रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २४७ किया है। तदनुसार विचार करने से स्पष्ट विदित होता है कि अवतारवाद भावनामात्र नहीं है। वह कल्पनामात्र नहीं है अथवा कोई दिमागी फितूर भी नहीं है, किन्तु सूर्य-चन्द्र से भी ज्वलन्त सत्य है जिसका परम प्रमाणभूत वेदों में वर्णन है। उसमें प्रारम्भ और अन्त में कोई भेद नहीं है। अतएव प्रारम्भ में "विष्णु की अपेक्षा प्रजापति को उस सम्बन्ध में अधिक महत्त्व दिया जाता था" यह कल्पना निस्सार है। प्रकृत में विष्णु और प्रजापति में भेद नहीं है, नाम-भेद से लक्ष्य भेद नहीं होता, किन्तु लक्षण-भेद से लक्ष्य-भेद होता है। जैसे ब्रह्मसूत्रों में 'जन्माद्यस्य यतः' 'प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् । यह ब्रह्म का लक्षण कहा गया है, उक्त लक्षण जिसमें घटता हो वह ब्रह्म है, फिर नाम भले ही आकाश, प्राण आदि भिन्न-भिन्न हों । १४५ वें अनु० में बुल्के कहते हैं "रामकथाविषयक गाथाओं से लेकर प्रचलित वाल्मीकिरामायणरूप तक रामकथा के प्रारम्भिक विकास की रूपरेखा अङ्कित करने का प्रयत्न प्रस्तुत अध्याय में किया गया है। यह उत्तरोत्तर विकास ही रामकथा की लोकप्रियता का प्रमाण है।" परन्तु बुल्के को यह समझना चाहिए कि भारत में काल्पनिक किसी विकास को महत्त्व नहीं दिया जाता है। क्योंकि वह निराधार होता है। इसी लिए आगम प्रमाण पर विचार करते हुए पौरुषेय तथा अपौरुषेय विविध आगमों पर विचार कर अपौरुषेय आगम का ही मुख्य प्रामाण्य माना गया है। पौरुषेय उसी आगम को प्रमाण माना गया है, जो कि अपौरुषेयवेदमूलक है। पुरुषों में भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव आदि दोषों की सम्भावना प्रायः होती है; इसी लिए पौरुषेय ग्रन्थों का स्वतन्त्र प्रामाण्य मान्य नहीं होता है। नैयायिक, वैशेषिक आदि भी आप्तवाक्य का ही प्रामाण्य मानते हैं। ईश्वर सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् आप्त है उसके वचन होने से वेद प्रमाण हैं। अन्य ऋषि, महर्षि वेदानुयायी वेदानुसारी होने से आदरणीय होते हैं। अतएव जिस किसी के ग्रन्थ का प्रामाण्य नहीं माना जाता है। मार्क्सवादी विकासवादी कहते हैं, "आदिम मानव वनवासी था, जङ्गली जानवरों के समान ही वह भी वृक्षों पर या कन्दराओं में जीवन व्यतीत करता था। प्राकृत अग्नि, वायु, बादल और बिजली से प्रभावित होता रहता था। उसका भीरु मस्तिष्क अपने इर्द-गिर्द बहुत भूत, प्रेत, पिशाच आदि आत्माओं की कल्पना करता हुआ उनकी पूजा-स्तुति कर आत्मरक्षा की आशा करता था। वही भूत-प्रेत की कल्पना विकसित मानव के मस्तिष्क में सभ्यता के साबुन से धुल-धुलकर देवकल्पना बन गयी। वही वैज्ञानिक विविध चमत्कृतियों से चमत्कृत होकर ईश्वर-कल्पना या ब्रह्म-कल्पना का रूप धारण कर सकी है। समझदार व्यक्ति सहज ही में समझ जायगा कि वस्तुतः भीरु मस्तिष्क की भूत-प्रेत-कल्पना ही देव, ईश्वर या ब्रह्म कल्पना का मूल है। वास्तविक वह कुछ भी नहीं है। इसी तरह विकास-क्रम के अनुसार महिमा का विस्तार है।" किन्तु ईश्वरत्व का विकास किसी में हो जाये एतावता वह ईश्वर नहीं हो सकता। इसी तरह यदि राम वस्तुतः मनुष्यमात्र थे, ईश्वर नहीं थे तो कालक्रम या विकासक्रम से उनकी महिमा बढ़ जाने पर भी उनकी ईश्वरत्व-ख्याति हो जाने पर भी उनको ईश्वर मानना उचित नहीं है और उससे कोई वास्तविक लाभ नहीं हो सकता। उलटा अनीश्वर में ईश्वरत्वभ्रान्ति का दोष भी हो सकता है। अतः स्पष्ट है कि राम का ईश्वरत्व, परब्रह्मत्व, श्रीराम का अनन्त कल्याणगुणगणास्पदत्व स्वाभाविक ही था और यह अपौरुषेय मन्त्रों, ब्राह्मणों, उपनिषदों से ही सिद्ध है। उन्हीं आधारों पर वाल्मीकि ने शतकोटिप्रविस्तर रामायण का आविर्भाव किया। उसी का सार वर्तमान चतुर्विंशतिसाहस्रिका संहिता वाल्मीकिरामायण है। उसी आधार पर पुराणों में अध्यात्मरामायण, अद्भुतरामायण, आनन्दरामायण, महारामायण आदि रामायणों तथा संहिताओं का निर्माण हुआ है। उसी आधार पर अनेक संस्कृत, प्राकृत, देशी, विदेशी भाषाओं में विविध रामकथाओं का आविर्भाव हुआ है। एकस्वर से सर्वत्र राम का परमेश्वरत्व, ब्रह्मत्व प्रसिद्ध है। कोटि-कोटि नर-नारी राम की उपासना करते हैं। केवल मिथ्या विकासवादी कल्पना के आधार पर यह सब नहीं हो सकता था।
२४८ रामायणमीमांसा सप्तम “रामायणं महाकाव्यमुद्दिश्य नाटकं कृतम् । जन्म विष्णोरमेयस्य राक्षसेन्द्रवधेप्सया ।।” (ह० पु० विष्णुपर्व अ० ९२) बुल्के ने हरिवंश के उक्त श्लोक का उद्धरण कर कहा है कि प्राचीन काल में रामकथा का अभिनय होता था । किन्तु उसी श्लोक से स्पष्टतः राम को अप्रमेय विष्णुस्वरूप भी कहा गया है, पर उसे बुल्के स्वीकार नहीं करते हैं । श्लोकार्थ यह है—रामायण महाकाव्य के आधार पर नाटकों का निर्माण हुआ है । उसमें राक्षसेन्द्र रावण के वधार्थ अप्रमेय विष्णु के जन्म आदि का वर्णन है । रामकथा की लोकप्रियता राम के स्वाभाविक महत्त्व, परमेश्वरत्व तथा विशेषतः रामावतार के स्वाभाविक मर्यादामयी लीलाओं के कारण थी, किसी के मानने न मानने के आधार पर नहीं । राम के विद्यमान गुणों का भी वर्णन असम्भव है फिर महत्त्व वृद्ध्यर्थ अविद्यमान गुणों के वर्णन का प्रसङ्ग ही कैसे सम्भव है ? किसी व्यक्ति में अविद्यमान गुणों का आरोप कर वर्णन करना स्तुति कही जाती है । जैसे राजा को सूर्यतुल्य कहा जाता है । ‘रविरिव राजते राजा ।’ परन्तु ईश्वरस्वरूप राम में विद्यमान ही अनन्त गुण हैं जिनका सामस्त्येन वर्णन नहीं हो सकता । जैसे आकाश में अपनी शक्ति के अनुसार मच्छर और गरुड़ दोनों ही उड़ते हैं, परन्तु आकाश का अन्त कोई नहीं पाता— “नभः पतन्त्यात्मसमं पतत्रिणः ।” उसी तरह अपनी-अपनी शक्ति भर ब्रह्मादि एवं सामान्य जन भी भगवद्गुणों का वर्णन करते हैं पर अन्त कोई नहीं पाता । अपनी वाणी पवित्र करना ही भगवद्गुण-गणवर्णन करने का उद्देश्य है । स्तुति न सम्भव ही है न उद्देश्य ही है । बुल्के कहते हैं “रामकथा की लोकप्रियता का एक और महत्त्वपूर्ण प्रमाण बौद्ध तथा जैन साहित्य में मिलता है । बौद्धों ने ईसवी सन् की कई शताब्दियों पहले राम को बोधिसत्त्व मानकर रामकथा की लोकप्रियता, आकर्षकता का साक्ष्य दिया है । जैनियों ने वाल्मीकि की रचना को मिथ्या कहकर कथा के एक नये रूप में राम को ( जैनी रूप में ) अपनाने का प्रयत्न किया है । इसी तरह रामकथा प्रारम्भ से ही भारत की संस्कृति में इतनी फैल गयी कि राम ने उस समय के प्रचलित तीन धर्मों में प्रमुख स्थान प्राप्त किया ब्राह्मणधर्म में विष्णु के अवतार, बौद्ध- धर्म में बोधिसत्त्व तथा जैनधर्म में आठवें बलदेव के रूप में । आगे चलकर संस्कृतसाहित्य की प्रत्येक शाखा में, अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य में एवं भारत के निकटवर्ती देशों में सर्वत्र रामकथा का प्रभाव दिखलायी देता है ।” परन्तु यह सब सर्वप्राणिपरप्रेमास्पद राम और उनकी कथा में आकर्षण स्वाभाविक है, विकास-क्रम के अनुसार काल्पनिक विशेषता के आधार पर नहीं । बौद्धों और विशेषकर जैनों ने तो राम की कथा की ओर जन-प्रवृत्ति देखकर बौद्ध तथा जैन जनता की स्वाभाविक रामकथा में प्रवृत्ति होने से वेदप्रामाण्य तथा ईश्वरवाद का खतरा देखकर रामकथा को विकृत कर राम को बौद्ध और जैन बनाकर अपनी जनता को अपना अनुयायी बनाये रखने के उद्देश्य से वैसा किया था । फिर भी सत्यान्वेषी बौद्ध और जैन भी वाल्मीकिरामायण की ओर आकृष्ट हुए बिना नहीं रहे हैं ।
अष्टम अध्याय अवतार-सामग्री “मनवे ह वै प्रातः। अवनेज्यमुदकमाजह्रर्यथेदं पाणिभ्यामवनेजनायाहरन्त्येवं तस्यावने- निजानस्य मत्स्यः पाणी आपेदे ॥१॥ स हास्मै वाचमुवाद। बिभृहि मा पारयिष्यामि त्वेति कस्मान्मा पारयिष्यसीत्यौघ इमाः सर्वाः प्रजा निर्वोढा ततस्त्वा पारयिताऽस्मीति। कथं ते भृतिरिति ॥२॥ स होवाच। यावद्वै क्षुल्लका भवामो बह्वी वै नस्तावन्नाष्ट्रा भवत्युत मत्स्य एव मत्स्यं गिलति कुम्भ्यां माग्रे बिभरासि स यदा तामतिवर्धा अथ कर्षू खात्वा तस्यां मा बिभरासि स यदा तामतिवर्धा अथ मा समुद्रम- भ्यवहरासि तर्हि वा अतिनाष्ट्रो भवितास्मीति ॥३॥ शश्वद्ध झष आस। स हि ज्येष्ठं वर्धतेऽथेतिथीं समां तदौघ आगन्ता। तन्मा नावमुप कल्प्योपासासे स औघ उत्थिते नावमापद्यासै ततस्त्वा पारयितास्मीति ।” (श० ब्रा० १।८।१।१-४) उपर्युक्त वचनों में कहा गया हैं कि मनु ने अवनेजन के लिए दोनों हाथों में जल लिया तो उसमें एक मत्स्य आ गया और उसने मनु से कहा, 'मेरी रक्षा करो, मैं प्रजा सहित तुम्हें प्रलय के महौघ से पार करूँगा।' तब मनु ने कहा 'कैसे तुम्हारा भरण हो ?' तो मत्स्य ने कहा जब तक मत्स्य छोटे रहते हैं तभी तक उनके नाश का भय रहता है। एक मत्स्य ही दूसरे मत्स्य का भक्षण करता है, अतः कुम्भी में रखकर मेरा पालन करो। मनु ने कुम्भ में मत्स्य को रखा।” जब वह अधिक बढ़ गया तो उसने कहा, “बड़ा कर्षू 'सरोवर' बनाकर हमें उसमें रखो।” मनुजी ने वैसा ही किया। जब उससे भी अधिक बढ़ गया तब उसने कहा, "अब समुद्र में मुझे रखो।” तब मनु ने समुद्र में रख दिया। मत्स्य अत्यधिक बढ़ गया और उसने मनु से कहा, “अमुक समय में महौघ आयेगा तब नौका की कल्पना कर उसमें आरूढ़ होना। मैं पार करूँगा।” “तमेवं भृत्वा समुद्रमभ्यवजहार। स यतिथीं तत्समां परिदिदेश ततिथीं समां नावमुपकल्प्योपा- सांचक्रे। स औघ उत्थिते नावमापेदे। तं स मत्स्य उपन्यापुप्लुवे तस्य शृङ्गे नावः पाशं प्रतिमुमोच तेनैत- मुत्तरं गिरिमधिदुद्राव ॥५॥ स होवाच अपीपरं वै त्वा वृक्षे नावं प्रतिबध्नीष्व तं तु त्वा मा गिरौ सन्तमुदकमन्तश्छेत्सीद्यावदुदकं समवायात्तावत्तावदन्ववसर्पासीति । स ह तावत्तावदेवान्ववसर्प तदप्येत- दुत्तरस्य गिरेर्मनोरवसर्पणमित्यौघो ह ताः सर्वाः प्रजा निरुवाहायेह मनुरेवैकः परिशिशिषे ॥६॥” (श० ब्रा० १।८।१।५,६) मनु ने समुद्र में मत्स्य को डाल दिया। जितने दिनों में महौघ आने को मत्स्य ने कहा था उतने ही दिनों में महौघ आया। मनु ने पृथिवी को नाव बनाकर उसमें स्थान प्राप्त किया और उसी मत्स्य के शृङ्ग में नाव को बाँध दिया। उसी मत्स्य के द्वारा मनु उत्तर गिरि हिमालय पहुँचे। तत्पश्चात् महामत्स्य ने कहा—मैंने तुम्हें पार कर दिया नाव को वृक्ष में बाँध दो। “ऊचुश्च कूर्मराजानमकूपारे सुरासुराः। अधिष्ठानं गिरेरस्य भवान् भवितुमर्हति ॥ कूर्मेण तु तथेत्युक्त्वा पृष्ठमस्य समर्पितम्। तं शैलं तस्य पृष्ठस्थं यन्त्रेणेन्द्रो न्यपीडयत् ॥ ३२
२५० रामायणमीमांसा अष्टम
मन्थानं मन्दरं कृत्वा तथा नेत्रं च वासुकिम् । देवा मथितुमारब्धाः समुद्रं निधिमम्भसाम् ॥” ( म० भा० १।१८।११-१३ ) महाभारत के उपर्युक्त वचनों में कूर्मावतार का वर्णन है। देवताओं की प्रार्थना से उस कूर्म ने अपने पृष्ठ पर मन्दराचल को धारण किया था जिसको मन्थान दण्ड बनाकर देवताओं एवं असुरों ने समुद्रमन्थन किया था। निम्नोक्त वचनों में परशुराम आदि अवतारों का वर्णन है— “त्रेतायुगे भविष्यामि रामो भृगुकुलोद्भवः । क्षत्रं चोत्सादयिष्यामि समृद्धबलवाहनम् ॥ सन्ध्यांशे समनुप्राप्ते त्रेताया द्वापरस्य च। अहं दाशरथी रामो भविष्यामि जगत्पतिः॥ द्वापरस्य कलेश्चैव सन्धौ पर्यवसानिके । प्रादुर्भावः कंसहेतोर्मंथुरायां भविष्यति ॥ हंसः कूर्मश्च मत्स्यश्च प्रादुर्भावा द्विजोत्तम । वराहो नरसिंहश्च वामनो राम एव च ॥ रामो दाशरथिश्चैव सात्वतः कल्किरेव च । यदा वेदश्रुतिर्नष्टा मया प्रत्याहृता पुनः॥ सवेदाः सश्रुतीकाश्च कृताः पूर्वं कृते युगे । अतिक्रान्ताः पुराणेषु श्रुतास्ते यदि वा क्वचित् ॥” ( म० भा० १२।३३९।८४-८९; १०१-१०५ ) “जन्माद्यस्य यतः” ( ब्र० सू० १।१।२), “प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् ।” ( ब्र० सू० १।४।२३ ) इत्यादि ब्रह्मसूत्रों से सम्पूर्ण जगत् के अभिन्न निमित्तोपादान कारण को ब्रह्म कहा गया है। उपनिषदों, मन्त्रों, ब्राह्मणों एवं आरण्यकों में जहाँ कहीं भी जिसमें उक्त लक्षण घटता हो वह चाहे जिस नाम से व्यपदिष्ट हो उसे ब्रह्म ही समझना चाहिये। इसी लिये “आकाशस्तल्लिङ्गात्” ( ब्र० सू० १।१।२२ ), “प्राणस्तथानुगमात्” ( ब्र० सू० १।१।२८ ), “अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्” ( ब्र० सू० १।१।२४ ) इत्यादि सूत्रों में आकाश, प्राण तथा आदित्यमण्डलस्थ पुरुष को ब्रह्म ही कहा गया है, क्योंकि श्रुतिप्रमाण से उनमें जगत्कारणता सिद्ध है। इस दृष्टि से प्रकृत में विष्णु और प्रजापति अभिन्न ही तत्त्व हैं । अतएव वाल्मीकिरामायण में प्रजापति नाम का निर्देश न होकर ब्रह्म का उल्लेख हुआ है। दक्षादि प्रजापति अवान्तर प्रजापति होते हैं। मुख्य प्रजापति ब्रह्मा ही होता है। वही विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का हेतु होता है। वह यद्यपि एक ही है तो भी कार्य भेद से उसके पृथक्-पृथक् भी नाम होते हैं। उत्पादक ब्रह्मा, पालक विष्णु एवं संहारक रुद्र या शिव कहे जाते हैं। इस दृष्टि से प्रजापति ईश्वर या महाविराट् त्रिमूर्ति होता है। त्रिमूर्ति में भी विष्णु की प्रधानता होने से इन शब्दों द्वारा विष्णु का ही उल्लेख हुआ है। स्वयम्भू ब्रह्मा का देवताओं के साथ आविर्भाव हुआ और उन्होंने वाराह रूप धारण कर पृथ्वी का उद्धार किया। पूर्वापर के सभी ग्रन्थों के समन्वित निष्कर्ष से यह सिद्धान्त सिद्ध होता है कि भगवान् विष्णु ही शतपथ, तैत्तिरीय, काठक आदि में प्रजापति, ब्रह्म आदि शब्दों से उक्त हैं और उन्हीं से मत्स्य, कूर्म, वराह आदि अवतार हुए । हर ग्रन्थ में हर बात का निरूपण सम्भव नहीं होता, अपने-अपने अनुसार हि कोई ग्रन्थ मत्स्यावतार का एवं कोई वराहावतार का वर्णन करते हैं। रामायण का कोई पाठ परवर्ती नहीं है। सभी पाठ प्रामाणिक एवं
परम्पराप्राप्त हैं। जैसे वेदों में शाखाभेद से सभी पाठभेद प्रामाणिक हैं। सप्तशती के परम्पराप्राप्त सभी पाठ प्रामाणिक हैं। वही स्थिति रामायण के पाठ-भेदों की भी है। महाभारत में कूर्मराज से देवताओं ने और असुरों ने मन्दराचल का आधार बनने को कहा। परन्तु जब तैत्तिरीय आरण्यक में ही कूर्म को प्रजापति ईश्वर का अवतार कहा गया है तब उन कूर्मराज को प्रजापति के अवतारभूत कूर्म से अभिन्न ही मानना स्वाभाविक है। यदि वेदों और आर्ष ग्रन्थों का प्रामाण्य न माना जाय तब तो किसी कच्छप से देवताओं द्वारा प्रार्थना और उसके द्वारा मन्दराचल का धारण आदि सिद्ध ही नहीं हो सकता। उस स्थिति में यह सब कुछ पागल का प्रलापमात्र समझा जायगा । महाभारत एवं विष्णुपुराण का समन्वय करने से भी यही निष्कर्ष निकलता है। महाभारत का प्रजापति विष्णुरूप ही है। महाभारत के वचन में 'मत्परं नाधिगम्यते' कहा गया है। जिससे स्पष्ट है कि वह प्रजापति वेदान्तवेद्य ब्रह्म ही है। वही विष्णु भी हैं। 'अहं प्रजापतिर्ब्रह्मा' इत्यादि का श्लोकार्थ यों है—मैं सृष्टिकर्ता प्रजापति ब्रह्मा हूँ। मुझसे पर (उत्कृष्ट) कोई भी प्रमाण से ज्ञात नहीं है। मैंने ही मत्स्यरूप से महान् भय से तुम देवताओं की रक्षा की थी। विष्णुपुराण के वचन का अर्थ निम्नोक्त है। जगत् का प्रलय होने पर 'तोयान्तःस्थां महीं ज्ञात्वा' अनुमान से पृथ्वी को जल के भीतर जानकर उसका उद्धार करने की कामना से प्रजापति ने पूर्व कल्पों के समान ही मत्स्य, कूर्म आदि के समान वराहरूप धारण किया। पूर्वोक्त दृष्टि से ही विष्णुपुराण में विष्णु तथा ब्रह्मस्वरूप नारायण एवं ब्रह्मा के साथ अभिन्नता कही गयी है, अतएव मत्स्य, कूर्म आदि विष्णु के ही अवतार हैं। आप कहते हैं विष्णु का महत्त्व बढ़ जाने से प्रजापति के अवतार मत्स्य, कूर्म आदि विष्णु के माने जाने लगे ? पर यह कल्पना सर्वथा निराधार है। किसी की इच्छा या भावना से विष्णु का महत्त्व घटता अथवा बढ़ता नहीं है। शास्त्रों के आधार पर ही विष्णु का महत्त्व है। विष्णुपुराण, हरिवंशपुराण तथा महाभारत में विष्णु का खूब महत्त्व भी कहा गया है और उन्हीं ग्रन्थों में प्रजापति के अवतारों में मत्स्य, कूर्म आदि का वर्णन भी है। अतः कब से क्यों किस प्रमाण से विष्णु का महत्त्व बढ़ा ? यह कहना और सिद्ध करना असम्भव ही है। महाभारत तथा हरिवंश में बुल्के के अनुसार भी वराह तथा विष्णु का सम्बन्ध माना गया है। वस्तुतः हेमाद्रि, पराशरमाधव, मिताक्षरा, निर्णयसिन्धु आदि में जैसे मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक, विविध स्मृतियों, पुराणों और आगमों का समन्वय करके ही निष्कृष्ट अर्थ निकाला जाता है वैसे ही अवतारों और रामकथाओं के सम्बन्ध में भी सबका समन्वय करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है। जब महाभारत, हरिवंश तथा विष्णुपुराण जैसे प्रामाणिक ग्रन्थों में प्रजापति और विष्णु को एक मानकर मत्स्यादि अवतारों और राम और कृष्ण को विष्णु के अवतार कहा ही जा रहा है तब हठधर्मी के कारण वाल्मीकिरामायण में राम को अवतार बतलानेवाले अंशों को क्षेपक कहने में क्या तुक है ? १४१ वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "वामनावतार और नृसिंहावतार प्रारम्भ से विष्णु से ही सम्बन्ध रखते हैं। वामनावतार का उल्लेख तैत्तिरीयसंहिता (२।१।३।१), शतपथब्राह्मण (१।२।५।५), तैत्तिरीयब्राह्मण (१।७।१७) एवं ऐतरेयब्राह्मण (६।३।७) में हुआ है। यह अवतार ऋग्वेद की एक कथा से विकसित माना जाता है (दे० ऋ० सं० १।२२) और शतपथब्राह्मण (१।२।५।१) । नारायणीय उपाख्यान महाभारत (१२।३२६।७५) तथा हरिवंश (१।४१) में इसका विष्णु के अन्य अवतारों के साथ उल्लेख हुआ है। नृसिंहावतार की कथा पहले पहल तैत्तिरीय आरण्यक के परिशिष्ट (१०।१।६) में मिलती है। नारायणीय उपाख्यान महाभारत (१२।३२६।७३ और ३३७।३६) तथा हरिवंशपु० (१।४१) में इसका उल्लेख है। परशुराम विष्णु के अवतार का प्रारम्भिक कथाओं में उल्लेख नहीं है। उदाहरणार्थ महाभारत (३।११५-११७), किन्तु नारायणीय उपाख्यान
२५२ रामायणमीमांसा अष्टमं महाभारत ( १२।३२६।७७ ), हरिवंश पु० ( १।४१।११२-१२० ) तथा विष्णुपुराण ( १।९।१४३ ) में उनको विष्णु का अवतार माना गया है ।" वस्तुतः उक्त सभी ग्रन्थ प्रामाणिक हैं । उनमें कहीं भी किसी अवतार की चर्चा है तो वह प्रामाणिक है । निष्कर्षरूप में सभी विष्णु के अवतार हैं, पर इन पृथक्-पृथक् उक्तियों से अवतारों के विकास की बात सिद्ध नहीं होती । अतः बुल्के का यह निष्कर्ष कि "ब्राह्मणों में तथा अन्य प्राचीन साहित्यों में अवतारवाद विद्यमान है, किन्तु उक्त ग्रन्थों के रचनाकाल में न तो अवतारों की कोई विशेष पूजा की जाती थी और न उनमें विष्णु का प्राधान्य ही था" सर्वथा असङ्गत है । प्रजापति तथा विष्णु का विभिन्न यज्ञों में देवताओं के रूप में उल्लेख है ही । कई स्थलों में इन्द्र और विष्णु का साथ-साथ देवतात्व है, कहीं विष्णु का ही प्राधान्य भी । पीछे दिखलाया जा चुका है कि विष्णु की पूज्यता से ही उनसे अभिन्न अवतारों की पूज्यता सिद्ध होती है। वस्तुतः जैसे अग्निहोत्र, ज्योतिष्टोम आदि कर्मों का ज्ञान और अनुष्ठान किसी एक ग्रन्थ पर आश्रित नहीं होता, वह तो मन्त्र, ब्राह्मण और कल्पसूत्र तीनों का समन्वय करके ही समझा जा सकता है । केवल मन्त्र या ब्राह्मण के आधार पर उनका अनुष्ठान नहीं हो सकता । इतना ही क्यों, तीनों के आधार पर बनी हुई परम्पराप्राप्त पद्धतियों के आधार पर ही ज्योतिष्टोमादि का प्रयोग हो सकता है। इसी तरह मन्त्रों, ब्राह्मणों, आरण्यकों, उपनिषदों तथा रामायण, भारत, पुराणों एवं आगमों के आधार पर बने पूजाविधानों के आधार पर ही राम, कृष्ण आदि की आराधनाएँ होती हैं, पर इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि इनकी पूजा पहले नहीं होती थी, विकास-क्रम के बाद में चल पड़ी । "अतएव कृष्णावतार के साथ-साथ अवतारवाद के विकास में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन प्रारम्भ हुआ । उस समय से लेकर अवतारवाद भक्ति-भाव से ओत-प्रोत होने लगा ।" बुल्के का यह कथन भी निराधार है, क्योंकि महाभारत, हरिवंश, विष्णुपुराण, श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थों से ही कृष्णावतार की सामग्री प्राप्त होती है और उन्हीं ग्रन्थों में विष्णु की, राम आदि की भक्ति की भी चर्चा है ही। रामतापनीय, गोपालतापनीय आदि उपनिषदों में भी राम, कृष्ण आदि अवतारों की भक्ति एवं पूजा आदि का उल्लेख है । यह कहना सर्वथा निराधार है कि "वासुदेव कृष्ण भागवतों के इष्ट देव थे । प्रारम्भ में उनका विष्णु से कोई सम्बन्ध नहीं था ।" यह भी कहना गलत है, "तीसरी शती ई० पू० में वासुदेव और कृष्ण की अभिन्नता की भावना उत्पन्न हुई । बौद्ध धर्म तथा भागवत साम्प्रदाय का भक्तिमार्ग दोनों समानरूप से ब्राह्मण-साहित्य, कर्मकाण्ड तथा यज्ञप्रधान धर्म की प्रतिक्रिया के रूप में उत्पन्न और विकसित हुए । इसके फलस्वरूप धर्म के क्षेत्र में ब्राह्मणों का एकाधिकार लुप्त हो गया था । बौद्ध-धर्म का अधिकाधिक प्रसार देखकर ब्राह्मणों ने भागवतों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए भागवतों के इष्टदेव वासुदेव कृष्ण को विष्णु नारायण का अवतार मान लिया । इससे अवतारवाद को बहुत प्रोत्साहन मिला । साथ ही साथ विष्णु का भो महत्त्व बढ़ने लगा । इस तरह अवतारवाद की सारी भावना धीरे- धीरे विष्णु नारायण में केन्द्रित होने लगी और वैदिक साहित्य के अन्य अवतारों के कार्य विष्णु में ही आरोपित हुए," क्योंकि उक्त कल्पना को सिद्ध करनेवाला कोई प्रमाण नहीं है । बौद्ध धर्म वैदिक धर्म का प्रतिक्रियारूप था । इसमें तो प्रमाण बौद्ध ग्रन्थ ही है । बुद्ध तथा बौद्धों ने प्रत्यक्ष तथा अनुमान दो ही प्रमाण माने हैं । आगम प्रमाण नहीं माना । फलतः उनके मत में वेदों की मान्यता नहीं है । बौद्ध बुद्ध को ही सर्वज्ञ मानकर बुद्ध-वचन को ही धर्म में प्रमाण मानते हैं । सुतरां वे लोग वैदिक नित्यात्मवाद तथा यज्ञ, याग आदि विशेषतः पश्वादिसमवेत यज्ञ के विरोधी थे । वे जन्मना जाति नहीं मानते थे । सुतरां ब्राह्मण जाति का भी उनकी दृष्टि में कोई महत्त्व नहीं था । परन्तु भागवत भी ऐसे थे यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि भगवान् वासुदेव ने महाभारत तथा गीता में वेद का, आत्मा का तथा वैदिक धर्मों का महत्त्व वर्णन किया है। ऐसी स्थिति में कृष्णभक्त वेद, यज्ञ आदि का विरोधी कैसे हो सकता था ?
अध्याय अवतार-सामग्री २५३ नारायणीयोपाख्यान, श्रीमद्भागवत तथा सर्वोपरि रामायण में वेद, यज्ञों और ब्राह्मणों का प्रभूत महत्त्व वर्णित है। अतः भागवतों के भक्तिसम्प्रदाय को बौद्धों के समान वेद, यज्ञ तथा ब्राह्मणों का विरोधी समझना निरी भ्रान्ति ही है। साथ ही भागवतों के उक्त ग्रन्थों में ही जब वासुदेव कृष्ण को विष्णु का अवतार माना गया है तब तो कृष्ण और वासुदेव की भिन्नता की कल्पना को कोई अवकाश ही नहीं मिलता। ब्राह्मणों ने भागवतों को आकर्षित करने के लिए वासुदेव को विष्णु का अवतार मान लिया, इसका भी कोई आधार नहीं है। उलटा ‘विष्णुर्गोपा अदाभ्यः’ (ऋ० सं० १।२२।१८) इत्यादिरूप से दोनों में ही विष्णु को गोप (कृष्ण) कहा गया है। ‘गोपवेषस्य विष्णोः’ मेघदूत (१।१५) में कालिदास ने भी विष्णु को गोपवेषधारी कहा है। वस्तुतः विष्णु- पुराण आदि ग्रन्थ ब्राह्मणसम्प्रदाय की स्वार्थपूर्ण कल्पना नहीं हैं, किन्तु महर्षि व्यास द्वारा वेदार्थ के उपबृंहण या वेद के भाष्यरूप में ही निर्मित हैं— “इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत् ।” वस्तुस्थितिमूलक होने के कारण ही पुराणों में वेदविरोधी बुद्ध को भी विष्णु का अवतार माना गया है। फिर जब वेदस्वरूप तैत्तिरीय आरण्यक (१०।१।६) में वासुदेव और विष्णु की एकता का प्रमाण मिलता है। वह किसी के संसर्ग से बढ़ने लगा, यह कल्पना भी निर्मूल है। १४३ वें अनु० में बुल्के का कहना कि “इधर अवतारवाद की भावना फैलती जा रही थी; उधर कई शतियों से राम का आदर्श चरित्र भारतीय जनता के सामने आ रहा था। रामायण की लोकप्रियता के साथ-साथ राम का महत्त्व भी बढ़ रहा था। उनकी वीरता के वर्णन में अलौकिकता की मात्रा बढ़ने लगी। रावण पाप और दुष्टता का प्रतीक बन गया और राम पुण्य और सदाचरण के, अतः इस विकास की स्वाभाविक परिणति यह हुई कि कृष्ण की तरह राम भी विष्णु के अवतारों में गिने जाने लगे। राम तथा विष्णु की अभिन्नता की धारणा कब उत्पन्न हुई इसका ठीक समय निर्धारित करना असम्भव है। फिर भी अवतारवाद उत्तरकाण्ड में इतना व्याप्त है कि इसे उत्तरकाण्ड की अधिकांश सामग्री के पूर्व का मानना चाहिए। अतः बहुत सम्भव है कि पहली शती ई० पू० से ही रामावतार की भावना प्रचलित होने लगी थी। रामायण के प्रक्षेपों के अतिरिक्त महाभारत, वायु, ब्रह्माण्ड, विष्णु, मत्स्य, हरिवंश आदि प्राचीनतम पुराणों में अवतारों की तालिका में दाशरथि राम का भी नाम आया है।” यह कथन नितान्त भ्रम एवं दुरभिसन्धिपूर्ण है। कारण कहा जा चुका है कि वेदों, उपनिषदों में अनादिकाल से ही राम के अवतार तथा उनकी उपासना का वर्णन है। जब मन्त्रों, ब्राह्मणों, उपनिषदों तथा ब्रह्म- सूत्रों में परमात्मा का सगुण साकार होना वस्तुस्थिति है तब अवतार केवल भावना की वस्तु कैसे कहा जा सकता है। बुल्के का कथन केवल प्रतिज्ञामात्र है, उसमें कोई हेतु नहीं है। बिना हेतु के अनुमान अकिञ्चित्कर ही होता है। जैसे धूम का अग्नि से कार्य-कारणभाव होने से निश्चित व्याप्ति है तभी धूम से वह्नि का अनुमान होता है। इस प्रकार राम विष्णु के अवतार नहीं हैं इसकी किसी हेतु के साथ व्याप्ति नहीं है। विष्णु और राम दोनों ही पाश्चात्यों एवं बुल्के दोनों के लिए अप्रत्यक्ष ही हैं। फिर, उनका भेद या अभेद भी अप्रत्यक्ष ही है। अप्रत्यक्ष साध्य के साथ साधन की व्याप्ति का प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है। जिन ग्रन्थों के आधार पर विष्णु एवं राम का अस्तित्व सिद्ध होता है, उन्हीं से उनका अभेद भी सिद्ध होता है। अतएव जब प्रामाणिक वेदों, आर्ष रामायण तथा महाभारत इतिहासों से राम की ब्रह्मरूपता सिद्ध है, तब तो तद्विरुद्ध नगण्य जनों की निराधार कल्पना का महत्त्व हो ही नहीं सकता। प्रामाणिक आधार के बिना केवल वीरता एवं लोकप्रियता के कारण ही किसी को अवतार नहीं माना जाता है। सिद्धान्ततः महाभारत, भागवत तथा अन्य पुराणों की अपेक्षा भी रामायण अति प्राचीन तथा प्रामाणिक सद्ग्रन्थ है। अवतार रूप से प्रथम ही राम का अवतार प्रसिद्ध है। इसलिए संसार में राम का नाम सर्वाधिक प्रसिद्ध है। भारत
२५४ रामायणमीमांसा अष्टम में तो बच्चे-बच्चे आस्तिक-नास्तिक सभी की जिह्वा पर राम का नाम प्रख्यात है। कृष्ण की कथाओं में भी आता है कि कृष्ण की माता यशोदा कृष्ण को राम की कथा सुना रही थी, जब सीताहरण की बात आयी तो सोते-सोते कृष्ण बोल पड़े "सौमित्रे क्व धनुर्धनुर्ध्नुरिति व्यग्रा गिरः पान्तु वः।" वस्तुतः जब वेद, उपनिषद् तथा रामायण से अवतारवाद सिद्ध है तब वह भावनामात्र कैसे हो सकता है? यदि वेद आदि प्रमाण नहीं तो बुल्के जैसे लोगों के नगण्य वचनों का ही क्या प्रमाण हो सकता है। कुछ व्यक्तियों की तुच्छ कल्पनाओं के बल पर वेद, उपनिषद्, महर्षियों के रामायण, महाभारत, विष्णुपुराण तथा श्रीमद्भागवत को झूठा मान लेना सर्वथा अनुचित है। १४४वें अनु० में बुल्के कहते हैं—"छठी या सातवीं शती ई० से महात्मा बुद्ध भी विष्णु के अवतार माने जाने लगे।" इसके लिए उन्होंने दिखाया है कि अवतारों की सूची में एकरूपता नहीं है, किन्तु यह तर्क अकिञ्चित्कर है। यह आवश्यक नहीं कि सब बातें सभी जगह लिखी जायें। कहा जा चुका है कि ऐसी अनेकरूपता वेदों और उपनिषदों के कर्मों एवं उपासनाओं में भी आती है और इसी लिए मीमांसा के अनुसार समन्वय करके ही सूत्रों के अनुसार पद्धतियाँ बनती हैं। फिर भी नारायणोय उपाख्यान में विष्णु के दस अवतारों की सूची मिलती है। उसके प्रक्षिप्तत्व की कल्पना निराधार है। श्रीमद्भागवत परम प्रामाणिक ग्रन्थ है। वोपदेव ने श्रीमद्भागवत के आधार पर ही मुक्ताफल नामक ग्रन्थ लिखा है और वे हेमाद्रि के समय के हैं। श्रीभागवत में विष्णु के दस अवतारों का वर्णन है। उसमें बुद्ध की भी गणना है। अतः बुद्ध को छठी शती ई० से अवतार माना जाने लगा यह कल्पना सर्वथा अप्रमाण है। १४५वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "बौद्धों ने ई० सन् के कई सौ वर्ष पूर्व राम को बोधिसत्त्व मानकर राम- कथा की लोकप्रियता का साक्ष्य दिया है। जैनियों ने भी वाल्मीकि की रचना को मिथ्या कहकर रामकथा के एक नये रूप में राम को अपनाने का प्रयत्न किया है।" एतावता बुल्के ने यह स्वीकार किया है कि जैनियों ने वाल्मीकि- रामायण को ही उलट कर रूपान्तर देने की चेष्टा की है, परन्तु रामकथा का प्रारम्भ ई० सन् की कई शतियों पूर्व में हुआ और राम ने ब्राह्मण-धर्म में विष्णु के अवताररूप में निश्चित स्थान प्राप्त कर लिया, इत्यादि बुल्के की उक्तियां निराधार हैं। राम ईसा से लाखों वर्ष पूर्व ही वस्तुतः विष्णुरूप में प्रसिद्ध हैं। इसमें सम्पूर्ण भारतीय साहित्य प्रमाण है। परन्तु बुल्के के कथन में कुछ पाश्चात्यों की अटकलबाजियों को छोड़कर कोई भी प्रमाण नहीं हैं। वस्तुतस्तु भारतीय साहित्यों के अनुसार राम विष्णु के अवतार ही नही किन्तु किसी दृष्टि से अनन्त- अनन्त ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्र राम के अंश से प्रकट होते हैं— "शम्भु विरञ्चि विष्णु भगवाना, उपजहि जासु अंश ते नाना।" ( रा० मा० १।१४३।३ ) श्रीभागवत के अनुसार ब्रह्माजी ने ही स्पष्ट कहा है कि तम, महान्, अहं, आकाश आदि अष्ट आवरणों से आवृत सप्तवितस्तिकायवाला कहाँ मैं और कहाँ आप जिनके रोमकूपों में इसी प्रकार के अगणित ब्रह्माण्ड-परमाणु निरन्तर परिभ्रमण करते रहते हैं। भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार विभिन्न ब्रह्माण्डों के उत्पादक, पालक और संहारक ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र कार्यब्रह्म हैं, परन्तु अनन्त ब्रह्माण्डों के उत्पादक, पालक और संहारक ब्रह्म कारण- ब्रह्म हैं। ऐसी स्थिति में कार्यब्रह्म कारणब्रह्म के अंश ही ठहरते हैं, अतः विष्णुपुराण के विष्णु, शिवपुराण के शिव, रामायण के राम, श्रीभागवत के कृष्ण तथा शाक्तागमों की शक्ति एक ही कारण वस्तुरूप हैं। परन्तु विष्णुपुराणोक्त विष्णु के अंशभूत अनन्त ब्रह्मा, विष्णु, शिवादि कार्यब्रह्म ही हैं। इसी तरह शिवपुराणोक्त शिव के अंशभूत विष्णु आदि भी कार्यब्रह्म ही हैं। इसी दृष्टि से रामायण एवं भागवत के राम और कृष्ण भी कारणब्रह्म रूप हैं। फलतः उनके रोमकूपों में कार्यब्रह्मरूप अनन्त ब्रह्माण्डों के उत्पादक, पालक और संहारक कार्यरूप ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि उनके
अध्याय अवतार-सामग्री २५५ अंश ही हैं। इस दृष्टि से राम का स्वतःसिद्ध लोकोत्तर महत्त्व प्रख्यात है। फिर ईसा की अमुक शती में राम ने ब्राह्मणधर्म में विष्णु के अवतार का पद प्राप्त कर लिया, यह कहना धृष्टतामात्र है । दसवें अध्याय में, १६४वें अनुच्छेद में बुल्के कहते हैं, "रामकथा-साहित्य में अवतारवाद की उत्तरोत्तर बढ़ती हुई व्यापकता के साथ-साथ भक्ति-भावना भी उत्पन्न हुई और धीरे-धीरे विकसित होने लगी। बुल्के की दृष्टि में अवतारवाद एक भावनामात्र है। राम के आदर्शचरित्र के कारण उनमें विष्णु अवतार होने की कल्पना हो गयी, वस्तुतः राम विष्णु अवतार नहीं थे। परन्तु अवतारभावना के साथ-साथ राम-भक्ति भी विकसित होने लगी।" परन्तु विष्णु, राम, कृष्ण अनादि काल से ही भारतीय साहित्य में परब्रह्म रूप से प्रसिद्ध हैं। अतः उनकी भक्ति भी अनादिकाल से ही सिद्ध है। उसका विकास या कल्पना नहीं है। बुल्के कहते हैं, "भारतीय भक्ति-मार्ग का सूत्रपात और विकास राम-भक्ति के शताब्दियों पूर्व हुआ था । वेदों में इसका बीजारोपण हुआ और भागवत धर्म में वह पल्लवित हुआ। बौद्ध धर्म और जैन-धर्म की भाँति भागवतों का भक्ति-मार्ग भी कर्मकाण्ड तथा यज्ञप्रधान ब्राह्मण-धर्म की प्रतिक्रिया रूप में उत्पन्न हुआ। लेकिन इसमें वेदों की निन्दा को स्थान नहीं मिला और इस प्रकार बाद में ब्राह्मण तथा भागवत धर्म के समन्वय के साथ वैष्णव धर्म की उत्पत्ति सम्भव हो सकी । इसमें भागवतों के देवता वासुदेव कृष्ण प्राचीन वैदिक देवता विष्णु के अवतार माने गये हैं। भक्ति-भावना इन्हीं विष्णु नारायण वासुदेव कृष्ण में केन्द्रीभूत होकर उत्तरोत्तर विकसित होने लगी । विष्णु के अवतार भी माने जाने लगे । जिनमें से रामावतार भारतीय संस्कृति के दृष्टिकोण से सबसे महत्त्वपूर्ण है । फिर भक्तिमार्ग के इतिहास में भागवत धर्म तथा पाञ्चरात्र के साहित्य में शाण्डिल्यभक्तिसूत्र, नारदीयभक्तिशास्त्र, रामानुज, निम्बार्क, मध्व तथा वल्लभाचार्य के सम्प्रदायों में कृष्णावतार को प्रायः एकाधिकार मिला है।" परन्तु अपने उक्त कथन की पुष्टि में बुल्के ने कोई प्रमाण नहीं दिया। टिप्पणी में इनसाइक्लोपीडिया आव रिलीजन एण्ड एथिक्स के भक्तिमार्ग, हेमचन्द्रराय चौधरी के अर्ली हिस्ट्री आव वैष्णव सेक्ट, बलदेवप्रसाद मिश्र के तुलसीदर्शन को ही अपने कथन का आधार बताया है, जो कि स्वयं में ही प्रमाण नहीं हो सकते, क्योंकि उक्त कथन भारतीय साहित्य के विरुद्ध ही हैं। बुल्के भी वेदों में भक्तिमार्ग का बीज मानते हैं। पर वेद नित्य एवं अनादि हैं (दे० वेदप्रामाण्य ) । भागवतों का भक्तिमार्ग ब्राह्मण-धर्म की प्रतिक्रिया के रूप में नहीं, किन्तु वह ब्राह्मण- धर्म का ही एक अंग है। साथ ही वैदिक धर्म से भिन्न कोई ब्राह्मण-धर्म है यह केवल पाश्चात्यों की कल्पना है। वेदों के आरण्यक, उपनिषद् भागों में ही उपासना और ज्ञान काण्ड का प्रतिपादन है। इसी लिए वेद त्रिकाण्ड कहा जाता है। वेदों में कर्मकाण्ड की तथा कर्मकाण्ड में भी अनेक निन्दाएँ मिलती हैं पर उन निन्दाओं का तात्पर्य विविक्षित अर्थ की स्तुति में ही होता है : "नहि निन्दा निन्यं निन्दितुं प्रवर्तते अपितु विधेयं स्तोतुम् । यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति ॥" "अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः ॥" (यजु० सं० ४०।९) उक्त प्रसङ्गों में वेदोक्त कर्मकाण्ड और उपासनात्मक ज्ञान दोनों की निन्दा है । पर यह निन्दा दोनों के समुच्चयानुष्ठान विधि के प्रशंसार्थ ही है। इस तरह कहीं कर्मकाण्ड की निन्दा देखकर इसे प्रतिक्रिया समझना भ्रान्ति ही है। महाभारत वेद का उपबृंहणमात्र है। श्रीभागवत में कहा गया है कि भगवान् व्यास ने भारत के व्यपदेश से वेदार्थ ही प्रदर्शित किया है। फलतः भागवत-धर्म का मूल नारायणीयोपाख्यान आदि भी वेदार्थ का ही उपबृंहणमात्र है। विष्णुपुराण, हरिवंश, भागवत आदि सभी पुराण भी वेदार्थ के उपबृंहण और वेद के विस्तृत आर्ष भाष्यमात्र हैं ।
२५६ रामायणमीमांसा अष्टम
शैव, वैष्णव, शाक्त आदि विभिन्न आगम एवं तन्त्र आदि भी वैदिक धर्म की ही शाखा-प्रशाखाओं के ही उपबृंहक हैं। सर्वत्र ही न केवल विष्णु या कृष्ण की ही भक्ति वर्णित है बल्कि शिव, शक्ति, विष्णु एवं राम तथा कृष्ण आदि की भक्ति का स्पष्ट वर्णन है। जैसे उपनिषदों में रामतापनीय है वैसे ही गोपालतापनीय, नृसिंहतापनीय आदि हैं। रामानुज, निम्बार्क, मध्व आदि ने रामायण, महाभारत, विष्णुपुराण, श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थों को परम प्रमाण माना है। सुतरां उनमें वर्णित राम की भक्ति को भी पूर्णरूप से आदृत किया है। श्रीमद्भागवत के नवें स्कन्ध में रामचरित का सर्वोत्तम वर्णन है।
'भक्ति का सूत्रपात ई० सन् के प्रारम्भ के आसपास हुआ' यह कहना सर्वथा असङ्गत है। वेद एवं वेदोक्त भक्ति अनादि है। आधुनिक इतिहास की दृष्टि में भी वेद, वैदिक सभ्यता तथा शिवभक्ति ईसा से हजारों वर्ष पूर्व का है। ऋग्वेद में रुद्र शब्द का प्रयोग शिव के लिए मिलता है और जो विशेषण शिवजी के लिए प्रयुक्त हुए हैं, वे प्रायः रुद्र के लिए मिलते हैं। शिव शब्द भी है ही।
आधुनिक मोहनजोदड़ो और हरप्पा की खुदाई ने भारतीय धार्मिक इतिहास पर बहुत प्रभाव डाला है। वहाँ दो प्रकार की शिव-मूर्तियाँ मिली हैं, पहली जो मोहनजोदड़ो की मुहरों में मिली है, उसमें योगावस्था में बैठे ध्यानी शिव हैं। इसमें शिवजी बीच में बैठे हैं ओर चारों ओर पशुओं की आकृतियाँ हैं। शिव को पशुपतिनाथ कहा ही जाता है, अतः बाघ, हाथी, गेंडा और भैंसा ध्यानी शिव के चारों तरफ खड़े हैं। त्रिशूल की जगह पर शिव के मस्तक पर तीन आकृतियाँ हैं। उसमें शिव के सिंहासन के नीचे दो मृग भी हैं। दूसरी मुहर में शिव के तीन मुख हैं जो ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश त्रिरूप के बोधक हैं। हरप्पा में बहुत सी पत्थर की सामग्रियाँ मिली हैं जो शिव-लिङ्ग जैसी हैं। एतावता शिव-लिङ्ग की पूजा स्वतः प्रमाणित हो जाती है। ऋग्वेद में शिश्नदेवाः शब्द (ऋ० सं० ७।२१।५ और १०।१०।१९) आया है। पाश्चात्य लोग इसके आधार पर कहते हैं कि अनार्य लोग शिव-लिङ्ग के पूजक थे, आर्यों में उन्हीं से वह ली गयी है। परन्तु पाश्चात्यों की उक्त धारणा गलत है। यास्क तथा सायण ने इसका 'अब्रह्मचर्य' अर्थ लिया है। शिश्नोदरपरायण विषयी लोग शिश्नदेव माने जाते थे। अब भी वैसे ही माने जाते हैं। इस आधार पर कम से कम ६ हजार वर्ष पहले शिव-पूजा प्रचलित थी, यह सिद्ध होता है।
ईसा से २०० वर्ष पूर्व पुष्यमित्र शृङ्ग ने वैदिक धर्म का प्रसार किया। ईसा के पूर्व पहली शती में बैंक्ट्रियन तथा शक राजाओं ने उत्तर पश्चिम भारत पर राज्य किया था। उनके सिक्कों पर वृषभ के चिह्न हैं।
ईसा की पहली शती में कुषाणवंशीय नरेशों ने एक बहुत बड़ा राज्य स्थापित किया था जिसका विस्तार वाराणसी तक था। राजा बीम कड फाइसीस तो शैव धर्म स्वीकार कर महादेव का पूर्ण उपासक हो गया था। उसके सिक्कों से यह स्पष्ट है। उनमें एक तरफ राजा का चित्र है दूसरी तरफ महादेव नन्दी को साथ लिए खड़े हैं। उनमें शिवजी त्रिशूल और डमरू लिये दिखाये गये हैं। कनिष्क ने भी वैसे ही सिक्के चलाये थे। उसके सिक्कों में शिवजी ईशो या ईश नाम से अङ्कित हैं। उस मूर्ति में महादेव की चार भुजाएँ हैं।
काशीप्रसाद जायसवाल ने नागवंशीय राजाओं का पता लगाया है। यह वंश कुषाणों के बाद और गुप्तकाल के पहले का है। इसके शिलालेखों से विदित होता है कि इस वंश के आदि पुरुष ने शिवलिङ्ग को अपने कन्धे पर रखकर शिवजी को परितुष्ट कर राज्य-स्थापना की थी। अंसभारसंनिवेशितशिवलिङ्गोद्वहनशिवसुपरितुष्टसमुत्थापित- राजवंशानां पराक्रमाधिगतभागीरथ्यमलजलमूर्धाभिषिक्तानां दशाश्वमेधावभृथस्नानानां भारशिवानाम्। (ना० प्र० पत्रिका भाग १२ अङ्क १)। इस वंश का नाम ही भारशिव था। इसके बाद भी गुप्तकाल में और उसके बाद भी शिव की उपासना चलती रही।
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“योजनौ रुद्रो यो अप्स्वन्तर्य ओषधीर्वीरुध य इमा विश्वा भुवनानि चाक्लृपे तस्मै रुद्राय
नमोऽअस्त्वग्नये ।” ( अथ० सं० ७।९२।१ ), “भुवनस्य पितरं गीर्भिराभी रुद्रं दिवा वर्धया रुद्रमक्तौ ।
बृहन्तमृष्वमजरं सुषुम्न मृध्नुवेम कविनेषितासः ॥” ( ऋ० सं० ६।४९।१० )
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जो रुद्र अग्न्यादि वेदों का कारण है, जो विश्व का एकमात्र स्वामी है, महाज्ञानी और अतीन्द्रियार्थदर्शी है
और जो हिरण्यगर्भ को उत्पन्न करता है वह हमें शुभ बुद्धि दे । जो रुद्र अग्नि में, जल में, ओषधियों और वनस्पतियों
में है और जो भुवनों का निर्माण करता है उस तेजस्वी रुद्र को हमारा नमस्कार हो। जो भुवनों का रक्षक है तथा जो
`बड़ा ज्ञानी है, प्रेरक
२५८ रामायणमीमांसा अष्टम थे तब हनुमान् और लक्ष्मण उन्हें दबा-दबाकर उनकी थकावट दूर करते थे । शूर्पणखा की नाक और कान काटकर विरूप करने के कारण उन्हें अपनी प्रिया का वियोग भी सहना पड़ा । इस वियोगजनित रोष के कारण भौंहें तन गयीं जिन्हें देखकर समुद्र भी भयभीत हो गया । इसके बाद उन्होंने समुद्र में पुल बाँधा और लङ्का में जाकर दुष्ट राक्षसों के जङ्गल को दावाग्नि के समान दग्ध कर दिया । वे कोशलेन्द्र हम सबकी रक्षा करें । “नेदं यशो रघुपतेः सुरयाञ्चयाऽऽत्तलीलातनोरधिकसाम्यविमुक्तधाम्नः । रक्षोवधो जलधिबन्धनमक्षपूगैः किं तस्य शत्रुहनने :कपयः सहायाः ॥” (भा० पु० ९।११।२०) “यस्यामलं नृपसदःसु यशोऽधुनापि गायन्त्यघघ्नमृषयो दिग्भेन्द्रपट्टम् । तं नाकपालवसुपालकिरीटजुष्टपादाम्बुजं रघुपतिं शरणं प्रपद्ये ॥” (भा० पु० ९।११।२१) भगवान् श्रीराम के समान भी यश और ऐश्वर्यवाला कोई नहीं, फिर उनसे अधिक ऐश्वर्यशाली कैसे कोई हो सकता है ? भगवान् ने देवताओं की प्रार्थना से ही दिव्य लीलाविग्रह धारण किया था । उन रघुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीराम के लिए यह कोई बड़े गौरव की बात नहीं है कि उन्होंने अस्त्र-शस्त्रों से बड़े-बड़े राक्षसों को मार डाला, या समुद्र पर पुल बाँध दिया । भला क्या उन्हें शत्रुओं को मारने के लिए बन्दरों की सहायता की आवश्यकता थी । वस्तुतः सब उनकी लीला ही थी । भगवान् का निर्मल यश सब पापों को नष्ट करनेवाला है । वह इतना फैल गया कि दिग्गजों का भूषणरूप हो गया है । आज भी बड़े-बड़े मार्कण्डेय आदि ऋषि-महर्षि युधिष्ठिर आदि राजाओं की सभाओं में उस यश का गान करते हैं । स्वर्ग के देवता तथा पृथ्वी के नरपति अपने कमनीय किरीटों से उनके चरणकमल का नीराजन करते हैं । श्रीमद्भागवत वोपदेवकृत है यह कहना असङ्गत है, क्योंकि १३ वीं शती में देवगिरिस्थ वोपदेव ने भागवत के ही आधार पर मुक्ताफल, भागवतानुक्रमणिका और भागवतसारबोधक ग्रन्थ लिखे हैं । यदि वोपदेव ने भागवत भी बनाया होता तो उसका उल्लेख अवश्य किया होता । जैसे अन्य ग्रन्थों के कर्ता के रूप में वोपदेव का उल्लेख है वैसे ही भागवत में भी उल्लेख होना चाहिए था । परन्तु भागवत के प्रथम स्कन्ध में कर्ता रूप से ही व्यास का उल्लेख है । वोपदेव के आश्रयदाता चतुर्वर्गचिन्तामणि के निर्माता हेमाद्रि थे । उन्होंने महापुराणों के दान के प्रसङ्ग में श्रीमद्भागवत पुराण का भी दान लिखा है । यदि भागवत का निर्माण उसी समय हुआ होता तो महापुराणों के प्रसङ्ग में महा- पुराणरूप से भागवत का दान वर्णन कैसे होता ? फिर, वोपदेव हुए तेरहवीं शती में ग्यारहवीं शती का हस्तलिखित भागवत काशी के सरस्वतीभवन में विद्यमान है । श्रीमध्वाचार्य ने अपने भागवततात्पर्यनिर्णय ग्रन्थ में लिखा है— ‘श्रीशङ्कराचार्यचित्सुखाचार्यप्रभृतिभिर्भागवते टीकाः कृताः ।’ अर्थात् श्रीशङ्कराचार्य, चित्सुखाचार्य आदि ने भागवत पर टीकाएँ लिखी थीं । पद्मपुराण के वासुदेव- सहस्रनामभाष्य में श्रीशङ्कराचार्य ने स्वयं भागवत के श्लोक का उद्धरण किया है । श्लोक यह है—"पश्यन्त्यदो रूपमभ्रचक्षुषा ।” ( भाग० पु० १।३।४ ) । शङ्कराचार्य के परम गुरु गौड़पादाचार्य ने पञ्चीकरण-टीका में भागवत का उल्लेख किया है— “स यैः स्पृष्टोऽभिदृष्टो वा संविष्टोऽनुगतोऽपि वा । कोशलास्ते ययुः स्थानं यत्र गच्छन्ति योगिनः ॥” (भा० पु० ९।११।२२) जिन्होंने राम का स्पर्श किया, जिन्होंने दर्शन किया, जो पास बैठे और जिन्होंने राम का अनुगमन किया वे सभी कोशलवासी जहाँ योगी लोग जाते हैं उस दिव्य साकेत धाम में पहुँच गये । जब शङ्कराचार्य का समय ही
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अध्याय अवतार-सामग्री २५९ नेपाल में मिले प्रमाणों के आधार पर ईसा से सात सौ वर्ष पूर्व है तो उनके परमगुरु गौडपादाचार्य के समय की प्राचीनता में क्या सन्देह ? जब उनके द्वारा भी रामभक्ति से ओतप्रोत भागवत-श्लोक उद्धृत है तो भक्तिमार्ग को और भागवत को ईसा से कुछ वर्ष पूर्व के कहने का क्या अर्थ है । श्रीकृष्ण भगवान् भी अपनी विश्वविख्यात गीता में जैसा कहते हैं— ‘वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि’ (गी० १०।३७ ) वृष्णियों में मैं वासुदेव हूँ । उसी तरह कहते हैं—‘रामः शस्त्रभृतामहम्’ (गी० १०।३१ ) । शस्त्रधारियों में मैं राम हूँ । जन-जन में रामनाम जितना प्रख्यात है उतना और कोई भी विष्णु, कृष्ण आदि का नाम प्रख्यात न हो सका । पद्मपुराण के अनुसार शिवजी ने पार्वती को बतलाया कि राम ही मेरा धन है। एक बार रामनाम का जप विष्णुसहस्रनाम जप के तुल्य होता है । हे मनोरमे ! मैं उसी राम में रमण करता हूँ । हे वरानने ! मैं अतिराम अर्थात् जामदग्न्य का अतिक्रमण करनेवाले राम में अतिरमण करता हूँ । अतिरामे रामे अतिरामे— “राम रामेतिरामेति रमे रामे मनोरमे । सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥” १४७ वें अनु० में बुल्के का यह कहना भी असङ्गत है कि “रामायण के प्रक्षिप्त अंशों में तथा भारत में कई स्थलों पर रामावतार का उल्लेख है ।” भ्रान्ति या दुरभिसन्धि से ही बुल्के रामावतार-बोधक श्लोकों को प्रक्षिप्त मानते हैं । उनके पास इसके लिए कोई भी ठोस आधार नहीं है । जब कि अवतार-पक्ष में वेद, रामायण, महाभारत तथा सभी पुराण प्रमाण हैं । सीता को लक्ष्मी बतलानेवाला युद्धकाण्ड का श्लोक भी प्रक्षिप्त नहीं है । अतएव प्राचीन रामसाहित्य में कहीं भी रामभक्ति का निरूपण नहीं मिलता, यह कहना भी गलत है, क्योंकि रामतापनीय, रामरहस्योपनिषद्, वाल्मीकिरामायण, महाभारत, अध्यात्मरामायण, पुराण आदि सब प्राचीन राम- साहित्य हैं । उनमें रामभक्ति का पूर्णतया उल्लेख है । बुल्के का कहना हैं कि “हरिवंश में तथा प्राचीन पुराणों में भी रामभक्ति का उल्लेख नहीं हुआ, अतः रामावतार की भावना के बहुत काल के बाद राम-भक्ति तथा रामपूजा का आविर्भाव हुआ है। सर रामकृष्णपुल भण्डारकर का कहना है—यद्यपि ई० सन् के प्रारम्भ से ही राम विष्णु के अवतार माने गये थे, किन्तु उनकी विशेषरूप से प्रतिष्ठा ११ वीं शती के लगभग प्रारम्भ हुई । डाक्टर श्राडर का भी यह निर्णय है कि जिन वैष्णवसंहिताओं में राम अथवा राधा की एकान्तिक पूजा प्रतिपादित की गयी है वे अर्वाचीन हैं और पाञ्चरात्र के प्रामाणिक साहित्य के अनुकरण से उत्पन्न हुई हैं। फिर भी गुप्तकालों में विष्णु के अन्य अवतारों की भाँति राम की भी पूजा प्रचलित थी । धर्मोत्तरपुराण तथा वराहमिहिर की बृहत्संहिता में राममूर्ति के निर्माण के लिए नियम मिलते हैं। ५वीं शती की वाकाटक महारानी राम गिरिखामी की भक्त थी । सम्भवतः वे दाशरथि राम थे । अग्निपुराण में मत्स्यादि-प्रतिमा-लक्षण नामक ४९ वें अध्याय में राम की मूर्ति का उल्लेख है ।” उक्त सभी लेखक पाश्चात्यों के ही प्रभाव से प्रभावित होकर उक्त निष्कर्ष पर पहुँचे हैं । रामायण में राम को परब्रह्म पुरुषोत्तम कहा गया है और फलश्रुति में राम-भक्ति करनेवालों को उत्तम फल की प्राप्ति कही गयी है। श्रीराम के रामायण का सादर श्रवण करने से श्रद्धालु जितक्रोध होकर विविध विपत्तियों को पार कर लेता है । उसके सुनने से सब देवता प्रसन्न होते हैं और प्रार्थित वरप्रदान करते हैं। स्त्रियाँ इसके सुनने से उत्तम पुत्र प्राप्त करती हैं। प्राणी सब पापों से मुक्त होता है । रामायण सुनने से ऐश्वर्य एवं पुत्र का लाभ होता है । सम्पूर्ण रामायण के सुनने से और पढ़ने से राम प्रसन्न होते हैं । राम साक्षात् सनातन विष्णु, आदिदेव हरि एवं नारायण हैं—
२५० रामायणमीमांसा अष्टम “प्रीयते सततं रामः स हि विष्णुः सनातनः । आदिदेवो महाबाहुर्हरिनारायणः प्रभुः ॥” (वा० रा० ६।१२८।११७) राम की स्तुति करते हुए ब्रह्माजी ने कहा है—राम आपका दर्शन अमोघ है एवं आपका संस्तवन अमोघ है। भूतल में आपकी भक्ति करनेवाले मनुष्य भी अमोघ होंगे। ध्रुव, पुराणपुरुषोत्तमस्वरूप आपको जो भजेंगे वे इस लोक और परलोक के सब अभीष्टों को प्राप्त करेंगे— “अमोघं दर्शनं राम अमोघस्तव संस्तवः । अमोघास्ते भविष्यन्ति भक्तिमन्तो नरा भुवि ॥ ये त्वां देवं ध्रुवं भक्ताः पुराणं पुरुषोत्तमम् । प्राप्नुवन्ति तथा कामानिह लोके परत्र च ॥” (वा० रा० ६।११९।३०, ३१) जब इस तरह राम के समकाल में ही ब्रह्मादि देवता ही राम की भक्ति और उसका फल वर्णन करते हैं और महाभारत एवं पुराण सभी इसका साक्ष्य दे रहे हैं तब यह कहना कि ११वीं शती से राम की भक्ति चली धृष्टतामात्र है। हरिवंश में राम को विष्णु का स्वरूप बताया है तो सुतरां उनकी भक्ति सिद्ध है। भक्ति का अर्थ मूर्ति-पूजा ही नहीं है; श्रवण, पठन, ध्यान आदि भी भक्ति है। वस्तुतस्तु भगवद्गुणगणश्रवणजनित द्रवीभूत अन्तःकरण की भगवदाकाराकारित वृत्ति ही भक्ति है— “मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये । मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ ॥ (भा० पु० ३।२९।११) जैसे समुद्र की ओर द्रवीभूत निर्मल परम पवित्र गङ्गा का अविच्छिन्न प्रवाह प्रवाहित होता है इसी तरह सर्वगुहाशयी भगवान् की ओर निर्मल द्रवीभूत अन्तःकरण की अविच्छिन्न वृत्ति ही भक्ति है। जो राम का अवतार और राम की भक्ति का वर्णन करने के कारण ही परम प्रामाणिक रामायण के अविभाज्य अङ्ग को प्रक्षिप्त कहने का साहस कर सकता है वह प्रामाणिक से प्रामाणिक ग्रन्थ को प्रक्षिप्त कह सकता है। बुल्के को वाल्मीकिरामायण के पाँच काण्ड प्रामाणिकरूप से मान्य हैं पर उनमें अवतार-बोधक वचनों को वे प्रक्षेप मानते हैं। वे कहते हैं कि प्राचीन पुराणों में राम की भक्ति का उल्लेख नहीं है। यदि उन प्रामाणिक पुराणों में रामभक्ति का उल्लेख मिल जाय तो बुल्के उनको भी प्रक्षेप कह देंगे। इसकी कोई चिकित्सा ही नहीं है। इस तरह तो ईसाई बुल्के की बाइबिल को भी तो प्रक्षिप्त कहा जा सकता है। विष्णुधर्मोत्तर और अग्निपुराण भी अर्वाचीन नहीं हैं। भारतीय दृष्टिकोण से पुराण अति प्राचीन हैं, अतएव वेदों तथा उपनिषदों में पुराणों का वर्णन है। उन्हें पांचवे वेद की संज्ञा दी गयी है। यह पीछे कहा जा चुका है। पुराणों के अनुसार राम भी पुराणों का श्रवण करते थे। तुलसीदासजी भी कहते हैं— “वेदपुरान वसिष्ठ बखानहिं । सुनहिं राम यद्यपि सब जानहिं ॥” (रा० मा० ७।२५।१) वेद, पुराण सभी अनादि ही हैं। भेद इतना ही है कि वेदों की आनुपूर्वी कभी नहीं बदलती है, अतः वे अपौरुषेय हैं। इतिहास-पुराण पौरुषेय हैं, अतः उनकी आनुपूर्वी विभिन्न कल्पों में बदलती रहती है। परन्तु कथावस्तु और सिद्धान्त ज्यों के त्यों बने रहते हैं। इतिहास पुराण-कार त्रिकालज्ञ ऋषि हैं। अतः उनके ग्रन्थों में अतीत के समान ही अनागत वृत्तान्तों का भी वर्णन हुआ है। यह न समझने के कारण ही बुल्के आदि किसी अर्वाचीन वस्तु को देखकर उसके आधार पर पुराणों के रचना-काल की खोज करते हैं। इन्हीं वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत तथा पुराणों के अनुसार ही तमिल के प्राचीनतम आल्वारों के स्तोत्रों में राम का उल्लेख हुआ है। कुलशेखर ( नवी शती के ) आल्वार द्वारा कृत रामभक्ति का निरूपण स्वतन्त्र
अध्याय अवतार-सामग्री- २६१
नहीं है, किन्तु वह सब वेदादि के आधार पर ही आधारित है। अतएव यह भी कहना निराधार है, "रामभक्ति तथा रामपूजा का शास्त्रीय प्रतिपादन पहले पहल रामानुजसम्प्रदाय में हुआ है।" यह कहना भी अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना है कि 'रामानुज ने भी रामभक्ति पर कुछ नहीं लिखा'; परन्तु अपने श्रीभाष्य में उन्होंने विभवों में राम और कृष्ण का उल्लेख किया है ( श्रीभाष्य २।२।४२ ), क्योंकि उनके सम्प्रदाय में प्रथम अर्चावतार की पूजा होती है, उसके पश्चात् विभव की पूजा होती है। अतः राम और कृष्ण को विभव स्वीकार करने से ही उनकी भक्ति भी स्वीकृत हो जाती है। बुल्के कहते हैं, "रामानुजसम्प्रदाय में अगस्त्यसंहिता, कलिराघव, बृहद्राघव, राघवौयसंहिता तथा तीन रामभक्तिसम्बन्धी उपनिषदें सुरक्षित हैं—रामपूर्वतापनीय, रामोत्तरतापनीय तथा रामरहस्योपनिषद् । इनमें रामयन्त्र, राममन्त्र तथा सीतामन्त्र आदि का उल्लेख है।" पर बुल्के का उक्त कथन सर्वथा अशुद्ध और अप्रामाणिक है, क्योंकि अगस्त्यसंहिता ग्रन्थ अतिप्राचीन है। उसका रामानुजसम्प्रदाय में परम आदर अवश्य है। परन्तु वह सम्प्रदाय के किसी आचार्य की कृति है, इसमें कोई प्रमाण नहीं है। बुल्के भी कोई प्रमाण नहीं दे सके । रामतापनीय आदि उपनिषदें तो अनादि अपौरुषेय वेद के अविभाज्य अङ्ग होने से अपौरुषेय वेद ही हैं। राममन्त्र, सीतामन्त्र आदि अनादि परम्परा से ही प्रचलित हैं। किसी सम्प्रदाय में मन्त्र का निर्माण करके उपदेश नहीं होता, किन्तु अनादिपरम्पराप्राप्त मन्त्र का ही उपदेश होता है। इसी कारण इतर सम्प्रदायों में भी राममन्त्र-परम्परा चलती है। राममन्त्र अति प्राचीन स्मार्त सम्प्रदाय में भी प्रचलित है। अतएव रामतापनीय में स्पष्ट कहा गया है कि साक्षात् शङ्कर ने भी राममन्त्र का जप किया था। इसे मिथ्या कहने का साहस करना साहस ही होगा। अपनी बातों की पुष्टि में बुल्के ने भण्डारकर तथा डा० श्राडर के लेखों का स्मरण किया है जो कि स्वयं ही प्रमाणसापेक्ष हैं। बुल्के के अनुसार "उत्तरतापनीय तथा रामरहस्योपनिषद् में अद्वैत भक्ति भी प्रतिपादित है— "सदा रामोऽहमस्मीति तत्त्वतः प्रवदन्ति ये । न ते संसारिणो नूनं राम एव न संशयः ॥" जो सर्वदा तत्त्व की दृष्टि से अपने को कार्यकारणसङ्घात से भिन्न अखण्डबोध रामरूप ही समझते हैं वे संसारी न होकर राम ही हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं है।" यह उद्धरण ही बुल्के के इस कथन को अप्रमाणित सिद्ध करता है कि ये उपनिषदें रामानुजसम्प्रदाय में ही निर्मित हुई हैं। कारण यदि ये किसी रामानुजीय आचार्य से निर्मित होती तो इनमें अद्वैत का वर्णन नहीं हो सकता, क्योंकि उस सम्प्रदाय में अपने को राम या विष्णु या ब्रह्म समझना एक प्रकार का अपराध है। वे यह भी कहते हैं कि "रामतापनीय के अनेक स्थलों पर अध्यात्मरामायण के रामहृदय का साम्य पाया जाता है ( ४।७।१९) । इसमें संक्षिप्त रामचरित भी दिया गया है जिसके अनुसार रावण ने मुक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से सीता का हरण किया था 'स्वनिवृत्त्यर्थम्' । राम और लक्ष्मण (सीता की खोज के व्याज से ) पृथिवी का भ्रमण करते थे तथा सुग्रीव ने सीता को ले आने की आज्ञा दी थी।" वस्तुतः वेद और उपनिषद् ही रामचरित्र रामायणादि ग्रन्थों के भी मूल हैं। यह पीछे स्पष्ट किया जा चुका है, अतः अध्यात्मरामायण आदि रामतापनीय के अनुसार ही हो सकते हैं। उपनिषद् में निवृत्त्यर्थ में निवृत्ति का अर्थ मुक्ति नहीं है, किन्तु नाश ही अर्थ है। यह व्यावहारिक भाषा है। जैसे कहा जाता है पतङ्ग अपने नाश के लिए दीपादि पर हमला करता है। उसी तरह रावण भी अपने नाश के लिए ही
सीताहरणरूप कार्य में प्रवृत्त हुआ था। कलिसन्तरण और कृष्णोपनिषद् में भी राम के नाम का माहात्म्य और राम की चर्चा है ही। तारसार, त्रिपादविभूतिमहानारायण, मुक्तिकोपनिषद् आदि में राम की चर्चा है ही। त्रिपादविभूतिमहानारायण में तो भरताग्रज जानकीवल्लभ सम्बन्धित ७ वें अध्याय में 'दाशरथाय विद्महे सीता- वल्लभाय धीमहि तन्नो रामः प्रचोदयात्' इस रामगायत्री का उल्लेख है। और भी अनेक उपनिषदों में राममाहात्म्य तथा वन्दना वर्णित है। मुक्तिकोपनिषद् में 'राम त्वं परमात्मासि' इत्यादि उक्तियाँ ठीक ही हैं। सीतोपनिषद् भी श्रुति ही है। बुल्के कहते हैं, "उन सब ग्रन्थों की रचना का काल निर्धारित करना असम्भव प्रतीत होता है।" वस्तुतः प्रतीत नहीं असम्भव ही है। कारण, वेद अनादि हैं। उक्त उपनिषदें वेद हैं, अतः अनादि ईश्वर के अनादि निःश्वासभूत हैं। उनका रचनाकाल ढूँढना अनभिज्ञता ही है। संसार में कोई भी व्यक्ति छोटा सा भी लेख लिखता है तो उपाधियों सहित उसमें अपने नाम का उल्लेख करता है। यदि ये उपनिषदें किसी व्यक्तिविशेष की निर्मित होतीं तो इनमें उस लेखक का नाम अवश्य होता। लेखक का नाम न होने से भी इनकी अपौरुषेयता ही व्यक्त होती है। वेबर ने रामतापनीय का प्राचीनतम निर्माणकाल ११वीं शती माना है। उनके अनुसार उस समय से लेकर रामभक्तिविषयक साहित्य का निर्माण होने लगा था। परन्तु वेबर की यह कल्पना अटकल पर ही निर्भर है। रामार्चनसोपान, सर्वसिद्धान्त, रामार्चनपद्धति, रामपूजापद्धति आदि पौरुषेय ग्रन्थों के निर्माणकाल की कल्पना ठीक हो सकती है। इसी प्रकार भगवद्गीता के अनुकरण पर रामगीता नामक ग्रन्थों का उल्लेख मानना भी अशुद्ध है। कारण जिस महाभारत का भगवद्गीता रत्न माना जाता है उसमें उत्तरगीता, अनुगीता आदि अनेक गीताओं का उल्लेख है। इसमें अनुकरण का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। अतएव अध्यात्मरामायण की रामगीता, स्कन्दपुराणीय निर्वाणखण्ड की रामगीता को किसी का अनुकरण नहीं कहा जा सकता। अध्यात्मरामायण की रामगीता को तो कथमपि अनुकरण नहीं कहा जा सकता। तत्त्वमस्यादि वाक्यों का विवेचन और श्लोकों का ढङ्ग इसका सर्वथा विलक्षण ही है। गो० तुलसीदासजी का श्रोराचरितमानस किसी सम्प्रदायविशेष पर निर्भर नहीं है, किन्तु उनके ही शब्दों में नानापुराण, निगम, आगम और अपनी परम्परा पर ही निर्भर है। बुल्के का यह कहना भी अशुद्ध है, "रामभक्ति के विकास के साथ-साथ रामकथा को भक्ति के ढाँचे में ढालने की आवश्यकता का अनुभव हुआ। फलस्वरूप बहुत से साम्प्रदायिक रामायणों की सृष्टि होने लगी। जिनमें अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण तथा अद्भुतरामायण प्रमुख हैं।" क्योंकि रामभक्ति के विकास के आधार पर भक्तिग्रन्थों का आविर्भाव नहीं हुआ। किन्तु उन वेद, उपनिषद् आदि ग्रन्थों के आधार पर ही भक्ति का आविर्भाव हुआ है। अतः अध्यात्मरामायण आदि को अर्वाचीन बतलाने का साहस करना वृथा ही है। अध्यात्मरामायण का निर्माण शङ्कराचार्य के अद्वैतसिद्धान्त के अनुसार नहीं हुआ, किन्तु शङ्कराचार्य के अद्वैतसिद्धान्त को ही इसके अनुसार कहा जा सकता है। तभी तो इसका सम्मान अन्य सम्प्रदायों में भी है। यदि यह शङ्कराचार्य के सिद्धान्त के आधार पर निर्मित होता तो निश्चित ही विशिष्टाद्वैती तथा रामानन्दीय सम्प्रदाय में इसका इतना आदर न होता। अद्वैत- बोधक बहुत से वचन जैसे वेदों, उपनिषदों तथा पुराणों में मिलते हैं, वैसे ही अध्यात्मरामायण में भी हैं। अतः इतने से ही किसी अद्वैतसम्प्रदायी द्वारा उसका निर्माण नहीं कहा जा सकता। श्रीमद्भागवतपुराण का भी राम- चरितमानस में आश्रय लिया गया है। रामचरितमानस का भी वह मुख्य आधार पुराणांश होने से ही हुआ है। अतएव वह अध्यात्मरामायण तथा ब्रह्माण्डपुराण का ही अंश माना जाता है। यदि अन्य कोई रचयिता होता तो वह ऐसे ग्रन्थरत्न के रचयिता के रूप में अपने नाम का अवश्य उल्लेख करता। अतएव १७५ वें अनु० की बुल्के की कल्पनाएँ निराधार ही हैं। एकनाथ वाल्मीकिरामायण की अपेक्षा अध्यात्मरामायण को अर्वाचीन मानते हैं। सो यह तो ठीक ही है। वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ चौबीसवीं चतुर्युगी के त्रेतायुग की कृति है और
अध्याय अवतार-सामग्री २६३ अध्यात्मरामायण २८वीं चतुर्युगी के द्वापर में व्यास द्वारा निर्मित है, अतः उसकी प्राचीनता महाभारत के समान ही असन्दिग्ध है। भारतीय लेखक मिथ्या संवाद नहीं लिखते । अतएव सर्वज्ञकल्प व्यास ने ही ब्रह्मानारदसंवाद और पार्वती-शङ्कर संवाद के रूप में अध्यात्मरामायण का आविर्भाव किया है। अवतारवाद की व्यापकता वस्तुस्थिति है। श्रीराम परब्रह्म हैं और सीता मूलप्रकृति है, यह उल्लेख ठीक ही है। बालकाण्ड में भागवत का अनुकरण करके राम का कौशल्या को अपना विष्णुरूप दिखलाया गया है, यह भी अशुद्ध है, क्योंकि पुराणों में अन्यत्र भी वही पद्धति है। वामन भगवान् भी अपनी माता अदिति के सामने चतुर्भुजरूप से ही प्रकट हुए थे। इसी तरह भगवान् व्यास तथा ब्रह्मा, नारद और शिव, पार्वती की परम्परा के राम का कौशल्या में वैसा ही आविर्भाव हुआ है। इसी लिए इस संवाद में वैसा उल्लेख है। अहल्योद्धार, केवट का वृत्तान्त, अभिषेक के पूर्व राम-नारदसंवाद, मन्थरा में सरस्वती का प्रवेश, वाल्मीकि द्वारा अपनी कथा द्वारा रामनाम का माहात्म्य वर्णन, मायामयी सीता का हरण-वृत्तान्त, लक्ष्मण का १९ वर्ष तक उपवास आदि, सेतुबन्ध के पूर्व रामेश्वर शिवलिङ्ग की स्थापना आदि सब वृत्तान्त कल्पना नहीं हैं किन्तु वस्तुस्थिति के अनुसार ही उनका उल्लेख है। तदनुसार ही अनेक पुराणों में भी रामेश्वरस्थापना का वर्णन है। इतना ही नहीं आज तक सेतुबन्ध रामेश्वर नाम से ही धनुष्कोटि के समीप रामेश्वर लिङ्ग स्थित है। देश-देशान्तर से लक्ष्यों लक्ष आस्तिक दर्शन करने जाते हैं। 'नह्यमूलं प्ररोहति' बिना मूल के यह सब सम्भव नहीं हो सकता। अद्भुतरामायण को भी अर्वाचीन कहना अशुद्ध ही है। विभिन्न रामायणों और पुराणों में रामकथा की वस्तु के भेद का कारण कल्पभेद ही है। रामचरितमानस में कहा गया है— “कलपभेद हरि चरित सुहाये, भाँति अनेक मुनीसन गाये ।” ( रा० मा० १।३२।४ ) सहस्रमुख रावणवध आदि भी कल्पनामात्र नहीं है। अतीत घटनाओं में इतिहास आदि ग्रन्थ ही प्रमाण होते हैं। अतः अद्भुतरामायण के अनुसार तथावर्णित उस घटना के अभाव में कोई प्रमाण नहीं। आनन्दरामायण भी अद्भुतरामायण आदि के तुल्य वाल्मीकिकृत ही है। पुराणों तथा वाल्मीकिपरम्परा प्राप्त वचनों के आधार पर प्रत्येक आस्तिक यह जानता है कि रामायण ग्रन्थ शतकोटि श्लोकों में विस्तृत हुआ है। “चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् । एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥” ( रामरक्षास्तोत्र ) रघुनाथ रामभद्र का चरित्र शतकोटि श्लोकों में विस्तृत हुआ है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा है— “रामायन सतकोटि अपारा” ( रा० मा० १।३२।३ ), “रामचरित सतकोटिमहँ, लिय महेश जिय जानि ।” ( रा० मा० १।२५ ) रामचरित मानस में कवीश्वर और कपीश्वर दोनों को 'सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारी' कहा गया है। “सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ । वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ ॥” ( रा० मा० १।मंगलाचरण। ४ ) तुलसीदास जैसे तत्त्वदर्शी सन्त स्वप्न में भी अनृतवादी होना पाप मानते हैं। फिर वे मिथ्या बातों को अपने अमरकाव्य में कैसे स्थान दे सकते थे ? वी. राघवन्, जी. ग्रियर्सन आदि समालोचकों की समालोचना निष्प्रमाण ही है। उन विदेशियों एवं भारतीयसंस्कारशून्य लोगों को इन परम प्रामाणिक आर्षग्रन्थों के सम्बन्ध में
२६४ रामायणमीमांसा अष्टम कुछ भी ज्ञात नहीं है। जैसे कुरान, बाइबिल आदि ग्रन्थों के सम्बन्ध में भी उनके रहस्यज्ञ विद्वान् ही कुछ कह सकते हैं, अन्य नहीं वैसे ही रामायण के सम्बन्ध में भी समझना चाहिये । १५०वें अनु० में बुल्के का कहना है "भारतीय भक्तिमार्ग के इतिहास में कृष्ण तथा बाद में राधा और कृष्ण का स्थान निर्विवाद रूप से प्रधान है और रामभक्ति पर कृष्णभक्ति का प्रभाव पड़ जाना स्वाभाविक था। राम के प्रति दास्यभक्ति के अतिरिक्त माधुर्यभक्ति का भी प्रतिपादन किया गया है। इस माधुर्यभक्ति के आधार पर रसिकसम्प्रदाय का सम्भवतः १६वीं शती ई० के अन्त में प्रवर्तन हुआ ।” यह कथन भी असङ्गत ही है, क्योंकि भारतीय भक्ति का इतिहास अति प्राचीन काल से वेदों में ही वर्णित है। “मुमुक्षुर्वे शरणमहं प्रपद्ये ।” “यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ ।” ( श्वे० उ० ६।२३ ) । के अनुसार प्रपत्ति, भक्ति तथा शरणागति शब्द एक ही वस्तु के बोधक हैं। निर्गुण निराकार ब्रह्म तथा सगुण साकार ब्रह्म की भी भक्ति वेदों में वर्णित है । वेदों और उपनिषदों में उपासना एवं तत्त्वज्ञान का ही प्राधान्येन वर्णन है । ब्रह्मसूत्रों में भी उपासना और तत्त्वज्ञान की दृष्टि से ही ब्रह्म का विचार प्रस्तुत हुआ है। दर्शन, वेदन, ज्ञान आदि शब्दों का उपासना के प्रसङ्ग में उपासना ही अर्थ है। यह शङ्कर, रामानुज, निम्बार्क, मध्व तथा वल्लभ सभी को मान्य है। यह उपासना भी भक्ति है। श्रीरामानुजाचार्य ने ध्रुवा स्मृति को भक्ति माना है। श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य, आत्मनिवेदन तथा पूर्णानुरक्ति आदि सभी प्रकार की भक्तियाँ वेदों में वर्णित हैं। “सर्वलोकशरण्याय विभीषणमुपस्थितम् ।” “त्यक्त्वा पुत्रांश्च दारांश्च राघवं शरणं गतः ।।” ( वा० रा० ६।१८।१६,१७ ) “सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते । अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ।।” ( वा० रा० ६।१८।३३ ) सर्वमान्य गीता में भी भक्ति और शरणागति का खूब उल्लेख है। उसमें स्वयं भगवान् द्वारा ईश्वर (शिव) की शरणागति का उल्लेख है— “तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत । तत्प्रसादात्परां शान्तिस्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥” ( गीता १८।६२ ) अतः भक्ति का प्रचार आधुनिक नहीं है। उक्त वचनों में शरणागति का वर्णन भक्ति का ही वर्णन है । हनुमान्, विभीषण, भरत तथा लक्ष्मण ये भी उत्कृष्ट कोटि के भक्त थे। आजकल भक्तों एवं परम भागवतों में इन सबकी गणना है । श्रीतुलसीदासजी ने कहा है— “भरत सरिस को रामसनेही । जग जपु राम राम जपु जेही ।” ( वा० रा० २।२१७।४ ) भागवत आदि में नमस्कार भी वन्दनरूप भक्ति है । वेदों में 'नमस्ते रुद्र मन्यव उतोत इषवे', 'नमो हिरण्य- बाहवे' आदि रूप से भगवान् सगुण साकार शिवजी का स्पष्ट ही वर्णन है। रामेश्वर शिवलिङ्ग की स्थापना करनेवाले राम शिवभक्त ही थे। उपमन्यु से शिवमन्त्र की दीक्षा लेकर शिवजी की उपासना करते थे। महाभारत में श्रीकृष्ण ने भीष्म और धर्मराज के अनुरोध पर शिवजी की भक्ति का वर्णन किया है। महाभारत में ही श्रीकृष्ण के उपदेश से अर्जुन ने भगवती की स्तुति की थी। अतः भारतीय भक्ति के इतिहास में अनादिकाल से ही शिव, विष्णु, सीताराम तथा राधाकृष्ण की भक्ति प्रचलित है। अतः ११वीं या १७वीं शती से कृष्ण या राम की भक्ति प्रचलित हुई इत्यादि कल्पनाएँ निर्मूल ही हैं ।
अध्याय अवतार-सामग्री २६५ उत्तररामचरित, जानकीहरण, हनुमन्नाटक आदि ही नहीं वेदों, उपनिषदों और वाल्मीकिरामायण में भक्ति-भावना से ही रामचरित्र का वर्णन हुआ है । इसी लिए "प्रीयते सततं रामः" ( वा० रा० ६।१२८।११७ ) इत्यादि वचनों से कहा गया है कि रामायण-श्रवण से राम प्रसन्न होते हैं। इतना ही नहीं भारतीय दर्शनों के अनुसार 'भूतं भव्याय कल्पते' प्रत्येक भूत सिद्ध वस्तु का वर्णन उपासना या कर्म के लिए होता है। इसी लिए 'आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम्' ( जै० सू० १।२।१ ) में कहा गया है कि आम्नाय वेदराशि का क्रिया ही प्रयोजन है, अतः क्रिया जिनका अर्थ नहीं है वे अर्थवाद और मन्त्र आदि अनर्थक होंगे । इसी लिए विधि के साथ एकवाक्यता के द्वारा विध्यर्थ की स्तुति करके विधि का अङ्ग बनकर ही अर्थवाद सार्थक होता है। मन्त्र भी विध्यर्थ के अनुष्ठान में अपेक्षित कर्माङ्ग द्रव्य और देवता का स्मरण कराकर विधियोग से ही सार्थक होते हैं । ठीक इसी तरह रामायण आदि में राम और रामचरित्र का वर्णन उपास्यस्वरूप के समर्पण द्वारा उपासना में ही उपयुक्त होकर सार्थक होता है। सगुण ब्रह्म और उसका चरित्र उपास्यरूप में ही वर्णित होता है। निर्गुण ब्रह्म के प्रसङ्ग में सृष्टिकारणत्वादि वर्णन निर्गुण ब्रह्म के ज्ञान के अङ्गरूप में हुआ है । लाखों करोड़ों श्लोकों में राम और रामचरित्र का वर्णन भक्ति एवं तत्त्वज्ञान के लिए हैं, अतः भक्ति को अर्वाचीन काल का मानना अत्यन्त असङ्गत है । अध्यात्मरामायण की बाललीला पर कृष्ण की बाललीला का प्रभाव सुस्पष्ट है। आनन्दरामायण, सत्यो- पाख्यान आदि में जो राम-सीता की विलासक्रीड़ाओं का विस्तृत वर्णन किया गया है वह भी कृष्णलीला से प्रभावित है । कृष्णलीला के अनुकरण की परमसीमा यह है कि भुशुण्डिरामायण, हनुमत्संहिता, बृहत्कोसलखण्ड, संगीतरघुनन्दन आदि ग्रन्थों में राम की रासलीला की कल्पना कर ली गयी है। विवाह के पूर्व तथा पश्चात् राम अयोध्या के आस- पास रासलीला करते हैं तथा वनवास के समय चित्रकूट में भी । आगे चलकर मधुराचार्य आदि रसिक-सम्प्रदाय के आचार्यों ने रामकथा में यह परिवर्तन किया है कि वास्तव में न तो मीता का हरण हुआ और न स्वयं ब्रह्मराम ने एक तुच्छ राक्षस के वध के लिए धनुषबाण ही धारण किया है। वनयात्रा के समय राम, लक्ष्मण और सीता चित्रकूट के आगे नहीं बढ़े । वे स्वयं अपनी आह्लादिनी शक्ति सीता के साथ चित्रकूट में विहार करते रहे। इस लीला में कैङ्कर्य और व्यवस्था लक्ष्मण, जो जीवतत्त्व के प्रतिनिधि थे, करते रहे। चित्रकूट के आगे लक्ष्मी, नारायण और शेष उनके वेष में गये थे । परात्पर ब्रह्म रामजी ने रावण का वध करके सीता रूपी लक्ष्मी का उद्धार किया था । चित्रकूट लौट आये । कृपानिवासजी ने स्वरचित रामायण में यह कथा विस्तारपूर्वक लिखी है। मधुराचार्य ने राज्याभिषेक के अनन्तर सीता-वनवास की घटना को इसी प्रकार राम की प्रकाशलीला माना है। उपर्युक्त उल्लेखों के आधार पर भी राम की बाललीला और मधुर आदि लीलाओं को अनुकरण नहीं कहा जा सकता है। यह सब तभी कहा जा सकता है जबकि यह मान लिया जाय कि राम और राम की कथाएँ वस्तुस्थितिमूलक नहीं हैं केवल कल्पना- मूलक हैं; पर यह शतशः खण्डित है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि रामलीला कृष्णलीला की अपेक्षा अति प्राचीन है । कहा जा चुका है कि महर्षि वाल्मीकि ने अपौरुषेय वेदों, उपनिषदों तथा श्रीनारद के उपदेशों से राम की कथावस्तु को जानकर और समाधिजनित ऋतम्भरा प्रज्ञा से सम्पूर्ण चरित्रों का प्रत्यक्ष साक्षात्कार कर रामायण का निर्माण किया है। महर्षि व्यास ने इसी तरह श्रीमद्भागवत का निर्माण किया है। रामायण शतकोटिप्रविस्तर है । उसका सार २४ हजार श्लोकों का वर्तमान रामायण ग्रन्थ है। इसके अन्य अंश रामचरित का किन्हीं महर्षियों को वाल्मीकि के समान ही साक्षात्कार हो सकता है। वर्तमान रामायण की अधिकांश कथावस्तु तो राम की ४० वर्ष की आयु के भीतर की है। वाल्मीकि के अनुसार ११ हजार वर्ष तक राम धरातल पर राज्य करते रहे हैं। अतः उनके सम्पूर्ण जीवन का वृत्तान्त लिखा जाय तो शतकोटि भी कम ही है । इसके अतिरिक्त यह कहा गया कि अधिकांश वाल्मीकि- रामायण का निर्माण सीताशुद्धि के उद्देश्य से ही हुआ है । इसके अतिरिक्त बहुत से गुप्त चरित्र हो ही सकते हैं ३४
२६६ रामायणमीमांसा अष्टम जिनका उल्लेख अन्य रामायणों में या अन्य ऋषियों की कृतियों में हो सकता है । जिनको आर्षविज्ञान नहीं सम्भव है ऐसे कविगण तो रामायण, महाभारत, पुराण, उपपुराण, तन्त्र, आगम आदि प्रामाणिक आर्ष ग्रन्थों के आधार पर ही काव्य-निर्माण करते हैं ! क्योंकि सिद्धान्त ग्रन्थों का ही उन्हें वैसा ही निर्देश है और वैसी ही परम्परा है । आर्ष विज्ञान के आधार पर प्रथम काव्य होने से ही वाल्मीकिरामायण आदि काव्य कहा जाता है। विक्रम २००० पूर्व महाकवि कालिदास ने भी वाल्मीकिरामायण को आदि काव्य कहा है। पुराणों के अनुसार वेदवेद्य परमात्मा जब दशरथात्मज राम के रूप में प्रकट हुए तब साक्षात् वेद भी महर्षि प्राचेतस से रामायण के रूप में अवतरित हुए— 'वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे । वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षाद्रामायणात्मना ।।' (लवकुशप्रोक्त मङ्गलाचरण १३) 'अनन्ता वै वेदाः' ( तै० ब्रा० ३।१०।११।४ ) के अनुसार वेद अनन्त हैं, ईश्वर का ज्ञान अनन्त है । कोई भी ज्ञान बिना शब्दानुवेध के नहीं होता है । सुतरां ईश्वर का अनन्त ज्ञान जिन शब्दों से अनुविद्ध था वे ही वैदिक शब्द हैं । अनन्त वेद का अवतार शतकोटि रामायण के ही रूप में हो सकता है । वर्तमान वाल्मीकिरामायण गायत्री मन्त्र के २४ अक्षरों के आधार पर है । अतः जो वेद या आर्ष ज्ञान राम की लीलाओं के आधार थे वे ही कृष्ण लीलाओं के आधार थे । इसलिए कई अंशों में तुल्यता परिलक्षित होती है । अतः तुल्यता देखकर किसी को किसी का अनुकरण कहना ठीक नहीं । अतएव बुद्ध और ईसा की बहुत अंशों में तुल्यता होने पर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि ईसा के चरित्रलेखक ने बुद्ध के चरित्र का अनुकरण किया है । श्रीमद्भागवत के अनुसार भगवान् का अवतार केवल धर्म-ग्लानि (अधर्म) की निवृत्ति तथा धर्मसंस्थापना एवं दुष्टदर्पदलन तथा साधुपरित्राण के लिए ही नहीं, किन्तु मुख्यतया अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रों को भक्तियोग-विधान के लिए ही होता है— “तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम् । भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येमहि स्त्रियः ॥” (भा० पु० १।८।२०) श्रीमद्भागवत में यह भी उल्लेख है कि भक्त की मनोवाञ्छा के अनुसार ही भगवान् अपना रूप बनाते हैं— “यद्यद् धिया त उरुगाय विभावयन्ति । तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥” (भा० पु० ३।९।११) वेद में भी उल्लेख है कि 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' ( ऋ० सं० १।१६४।४६ ) एक ही तत्त्व मित्र, वरुण, अग्नि आदि अनेक रूपों से प्रकट होता है, 'तं यथा यथोपासत' ( श० ब्रा० १०।५।२।२० ) । उस परमेश्वर की जिस प्रकार उपासना की जाती है परमेश्वर उन-उन रूपों में ही उपलब्ध होता है । गीता में भगवान् को गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, शरण तथा सुहृद् रूप से उपास्य कहा गया है— “गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृद् ।” (गी० ९।१८) अर्जुन ने भी कहा है कि हे देव, जैसे सखा सखा के अपराधों को एवं प्रिय प्रिया के अपराधों को क्षमा करता है वैसे ही आप भी मेरे अपराधों को क्षमा कीजिये । इन्हीं शास्त्रीय आधारों पर अनादिकाल से ही परमेश्वर के प्रति मधुरभाव की उपासना होती है । ऋग्वेद के अपालासूक्त में अपाला ने इन्द्र की कान्तभाव से उपासना की थी । इन्हीं मूल आधारों पर ही अगस्त्यसंहिता आदि आर्ष ग्रन्थों में वस्तुस्थिति के अनुसार ही श्रीराम की मधुर उपामनाओं का वर्णन हुआ है । भागवत आदि ग्रन्थों में भी उसी के आधार पर मधुर भक्ति का वर्णन है । शिवजी के प्रति भी