भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 330

अध्याय अवतार-सामग्री २५३ नारायणीयोपाख्यान, श्रीमद्भागवत तथा सर्वोपरि रामायण में वेद, यज्ञों और ब्राह्मणों का प्रभूत महत्त्व वर्णित है। अतः भागवतों के भक्तिसम्प्रदाय को बौद्धों के समान वेद, यज्ञ तथा ब्राह्मणों का विरोधी समझना निरी भ्रान्ति ही है। साथ ही भागवतों के उक्त ग्रन्थों में ही जब वासुदेव कृष्ण को विष्णु का अवतार माना गया है तब तो कृष्ण और वासुदेव की भिन्नता की कल्पना को कोई अवकाश ही नहीं मिलता। ब्राह्मणों ने भागवतों को आकर्षित करने के लिए वासुदेव को विष्णु का अवतार मान लिया, इसका भी कोई आधार नहीं है। उलटा ‘विष्णुर्गोपा अदाभ्यः’ (ऋ० सं० १।२२।१८) इत्यादिरूप से दोनों में ही विष्णु को गोप (कृष्ण) कहा गया है। ‘गोपवेषस्य विष्णोः’ मेघदूत (१।१५) में कालिदास ने भी विष्णु को गोपवेषधारी कहा है। वस्तुतः विष्णु- पुराण आदि ग्रन्थ ब्राह्मणसम्प्रदाय की स्वार्थपूर्ण कल्पना नहीं हैं, किन्तु महर्षि व्यास द्वारा वेदार्थ के उपबृंहण या वेद के भाष्यरूप में ही निर्मित हैं— “इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत् ।” वस्तुस्थितिमूलक होने के कारण ही पुराणों में वेदविरोधी बुद्ध को भी विष्णु का अवतार माना गया है। फिर जब वेदस्वरूप तैत्तिरीय आरण्यक (१०।१।६) में वासुदेव और विष्णु की एकता का प्रमाण मिलता है। वह किसी के संसर्ग से बढ़ने लगा, यह कल्पना भी निर्मूल है। १४३ वें अनु० में बुल्के का कहना कि “इधर अवतारवाद की भावना फैलती जा रही थी; उधर कई शतियों से राम का आदर्श चरित्र भारतीय जनता के सामने आ रहा था। रामायण की लोकप्रियता के साथ-साथ राम का महत्त्व भी बढ़ रहा था। उनकी वीरता के वर्णन में अलौकिकता की मात्रा बढ़ने लगी। रावण पाप और दुष्टता का प्रतीक बन गया और राम पुण्य और सदाचरण के, अतः इस विकास की स्वाभाविक परिणति यह हुई कि कृष्ण की तरह राम भी विष्णु के अवतारों में गिने जाने लगे। राम तथा विष्णु की अभिन्नता की धारणा कब उत्पन्न हुई इसका ठीक समय निर्धारित करना असम्भव है। फिर भी अवतारवाद उत्तरकाण्ड में इतना व्याप्त है कि इसे उत्तरकाण्ड की अधिकांश सामग्री के पूर्व का मानना चाहिए। अतः बहुत सम्भव है कि पहली शती ई० पू० से ही रामावतार की भावना प्रचलित होने लगी थी। रामायण के प्रक्षेपों के अतिरिक्त महाभारत, वायु, ब्रह्माण्ड, विष्णु, मत्स्य, हरिवंश आदि प्राचीनतम पुराणों में अवतारों की तालिका में दाशरथि राम का भी नाम आया है।” यह कथन नितान्त भ्रम एवं दुरभिसन्धिपूर्ण है। कारण कहा जा चुका है कि वेदों, उपनिषदों में अनादिकाल से ही राम के अवतार तथा उनकी उपासना का वर्णन है। जब मन्त्रों, ब्राह्मणों, उपनिषदों तथा ब्रह्म- सूत्रों में परमात्मा का सगुण साकार होना वस्तुस्थिति है तब अवतार केवल भावना की वस्तु कैसे कहा जा सकता है। बुल्के का कथन केवल प्रतिज्ञामात्र है, उसमें कोई हेतु नहीं है। बिना हेतु के अनुमान अकिञ्चित्कर ही होता है। जैसे धूम का अग्नि से कार्य-कारणभाव होने से निश्चित व्याप्ति है तभी धूम से वह्नि का अनुमान होता है। इस प्रकार राम विष्णु के अवतार नहीं हैं इसकी किसी हेतु के साथ व्याप्ति नहीं है। विष्णु और राम दोनों ही पाश्चात्यों एवं बुल्के दोनों के लिए अप्रत्यक्ष ही हैं। फिर, उनका भेद या अभेद भी अप्रत्यक्ष ही है। अप्रत्यक्ष साध्य के साथ साधन की व्याप्ति का प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है। जिन ग्रन्थों के आधार पर विष्णु एवं राम का अस्तित्व सिद्ध होता है, उन्हीं से उनका अभेद भी सिद्ध होता है। अतएव जब प्रामाणिक वेदों, आर्ष रामायण तथा महाभारत इतिहासों से राम की ब्रह्मरूपता सिद्ध है, तब तो तद्विरुद्ध नगण्य जनों की निराधार कल्पना का महत्त्व हो ही नहीं सकता। प्रामाणिक आधार के बिना केवल वीरता एवं लोकप्रियता के कारण ही किसी को अवतार नहीं माना जाता है। सिद्धान्ततः महाभारत, भागवत तथा अन्य पुराणों की अपेक्षा भी रामायण अति प्राचीन तथा प्रामाणिक सद्ग्रन्थ है। अवतार रूप से प्रथम ही राम का अवतार प्रसिद्ध है। इसलिए संसार में राम का नाम सर्वाधिक प्रसिद्ध है। भारत