भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 325

२४८ रामायणमीमांसा सप्तम “रामायणं महाकाव्यमुद्दिश्य नाटकं कृतम् । जन्म विष्णोरमेयस्य राक्षसेन्द्रवधेप्सया ।।” (ह० पु० विष्णुपर्व अ० ९२) बुल्के ने हरिवंश के उक्त श्लोक का उद्धरण कर कहा है कि प्राचीन काल में रामकथा का अभिनय होता था । किन्तु उसी श्लोक से स्पष्टतः राम को अप्रमेय विष्णुस्वरूप भी कहा गया है, पर उसे बुल्के स्वीकार नहीं करते हैं । श्लोकार्थ यह है—रामायण महाकाव्य के आधार पर नाटकों का निर्माण हुआ है । उसमें राक्षसेन्द्र रावण के वधार्थ अप्रमेय विष्णु के जन्म आदि का वर्णन है । रामकथा की लोकप्रियता राम के स्वाभाविक महत्त्व, परमेश्वरत्व तथा विशेषतः रामावतार के स्वाभाविक मर्यादामयी लीलाओं के कारण थी, किसी के मानने न मानने के आधार पर नहीं । राम के विद्यमान गुणों का भी वर्णन असम्भव है फिर महत्त्व वृद्ध्यर्थ अविद्यमान गुणों के वर्णन का प्रसङ्ग ही कैसे सम्भव है ? किसी व्यक्ति में अविद्यमान गुणों का आरोप कर वर्णन करना स्तुति कही जाती है । जैसे राजा को सूर्यतुल्य कहा जाता है । ‘रविरिव राजते राजा ।’ परन्तु ईश्वरस्वरूप राम में विद्यमान ही अनन्त गुण हैं जिनका सामस्त्येन वर्णन नहीं हो सकता । जैसे आकाश में अपनी शक्ति के अनुसार मच्छर और गरुड़ दोनों ही उड़ते हैं, परन्तु आकाश का अन्त कोई नहीं पाता— “नभः पतन्त्यात्मसमं पतत्रिणः ।” उसी तरह अपनी-अपनी शक्ति भर ब्रह्मादि एवं सामान्य जन भी भगवद्गुणों का वर्णन करते हैं पर अन्त कोई नहीं पाता । अपनी वाणी पवित्र करना ही भगवद्गुण-गणवर्णन करने का उद्देश्य है । स्तुति न सम्भव ही है न उद्देश्य ही है । बुल्के कहते हैं “रामकथा की लोकप्रियता का एक और महत्त्वपूर्ण प्रमाण बौद्ध तथा जैन साहित्य में मिलता है । बौद्धों ने ईसवी सन् की कई शताब्दियों पहले राम को बोधिसत्त्व मानकर रामकथा की लोकप्रियता, आकर्षकता का साक्ष्य दिया है । जैनियों ने वाल्मीकि की रचना को मिथ्या कहकर कथा के एक नये रूप में राम को ( जैनी रूप में ) अपनाने का प्रयत्न किया है । इसी तरह रामकथा प्रारम्भ से ही भारत की संस्कृति में इतनी फैल गयी कि राम ने उस समय के प्रचलित तीन धर्मों में प्रमुख स्थान प्राप्त किया ब्राह्मणधर्म में विष्णु के अवतार, बौद्ध- धर्म में बोधिसत्त्व तथा जैनधर्म में आठवें बलदेव के रूप में । आगे चलकर संस्कृतसाहित्य की प्रत्येक शाखा में, अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य में एवं भारत के निकटवर्ती देशों में सर्वत्र रामकथा का प्रभाव दिखलायी देता है ।” परन्तु यह सब सर्वप्राणिपरप्रेमास्पद राम और उनकी कथा में आकर्षण स्वाभाविक है, विकास-क्रम के अनुसार काल्पनिक विशेषता के आधार पर नहीं । बौद्धों और विशेषकर जैनों ने तो राम की कथा की ओर जन-प्रवृत्ति देखकर बौद्ध तथा जैन जनता की स्वाभाविक रामकथा में प्रवृत्ति होने से वेदप्रामाण्य तथा ईश्वरवाद का खतरा देखकर रामकथा को विकृत कर राम को बौद्ध और जैन बनाकर अपनी जनता को अपना अनुयायी बनाये रखने के उद्देश्य से वैसा किया था । फिर भी सत्यान्वेषी बौद्ध और जैन भी वाल्मीकिरामायण की ओर आकृष्ट हुए बिना नहीं रहे हैं ।