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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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२५४ रामायणमीमांसा अष्टम में तो बच्चे-बच्चे आस्तिक-नास्तिक सभी की जिह्वा पर राम का नाम प्रख्यात है। कृष्ण की कथाओं में भी आता है कि कृष्ण की माता यशोदा कृष्ण को राम की कथा सुना रही थी, जब सीताहरण की बात आयी तो सोते-सोते कृष्ण बोल पड़े "सौमित्रे क्व धनुर्धनुर्ध्नुरिति व्यग्रा गिरः पान्तु वः।" वस्तुतः जब वेद, उपनिषद् तथा रामायण से अवतारवाद सिद्ध है तब वह भावनामात्र कैसे हो सकता है? यदि वेद आदि प्रमाण नहीं तो बुल्के जैसे लोगों के नगण्य वचनों का ही क्या प्रमाण हो सकता है। कुछ व्यक्तियों की तुच्छ कल्पनाओं के बल पर वेद, उपनिषद्, महर्षियों के रामायण, महाभारत, विष्णुपुराण तथा श्रीमद्भागवत को झूठा मान लेना सर्वथा अनुचित है। १४४वें अनु० में बुल्के कहते हैं—"छठी या सातवीं शती ई० से महात्मा बुद्ध भी विष्णु के अवतार माने जाने लगे।" इसके लिए उन्होंने दिखाया है कि अवतारों की सूची में एकरूपता नहीं है, किन्तु यह तर्क अकिञ्चित्कर है। यह आवश्यक नहीं कि सब बातें सभी जगह लिखी जायें। कहा जा चुका है कि ऐसी अनेकरूपता वेदों और उपनिषदों के कर्मों एवं उपासनाओं में भी आती है और इसी लिए मीमांसा के अनुसार समन्वय करके ही सूत्रों के अनुसार पद्धतियाँ बनती हैं। फिर भी नारायणोय उपाख्यान में विष्णु के दस अवतारों की सूची मिलती है। उसके प्रक्षिप्तत्व की कल्पना निराधार है। श्रीमद्भागवत परम प्रामाणिक ग्रन्थ है। वोपदेव ने श्रीमद्भागवत के आधार पर ही मुक्ताफल नामक ग्रन्थ लिखा है और वे हेमाद्रि के समय के हैं। श्रीभागवत में विष्णु के दस अवतारों का वर्णन है। उसमें बुद्ध की भी गणना है। अतः बुद्ध को छठी शती ई० से अवतार माना जाने लगा यह कल्पना सर्वथा अप्रमाण है। १४५वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "बौद्धों ने ई० सन् के कई सौ वर्ष पूर्व राम को बोधिसत्त्व मानकर राम- कथा की लोकप्रियता का साक्ष्य दिया है। जैनियों ने भी वाल्मीकि की रचना को मिथ्या कहकर रामकथा के एक नये रूप में राम को अपनाने का प्रयत्न किया है।" एतावता बुल्के ने यह स्वीकार किया है कि जैनियों ने वाल्मीकि- रामायण को ही उलट कर रूपान्तर देने की चेष्टा की है, परन्तु रामकथा का प्रारम्भ ई० सन् की कई शतियों पूर्व में हुआ और राम ने ब्राह्मण-धर्म में विष्णु के अवताररूप में निश्चित स्थान प्राप्त कर लिया, इत्यादि बुल्के की उक्तियां निराधार हैं। राम ईसा से लाखों वर्ष पूर्व ही वस्तुतः विष्णुरूप में प्रसिद्ध हैं। इसमें सम्पूर्ण भारतीय साहित्य प्रमाण है। परन्तु बुल्के के कथन में कुछ पाश्चात्यों की अटकलबाजियों को छोड़कर कोई भी प्रमाण नहीं हैं। वस्तुतस्तु भारतीय साहित्यों के अनुसार राम विष्णु के अवतार ही नही किन्तु किसी दृष्टि से अनन्त- अनन्त ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्र राम के अंश से प्रकट होते हैं— "शम्भु विरञ्चि विष्णु भगवाना, उपजहि जासु अंश ते नाना।" ( रा० मा० १।१४३।३ ) श्रीभागवत के अनुसार ब्रह्माजी ने ही स्पष्ट कहा है कि तम, महान्, अहं, आकाश आदि अष्ट आवरणों से आवृत सप्तवितस्तिकायवाला कहाँ मैं और कहाँ आप जिनके रोमकूपों में इसी प्रकार के अगणित ब्रह्माण्ड-परमाणु निरन्तर परिभ्रमण करते रहते हैं। भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार विभिन्न ब्रह्माण्डों के उत्पादक, पालक और संहारक ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र कार्यब्रह्म हैं, परन्तु अनन्त ब्रह्माण्डों के उत्पादक, पालक और संहारक ब्रह्म कारण- ब्रह्म हैं। ऐसी स्थिति में कार्यब्रह्म कारणब्रह्म के अंश ही ठहरते हैं, अतः विष्णुपुराण के विष्णु, शिवपुराण के शिव, रामायण के राम, श्रीभागवत के कृष्ण तथा शाक्तागमों की शक्ति एक ही कारण वस्तुरूप हैं। परन्तु विष्णुपुराणोक्त विष्णु के अंशभूत अनन्त ब्रह्मा, विष्णु, शिवादि कार्यब्रह्म ही हैं। इसी तरह शिवपुराणोक्त शिव के अंशभूत विष्णु आदि भी कार्यब्रह्म ही हैं। इसी दृष्टि से रामायण एवं भागवत के राम और कृष्ण भी कारणब्रह्म रूप हैं। फलतः उनके रोमकूपों में कार्यब्रह्मरूप अनन्त ब्रह्माण्डों के उत्पादक, पालक और संहारक कार्यरूप ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि उनके