भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 324

अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २४७ किया है। तदनुसार विचार करने से स्पष्ट विदित होता है कि अवतारवाद भावनामात्र नहीं है। वह कल्पनामात्र नहीं है अथवा कोई दिमागी फितूर भी नहीं है, किन्तु सूर्य-चन्द्र से भी ज्वलन्त सत्य है जिसका परम प्रमाणभूत वेदों में वर्णन है। उसमें प्रारम्भ और अन्त में कोई भेद नहीं है। अतएव प्रारम्भ में "विष्णु की अपेक्षा प्रजापति को उस सम्बन्ध में अधिक महत्त्व दिया जाता था" यह कल्पना निस्सार है। प्रकृत में विष्णु और प्रजापति में भेद नहीं है, नाम-भेद से लक्ष्य भेद नहीं होता, किन्तु लक्षण-भेद से लक्ष्य-भेद होता है। जैसे ब्रह्मसूत्रों में 'जन्माद्यस्य यतः' 'प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् । यह ब्रह्म का लक्षण कहा गया है, उक्त लक्षण जिसमें घटता हो वह ब्रह्म है, फिर नाम भले ही आकाश, प्राण आदि भिन्न-भिन्न हों । १४५ वें अनु० में बुल्के कहते हैं "रामकथाविषयक गाथाओं से लेकर प्रचलित वाल्मीकिरामायणरूप तक रामकथा के प्रारम्भिक विकास की रूपरेखा अङ्कित करने का प्रयत्न प्रस्तुत अध्याय में किया गया है। यह उत्तरोत्तर विकास ही रामकथा की लोकप्रियता का प्रमाण है।" परन्तु बुल्के को यह समझना चाहिए कि भारत में काल्पनिक किसी विकास को महत्त्व नहीं दिया जाता है। क्योंकि वह निराधार होता है। इसी लिए आगम प्रमाण पर विचार करते हुए पौरुषेय तथा अपौरुषेय विविध आगमों पर विचार कर अपौरुषेय आगम का ही मुख्य प्रामाण्य माना गया है। पौरुषेय उसी आगम को प्रमाण माना गया है, जो कि अपौरुषेयवेदमूलक है। पुरुषों में भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव आदि दोषों की सम्भावना प्रायः होती है; इसी लिए पौरुषेय ग्रन्थों का स्वतन्त्र प्रामाण्य मान्य नहीं होता है। नैयायिक, वैशेषिक आदि भी आप्तवाक्य का ही प्रामाण्य मानते हैं। ईश्वर सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् आप्त है उसके वचन होने से वेद प्रमाण हैं। अन्य ऋषि, महर्षि वेदानुयायी वेदानुसारी होने से आदरणीय होते हैं। अतएव जिस किसी के ग्रन्थ का प्रामाण्य नहीं माना जाता है। मार्क्सवादी विकासवादी कहते हैं, "आदिम मानव वनवासी था, जङ्गली जानवरों के समान ही वह भी वृक्षों पर या कन्दराओं में जीवन व्यतीत करता था। प्राकृत अग्नि, वायु, बादल और बिजली से प्रभावित होता रहता था। उसका भीरु मस्तिष्क अपने इर्द-गिर्द बहुत भूत, प्रेत, पिशाच आदि आत्माओं की कल्पना करता हुआ उनकी पूजा-स्तुति कर आत्मरक्षा की आशा करता था। वही भूत-प्रेत की कल्पना विकसित मानव के मस्तिष्क में सभ्यता के साबुन से धुल-धुलकर देवकल्पना बन गयी। वही वैज्ञानिक विविध चमत्कृतियों से चमत्कृत होकर ईश्वर-कल्पना या ब्रह्म-कल्पना का रूप धारण कर सकी है। समझदार व्यक्ति सहज ही में समझ जायगा कि वस्तुतः भीरु मस्तिष्क की भूत-प्रेत-कल्पना ही देव, ईश्वर या ब्रह्म कल्पना का मूल है। वास्तविक वह कुछ भी नहीं है। इसी तरह विकास-क्रम के अनुसार महिमा का विस्तार है।" किन्तु ईश्वरत्व का विकास किसी में हो जाये एतावता वह ईश्वर नहीं हो सकता। इसी तरह यदि राम वस्तुतः मनुष्यमात्र थे, ईश्वर नहीं थे तो कालक्रम या विकासक्रम से उनकी महिमा बढ़ जाने पर भी उनकी ईश्वरत्व-ख्याति हो जाने पर भी उनको ईश्वर मानना उचित नहीं है और उससे कोई वास्तविक लाभ नहीं हो सकता। उलटा अनीश्वर में ईश्वरत्वभ्रान्ति का दोष भी हो सकता है। अतः स्पष्ट है कि राम का ईश्वरत्व, परब्रह्मत्व, श्रीराम का अनन्त कल्याणगुणगणास्पदत्व स्वाभाविक ही था और यह अपौरुषेय मन्त्रों, ब्राह्मणों, उपनिषदों से ही सिद्ध है। उन्हीं आधारों पर वाल्मीकि ने शतकोटिप्रविस्तर रामायण का आविर्भाव किया। उसी का सार वर्तमान चतुर्विंशतिसाहस्रिका संहिता वाल्मीकिरामायण है। उसी आधार पर पुराणों में अध्यात्मरामायण, अद्भुतरामायण, आनन्दरामायण, महारामायण आदि रामायणों तथा संहिताओं का निर्माण हुआ है। उसी आधार पर अनेक संस्कृत, प्राकृत, देशी, विदेशी भाषाओं में विविध रामकथाओं का आविर्भाव हुआ है। एकस्वर से सर्वत्र राम का परमेश्वरत्व, ब्रह्मत्व प्रसिद्ध है। कोटि-कोटि नर-नारी राम की उपासना करते हैं। केवल मिथ्या विकासवादी कल्पना के आधार पर यह सब नहीं हो सकता था।