स्फुट प्रकाश हुआ। सीता के प्रति कुछ लोगों के मन में उत्पन्न विविध संशय, विपर्यय आदि का समूल उन्मूलन हो गया; सीता का निर्मल चरित्र सबके हृदय में प्रकाशित हो गया। उत्तरकाण्ड के ९४वें सर्ग के प्रसङ्गानुसार राम ने अश्वमेध यज्ञ के प्रसङ्ग से महामुनियों, राजाओं तथा नैगमों, वैदिकों, पौराणिकों, शब्दविदों, वृद्धों, द्विजातियों तथा स्वरों के लक्षणज्ञों, उत्कृष्ट द्विजसत्तमों, लक्षणज्ञों, गान्धर्वतत्त्वज्ञों तथा पाद-अक्षर-समास-विदों, छन्दपरिनिष्ठित जनों, कलातत्त्वज्ञों, ज्योतिषविशेषज्ञों, क्रियाकल्पज्ञों, कार्यविशारदों, हेतूपचारकुशल जनों, चित्रकलानिपुण जनों, वृत्तिसूत्रज्ञों तथा नृत्य-गीतविशारदों आदि सब श्रेणी के विशेषज्ञों को निमन्त्रित कर उनकी महतो सभा में कुश और लव को रामायण का गान करने के लिए आमन्त्रित किया। कुश और लव के अतिमानुष मधुर गन्धर्व-स्वर से सभी श्रोता मन्त्र-मुग्ध हो गये। मुनिगण एवं पार्थिवगण बारम्बार चक्षु से पान करते हुए वे उन दोनों बालकों, कुश और लव को बारम्बार देखते हुए आपस में कह रहे थे कि ये दोनों इस तरह राम के तुल्य लगते हैं जैसे सूर्यविम्ब से दूसरा सूर्य-बिम्ब ही उदित हुआ हो। यदि ये दोनों बालक जटायुक्त और वल्कलधारी न होते तो राघवेन्द्र राम और इन दोनों बालकों में कोई भेद अवगत न होता — “जटिलौ यदि न स्यातां न वल्कलधरौ यदि। विशेषं नाधिगच्छामो गायतो राघवस्य च॥” (वा० रा० ७।९४।१४) उपर्युक्त सम्पूर्ण वक्तव्य से स्पष्ट है कि कुश और लव दोनों ही राम के पुत्र, राजकुमार थे न कि तथा- कथित कुशीलव नृत्यगीत-काव्योपजीवी जातिविशेष। उत्तरकाण्ड के ९५वें सर्ग में कहा गया है राम ने बहुत दिनों तक परम शुभ गीत मुनियों, राजाओं एवं सुग्रीव-हनुमान् वानर आदिकों के साथ सुना और उस गानप्रसङ्ग में ही कुश और लव को सीता पुत्र जान लिया— “तस्मिन् गीते तु विज्ञाय सीतापुत्रौ कुशीलवौ। तस्याः परिषदो मध्ये रामो वचनमब्रवीत्॥” (वा० रा० ७।९५।२) यदि बुल्के ने इन सब वचनों को ध्यान से पढ़ा होता तो निश्चय ही वे ऐसी विपरीत कल्पना नहीं कर सकते थे। अपने काल्पनिक मन्तव्य की रक्षा के लिए ही बुल्के ने इन सब सर्गों को प्रक्षेप कहा है। उपर्युक्त प्रकरणों से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वाल्मीकिरामायण का निर्माणकाल राम का सिंहासनारूढ़ होने का काल ही था, क्योकि राम द्वारा किये गये अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर ही कुश और लव द्वारा इसका गान हुआ था, अतः निश्चय के साथ कहा जा सकता है कि इसका निर्माणकाल ई० पू० दूसरी शती कदापि नहीं हो सकता। आश्चर्य तो यह है कि जिन प्रसङ्गों के आधार पर 'कुशीलव' शब्द को मान लेते हैं उन्हीं प्रसङ्गों से व्यक्त, उन्हीं से सम्बद्ध अन्य बातों को, कुश और लव का सीता-पुत्र या राम-पुत्र होना, राम-सभा में रामायण का सुना जाना आदि को, प्रक्षेप मान लेते हैं यही अर्ध-जरतीय न्याय है। इसी सर्ग में यह भी उल्लेख है कि उसी महापरिषद् में शुद्ध समाचारवाले दूतों को बुलाकर राम ने उनसे कहा “भगवान् बाल्मीकि के समीप जाकर यह कहो कि यदि सीता शुद्धसमाचारा हैं, वीतकल्मषा हैं, तो मुनि की अनुमति से आत्मशुद्धि को प्रमाणित करें; यदि मुनि की इच्छा हो तो उनके मनोगत भावों को जानकर बताओ। कल प्रातः समय जनकात्मजा मैथिली अपनी और मेरी शुद्धि के लिए सभा में सबके समक्ष शपथ करें।” उन दूतों ने