रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 314, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २३७ में महर्षि वाल्मीकि के समीप में ही वेदादि शास्त्रों तथा धनुर्वेद आदि का अध्ययन किया। यह सब पूर्वापरप्रसङ्गों से सुतरां सिद्ध हो जाता है। राजा द्वारा त्यक्त सीता को अपने आश्रम में आवास देकर मुनि को सीता और उसके बालकों के सम्बन्ध में चिन्ता होनी स्वाभाविक ही थी। इस सबके लिए परमावश्यक था कि सीता के विशुद्ध चरित्र का प्रख्यापन हो, इस दृष्टि से ही ब्रह्मा के आदेशानुसार ऋषि ने ऋतम्भरा प्रज्ञा से सीता, राम, लक्ष्मण आदि के गुप्त और प्रकट हसित, भाषित, इङ्गित, चेष्टित आदि अतीत चरित्रों का साक्षात्कार कर रामायण का निर्माण किया (सर्ग ३,४)। वस्तुतः वह सीताचरित्र ही था, परन्तु एक पतिव्रता का चरित्र उसके पति के चरित्र से ही साङ्गोपाङ्ग सम्पन्न होता है, इसलिए वह रामचरित्र रामायण भी है। “काव्यं रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत्। पौलस्त्यवधमित्येवं चकार चरितव्रतः॥” (वा० रा० १।४।७) रामचरित्र रामायण और सीताचरित्र के उस महाकाव्य का पौलस्त्यवध यह नाम रखा गया। सीताचरित्र होने से ही धीरोदात्त नायक राम रामायण के श्रवण में प्रवृत्त हुए थे। आत्मचरित्रश्रवण से तो धीरोदात्त नायक को संकोच ही होता है। सीता के निर्मल चरित्र का काव्य बन गया, परन्तु उसका प्रचार कैसे हो यह विचार मुनि के सामने उपस्थित हो ही रहा था उसी समय कुश और लव दोनों ने आकर मुनि का पाद-वन्दन किया। दोनों राजपुत्र हैं, आश्रमवासी हैं और उन्होंने वेदाध्ययन कर लिया है. अतः वेद के उपबृंहणार्थ मुनि ने उन दोनों बालकों को रामायण का अध्ययन कराया— “स तु मेधाविनौ दृष्ट्वा वेदेषु परिनिष्ठितौ। वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः॥” (वा० रा० १।४।६) सीता के निर्मल चरित्र के प्रख्यापन के लिए रामायण का प्रखर प्रचार अनिवार्य था, अतः प्रचार का ढङ्ग भी अत्यन्त आकर्षक होना आवश्यक था। रामायण पाठ्य होने के साथ ही उत्कृष्ट गेय भी था। कुश और लव दोनों गान्धर्वशास्त्र के भी तत्त्वज्ञ थे। साथ ही स्थान, मूर्च्छना आदि के भी विद्वान् थे और स्वर (मधुरकण्ठ) सम्पन्न थे एवं गन्धर्वों के समान अत्यन्त रूपवान् भी थे। उत्तम रूप एवं लक्षणों से युक्त तथा मधुरस्वरभाषी वे दोनों राम के पुत्र सूर्य-बिम्ब से उत्थित दो प्रतिबिम्बों के तुल्य ही राम के प्रतिबिम्ब जैसे ही लगते थे। उन दोनों धर्मज्ञ राजपुत्रों ने इस काव्य को वाचाविधेय (कण्ठस्थ) कर लिया। द्रुत, मध्य, विलम्ब तीनों प्रमाणों तथा षड्जादि सप्त स्वरों एवं वीणातन्त्रीलय के साथ इस महाकाव्य रामायण को ऋषियों की सभा में गाया। उनके गान को सुनकर सब मुनियों के नेत्र आनन्दाश्रु से पूर्ण हो गये। सभी साधु साधु कहते हुए गानकौशल और माधुर्य से विस्मित तथा प्रसन्न होकर प्रशंसा करने लगे। इस काव्य का वृत्त यद्यपि बहुत पहले का था तो भी लोकोत्तर काव्य के लोकोत्तर गान से सब प्रत्यक्षवत् प्रतीत होने लगा। उनके अति मधुर गान से प्रसन्न हो भिन्न-भिन्न मुनियों ने सुन्दर कलश, वल्कल वसन, कृष्णाजिन, यज्ञसूत्र, कमण्डलु, मौञ्जी, वृधी, कौपीन, कुठार, काषाय वस्त्र, चीर, जटाबन्धन काष्ठरज्जु, यज्ञ-भाण्ड आदि विभिन्न वस्तुएँ पुरस्कार के रूप में उन दोनों राजकुमारों को प्रदान कीं। उसी समय नैमिषारण्य में राम का अश्वमेध चल रहा था। देश-देशान्तर के सभी प्रतिष्ठित ब्रह्मर्षि, राजर्षि तथा अन्य प्रतिष्ठित व्यक्ति एकत्रित थे। महर्षि वाल्मीकि भी निमन्त्रित होकर वहाँ गये थे। कुश और लव के सर्वश्रुतिमनोहर रामायण के गान से सभी प्रभावित थे। उन विशिष्ट जनों तथा जन साधारण से भी कुश, लव की प्रशंसा सुनकर भरताग्रज राम ने उन्हें अपने भवन में बुलाकर उनका सम्मान किया और विशिष्ट जनों की महती